हिन्दी दिवस परः शैल अग्रवाल

नहीं जानती त्योहार की तरह मनाई जाती है या श्राद्ध की तरह, पर चन्द भाव पुष्प चरणों में …

मैं हिन्दी (1)
लचीली डाल हूँ मैं झुककर भी ना टूट पाऊँगी
जितना ही लूटोगे तुम मुझे ऊपर ही उठती जाऊँगी
फिर फिर के खिलूंगी में टूट टूटकर झरझर के
बासंती बयार के दुलार पर सावन की पहली फुहार पर

मैं हिन्दी (2)
अच्छा नही लगता
जब अपने ही घर में
हाशिए पर रखकर मुझे
चिंतित होते हो तुम
मेरे भविष्य के बारे में
और विचार विमर्श करते हो
मेरे उत्थान और पतन पर
जलती बुझती चिनगारियों सा
तुम्हारा यह उत्साह
मन के अँगार को
कुछ और हवा दे जाता है।

जैसे जीती आई हूँ
वैसे ही जी लूँगी मैं आगे भी
आंसुओं की स्याही में डूबी
तो किलकारियों में अनुगुंजित
कहीं तुम्हारे आस पास ही
यादों की धरोहर बनी
अपने प्रेमियों के ह्रदय में, जिह्वा पर.
कलम से प्रेरणा का अदम्य स्रोत-बनी
बहती ही रहूँगी मैं निरंतर गंगा-सीं
,भूलो मत,
मुझसे ही है
तुम्हारी यह संस्कृति
आचार संहिता वांगमय
सारा गौरवमय अतीत
मेरे सहारे यह पहचान तुम्हारी
तुम्हारे सहारे जिन्दा मैं नहीं।…

3.
हिन्दी दिवस।
प्रेम दिवस, मातृ दिवस, पित्र दिवस
बेटी दिवस बाल दिवस परिवार दिवस,
मित्रता दिवस पर्यावरण दिवस, जल दिवस, पृथ्वी दिवस
और अब एक और हिन्दी दिवस भी

जिस- जिस पर खतरा नजर आया
या वक्त नहीं दे पाए हम
मना लेते हैं उन्ही के नाम पर एक और दिवस
दर्शा आते हैं एक दिन की प्रतिबद्धता और निष्ठा
और धो लेते हैं हाथ अपने सारे उत्तरदायित्वों से।

मत रो हिन्दी पर तू अकेली तो नहीं
जिसे याद किया जाता है बस
साल में एक दिन
सैनिक, किसान, मजदूर, और नारी
कितने भूखे नंगे और व्यथित भी तो हैं
जो खड़े हैं इसी कतार में उपेक्षित और बेहाल
तालियाँ और फूलमाला लदा अखबारों में सुर्खियाँ बना
एक ही दिन तो है इनके भी बस नाम
जिन्दगी की व्यस्तताओं में भूल जाना गुनाह तो
पर इतना बड़ा भी नहीं,जितना कि सुध ही ना लेना
पता नहीं माना मान-सम्मान देते ये महज कर्तव्यवश
या फिर किसी बोझ तले या बस इसलिए कि चलन है
यह भी तो देख पर कितने व्यस्त हैं ये
किस-किस और कैसे कैसे भव्य आयोजनों में
खाए-अघाए दावतें खाते लोग तेरे नाम पर
घर की दाल रोटी अच्छी नहीं लगती इन्हे
किसी का जन्मदिन तो किसी का मरण दिन
अपनों को छोड़ सभी की सुध ले लेते हैं ये
आलू प्याज, और मिर्च मसाला ही नही
बहुत कुछ देखना और समझना पड़ता है इन्हें
दुनिया भर की खबरों के साथ सेल में आज
हर तरह का सामान बिकते देखा है इन्होंने
जरूरत हो या न हो, बस लेते और देते रहो
विज्ञापन के इस युग में आदमी की सोच
संस्कृति सभ्यता और जिन्दगी,
सब विज्ञापन-सी ही तो चलती है
खुद भी तो विज्ञापन ही बनना चाहते हैं हम अब
डेस्क से सीधे पेट तक जाते मशीनी युग के ये सपने
इन्हें भी तो यंत्रचलित रखते हैं
फुरसत किसके पास है अब
आत्मा को मार बस तन मन की भूख मिटाते
दौड़ते हांफते खुद बेहाल लोग हैं ये
चन्द घड़ियाली आंसू रो आए तो क्या
बनावटी मुस्कान पहन तुझे बहला आए तो क्या
महज स्वार्थ और दिखावा ही सही,
मिलने जुलने का बहाना ही सही
आभार मान, झूठे सच्चे वादे तो किए,
वरना फुरसत किसके पास अब
जो बूढ़ी मां तक जाए.!

4.

कब खिली कब मुरझा गई…
कब चांद तारों सी पुनः बिखरी
महकाती मन का कोना कोना
जिसने बूझी बस उसने जानी
शबनम के कतरों-सी
बारबार फना होती रही
नरगिसी है यह जुबां अपनी

ख्वाबों के इन कालीनों पे मगर
संभस-संभल कर ही चलना दोस्त
इन दागों को धोते-मिटाते
पीढ़ियाँ बूढ़ी हो जाती हैं
हमने तो बस इतना देखा
हमने तो बस इतना जाना
तह में गिरे या तट पर खेले
एक लहर है यह आज भी
जुबाँ मां के दूध की
जुबाँ अपने जजबातों की
सिमटी तो दुगने वेग से
वापस आ जाएगी…

5.

रूस की भाषा रूसी, फ्रांस की फ्रेंच
चीन की चीनी और इंगलैंड की इंगलिश
फिर हमारे बीच ही क्यों यह बहस यह मुद्दा
एक दिन की धूम सारी, एक दिन की ही बात
365 दिनों में क्यों हो हिन्दी का एक ही दिन खास
हिन्दी हिन्द की बोली, भारत की एकता का परिणाम
बापू का सपना और भारतेन्दु की मेहनत का अंजाम
मैकाले की कूट नीति थी जो देश बना अंग्रेजी का गुलाम

नहीं बहकेंगे पर अब हिन्दी ही भारत की भाषा, सहमत
नहीं बैर विरोध किसी भाषा किसी बोली से,बहनें हैं सब
सारी भाषाएं और बोली का ही तो है हिन्दी सामूहिक नाम
लिखते पढते, जिसमें करेंगे अब हम अपने सारे ही काम
दुनिया फूट तो डालेगीं पर देना है मां को पूरा सम्मान

कई बोलियों का देश हमारा कई जाति और प्रांत
जानें बाहरवाले पर हिन्द के वासी हम हिन्दी जिनकी जुबान
शब्द सहोदर हिलमिल रहते, उठाएँ क्यों फिर नफरत की दीवार
मां बोली से ही तो समझ पाते हम अपनों का लाड़ दुलार
किसे कहते हैं दुनिया की भीड़ में अपना घर संसार

हिन्दी ने ही सिखलाया लिखना पढ़ना, कहना मन की बात
हिन्दी में ही तो पाई थी हमने अपनी पहली डांट फटकार
अब सिखलाएगी यही हमें तकनीकी गुर और व्यापार
सशक्त बहुत है भाषा अपनी बिल्कुल ही कमजोर नहीं
फिर कैसी झिझक और क्यों हमें हो हिन्दी से ऐतराज

विश्व की संपर्क भाषा अंग्रेजी नहीं हमें एतराज
पर हिन्दी हमारी माथे की बिन्दी भारत मां की शान
साथ खड़े जिसके बंगाली मराठी मद्रासी पंजाबी बिहारी
पारसी अवधी भोजपुरी उर्दू उड़िया और मारवाड़ी
अरबों मात्र शब्द नहीं ये हमारे अपने आंतरिक उद्गार

शब्द शब्द मिलकर बने सारे जो हिन्दी के प्राण
इसी में बसती सारी समझ और दर्शन का सार
यूँ तो किसी भाषा-और बोली में समझ आ सकती बात
पर मातृभाषा ही वह गीत मधुर
झंकृत करता जो उलझे मन के तार

माथे का अक्षत रोली चंदन यही , यही हृदय का हार
यही सदा से अपनी बोली, गूंजे है जिसमें वेद कुराण
आभार व्यक्त करने को जीवित रखने को इसे
कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरा भारत ही नहीं
हर भारत वंशी भी प्रहरी सा इसके साथ।
शैल अग्रवाल

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