हास्य व्यंग्यः शताब्दी एक्सप्रेस का टिकट-नरेन्द्र कोहली

” लखनऊ शताब्दी में लखनऊ तक के लिए एक टिकट ।” मैने खिड़की बाबू से कहा।
” फारम भरो।” उसने आदेश दिया।
“फार्म भर कर आपके सामने ऱखा है।” मैने कहा, ” अपना सिर उठाइए। उसपर कृपादृष्टि डालिए।”
उसने वह फार्म उठा कर मेरी ओर फेंक दिया,” अंग्रेजी में भरो। यह ऐंडा बैंडा लिखा हुआ कौन पढ़ेगा यहां ? झुमरीतलैया समझ रखा है। यह दिल्ली है, कैपिटल औफ इन्डिया। ”
“यह ऐंडा बैंडा नहीं है।” मैने कहा, “यह हिन्दी है। भारत की राष्ट्र भाषा।”
” तो इसे राष्ट्र भाषा विभाग में ले जाओ।” वह बोला, ” हम तो रेलवे के आदमी हैं। अंग्रेजी में काम करते हैं, जो सारे संसार की मातृभाषा है। ”
” गाड़ी दिल्ली से चलेगी?” मैने पूछा।
” बिल्कुल दिल्ली से चलेगी। होनोलुलू से तो चलने से रही।” वह बोला।
” तो दिल्ली हिन्दी प्रदेश है।” मैने अपना स्वर ऊंचा कर लिया।
” नक्शे में है। जरा बाहर निकल कर देखो बाज़ार में एक भी बोर्ड हिन्दी में है? पैखाना उठाने की भी लिखत पढ़त अंग्रेजी में होती है यहां” वह बोला,”प्यारे भाई ! सपनों से जागो। यथार्थ से आंखें मिलाओ। पता नहीं, दिल्ली अंग्रेजों के हृदय में बसती है या नहीं, पर दिल्ली के हृदय में अंग्रेजी बसती है। प्रधान मंत्री से लेकर द्वार द्वार भटकने वाला, साधारण सेल्समैन तक अंग्रेजी ही बोलता है। कोई भला आदमी मुँह खोलता है तो उसमें से अंग्रेजी ही झराझर बरसती है।”
मैने चुपचाप अंग्रेजी में फार्म भर दिया, ” यह लो। ”
उसने तब भी मुझे टिकट नहीं दिया। एक फार्म और आगे सरका दिया।, ” ज़रा इसपर भी अपने औटोग्राफ दीजिए।”
“यह क्या है?”
“पढ़े लिखे हो, पढ़ लो। ”
“नहीं! मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं। ” मैं बोला, ” तुम ही बताओ।”
“वह तो मैं पहले ही समझ गया था। अनपढ़ हो, तभी तो हिन्दी हिन्दी कर रहे हो।” वह बोला, ” अब जरा ध्यान से सुनो। इस गाड़ी में सारी घोषणाएं अंग्रेजी में होंगी। इस कागज पर लिखा है कि तब तुम कोई आपत्ति नहीं करोगे?”
” हिन्दी में कोई घोषणा नहीं होगी?”
” होगी। पर वह तुम्हें समझ में नहीं आएगी।”
“क्यों? मेरी मातृभाषा हिन्दी है। मैं हिन्दी पढ़ा लिखा हूँ। और हिन्दी में काम करता हूं। ” मैने कहा।
” इसलिए कि घोषणा करने वालों का साउंड बॉक्स विदेशी है।” वह बोला, ” तो नहीं करोगे न आपत्ति?”
” नहीं करूंगा।”
” करो साइन। ”
” मैने हस्ताक्षर कर दिए।”
” अखबार अंग्रेजी का मिलेगा।” वह बोला,”तुम हिन्दी का अखबार नहीं मांगोगे।?”
” हो ना तो यह चीहिए कि सबको हिन्दी का समाचार पत्र दिया जाए?” मैने कहा, ” कोई विशेष आग्रह करे तो उसे अंग्रेजी का दे दिया जाए। सब पर अंग्रेजी क्यों थोप रहे हो?”
” टिकट लेना है या नहीं। लखनऊ जाना है या नहीं?”
” लेना है। लेना है।” मैने घबराकर कहा।”
” तो, साइन करो।
” किया। ” मैने हस्ताक्षर कर दिए।
” बैरा अंग्रेजी बोलेगा।” उसने कहा, ” तुम्हें बाबूजी नहीं, ‘ सर’ बोलेगा, ‘ राम राम नहीं करेगा, गलत उच्चारण में ‘गुड मार्निंग’ कहेगा। नाश्ते को ‘ब्रेकफास्ट’ कहा जाएगा, खाने को लंच। पानी को वाटर। बिस्तर को बेड। बोलो, आपत्ति तो नहीं करोगे?”
” पर ऐसा क्यों होगा?”
” टिकट चाहिए या नहीं?”
“चाहिए।”
” तो साइन करो। सवाल जवाब मत करो।”
” किया।”
” स्टेशनों और दूसरी चीजों के विषय में जो सूचनाओं की पट्टी आएगी, वह अंग्रेजी में आएगी। हिन्दी की पट्टी की मांग नहीं करोगे।”
” क्यों नहीं करूंगा…यह भारत है…अमरीका नहीं।”
” तो बैलगाड़ी या टमटम से लखनऊ चले जाओ।” वह बोला,” शताब्दी एक्सप्रेस का टिकट नहीं मिलेगा।”
” मैने हस्ताक्षर कर दिए।”
” यात्रा के अंत में एक छोटा सा फारम दिया जाएगा, उसे भरना होगा और अंग्रेजी में भरना होगा। तब यह कहकर इंकार नहीं कर सकोगे कि तुम्हें अंग्रेजी नहींआती। जितनी भी आती है, उसी में भरना होगा।”
“पर क्यों ?”
“टिकट चाहिए या नहीं।”
” चाहिए।”
“तो साइन करो।”
“मैने हस्ताक्षर कर दिए।”
“अपनी ओर से किसी से भी कोई प्रश्न अंग्रेजी में नहीं करोगे।”
“क्यों?”
“क्योंकि उनमें से किसी को भी अंग्रेजी नहीं आती।”
“तो फिर यह सब…?”
“टिकट चाहिए या नहीं?”
“चाहिए।”
” तो साइन करो। और हिन्दी में नहीं अंग्रेजी में।”
“मैने हस्ताक्षर कर दिये।”

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