हम पाँच और ग्वालियरः अंजू खरबंदा


संगीत सम्राट तानसेन की नगरी – ग्वालियर

राजा मानसिंह और मृगनयनी की प्रणय गाथा नगरी – ग्वालियर

वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की शहादत भूमि – ग्वालियर ।

क्या मालूम था कि ग्वालियर किस्सा कोताह वार्षिक उत्सव 2021 के रूप में हमें बुलायेगा । अशोक असफल सर का आमंत्रण मन से तो खींच रहा था पर घर बार छोड़ दो दिन के लिये बाहर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी । एक दिन दिव्या का फोन आया और साथ चलने के लिए और मुँह से झट हाँ निकल गई ।

टिकट बुकिंग की सारी जिम्मेदारी दिव्या ने सहर्ष ही स्वीकार कर ली । जाते हुए निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से दिल्ली इंदौर जबलपुर और वापिसी की टिकट वास्को डी गामा से बुक हुई । एक अजब सी हलचल थी मन में! थोड़ी घबराहट थोड़ा कौतूहल थोड़ी उत्सुकता और घर की ढेर सारी चिंताओं के बीच हम दोनों ग्वालियर की ओर चल पड़े ।

सोचना क्या जो भी होगा देखा जाएगा!

पाँच घंटे का रास्ता कैसे बातों ही बातों में कट गया पता ही नहीं चला । देर शाम को जब ग्वालियर रेलवे स्टेशन पहुंचे तो गुलाब के खूबसूरत फूल से हमारा स्वागत हुआ । स्टेशन पर प्रिय प्रतिभा दीदी, उनके सहचर डॉ मनोज त्रिवेदी और कमल हमें रिसीव करने के लिये जाने कितनी देर से खड़े थे । हमारा सामान कार की डिक्की में रखा गया और हम उड़ चले गेस्ट हाऊस की ओर! जहाँ प्रतिभा दीदी ने हम दोनों के रहने का भव्य इंतजाम कर रखा था । जाते ही फ्रेश हुए । डायनिंग टेबल पर शानदार डिनर हमारी बाट देख रहा था । हम पाँचो ने खूब छ्ककर खाया । खाने की जितनी तारीफ की जाए कम होगी । चाय का कप लेकर जब सोफे पर बैठे तो मनोज सर ने हमें मिलवाया कुक भगवान सिंह जी से । बेहद सौम्य, सरल व सेवा में तत्पर । उन्होंने हर दिन एक से बढ़कर स्वादिष्ट खाना खिलाया और जीती हमारी ढेर सारी दुआएं । जब चलने लगे तब पता चला कि भगवान सिंह से शायद भगवान को भी ज्यादा ही प्यार आ गया था और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी देकर सांसों की डोर खींचनी भी चाही थी, लेकिन उनके अदम्य साहस से भरी जिजीविषा ने मौत पर विजय पायी है।

सुबह उठते ही हम दोनों ग्वालियर की सड़के नापने चल दिये । सबसे पहले सूर्य मंदिर गए पर कोरोना की वजह से वह बन्द मिला । पर हम दोनों निराश होने वालों में से तो है नहीं सो वहाँ से ऑटो लिया और पहुँच गए तानसेन का मकबरा देखने । कमाल की नक्काशी देख हम दंग रह गए । खूब तस्वीरें ली । वहाँ इबादत कर रहे व्यक्ति से उस मकबरे का इतिहास पूछा तो उन्होंने खुशी खुशी पूरा मकबरा दिखाया और जानकारी भी देते रहे ।

गेस्ट हाऊस लौटे और झटपट तैयार हो नाश्ता कर प्रतिभा दी, मनोज सर और कमल के साथ किस्सा कोताह के वार्षिक उत्सव में जा पहुंचे ।आज प्रतिभा दीदी का उत्साह देखने लायक था, लाकडाउन पर आधारित उनके प्रथम कहानी संग्रह का विमोचन होने वाला था। वहाँ पहुँचते ही जो आनंद आया वह अवर्णनीय है । लगा बरसों से हम सभी एक दूसरे को जानते हैं । अशोक सर व ममता भाभी के सरल व्यक्तित्व ने बरबस ही मन मोह लिया । प्रथम सत्र और द्वितीय सत्र के अनमोल पल दिल में मानों अंकित हो गए हैं ।

द्वितीय सत्र समाप्त होते ही हम पाँचो अवसर पाते ही ग्वालियर के किले की ओर कूच कर गए क्योंकि हमें हर हाल में लाईट एंड साऊंड शो देखना ही देखना था ।

ग्वालियर के किले में होने वाला लाइट एंड साउंड शो टूरिस्टों को सबसे ज्यादा आकर्षित करता है। ये विशालकाय ग्वालियर किला बलुआ पत्थर की पहाड़ी पर बना हुआ है और मैदानी क्षेत्र से 100 मीटर ऊंचाई पर है जहाँ से रात में तारों की रोशनी में जगमगाता हुआ ग्वालियर बेहद खूबसूरत दिखलाई पड़ता है । किले में प्रवेश के लिए दो रास्ते हैं पहला ग्वालियर गेट और दूसरा ऊरवाई गेट।

मनोज सर ने जैसे ही गाड़ी पार्क की, प्रतिभा दी ने कहा- सामने देखो संगमरमर सा चमकता गुरुद्वारा । तुम तो पंजाबी हो, यहाँ माथा टेकने का अवसर न गंवाना । जिन्दगी भर याद रहेगा ये गुरुद्वारा ।

अभी बात कर ही रहे थे कि किसी ने कहा –

जल्दी जाओ! गुरुद्वारा बन्द होने का समय हो चला है ।

हम तीनों महिलाओं ने आव देखा न ताव! दनादन सीढिय़ां चढ़ते हुए दर्शन को जा पहुँचे । भला हो गुरद्वारे के सदस्यों का, हमें आते देख दरवाजा मोड़ा नहीं । जब हम दर्शन कर बाहर आए उनका लाख लाख शुक्रिया अदा किया । वहाँ के कड़हे प्रशाद की मिठास मानो अभी भी जुबान पर है ।

अब हमारा अगला लक्ष्य था लाईट एंड साऊंड शो ।

जल्दी से टिकट खिड़की की ओर बढ़े । पर ये क्या! पता चला कि हिन्दी वर्जन निकल चुका अब अंग्रेजी वर्जन में सारी कथा सुननी पड़ेगी । मरता क्या न करता! ऐसे कैसे छोड़ देते इस सुअवसर को! शो देखने जाते हुए रास्ते में एक पत्थर पर बड़ा सा लिखा था – जीरो । पूछने पर पता चला कि आजकल देश-विदेश के गणितज्ञों के लिए ग्वालियर किला अध्ययन का केंद्र बना हुआ है। हर साल बढ़ी तादाद में विदेशी गणितज्ञ जीरों की खोज के लिए ग्वालियर किले पर पहुंचते हैं। ग्वालियर किला पर नौवीं शताब्दी के चतुर्भुज मंदिर पर एक शिलालेख में सबसे पहले जीरों का अंक दर्ज होना पाया गया है। यह खोज महान गणितज्ञ आर्यभट्ट ने की थी। इसे मैथेमैटिक्स टूरिज्म का नाम दिया गया है। ये जानकारी पा खुशी हुई और फिर हमने लाईट एंड साऊंड शो का खूब आनंद लिया जिसकी रिकॉर्डिंग श्री अमिताभ बच्चन जी ने की हुई थी ।

किले से वापिस आते हुए ग्वालियर के फेमस कॉफी हाऊस से डोसा खाया । पूरा रेस्तराँ खचाखच भरा हुआ था । वह बैठ खूब बातें की और सुबह मिलने के वादे के साथ त्रिवेदी दंपति ने हमें हमारे ठिकाने यानी रेस्ट हाऊस पर छोड़ दिया ।

अगली सुबह यानि 14 मार्च 2021 हम दोनों आराम से उठे क्योंकि नयी जगह होने के कारण पहले दिन नींद ठीक से पूरी न हुई थी । फ्रेश होकर नीचे हॉल में पहुँचे तो कुक भगवान सिंह जी लाजवाब नाश्ता बनाए हमारा इन्तजार कर रहे थे । इतनी देर में दीदी और सर भी आ गए । हम सभी ने मिलकर नाश्ते का आनंद उठाया । हमने भगवान सिंह जी और उनकी पत्नी विनीता जी का आभार व्यक्त किया और अपना सामान प्रतिभा दी की गाड़ी में रख दिया क्योंकि आज रात हम लोगों की वापसी थी । मिलने मिलाने के कार्यक्रम के बाद आज का हमारा लक्ष्य था- जय विलास पैलेस ।

ग्वालियर का यह खूबसूरत सिंधिया संग्रहालय जीवाजी राव सिंधिया को समर्पित हैं। यह संग्रहालय मध्य-प्रदेश के सबसे प्रमुख संग्रहालयों में से एक हैं। इसका निर्माण सन 1964 में किया गया था। यह संग्रहालय पांडुलिपियों, सिक्कों, चित्रों, हथियारों, मूर्तियों आदि के संग्रह के लिए प्रसिद्ध है। हम लोग पैलेस का कोना कोना घूमे और ढेरों तस्वीरें ली । पूरे पैलेस की साज सज्जा बेहद ही उम्दा है । साफ सफाई का बहुत ध्यान रखा गया है । चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात है ताकि कोई भी सामानों को न छुए । घंटो तक हम मगन हो पैलेस देखते रहे । अचानक याद आया कि द्वितीय सत्र में हमारा लघुकथा वाचन है तो जल्दी से घर पहुंचे ।

साड़ी पहन सजधज कर जब लंच टेबल पर पहुंचे तो खाने की वैरायटी देख हम चकित रह गए । दीदी और कमल के हाथ के बने लाजवाब व्यंजनों का स्वाद हम हमेशा के लिये अपने साथ ले आए । लंच करके हम किस्सा कोताह उत्सव में पहुंचे । प्रथम सत्र काव्य पाठ का था और द्वितीय गद्य पाठ का । हम लोगों ने अपनी अपनी रचनाओं का पाठ किया और बाकी सभी की रचनाओं को ध्यानपूर्वक सुना और सहेजा ।

अशोक असफल सर ने सभी को सर्टिफ़िकेट दिये और अगले बरस आने का वादा लिया । बिछोह के क्षण पल पल करीब आ रहे थे । सभी की आँखे नम थी पर मिलने की प्रफुल्लता भी उनमें दिखाई दे रही थी । सभी ने आपस में एक दूसरे को फिर मिलने का वादा किया ।

किसी की ट्रेन का समय जल्दी था तो किसी का देर से । हमारी ट्रेन रात 12.50 पर थी अत: हमारे पास काफी समय था । अब हमारी तिगड़ी चल पड़ी मेले की ओर । दो घंटे घूमे कुछ शॉपिंग की और फिर सिटी सेंटर की ओर चल दिये । वहाँ डिनर का कार्यक्रम चल रहा था । कुछ लोग निकल चुके थे कुछ निकलने की तैयारी कर रहे थे । खाना खाकर सभी से मिलना मिलाना हुआ । किस्सा कोताह का अंक व फोटोग्राफर से कुछ फोटो ले हम प्रतिभा दीदी के घर आ गये । लगभग 9.30 का समय था । गर्मागर्म कड़क चाय का आनंद लेते हुए हम पाँचो ने खूब गप्पें मारी । जैसे जैसे सुई आगे भाग रही थी जुदाई की घड़ियाँ पास आती जा रही थी । बारह बजते-बजते तक दिव्या और मैंने अपना सामान पैक कर लिया । चलने को हुए तो प्रतिभा दीदी से लिपट यूँ मन भर आया जैसे अपनी बड़ी बहन से बिछुड़ रही हूँ । बड़ी मुश्किल खुद को संभाला और फिर जल्दी ही मिलने का वादा लिया ।

कभी अलविदा न कहना!

भीगी आँखों से कार में बैठे और रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ चले । कमल हमारे साथ साथ सामान रखने चला । सर कार के पास ही खड़े रहे । नम आँखों से उनकी ओर देखा उनकी आँखे भी भीगी हुई थी ।

प्रतिभा दीदी, मनोज सर और कमल से ये पहली मुलाकात थी और दो ही दिनों में हम पाँचो यूँ घुल-मिल गए थे मानो बरसों का साथ हो । ग्वालियर की ढेर सारी मीठी यादें मन में संजोए वापिस बैक टू पैवेलियन ।

दिल से शुक्रिया अशोक असफल सर!

आपके कारण ही ये मीठी यादें जिन्दगी का खूबसूरत हिस्सा बनी ।


अंजू खरबंदा
207 द्वितीय तल
भाई परमानंद कालोनी
दिल्ली 110009
फोन 9582404164

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