कभी नीम-नीम, कभी शहद-शहद-डॉ. जया आनंद

वो घर जिसमें गुज़रा था उसका बचपन ,वो अठखेलियां वो सहेलियाँ जिनके साथ खेलकर युवावस्था में उसने कदम रखा ,वो सारे अपने जिनसे कुछ न कुछ उसका जुड़ा था ,वो गलियां ,वो रास्ते जिनसे न जाने वो कितनी बार गुज़री होगी पर आज सब छूट रहा था और इन सबसे ऊपर ममता से भरे उसके माँ पिता …उनसे लिपट कर नेहा खूब रोयी ,सब्र का बांध टूट गया था उसका …आज उनसे भी विलग हो कर उनका आशीष लेकर नेहा चल पड़ी एक नई दुनियां में ..
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, पीछे जब कुछ छूटता है तो आगे जुड़ता भी है ,अब नेहा से जुड़ रहा था नया साथ ,नया शहर ,नए लोग जिन्हें वह अपना कह सकती थी । मन के किसी कोने में हल्के से डर को छुपाते हुए अनेक प्यार भरे सपनों के साथ नेहा ससुराल पहुंची ।लंबा सा घूंघट लिए सजी सवंरी नेहा सौरभ के साथ दरवाजे पर शरमाते हुए खड़ी थी । कैसे होंगे सब ,सौरभ तो अच्छे लगते हैं …ऐसे भी उसकी अर्रेंज मैरिज है तो बहुत तो नहीं जाना जा सकता किसी के विषय में पर ….यही सब नेहा खड़े-खड़े सोचे जा रही थी।

”आरती की थाली लेकर आओ,और एक लोटा पानी लेकर आओ “
,एक कड़कती हुई आवाज कानों में सुनाई पड़ी हां यह आवाज थी अम्मा जी की ।अम्माजी यानी नेहा की सास। सास बिल्कुल सास जैसी मध्यम कद की, सीधे पल्ले की साड़ी पहने और अपने पूरे रौब के साथ ..और बोली बिल्कुल नीम चढ़ी ।

अम्मा ने दोनों की आरती उतारी और पानी से नजर उतार कर नेहा और सौरभ को घर के भीतर ले आयीं ।

छोटा शहर हो तो आस पड़ोस के लोग आसानी से इकट्ठा हो ही जाते हैं और बाकी रहे रिश्तेदार …सब अपने मन की कह रहे थे
…” साड़ी और कोई नहीं पहन के आ सकती थी ,शादी हुई है कोई गुड्डे गुड़ियों का खेल नहीं,…”

फिर वही नीम चढ़ी आवाज नेहा के कानों को चुभती हुई पहुँची। नेहा ने अच्छी साड़ी पहनी थी पर गर्मी के कारण कुछ हल्की जरूर थी। यही पर छोटे शहर और बड़े शहर का अंतर पता चल रहा था। बड़े शहरों में इन सब बातों पर कोई ध्यान नहीं देता या देता भी हो तो नेहा ने नहीं दिया और बहू तो वो पहली बार बनी थी और सास से भी वास्ता पहली बार हुआ था ।उसे मन ही मन वो लोकगीत याद आ गया ……
..”आँगनवा में निबिया लगाय दो पिया ,सासू के बोल राजा हमें न सुहावे ,जैसे कडुआ करेला ओहो पिया ….”

सुबह नहा धोकर नेहा तैयार हो गई आखिर घर की बहू जो ठहरी ।मांग में लाल सिंदूर ,माथे पर बिंदी ,पीले रंग की चुनरी प्रिंट की साड़ी पहने नेहा सर में पल्ला लिए ,झुकी पलकों के साथ भारतीय नारी की प्रतिमूर्ति लग रही थी ।

”ये लो सौरभ के कपड़े ,इसे भी धुल दो”

फिर वही कड़क आवाज नेहा का दिल दहला गई । घर में तो उसे सब कितना प्यार से बोलते थे ,लाडली थी वह अपने घर की और यहां तो आते आते ही…. नेहा की आंखों में आंसू आ गए थे ,सौरभ ने छलकते आंसूओं को देख लिया चुपके से ..सौरभ आए और नेहा के गानों को सहला कर चले गए । अम्मा को भी तो कुछ बोल नहीं सकते थे और नेहा के मन का भी ध्यान रखना था। नेहा सौरभ की मनःस्थिति को खूब समझ रही थी।अम्मा की बातों को उसने अनसुना किया और अपने पिया के घर को निहारते हुए कपड़े धोने में मगन हो गई …..हां अब ये घर उसके पिया का घर था।

नेहा ने अपने मन में ठान लिया कि वह अम्मा को खुश कर लेगी। आखिर उस से तो सभी खुश रहते थे, घर स्कूल कॉलेज दोस्त, सब के बीच तो वो प्यारी और समझदार रही है तो फिर सौरभ की अम्मा को भी खुश कर ही लेगी ।इसलिए उसने रात में अम्मा जी का पैर दबाना शुरू कर दिया..

” कैसे दबाती हौ, पूरा शरीर हिला कर रख दिया, दोनों हाथन से ताकत लगाओ“
अम्माजी की कठोर आवाज़ में ज़रा सी भी मिठास नहीं आई थी। हमेशा नीम चढ़ी आवाज़ ,शहद का तो नामो निशान ही नहीं ……नेहा का मन बुझ सा जाता और उस बुझे मन को सौरभ अपनी मुस्कुराहट से ,स्नेहिल स्पर्श से हल्का कर देते।
नेहा को अम्मा के साथ ही रहना है तो क्या हर समय इतने कठोर शब्दों को सुन पाएगी ।वह कभी- कभी खुद भी नहीं समझ पाती कि उसमें इतना धैर्य या सहनशक्ति है पर एक बात नेहा जानती थी कि अभी शादी से पहले उसने कहा है कि वह अम्माजी के साथ रह लेगी तो उसे हर हालत में उनके साथ ही रहना है ,वह अपने शब्दों से पीछे हटने वालों में से नहीं और जब सौरभ साथ हैं तो ज़िन्दगी का हर रास्ता आसान हो जाएगा ।

नेहा ,सौरभ और अम्मा जी के साथ में दिल्ली के लिए चल पड़ी। अब नई गृहस्थी के सपनों की जगमगाहट में उसकी आँखें चौंधिया रही थी। दिल्ली में सौरभ ने किराए का टू बी एचके फ्लैट ले रखा था । नेहा ने मन में सोच रखा था कि वह अपनी गृहस्थी को बहुत सुंदर तरीके से सजायेगी ,ऐसे रखेगी घर को कि घर का हर कोना कलात्मक अभिरुचि को दर्शाए ।

“,इत्ते डब्बे और ये गमले खरीदे की का जरूरत है , बस फिजूलखर्ची आती है, ये नहीं कि जो पहले से है उसमें काम चला ले, बस फैसन बाजी में दिमाग है “

…अम्मा जी का स्वर अपने पूरे वेग से फ्लैट में गूंज गया ।नेहा सहम गई पर दूसरे ही पल उसे लगा कि उसे अम्मा के साथ रहना है तो उसे भी सहज होना ही पड़ेगा ।अपने मन की बात उन्हें बतानी ही होगी ।

“अम्मा ! अच्छा लगता है न !,करने दीजिए न मुझे थोड़ी फिजूलखर्ची ‘ नेहा ने बड़े लाड़ से कहा ।

“ जाओ ! करो ! फिजूलखर्ची “अम्मा की आवाज तो यूं ही कड़क और नीम चढ़ी ही बनी रहती पर स्वीकृति तो उन्होंने दे ही दी थी ।
नेहा ने अब अपनी बात मनवाने का यही तरीका अपना लिया था ।सौरभ की भी यही इच्छा रहती थी कि अम्मा से पूछ कर ही काम करो जिससे वह खुश रहे ।नेहा वैसा ही करती पर अम्मा खुश हैं कि नहीं वह नहीं समझ पाती….और उसे उस पल याद आजाता अपना मायका ,माँ का सहलाता हुआ प्यार और चुपके से आँखों से ढुलक जाती आसुंओ की दो बूंद …..

दिन अपने रूटीन में बंध चले थे। सौरभ सुबह ऑफिस चले जाते, नेहा सुबह नहा धोकर किचन में लंच बनाकर सौरभ को देती ।
”कैसी ऐचि बैची रोटी बनाई है, शरम आती है हमें तो “ अम्मा के ऐसे ऐसे कमेंट नेहा सुनने के आदी हो चुकी थी , वह उसे ही पॉजिटिवली लेती ,चलो ठीक है इसी बहाने उसके काम में सुधार रहेगा ।कबीर का यह दोहा उसने खूब पढ़ा था

“निदंक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय
– बिनु साबुन पानी बिना निर्मल करे सुभाय”

एक दिन पड़ोस की आंटी आईं ।नेहा ने उन्हें पानी और मिठाई जा कर दिया ,उन्हें नमस्ते किया और किचन में चाय बनाने चली गई ।
“अरे ! आजकल की बहुएं सब अपने में रहती हैं और यह सेवा करेंगीं ,ऐसा तो हम सोचते भी नही”ं अम्मा की नीम चढ़ी बोली अंदर किचन तक सुनाई पड़ रही थी ।

– किचन में चाय उबल रही थी और नेहा की आंखों से आंसू का गुबार फूट पड़ रहा था ।
– “क्या अम्मा को मुझ पर विश्वास नहीं है ….. मुझे ऐसा समझती हैं अम्मा !! नेहा खुद से ही बोले जा रही थी ।सौरभ से भी क्या कहती….,आखिर वो सौरभ की अम्मा हैं ,उन्हें बुरा लगेगा …….।इसलिए मन में ही सारी बातें रख लेती औऱ मन को खुद ही समझा भी लेती ।

अब नेहा घर का काम कर अपना मन किताबों में लगाती ।किताबें पढ़ने से उसका मन हल्का हो जाता औऱ इधर -उधर की बातें भी दिमाग में नहीं आतीं ।साहित्य -संगीत जीवन में रस भरते हैं ,जीवन को सार्थकता प्रदान करते हैं इसलिए वो कभी-कभी गाने भी गाती ।

” कान फोड़ोगी का ?? सोवै भी नहीं देती …”फिर अम्मा की वही नीम चढ़ी बोली जिससे नेहा आहत हो जाती ,आंखों से आँसू निकल पडते और उसे वही लोकगीत याद आ जाता
” सासू के बोल राजा हमें ना सुहावे जैसे कड़वा करेला हो हो पिया …..” नेहा हंस पड़ती।

सुबह से शाम नेहा अम्मा की हिदायतें सुनती रहती “ नेहा डब्बे का ढक्कन ठीक से बंद करो, सब्जी को बड़े चमचे से चलाओ, ढंग से साफ करो, चादर ऐसे बिछाओ ,चाय स्ट्रांग बनाओ ,अगर स्ट्रांग बन जाए तो कितनी स्ट्रांग बनाई
…..” अम्मा अपने पंचम सुर के साथ बोलती रहतीं ,नेहा भी सुनती रहती इसी बहाने कुछ सीख भी रही थी पर कभी-कभी उसे खीझ भी होती कि क्या उसे कुछ आता ही नहीं ,मां के घर में तो कितनी चीजें बना लेती थी और सब तारीफ करते थे ,खुश रहते थे। उन सब बातों को भुलाकर नए उत्साह के साथ काम करना शुरू करती पर अम्मा जी को खुश कर पाना उनसे तारीफ सुन पाना टेढ़ी खीर थी।

एक दिन ऐसे ही नेहा ने किताब पढ़ने के लिए उठाई कि आवाज आई
“हाय दैया ,हाय दैया, हाय राम, हाय राम……” यह तो अम्मा की आवाज थी ,नेहा ने दौड़ कर कर देखा तो चौंक गयी। बाथरूम मेंअम्मा गिरी पड़ी थीं ।जल्दी से नेहा ने उन्हें उठाया …” ठीक से पकड़ो, ढंग से पकड़ना भी नहीं आता …”अम्मा बड़बड़ाती जा रही थी ।नेहा ने किसी तरह से पलंग पर उन्हें बिठाया ।उनके पैरों में तेज चोट लगी थी ,कमर में भी दर्द हो रहा था। नेहा जल्दी से हल्दी चूना ले आई और पैरों पर लेप लगाया और कमर में बाम लगाया, गर्म थैली भी रखी। अम्मा को डॉ के पास ले जाना, चेकप करवाना, उनका पूरा ध्यान रखना ये सारे काम नेहा बड़े ही ध्यान से कर रही थी ,सेवा भाव उसके अंदर शुरू से रहा था और कहीं एक उम्मीद भी उसके अंदर जन्म ले रही थी कि शायद अम्मा उससे खुश हो जाएं ……हां अम्मा कुछ तो शांत थी । जब उनका पैर ठीक हुआ तो उन्होंने नेहा को बुलाया और दस हज़ार रु हाथ मे देते हुए बोली” खुश रहो” ।आवाज में वही रौब था ।….नेहा इतना सुनकर झूम उठी उसे लगा कि उसे बहुत बड़ा पुरुस्कार मिल गया ।

दूसरे ही दिन नेहा के चाचा जी आए तो अम्मा उनसे फिर शुरू हो गई “अरे ढंग से कोई काम काम ही नहीं करती ,गृहस्थन हो गई है पर कभी ,गाने कभी किताबें ……और अम्मा की अंत हीन चालीसा शुरू हो गई थी….. नेहा बस मुस्कुरा कर रह गयी
…सच कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं ….!!

आज नेहा का चेहरा गुलाबी हुआ जा रहा था, पलके झुकी थी, होठों पर मुस्कान खिली थी, हां उसके एकांत में कोई अब अपनी किलकारियों की गूंज पैदा करने आ रहा था ,एक नन्हा फूल उसके भीतर खिलने वाला था। उल्टियां शुरू हो गई थीं ।थोड़ा परेशान रहती नेहा और ऊपर से अम्मा की शहद घुली हुई बोली…” ढंग से खाओ, हल्का रखो पेट , कुछ समझ ही नहीं आता इसे ,……समझ भी कैसे आता… आखिर नेहा पहली बार जो मां बन रही थी ।उसे अम्मा पर गुस्सा भी आता पर गुस्सा बाहर नहीं निकलता और गलती से अगर निकल गया तो फिर अम्मा मुंह फुला कर बैठ जाएंगीं , किसी से बात ही नहीं करेंगीं ,यह तो और भी मुश्किल की बात….. इससे अच्छा तो वह दिनभर बोलती रहें ,वो सब नेहा सुन लेगी लेकिन मुंह फुलाने में तो मनाते- मनाते थक जाएगी और अम्मा के साथ साथ सौरभ भी गुस्सा हो जाएंगे…
इससे तो अच्छा कि अम्मा बोलती रहें ।

नौ महीने पूरे हो चुके थे और उस दिन नेहा अचानक बेचैन होने लगी, पूरा शरीर में दर्द हो रहा था , सर में भी भयंकर दर्द होने लगा। नेहा को अपनी मां की बहुत याद आई…. काश! यहाँ माँ होती तो !!…….. तभी सर पर किसी के सहलाते हुए हाथों का स्पर्श नेहा ने अनुभव किया अरे यह तो अम्मा जी हैं “,अरे पगली! क्यों घबरा रही है मैं हूं न !! सब ठीक हो जाएगा ,चल मैं तेरे पैर दबा देती हूं और फिर हॉस्पिटल चलते हैं भैया के साथ” ।पल भर के लिए नेहा भूल गई कि जिन आंखों से उसे डर लगता था आज उन आंखों से छलकती हुई ममता ने मन की सारी जलती हुई पीड़ा को ठंडा कर दिया , कहीं जो कडुवाहट मन में घर कर गयी थी वो तो सच पूछो तो एक कड़वी औषधि थी जिसका परिणाम मीठा ही होता है ।नेहा को अम्मा में अपनी मां की छवि दिखाई पड़ने लगी ……..नेहा ने उस दिन प्यारी सी बेटी को जन्म दिया ।अपनी कृति को देखकर बहुत खुश थी नेहा ।हॉस्पिटल के कमरे में वो लेटी थी ।कमरे के बाहर से आवाज आ रही थी “अरे मेरी बहु तो सीधी है इसलिए मैं उसे दुनियादारी सिखाने के लिए के लिए डांटती रहती हूं और घर के रीति रिवाज भी सिखाने हैं इसलिए भी डपट देती हूँ “…. बोलते बोलते अम्मा अंदर के कमरे में आई और ऊंची आवाज में बोली ” नेहा !अब दवाई भी हम ही खिलाएं ,हमने क्या बच्चे नहीं जने …. अब थोड़ा उठो और दवा खाओ ” ।आज नेहा को अम्मा की किसी बात पर भी गुस्सा नहीं आया वह समझ गई थी की अम्मा कभी नीम है ,कभी शहद या अंदर से पूरी शहर शहद……
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डॉ जया आनंद
प्रवक्ता सी एच एम कॉलेज
स्वतंत्र लेखन -विविध भारती ,मुम्बई आकाशवाणी ,दिल्ली आकाशवाणी , पत्र – पत्रिकाएं
अनुवाद – ‘तथास्तु’