
पांच लघुकधा 
सपना चंद्रा
कहलगाँव ,भागलपुर ,बिहार
लघुकथा-1
हाथी के दाँत
“यार महेश !मैं अपने बेटे मुकूल की शादी बिल्कुल सादे रीति-रिवाज से करना चाहता हूं”..वैसे भी अब ज्यादा लोगों को भीड़ से परहेज ही हो रहा है।
हमें तो बिना मांगे ही सब कुछ दे दिया,कितना भी मना करते रहे पर ….क्या कर सकते थे,उन्होनें नही माना।”
“वाहहह यार!ये तो बहुत ख़ुशी की बात है।”
“हाँ है तो!देखो भाई, तुम्हारा पहले से रहना बहुत जरुरी है..मेहमानों के आवभगत के लिए रहना होगा।”
“अरे हाँ! ठीक है रमेश..तेरा बेटा मेरा भी बेटा है..और बेटे के पिता और चाचा की रौब तो होनी ही चाहिए।”
शादी की तैयारियाँ एक पांच सितारा होटल में चल रही थी। मेहमानों की इक्का-दुक्का आवागही धीरे-धीरे हजारों में हो गई।
“रमेश ये क्या..इतने मेहमान .?”ज्यादातर तो तुम्हारे तरफ वाले ही है।”
“महेश क्या करुँ यार किसे छोड़ता और किसे बुलाता,अब आ ही गये है तो क्या कर सकते हैं..?”
“पर!. इस तरह तो अतिरिक्त बोझ लड़की वालों पर पड़ेगी..कैसे हो पायगा.?”
“तुम क्यूं टेंशन ले रहे हो! कौन सी तुम्हारी बेटी की शादी है..?”
“सही कहा तुमने! मेरी बेटी की शादी तो नहीं है पर उस पिता की जगह खुद को महसूस कर रहा हूँ।”
लघुकथा-2
बहती गंगा
बहुत जतन या यूँ कहें रमेश की जो नौकरी लगी मन्नतों ,दूआओं का ही असर है,कहते थे सब।
नौकरी हो गई ,नौकरी हो गई.. पुरे कस्बे में बात फैलते देर न लगी।
दिनभर लोगों का आना-जाना ,बैठक में बैठ सबसे बड़े गर्व से मिलते पिताजी बार-बार ठहाके लेकर हँसते।
सब बहुत खुश थे..”अब तो दुख के दिन छँट गये भाई!.रमेश अब सरकारी आदमी हो गया। आपको अब क्या चिंता करना।”
रमेश के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। इस अधेड़ावस्था में नौकरी का सुख काँटे की तरह चुभ रहा था।
घर के खर्चे,बच्चों की परवरिश, पढ़ाई-लिखाई, फिर दोनों बेटी की शादी,माँ-बाबूजी की तीर्थयात्रा और अब अम्मा ने जो मन्नतों की लिस्ट थमाई थी..जिंदा रहते शायद ही पुरा हो पाए।
अम्मा पर बड़ा गुस्सा आ रहा था।
” क्या जरुरत थी इतनी मन्नत की…पूजा -पाठ में खर्चे क्या कम लगते हैं,उसपर रिश्ते-नाते सब को बुलाना,उन्हें सम्मानपूर्वक बिदा करना,दान-धर्म भी साथ-साथ।”
एकबार अपने आप पर ग्लानि भी होने लगी,माँ की ममता का तुम्हें कोई ख्याल नहीं।कहाँ-कहाँ न पत्थर पूजे..आखिर पत्थर दिल पिघल ही गया।
पर बड़ी देर कर दी पिघलने में…
अपना सर थामे देर तक सोंच में डूबा बैठा रहा…
“ये नौकरी ने तो मुझे उम्मीदों तले दबा ही दिया,कहाँ से सब कर पाऊँगा मैं..एक मामूली किरानी की नौकरी है।”
“ये अलग बात है कि छोटी रकम की सलामी मिलती रहेगी।इससे सब पूरा हो पायगा क्या..?”
इसी सोंच में दिमाग की नसें थक गई और नींद हावी हो गया।
कुछ पल ही बीते थे कि पत्नी की खुरदुरी हथेली माथे पर घुम रही थी।सहलाते हुए बड़े ही प्यार से बोली!.”एक बात बोलनी थी,पहली पगार में हम दोनों कहीं पास में ही बाहर घुमने जाएँगे और बाहर ही खाना भी खाएँगे।ठीक है न।”
नींद से बोझिल आँखे आधी-अधूरी बात पर हाँ,हूँ निकली ली।
“राम जी सब दुख हर लेगें अब हमारी!..कुछ गहने ,साड़ियाँ भी ले लुँगी।
बहुत हो गया मन को मारकर जीना।”
सुना है कि किरानी का पद बहती हुई गंगा है। फिर चिंता किस बात की..हम-सब तर जाएँगे।
लघुकथा-3
बड़ा आदमी
तालियों की गड़गड़ाहट और बड़े आदमी की मुस्कान जारी थी.
तभी बड़े आदमी के कानों में पी ए ने कुछ कहा और बडे आदमी ने आश्वस्त में सर हिलाया.
भीड़ की फुसफुसाहट कानों-कान बढ़ रही थी..और भीड़ की नजरें बड़े आदमी को घुर रही थी.
ये तो वही है न जो सड़क पर सोये लोगों को कुचलता है..जंगल के मासूम जानवरों का शिकार करता है.
बड़े लोग के समर्थक और विरोधी आपस में भिड़ गए..
फिर कुछ लोग को भीड़ रौंद गई।
समर्थक-वो बड़ा आदमी है उसके रास्ते में जो आएगा कुचला जाएगा..गलती तो उनलोग की है।
विरोधी-आखिर उन लाशों का क्या होगा..मुआवजा तो देना होगा..
ये लो मिठाई के डब्बे और ऐश करो..लाशें कभी बोलती नहीं है।
भीड़ को यूं ही तितर-बितर हर-बार करो।
बड़े आदमी को कोई छुने न पाए..इसलिए हम -तुम विरोधी का खेल बार-बार करो।
लघुकथा-4
किश्त
______
“लता! मैं तुम्हारे पिता जी को ले आया हूँ, उन्हें नाश्ता- पानी कराकर वह बात कर लेना..,मैं अब आफिस जा रहा हूँ , शाम को देर से लौटूंगा।”
“पापा! आप अपना ध्यान नही रखते देखिए तो कपड़ो में वह चमक भी नही है,
आपके कपड़े भी अब खास से आम हो गये..!”
“अरे नही बेटा! क्या बात है, बता ?
तुम्हे कुछ चाहिए होता है तभी इतनी बारीक़ी से मेरे कपड़ों के बारे कहती हो।”
“नही पापा! कुछ भी तो नही, सब कुछ तो दे दिया आपने शादी में।”
“सच कह रही हो न,सब ठीक है न बेटा?”
“हाँ पापा! आप आराम करें सफर में थक गये होंगे।”
लता अपने पति के काॅल से परेशान हो रही थी, क्योंकि वह पिता के थके चेहरे को देख कुछ कह नही पाई।
शाम में …
“लता! पिताजी से बात हुई..?”
“….”
“कुछ पूछ रहा हूँ बोलती क्यों नही?”
“जी नही,पिताजी खुद ही परेशान है उन्हे कैसे बतांऊ..?”
“तुमसे एक काम नही हो पाया ,मैं ही बात कर लेता हूँ।”
लता ने पैर पकड़ लिए ,भगवान के लिए ऐसा मत किजिए.!
“छोड़ो!” झल्लाते हुए रमेश ने लता को एक तरफ धकेल दिया।
“दो साल की ही तो बात थी, एफडी पर मिलने वाले ब्याज को हमे दे सकते है,
अब उन्हे क्या करना है पेंशन की रकम काफी नही है..?”
“इतना कुछ तो पापा ने दिया है,ब्याज की रकम से अपनी लोन की किश्त चूका रहे है, हमे कैसे दे सकते है?”
“हमारी किश्त का क्या..?”
“आपकी किश्त?”
“मैं जो फ्लैट ले रहा हूँ क्या तुम उसमें नही रहोगी?”
“क्या?”
“सही सुन रही हो मैडम! आपको अपनी किश्त तो चुकानी पड़ेगी।”
दूसरे कमरे में आराम हराम हो गया।
लघुकथा-5
यक्ष प्रश्न
जन्माष्टमी के अवसर पर दही हाँडी प्रतियोगता का आयोजन किया जा रहा है ।
जो भी प्रतिभागी भाग लेना चाहें अपने नाम जल्द से जल्द लिखवा दें।
हाँडी फोड़ने पर पाँच सौ का इनाम और दही मलाई से भरी हाँडी उपहार स्वरूप दिया जाएगा।
रमेश जो बारह वर्ष का बालक बड़ी उहापोह में पड़ा था ,क्यूँ न मै भी प्रतियोगता में अपने नाम लिखवा दूँ।
मुश्क़िल से घर में रोटी डूबो कर खाने के लिए दुध की चाय कभी नसीब हो जाती थी,दही मलाई तो दूर की बात थी।
कैसी होती है ये मलाई जो ईश्वर को भी चोरी करने को विवश कर देती थी।
मै भी अगर स्वाद चख पाता..
सोचते हुए भी मन धिक्कारता है तेरी औकात है क्या.?
अपने अंतर्द्वन्द से लड़ता हुआ ..मै प्रतियोगता में भाग लेकर जीतना चाहता हूँ।
तभी उसके स्वाद चखना चाहता हूँ।इसमें ग्लानि कैसी..
रमेश जा पहुँचा अपना नाम लिखाने..
आयोजक–क्या बात है.?
रमेश–मुझे भाग लेना है इसमें।
आयोजक–अरे पहले अपनी ओर देख ले तब सपने देखना..हऽऽ..हऽऽ।
तेरे वश की बात नही है ,जा..तू।
प्रतियोगता में हाँडी फोड़ी जाती है और जीतने वाले को इनाम दिया जा रहा था।
रमेश अपनी तीव्र लालसा पर काबू नही कर पाया।चुपके से मलाई की हाँडी में हाथ लगाया ही था कि किसी ने देख कर
” माखन चोर ,माखन चोर”हल्ला कर दिया।
बेचारा पकड़ा गया ,मलाई होठों को तो नही छू पाई पर उँगली ने उसे माखन चोर बना दिया।
क्यूँ रे रमेश ,चोरी करके खाना चाहता था.?
नही ,मै तो प्रतियोगता जीतना चाहता था..पर आपने.ऽऽ
जुबान लड़ाता है..चोर कहीं का।
तुझे इसकी सजा मिलेगी।
रमेश–रोते हुए!संसार के मालिक ने भी तो चोरी की थी उन्हें सजा हुई थी क्या..?
सुनील गज्जानी
बीकानेर, राजस्थान

लघुकथा-1
काल
माँ-बेटी आपस में बातें कर रही होती है कि सेठानी को आता देख माँ फुर्ती से झाड़ू बुहारने लगी !
”क्यूँ री, अपनी माँ से क्या खुसुर-फुसुर कर रही थी ! छोरी, तेरा ध्यान काम में कम बातों में ज़्यादा दिखता है ! है री, चल तू बता तेरी छोरी क्या बाते कर रही थी ?”
”कुछ नहीं बस यूँ ही ”.!
”यूहीं ! कभी हमारे परिवार के सदस्यों को तो कभी हमारी कोठी को रह-रह देखते हुए बतिया रही थी तुम दोनों और तुम्हारी इस बेहूदा हरकत को ही तो देख उतावली हो चली आयी कि पूछूं तो भला की ऐसी क्या बात है जो तुम दोनों यूँ टुकुर-टुकुर देख बतिया रही हो। है री, बोल ना ! क्या बात है?!”
”बात तो बस भाग्य की है” बेटी बुदबुदायी !
”क्या बड़बड़ायी री,कोई मंतर ? कोई जादू-टोना कर हम पे कोई नज़र तो नहीं लगा रही हो ? ऐ बोलना ?!” सेठानी एक सांस में ये उगल पड़ी !
”सेठानी जी आप कैसी बातें कर रही हैं ?”! माँ ने सकपकाते हुए जवाब दिया !
”तो तू ही बता दे कि कैसी बात करूँ मैं ?’!
”जब से मेरे साथ यहाँ काम में हाथ बटाने आयी है तब से आप का बेटा मेरी सयानी बेटी पे भेड़िये-सी नज़र लगाए बैठा है !”’ माँ मन ही मन सिर्फ सोच सकी कुछ कह नहीं पायी ! बस सजल आँखों से बेटी को निहारने लगी !
”यूँ रो मत ! देख री, तेरे काऱण तेरी माँ कितना शर्मिंदा महसूस कर रही है ! तेरी माँ हमारे घरेलू फंक्शन में अपना हाथ बटाने दो दिन से तुझे साथ क्या लाने लगी कि तू आते ही तांक -झाँक करने लगी, हमें घूरने लगी !”
”सेठानी जी दरअसल ये बात नहीं है ! मेरी बेटी आप के और हमारी बीच तुलना कर रही थी, कर्मों की, सामाजिक भेदभाव की!”
”भेदभाव की ! क्या तुझे हम अपने घर के सदस्य की तरह नहीं समझते, क्या तेरे हर सुख-दुःख में काम नहीं आते ! हमारी इस कोठी में काम करने से तुझे तेरे समाज में इज़्ज़त नहीं मिलती, अरे, बता री अपनी छोरी को ?!”
”माँ चाह कर भी कुछ बोल नहीं पायी तो बेटी चहकती हुई कहने लगी -”सेठानी जी, आप ने मेरी सारी शंकाएं मिटा ! मैं मां से इसी सन्दर्भ में बात कर रही थी ! आप ने मेरी सोच बदल दी, बहुत प्रभावित हुई आप से, कितनी अच्छी है आप !” यह कह सेठानी को उल्लासित भावयुक्त हो आलिंगन करना चाहा तो सेठानी दुत्कारती,झिड़कती -” ऐ,सुन री ! अपनी बेटी को अपने संस्कार सीखा, बदलाव नहीं !” कह कर फुफकारती-सी चल पड़ी गंतव्य की ओर !
”माँ वो क्या कह तुनकती हुई चली गयी, मैं समझी नहीं !”
”यहीँ कि वो अब भी आदिकाल के रिवाज़ों में जीना चाहती है और हम आधुनिक काल में !’
***
लघुकथा -2
पीड़
जैसे ही उस घर के सामने वीआईपी गाड़ी रुकी आस-पास खड़े लोग फुसफुसानें लगे!
”क्या किस्मत पायी है शर्मा जी ने कभी नेता,कभी प्रशासानिक अधिकारी तो कभी सैन्य अधिकारी सभी पिछले दो-तीन दिनों से रह-रह कर मिलने आ रहे है !” एक व्यक्ति बोला !
”इन सबसे अच्छी जान-पहचान हो गयी होगी अब तो शर्मा जी की”! दूसरा बुदबुदाया !
”सब बेटे के कारण एप्रोच बन रही है शर्मा जी की!” तीसरा अपनी आँख मींचता बोला !
”चलो,लगे हाथ हम सब भी मिल आते है, क्यूँ क्या राय है ?” ! चौथे ने अपनी बात रखी !
”हाँ,हाँ क्यूँ नहीं !” तीनो समवेत स्वर में !
”आखिर हम भी पडोसी है उनके, उनकी ये ऊँची जान-पहचान कहीं हमारे भी कुछ काम आ जाए !” पहले ने कहा !
”मगर उनके सामने फालतू या ऊलजलूल मत बक देना,समझे सब !” दूसरा दूसरा अपना झाड़ता बोला !
”ठीक है,ठीक है ! उनसे बातचीत की शुरुआत आप ही कीजियेगा वर्मा जी, क्यूंकि आप को इस प्रकार की बातचीत का तज़ुर्बा है ! तीसरे से कहा !
”हाँ, सही बात ! चलो तब जल्द चला जाए,कोई और वीआईपी आये उससे पहले हम मिल आते है ! तीसरे की बात का समर्थन करते हुए फटाफट कदम बढ़ते हुए शर्मा जी के घर की तरह चल पड़े ! दरवाज़े तक पहुंचे ही थे की पहले आये वीआईपी गाड़ी में बैठ चल दिए तो वे और तेज़ी से कदम बढ़ाते हुए बैठकखाने की और चल पड़े फिर अभिवादन उपरान्त वर्मा जी ग़मगीन चेहरा बना अपने दल का प्रतिनिधित्व करते हुए बोले –
”शर्मा जी हमारे लायक कोई भी काम होतो अपना समझ हमें अवश्य बताइएगा, आखिर पडोसी ही पडोसी के काम आता है, क्यूँ शुक्ल जी मैंने गलत तो नहीं कहा ना !” अपने साथी से पूछा !
”कैसी बात करते है,एक दम खरी बात ! शर्मा जी, पहला सुख तो हम अच्छा पडोसी ही मानते है और यह सुख हमें सदा आप से मिलता रहा है और मिलता भी रहेगा ! क्यूँ पांडे जी मोहल्ले वाले क्या कहते है शर्मा जी के बारे में ?”!
”मिसाल देते है मिसाल मिश्रा जी !”
”शर्मा जी,मोहल्ले में यह चर्चा ज़ोरो पर है कि कल मुख्यमंत्री जी भी आप से मिलने आ रहे है !”
”हाँ, आ रहे है पांडे जी ! मगर मुझे क्या फर्क पड़ता है सीएम आये या पीएम !”
”आप से सुन बड़ा ताज़्ज़ुब हुआ,ऐसा क्यूँ ! क्या यह बड़ी बात नहीं है ?!”
”यह तो नैतिक कर्तव्य है उनका, जो मेरे लिए कोई बड़ा ताज़्ज़ुब नहीं !”
ऐसा जवाब सुन चारों एक-दूसरे का मुँह देखने लगे !
”हाँ,मुझे अभिमान है अपने बेटे पर जिसने मेरा मष्तक गर्व से ऊँचा कर दिया ! जो ईस्ट बड़े-बड़े व्यक्तित्व मुझसे मिलने आ रहे है ! मगर एक पिता के नाते आप सब से एक बात पूछूं ?!”
”हाँ ,हाँ शर्मा जी अपने पूर्ण अधिकार से पूछिए !” मिश्रा जी बोले !
”जिसके लिए ये सब अपनी-अपनी संवेदनाएं व्यक्त करने आ रहे हैं,क्या शहीद हुआ मेरा इकलौता बेटा भी कभी लौट के ऐसे आएगा !”
***
लघुकथा-3
नींव को बिसरा कंगूरे की गाओ
”पहले बंद करो अपने ये हाय-हाय,मुर्दाबाद के नारे, अगर तुम सब कुछ शांति रखो तो मैं कुछ बोलू, व्यक्ति गुस्से में झलाया !
”लो हो गए हम चुप, अब फरमाइए !” महिला अपने हुजूम को शांत रहने का इशारा कर जवाब में पूछा !
”अरे, मैं समझ सकता हूँ आप सब के आक्रोश को ! मगर मैं क्या करूँ, मैं तो बस अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ यहाँ का कर्मचारी होने के नाते ! अच्छा, एक बात बताओ तुम्हारे इन मटकों के यहाँ फोड़ने से क्या तुम्हारे गावँ के सूखे पड़े हौद, तालाब में पानी भर जाएगा ? या अंदर जो खेल मैदान में मैच की तैयारी के लिए पिछले कुछ दिनों से लगातार पानी का जो छिड़काव हो रहा है क्या उसे मैदान प्रशासन या ज़िला प्रशासन बंद कर देगा ? जो मुझे नहीं लगता !”
‘अगर वे हमारे पानी की समस्या को हल्के में लेंगे तो हमारा विरोध हमारा आक्रोश भी बंद नहीं होगा समझ लीजिए ”!
”तेवर अच्छे है !”
”नहीं ये पीड़ा है ! सुनिए साहब, हम औरतों को ही पता है पानी एक-एक बून्द का महत्व ! इस आग उगलती गर्मी में हम कस्तूरी मृग-सी हो जाती है जब हमारे आस-पास के जल स्त्रोत सूखने लग जाते है !”
”बहन जी,मैं समझ सकता हूँ आप की मनोदशा को !”
”साहब,समझने और भोगने में बहुत अंतर होता है ! जो रोज हम भोग रही है ! हम अपने सिर पर पानी का घड़ा ले कोसो-कोस पैदल चल कर लाती है, अगर आप समझते तो पानी की यहाँ यूँ बर्बादी भी नहीं करने देते !”
‘अरे,यहाँ की बात फिलहाल अलग है शायद तुम्हे पता नहीं होगा कि इस प्रकार के मैचों से हमारे शहर का और अधिक विकास,उन्नति होगी !”
”विकास ! अरे, जहां आज भी इस भीषण गर्मी में पानी के अभाव में लोग तड़फ-तड़फ कर प्यासे मर जाते है,जहां पानी के लिए आज भी भीख मांगनी पड़ती है,ऐसा विकास ? ! पहले भीख मांगने की परम्परा तो मिटाइए !”
”बहन जी, आप की बात शत-प्रतिशत सही है ! मगर मेरे सामने ये बाते करने से क्या होगा ! देखिये, दो बात आप कहेगी फिर मैं कहूंगा फिर ये बहस तकरार में बदल जाएगी ! मैं आप के दर्द को अच्छी तरह समझता हूँ इसलिए इतनी सहायता तो कर सकता हूँ कि अगर आप सब चाहो तो अपने लिए ज़रूरतमंद पानी ले जाने की अनुमति यहाँ से दे सकता हूँ !”
”अरे ओ साब जी, हम यहाँ अपना विरोध जताने आये है, हमें भीख नहीं हक़ चाहिए ! और हाँ, हमे पानी की रिश्वत देकर और भ्रष्टाचार फैलाने की कोशिश मत कीजिये !”तैश में आकर उसने जवाब दिया !
”अरे, मेरा मतलब ये नहीं था,आप गलत मतलब निकाल रही है !”अधिकारी सकपकाया-सा बोला !
”माफ़ कीजिये साब, अपने आक्रोश में मैंने ज़्यादा ही कह दिया आप को ! क्या करे, हमारी समस्या एक-दो दिन से नहीं, हमेशा से रही है ! मेरी समझ में तो हमारा विकास तभी होगा जब हमें पानी की समस्या से जुझने की विरासत अपनी अगली पीढ़ी को नहीं सौंपनी पड़े !”
”ओह, इतनी समस्या है तुम्हारे गावँ में पानी की ?”
”मेरे गावँ की स्थिति यूँ बयां कर सकती हूँ क़ि बिवाइयां-सी पड़े सूखे खेतों में बहती लूं मानो उनका दर्द और बढ़ाती रहती है ! बूढ़े कुँवें तो यूँ लगे मानो अपनी उम्र जी चुके हो !
”उफ़ ! बहुत दुखद…. !” ऐसा कह संवेदना व्यक्त कर ही रहा होता है कि तभी अधिकारी का मोबाइल घनघनाया !
”हां, ठेकेदार जी ! अरे, आज दो नहीं तीन टेंकर और जल्दी भेजो मैं मैदान को शानदार घासयुक्त बनाने के लिए किसी भी प्रकार से पानी की कंजूसी नहीं चाहता ! सख्त लहजे में मोबाइल पर जवाब दे कॉल काल दी !
”अभी जो आप ने संवेदना व्यक्त की फिर वो क्या थी ?!” ये सुन उस औरत ने हैरत में सवाल किया !
”देखिये इतने बड़े होने वाले क्रिकेट मैच में अगर मैदान के प्रबंधन में कुछ भी कमी मिली तो मेरा प्रमोशन तो दूर की बात शाबाशी तक नहीं मिलेगी ! और संवेदनाओं से कभी ड्यूटी नहीं की जाती !”
***
लघुकथा-4
फ़रमान
”बहुत मेहनत करनी पड़ी सर, कहीं भी ऐसा घर नहीं दिखा जो बूस्टर लगा कर पानी खींच रहा हो ! हो सकता है की जनता जलदाय विभाग के नए नियमों से डर गयी हो कि अगर हमारे यूँ बूस्टर लगा मिला तो जुर्माना भरना पडेगा !”
”सही बात है तुम्हारी !”
अधीनस्थ कर्मचारी अपने अधिकारी को सूचना देता हुआ रिपोर्ट दे रहा था !
‘मगर सर, मुझे लगता है की जुर्माने से बचने के लिए लोग नए-नए तरीके ईज़ाद कर लेते हैं !”
”हमारे यहाँ नियम तोड़ने के तरक्की पहले बनते है और नियम बाद में , समझा !”
अधिकारी समझता-सा बोला !
”जी सर, सौ फ़ीसदी सच !” अधीनस्थ कर्मचारी ने सहमति जताई !
”किसी को पानी का हक़ नहीं मारना चाहिए कि बूस्टर लगाकर खुद का घर तो लबालब कर ले और अपने पडोसी का कोई सोचे ही नहीं !”
”साब, आज तो सभी पहले अपनी ही सोचते है !”
”सही है दयाराम ! जो ऐसा ना सोचे वो अपनी खींचो और ओढ़ो ! फिर वो क्यूँ आकर हमारे सामने अपने मटके फोड़ अपना विरोध प्रदर्शन करते हैं !”
‘बात सही है साब ”
”अब छोड़ इस बात को, चल पंखा तेज़ कर गर्मी तो मानो जान लेकर छोड़ेगी !”
”साब ,लगता तो पानी का भी है,पूरे शहर में किल्लत मारा-मारी ! अच्छा हुआ जो आप ने फ़रमान जारी करवा दिया कि पानी सप्लाई के दौरान अगर किसी के भी बूस्टर लगा मिला हमारी फलाइंग के वक़्त तो हाथो-हाथ उसे ज़ुर्माना भरना पड़ेगा ! साब,लगता है आप की योजना कारगर रही !”अधीनस्थ कर्मचारी खुशामद करता बोला !
”अरे भई, सीधी-सी बात है दया राम ! पानी देंगे तो उतना ही ना जितना हमें पीछे से मिलेगा ! रोज-रोज बूस्टर की शिकायतों से तंग आकर ऊपर से परमिशन लेकर ये फ़रमान ही जारी करवाना पड़ा ! चलो मगज़ मारी तो मिटी कुछ समय के लिए !” ठंडी सांस भरता बोला !
”अरे,हाँ साब ! याद आया-याद आया ! शहर के पश्चिमी छोर पर फ़्लाइंग के वक़्त मुझे एक निर्माणाधीन मकान में बूस्टर लगा मिला तो मैंने उसे अपने जलदाय विभाग का फ़रमान दिखाते हुए इसका उलंघन बताते हुए जैसे ही चालान काटना चाहा तो उस मकान के कुछ लोग मुझसे धक्का-मुक्की करने लगे,गाली-ग़लोज करते हुए धमकाने लगे !”
” ओह, कहीं लगी तो नहीं ना तुम्हें? !”
”नहीं साब, मगर मैं वहाँ का ठिकाना नोट कर लाया ! नोटिस जारी कीजिये इस नाम का, सारी हेकड़ी हवा हो जायेगी उन सालो की !” अधीनस्थ कर्मचारी दांत पीसता अपने जेब से पर्ची निकालता हुआ बोला !
पर्ची देखते ही अधिकारी के चेहरे की हवा उड़ गयी और तुरंत पर्ची फाड़ते हुए गरजा ! ”अभी नई- नई ही नौकरी लगी है तुम्हारी, इसलिए अंजान हो कुछ नियमों से ! मुझे भी पता था इस मकान का, अगर अपनी सर्विस बुक पे कोई लांछन नहीं लगवाना चाहते होतो फिर कभी इस पर्ची का ज़िक्र मत करना !”
”जी, मगर कारण” ?
‘कुछ कारण समझे जाते है, बताये नहीं जाते ! बस इतना समझ लो की हमें भी अपने ऊपर वालो की कुछ बातें दबानी पड़ती हैं !”
”ओह, समझ गया ! क्या जान सकता हूँ निर्माणाधीन मकान किसका है ?”
”हमारे ही डिविज़नल हैड का !”
***
लघुकथा-5
भूख
”बेचारे भूखे को रोटी की बजाय लट्ठ खिला दिया, जानवरों की तो कोई क़द्र ही नहीं करता !”
मंगला भिखारी दर्द से करहा रहे कालू कुत्ते के पाँव को सहलाता हुआ बोलो |
”जब से आटे के भाव बढ़े है, लोगों ने रोटियां देनी कम कर दी है कहते है की अब रोटियां गिन कर बनाते है,अगरहम लोगों की भी दो-चार रोटियां गिन ले तो पहाड़ थोड़े ही टूट पडेगा उन पे, बेचारे कालू को चोट ज़ोर से लगी है !” उसकी पत्नी रुकमा बोली !
”कालू भूख में भूल गया था की ये उस सेठ के बंगले के सामने खड़ा कूकने लगा जहां चौकीदार लट्ठ लिए खडा रहता है !” मंगला ने कहा !
”इसमें इस का क्या दोष जब सेठ के नौकर सेठ के पालतू कुत्ते को बिस्किट खिला रहा था तो इस के मुझ में भी पानी आ गया होगा, सोचा होगा की जब इसे बिस्किट खिला रहा है तो मुझ भी खिलाएगा, मैं भी तो कुता हूँ !” रुकमा ने उतर दिया !
”दोनों कुतों की किस्मत में भी फ़र्क़ है ! आहाहा,आसपास कहीं गरमा गर्म बन रही रोटियों की महक से मेरी भूख भी भड़क रही है !”
”मेरे कटोरे में सूखी रोटी है !”
”पगली ! मुँह में दांत होते तो ये भी खा लेता !”
”पता है, तो मैं किसी घर से मांग कर लाती हूँ !”
रुकमा चल देती है, मगला दर्द से करहा रहे कालू कुत्ते को पुचकारने लगता है ! रोटियों की महक मगला के मुँह में रह-रह पानी भर रही थी ! मगर कुछ क्षणों बाद रुकमा लंगडाती हुई आई !
”अरे ! ये क्या हुआ ?”
”थोड़ी दूरी पे नया घर बना है इस उपलक्ष्य में वहां खाने का कार्यक्रम चल रहा था, खाने की महक बहुत ही अच्छी आ रही थी महक से लग रहा था शायद पकवान भी थे ! मैं मन ही मन ख़ुश हो रही थी कि आज हमें पकवान भी खाने को मिलेंगे, मैं ये ख़याली पुलाव लिए उस घर के दरवाज़े के पास जा कर खड़ी हो गयी तभी उस घर की कोई महिला सदस्या आई उसे देख मैं बोली – ;; माई ! कुछ खाने को दे दो ना मेरे पति भूखे हैं !”
”बाह्मण भोजन से पहले किसी को कुछ नहीं मिलेगा और हां, भिखारियों को तो पूरा खाने का कार्यक्रम सलटने के बाद ही !” वो मुझे झिड़कती बोली !
”आप लोग ही तो कहते है की मेहमान भगवान् का रूप होता है, थोड़ा खाना दे दो ना, मेरे पति को बहुत जोरो की भूख लगी है !” मैंने फिर विनती की उससे !
”भिखारी हो कर ज़बान लड़ाती है मेरे से ” तो ये कह तैश में आ कर मुझे अपनी लात से धक्का दे दिया और गिरने से मेरे थोड़े घुटने छिल गए अब दर्द भी हो रहा है !”
”वाह रे ,सभ्य समाज ! ख़ाने में धक्का ख़ैर , ये तो हमारे जीवन का एक हिस्सा-सा बन गया है फिर हम लोगो की और कालू की किस्मत में अंतर है भी कितना ?!” मंगला आक्रोश में बोला !
”सिर्फ़ इतना ही की बस हम इंसान कहलाते हैं और ये जानवर !” रुकमा अपनी चोट पे फूंक मारते हुए कहा !
”अरे, सुनो ! ख़ुशबू से लग रहा है की कहीं परांठे भी बन रहे है, है ना !” मंगला मुस्कुराता हुआ अपनी घ्राण शक्ति से सूंघता बोला !
”लगता तो है, चलो हम उस कचरे की ढेरी क पास चल कर बैठे तो तुम्हारे लिए ठीक रहेगा !” रुकमा सूखी रोटी को कटोरे में देखती हुई बोली !

पाँच लघुकथा 
नीलिमा शर्मा निविया
लघुकथा-१
निवेश
.” सुनो जी आज दफ्तर से सीधा मेरे कमरे में आना| यह क्या बात हैं आप दफ्तर से सीधा माँ के कमरे में जाते हैं आप ” सरबजीत ने रोष दिखाते हुए सरदार परमिंदर सिंह को कहा |
‘ मेरी प्यारी पत्नी !अगर आज मैं अपनी माँ को पूछता हूँ तो कल तेरे बच्चे भी तो तुझे पूछेंगे न |निवेश हमेशा पैसे का नही किया जाता|
“जाओ माँ के लिय भी चाय बना लेना “.
लघुकथा-२
“एक बार फिर”
” हैलो अंकित ,कैसे हैं आप? आप मुझे फिर से मिलना चाहते थे ?”
बेंच पर बैठते हुए मानसी ने अंकित की तरफ देखते हुए प्रश्नवाचक मुद्रा में पूछा |
“अरे होने वाली पत्नी हो तुम मेरी …फिर ऐसा सवाल क्यों?”
“नहीं , बस जिज्ञासा थी।माँ का फोन आया था कि आप एक बार फिर से शादी की तिथि तय होने से पहले मुझसे मिलना चाहते हो,
“हां! बस तुमको और अधिक जानना चाहता हूँ ,लेकिन तुम हमेशा इतनी चुप रहती हो,खुलकर मिलना भी नहीं चाहती?”
“जी, आदत ही ऐसी हैं ”
“पर ऐसे कैसे निभेगी यार! शादी से पहले रोमांस न हो, आपसी बातचीत ना हो तो रिश्ते में क्रिस्प नही आता”
“बातचीत का मतलब समझ रही हो ना ”
“पर आप तो कहते थे कि मेरी आँखों में बोलती हैं और आपको उनको पढ़ना आता ”
“शादी सिर्फ आँखों ने झांककर नही कटती है यार!”
करीब आते हुए अंकित ने मानसी को अपनी तरफ खींचना चाहा
“तुम समझों न यार! मुझे भी मालूम तो हो मेरी पत्नी कितनी रोमांटिक हैं ”
“लेकिन ”
“क्या लेकिन ? मुझे मालूम हैं तुम्हारा पहले भी एक रिश्ता टूट चुका हैं अब रिजेक्टड लड़की से शादी कर रहा हूँ तो देखूं तो कितनी आग हैं उसमें , मुझे किसी बर्फ की सिल्ली से शादी नहीं करनी हैं , वरना मेरी तरफ से रिश्ता ख़तम हो जाएगा ”
मानसी की आँखों के सामने अतीत का वो दृश्य गुजर गया जब उसकी मृत ममेरी बहन ने रिश्ता होने पर लड़के का कहा मान लिया था और उसके गर्भवती होने पर लड़के ने बहाना बनाकर रिश्ता तोड़ दिया था | मानसी ने झटके से उठते हुए कहा “ अंकित मैं एक लड़की हूँ किसी होटल का भोजन नही जिसे आप चख कर पहले स्वाद तय करेंगे , आपको रिश्ता करना हैं या नहीं ,आप सोचने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन अब मुझे आपसे रिश्ता नहीं करना है l
लघुकथा-३
अभिलाषा
ऑफिस में पुरुष दिवस की हलचल थी। मैनेजर ने ऐलान कियाl
“आज पुरुष दिवस है, अगर कोई परी कहे कि सब अपनी कोई एक इच्छा बता सकते हैं।”
सब पुरुष कर्मचारी चमक उठे। शर्मा जी ने तुरंत कहा
“सर, आज मेरी पत्नी मार्केट न जा सकेl घर का नेट ना चलेl ताकि वो पुरुषदिवस के नाम पर अपने लिए शॉपिंग ना कर सके … बस यही इच्छा है।”
गुप्ता जी बोले
“मुझे तो घर पहुँचते ही गरम-गरम चाय मिल जाए, खुद बनानी अच्छी नहीं लगतीlबाकी जीवन से कोई शिकायत नहीं।”
चौधरी जी ने शर्माते हुए कहा…
“सर, मेरी बस इतनी अभिलाषा है कि आज टीवी का रिमोट मुझे मिल जाए। बस एक शामl”
ऐसे ही एक-से-एक ‘महान’ इच्छाएँ चल रही थीं।
अचानक मैनेजर की नज़र दीपक पर पड़ीlहमेशा शांत रहने वाला, कम बोलने वाला।
“दीपक, तुम्हारी क्या इच्छा है?”
दीपक ने धीरे से कहा…
“सर, मैं तो बस इतना चाहता हूँ कि कम से कम आज मेरी बात पूरी सुनी जाए… बीच में रोका न जाए।” पूरा ऑफिस हँसी से गूंज उठाl
“वाह दीपक! इतनी बड़ी इच्छा, बजट में फिट नहीं बैठेगीl”
सब ठहाके मार रहे थे, और पुरुष दिवस पर दीपक इतिहास में दर्ज हो गयाl इतनी बड़ी और प्यारी अभिलाषाl
पहला पुरुष, जिसकी इच्छा सुनकर बाकी पुरुष भी सहानुभूति में हँस पड़ेl लधुकथा-४
बड़ी वाली लेखिका
“आ जाते है मुँह उठाकर। क्या समझते हैं ये फेसबुकिये? किसी की लिस्ट में हमारा नाम देखा और झट से मित्र प्रस्ताव भेज दिया! हुँह! कम से कम 200 लोग म्युचुएल फ्रेंड हों, तभी मित्र बनाने का सोचती हूँ । 50 से कम वालों को तो फॉलो भी नहीं करने देती।”
एक बड़ी वाली लेखिका ने एक बड़े लेखक की तरफ देखकर अपने गालों पर लटकते बालों को कानों के पीछे घुमाते हुए कहा।
“ओह हो, तो आप जब फ़ेसबुक पर आई थीं तो 200 फेक मित्रों को एॅड करके आयी होंगी क्योंकि उससे कम में तो आपको भी किसी बड़े लेखक ने एॅड नही किया होगा ।”
“कहना क्या चाहते है आप?” लेखिका जी का चेहरा तमतमा उठा।
“यह मत भूलिए कि फेसबुक पर हर कोई जीरो मित्रसूची के साथ आता है और वो कितना भी महान क्यों न हो, 5000 से ज्यादा मित्र तो सूची में ले ही नही सकता। मित्र सूचीवाले ये ही लोग आपको पढ़कर बड़ा बनाये हुए हैं जो आप आजकल लाइव आ रही है।”
अवाक लेखिका, लेखक महोदय को तक रही थी। उनके इस मुंहलगे लेखक मित्र ने उनका फ़ोन अपने हाथ मे लेकर एक्सेप्ट आल फ्रेंड रिक्वेस्ट का बटन दबा दिया।
लघुकथा-५
“चयन”
आँगन में मुर्गा, बिल्ली, कुत्ता और गाय खड़े थे।
दानों की थाली रखी गई।
मुर्गा बोला
“सबसे पहले मेरा हक़ है, सुबह मेरी आवाज़ से होती है।”
बिल्ली ने आँखें तरेरीं
“चुपके से जो मिले, वही मेरा।”
कुत्ता बोला
“पहले मालिक का, फिर मेरा।”
गाय चुप रही।
थाली उलट गई।
दानें मिट्टी में बिखर गए।
मुर्गा लड़ पड़ा,
बिल्ली झपट गई,
कुत्ता भौंकता रह गया।
गाय ने मिट्टी से दाने चुने
और सबके आगे रख दिए।
आँगन शांत हो गया।
उस दिन समझ आया
आवाज़, चालाकी और अधिकार से नहीं,
चयन से चरित्र बनता है।