पाँच लघुकथा

संतोष श्रीवास्तव

लघुकथा-१
चंदन बाबू का प्रेत
10 वर्ष बाद मैं फिर अभ्यांश के गेट पर था ।जहां दिव्यांग बच्चों की देखभाल होती थी ।पूरी इमारत सन्नाटे की गिरफ्त में थी। मेरी आंखें चंदन बाबू को जिन्होंने अपनी नौकरी से अवकाश के बाद की सारी उम्र अभ्यांश की देखभाल में लगा दी।
शहर के दानकर्त्ता अच्छी खासी रकम अभ्यांश की दान पेटी में डालते थे। मैं भी उनमें से एक था। लाखों का लेखा-जोखा……. समिति गठित हुई कुल 8 लोगों ने अभ्यांश का कामकाज संभाला। मैंने लोहे का बड़ा गेट खोला। गेट की आवाज से एक अधेड़ सा व्यक्ति” कौन है ?” की आवाज लगाता आया।
“जी चंदन बाबू हैं? उन्हीं से मिलने आया हूं ।”
“वे तो 4 साल पहले चल बसे।”
“ओह सॉरी भाई ।” अफसोस सहित मैंने उनका परिचय चाहा, दिव्यांग बच्चों के बारे में पूछा।
” मैं राधेश्याम ,यहां की देखभाल करता हूं ।चलिए ऑफिस में बैठते हैं ।”
ऑफिस वही था ।सामने कुर्सी पर चंदन बाबू बैठते थे। अब उस कुर्सी पर राधेश्याम था।
“चंदन बाबू के जाते ही यहां तो अभ्यांश के कोष की रकम में जैसे लूट सी मच गई।एक करोड़ रुपए कपूर से उड़ने लगे। पहले लोग धर्मादा पर आमादा थे ।अब धर्मादा को खा रहे हैं ।अभ्यांश के बच्चे सरकारी अनाथालय चले गए। अब इस जगह पर प्राइवेट कोचिंग होती है ।”
जिन बच्चों को चंदन बाबू जान से भी ज्यादा चाहते थे उनके नाम की पाई पाई रकम उन्हीं पर खर्च करते थे ।अब वो बच्चे …….
अचानक मुझे चंदन बाबू के हंसने की आवाज सुनाई दी ।लगा चंदन बाबू दरवाजे पर खड़े हैं। उनकी आंखों में आंसू हैं।जो गालों पर नहीं धरती पर गिर रहे हैं। और गिरते ही शून्य में समा रहे हैं।
लघुकथा-२
जाल
होली के रंग भरे मौसम में वह नितांत अकेला 6 महीने से जेल में बंद है।पत्नी ने मिलने की इच्छा प्रकट की थी पर उसने मना कर दिया। वह झूठ फरेब की दुनिया में किसी से मिलना नहीं चाहता। हालांकि उसकी ऐसी स्थिति में पत्नी का कोई दोष नहीं था।
सरकारी अस्पताल का बेहद काबिल डॉक्टर वह
उस दिन अस्पताल पहुंचा ही था कि देखा नर्स कल एडमिट हुई गर्भवती स्त्री को पलंग पर लिटा कर उसके पेट के दोनो ओर पैर रखकर उसके पेट को जोर-जोर से नीचे की ओर दबा रही थी ।स्त्री की कातर चीखें अस्पताल की दीवारों से टकरा रही थीं। उसने नर्स को डांटते हुए कहा-” यह क्या कर रही हो ? किसने तुम्हें नर्स के पद पर अप्वॉइंट किया? इतना भी नहीं जानती ऐसा करने से वह मर जाएगी ?”
नर्स ने तैश से उसे देखा। उसकी आंखों में अपमान की बिजलियां थीं। वह अनुसूचित जाति की थी। शाम तक नर्स ने एफ आई आर दर्ज करा दी कि डॉक्टर ने उसे हरिजन कहा।
दलित ह्यूमन राइट्स के तहत यह कानूनी अपराध है। उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया । हरिजन कहने के अपराध में कोई अग्रिम जमानत तक नहीं । इस झूठ ने उसकी वर्षों की सेवा और लोकप्रियता को मिट्टी में मिला दिया।
वह किंकर्तव्यविमूढ़ सा जेल के सींखचों को पकड़े छलक आई आंखों से होली के पकवानों से भरा डिब्बा लिए पत्नी को ओझल होते देखता रहा।
लघुकथा-३
तूफान
जब वह सरकारी अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डॉक्टर विपिन के क्लीनिक पहुंचा तो सिर्फ दो मरीज थे। वह खुश हो गया उसका नंबर जल्दी आएगा। अपनी फाइल काउंटर पर जमा कर नंबर का टोकन लेकर वह आराम से बैठ गया।
उसकी पत्नी अब गहरे अवसाद से लगभग मुक्त हो चुकी है। शायद आज डॉक्टर कहें कि अब दवाई की जरूरत नहीं है।
डॉक्टर 10:00 बजे आएंगे जल्दी नंबर आने के चक्कर में वह 9:00 बजे ही आ गया।धीरे-धीरे मरीजों की भीड़ बढ़ती गई।
10 के 12 बज गए पर डॉक्टर के आने की कोई सूचना नहीं । मरीज इंतजार करते बैठे रहे। कुछ महिलाएं तो अपने बच्चों को लेकर चली गई थीं।
डेढ़ बजे लंच ब्रेक के समय काउंटर पर बैठे आदमी ने घोषणा की “आज डॉक्टर नहीं आएंगे ।उन्होंने आज का भी अवकाश लिया है। हमें भी अभी पता चला।”
यह चौथा दिन था जो डॉक्टर उपलब्ध नहीं था ।हर बार अवकाश लेने की ही सूचना। करीब 25 मरीजों की भीड़ ने काउंटर पर बैठे आदमी को देखा। सभी खामोशी से क्लीनिक से बाहर चले गए ।किसी ने किसी भी प्रकार का गुस्सा झुंझलाहट प्रकट नहीं की। यह तूफान आने के पहले की शांति थी ।
शाम होते-होते सांध्य दैनिक में खबर थी।
डॉक्टर विपिन के घर पथराव ।घायल अवस्था में वे अस्पताल के आईसीयू में हैं।
लघुकथा-4
देशप्रेम
आतंकवादियों से लगातार चार दिन की मुठभेड़ के बाद मिली विजय की खुशियां सैनिक अपने शिविर में नाच गाकर मना रहे थे। लेकिन उनके पास रसद खत्म हो चुकी थी और उन तक आज रसद पहुंच भी पाएगी इसकी उम्मीद भी खत्म हो चुकी थी।
नाच गाने में खुद को थका कर वे सोने की कोशिश कर रहे थे लेकिन भूख की ज्वाला उन्हें चैन नहीं लेने दे रही थी।
दूर दूर तक कहीं किसी के होने की संभावना नहीं थी। आतंकवादियों के डर से गाँव वाले भाग गये थे। गाँव निर्जन था।
तभी उन्हें एक ज्योति सी जलती दिखाई दी ।आकृति स्पष्ट हुई। एक प्रौढ़ महिला आठ 9 साल के लड़के का हाथ पकड़े उन्हीं की ओर चली आ रही थी ।प्रौढ़ा के हाथ में रोटी सब्जी से भरी टोकरी थी और लड़के के हाथ में लालटेन। प्रौढ़ा ने टोकरी उनके सामने रखी-
” खा लो मेरे वीर भाइयों ,इतनी लड़ाई लड़ी है जालिमों से।भूख लगी होगी।
जवान रोटियों पर टूट पड़े ।प्रौढ़ा बहुत प्रेम से सैनिकों को रोटी खाते हुए देखती रही।
खाने से तृप्त हो एक सैनिक से पूछा-” अम्मा तुम कहां थी ?कैसे पहुंची हम तक?”
” बेटा, मेरे बहू बेटा आतंकवादियों ने मार डाले। किसी तरह मैं अपने पोते को लेकर खलिहान में छुप गई 4 दिन तक छुपी रही। जब गोलियों की आवाज शांत हुई ,जब मैं समझ गई कि तुम लोगों ने उनका काम तमाम कर दिया है।”
जवान देख रहे थे एक अनजान प्रौढ़ा को जिस के चूल्हे की आग ने न जाने किस प्रेरणा से जवानों के पेट की आग बुझाई थी। इस आग की लपटों की रोशनी में भारत देश जगमगा रहा था।
लघुकथा-५
सुनो बेताल
राजा ने शव को कंधे पर डाला और चल पड़ा।
“सुनो राजन्!…” शव में स्थित बेताल अन्य दिनों की तरह कहानी सुनाने को तैयार हुआ।
“नहीं बेताल, आज मुझे बोलने दें, आप सुनें और जवाब दें।”
“नि:संकोच कथा कहो राजन, मैं जवाब देने को प्रस्तुत हूँ।”
“राजपद का रुतबा बचाए रखने के लिए हम लोकसभा चुनाव में खड़े हो रहे हैं। जीतने के लिएआपकी सहायता चाहिए।”
“मेरी सहायता?” ठहाका लगाया बेताल ने, “मैं तो शव हूँ!”
“चुनाव में मरे हुए लोगों की बड़ी जरूरत पड़ती है बेताल। वोटिंग लिस्ट में दो तरह के मुर्दों का नाम दर्ज रहता है; एक उनका जो मर चुके हैं और दूसरा उनका जो पोलिंग के दिन मरे पड़े रहते हैं।”
“तो?”
“सारे मुर्दों का वोट मुझे चाहिए।”
“उतने भर से जीत जाओगे?”
“बाकी मैं खरीद लूँगा। बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल देने और बेरोजगारी खत्म करने के वादे करके।”
“राजा होकर भी चुनाव लड़ना और जीतना क्यों चाहते हो?” बेताल ने पूछा।
“बस एक बार जीत गए तो… रुतबा बरकरार। पीढ़ियों के वारे-न्यारे।”
“और बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल…?”
राजा हँसा–“आप भी… प्रजातांत्रिक चयन का यही तो फायदा है। राज भी, धन भी, यश भी। जवाबदेही कुछ नहीं।”
“यह तो धोखा है सरासर! मैं इस धोखे में तुम्हारा साथ नहीं दे सकता। मैं चला।” बेताल क्रोधित हो बोला और सड़क किनारे के पीपल के पेड़ पर जा लटका।
चुनाव तो मैं जीत ही लूँगा बेताल–पेड़ की ओर देख राजा मन ही मन मुस्कुराया–सुनो, चुनाव जीतकर सड़क पक्की करने के बहाने सबसे पहले पीपल के इस पेड़ का काम तमाम करवाऊँगा।
पाँच लघुकथा

छाया अग्रवाल

छाया अग्रवाल
बरेली
लघुकथा-1-
बाहर का खाना
उम्र का पतझड़ अभी तो शुरू भी नहीं हुआ था कि
कपिलेश की चिढ़चिढ़ाहट दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही थी, अम्मा कहती थी साठ में आदमी सठिया जाता है। अभी तो कपिलेश के सठिया में चार बरस बाकी हैं फिर….
दिन भर की नोंक-झोंक से उकताई स्नेहा बड़बड़ाती हुई कुछ मीठा पकाने का सोच रही थी आज शादी की तीसवीं वर्षगांठ थी, सब किचकिच, झुंझलालट एक तरफ, कपिलेश से तीस बरसों के लगाव ने जोर मारा, ‘वह बाहर का कुछ नहीं खाते चलो उनकी पसंद की केसर खीर बना लेती हूँ।’
खीर बनते-बनते स्नेहा की कडवाहड़ भी धुलने लगी।
कि अचानक कपिलेश ने पीछे से उसे बाहों में भर लिया और मुस्कुरा कर एक पेपर बैग उसकी तरफ बढ़ा दिया।
आज बरसों बाद अपने लिए तोहफा देख कर स्नेहा, स्नेह से भीग गयी।
बैग खोलते ही वह सन्न रह गयी- “ये किसके लिए है?”
कपिलेश ने बेशर्मी से कहा – “तुम्हारे लिए, जाओ पहन कर दिखाओ”
“छि: ये कपड़े?”
स्नेहा क्रोध और आश्चर्य के मिले-जुले भाव से भर उठी
“आपने सोचा भी कैसे कि ये कपड़े मैं पहनूंगी वो भी इस उम्र में, जबकि सारी उम्र मैंने सलवार-कुर्ते, साड़ी में निकाल दी।”
” देखों स्नेहा, आज ईमानदारी से एक बात कहता हूँ, जब मैं बाहर लड़कियों को ये कपड़े पहने देखता हूं तो बार- बार मन करता है उन्हें देखने का, अब फैसला तुम्हारे हाथ में है तुम चाहती हो मैं उन्हें न देखूँ तो तुम ये कपड़ें पहन कर दिखाओ।”
स्नेहा हतप्रभ आवाक खड़ी थी- ‘कपिलेश को बाहर का खाना पसंद है क्या ये सच है? या फिर वह वास्तव में ईमानदार है?’
लघुकता-2-
इमोशनस
“इमोशन्स लाओ….इमोशन्स”- टीचर ने पेंटिंग बनाते हुए निधी को चौथी बार टोका था।
“निधी देखो, तुमने नदी का किनारा, पहाड़, पेड़, पत्थर, घास सब कितने सुन्दर बनायें हैं? फिर यह प्रेमी युगल इतना नीरस क्यों? ध्यान रखो तुम प्रेम को जीवन्त कर रही हो तो प्रेमी युगल के भाव को कोमलता से उकेरो।”
निधी ने सामने रखे पोस्टर को उड़ती नज़र से देखा, जिसमें पुरूष के हाथ में गुलाब है और वह प्रेम रस में सकुचाई स्त्री को निहार रहा है।
निधी उसी को देख कर वह पेंटिंग को रचने का प्रयास कर रही थी।
मगर उसके कैनवास पर ब्रश नहीं जद्दोजहद सी थी। उसकी आँखों के सामने माँ-पापा के झगड़े, मनमुटाव और कड़वाहट के ही चित्र उभर रहे थे।
समय पूरा होने पर टीचर ने उसके कैनवास पर नजरें गड़ाईं तो देखा, पुरूष का हाथ हवा में लहरा रहा था और स्त्री सहमी सी अपने चेहरे को हथेलियों से ढ़ापीं हुई थी…..
टीचर आवाक थीं।
रंगों की प्लेट में बिखरें अलग-अलग रंगों की तरह उनके चेहरे के भाव भी बदल रहे थे, उन्होनें एक गहरी सांस ली- ‘यह सच है, कोई भी कला या चित्र को हाथ नहीं, दिल भाव और अतीत के रंग बनाते हैं, यह बात समझने में क्यों उम्र गुजर गयी?’
उन्होनें स्नेह से निधी के सिर पर हाथ फेरा और सहानुभूति के कदमों से आगे बढ़ गईं।
लघुकथा-3
दुर्गंध
आज माधुरी ने सोनिया से मिलने का फैसला किया और उसे शहर की भीड़़भाड़ से दूर एक रेस्तरां में बुलाया। दोनों के बीच औपचारिक अभिवादन के सिवाय जब कोई वार्तालाप नहीं हुआ तो काफी देर के सन्नाटे के बाद माधुरी ने कहा- “सोनिया तुम मेरे पति की ज़िन्दगी से निकल क्यों नहीं जातीं? ये तुम्हारे और मेरे दोनों के लिये अच्छा होगा।”
“आप मुझसे मद्द माँग रही हैं या मुझे कण्ट्रोल कर रही हैं माधुरी जी? जब कि ये काम आपको अपने पति के साथ करना चाहिए, आप जानती हैं कि, मैं नहीं, वो मेरे पीछे पड़ें हैं।”
“तुमने उन्हें कभी मना भी कहाँ किया? ये तुम्हारी मौन सहमति है जिसे तुम भी समझती हो।” माधुरी ने सोनिया को द्रढ़ नेत्रों से देखा।
“माधुरी जी, आपके पति जैसे बहुत हैं जो मेरे आगे-पीछे घूमते हैं, क्या सभी को जवाब देती रहूँ? बहुत उकता गयी हूँ मैं, मर्द की इस प्रवृत्ति से।”
उकताई हुई सोनिया ने अपने मन के चोर को बाहर आने से रोका और संभ्रांत महिला के लिवास में खड़ी रही।
“मुझे लगा था तुम मेरी तरह ही एक संवेदनशील औरत होगी जो जैसा सोचती है वैसा करती भी होगी? जिसे गिरने से मुझे बचाना चाहिए लेकिन तुम तो बहुत प्रैक्टीकल निकलीं।”
माधुरी ने परीक्षा के अंतिम क्षणों का पूरा जोर लगा कर धधकते हुये कहा।
“आप सिर्फ मेरी मद्द लेने आई हैं और मैंने आपको अपना समय दिया अगर मैं बुरी होती तो आपसे कभी न मिलती, आपको मेरा शुक्रिया कहना चाहिए।”
सोनिया ने पलट कर माधुरी की ओर पीठ कर ली थी।
“ठीक है, अगर तुम मेरे पति को बांध कर रखने में सफल हो गयीं तो मैं तुम्हारा शुक्रिया कहने जरूर आऊँगी।”
माधुरी उठ खड़ी हुई, अब वह उस ठंडे संवाद को छोड़ कर, आदमी के चरित्र की चिपचिपी दुर्गंध से दूर जा रही थी और सोनिया स्तब्ध खड़ी माधुरी को जाता हुआ देख रही थी।
लघुकथा-4
एक बोतल
ठिठुरती जाड़ों की सर्द रात में वह दोनों पति पत्नी ढ़ूंढ- ढ़ूंढ कर बेसहारा, बेघर लोगों को कंबल बांट रहे थे कि एक रैन बसेरा देख ठिठक गये, सोचा कि क्यों न कुछ कंबल यहाँ भी दे दिये जाएं सो गेट खटखटा दिया।
नींद से जागा केयर टेकर झुंझला उठा-
“इतनी रात को नींद खराब कर दी बाबू जी, वैसे भी ये साले रात भर सोने नहीं देते, कोई कराहता रहता है तो कोई बड़बड़ाता है, कल तो वो गलीच आते ही बोतल की माँग करने लगा, मैंने गुर्राया तो चाय माँगने लगा, अब आप ही बताओ साहब, मैंने यहां पर मुफ्त चाय बांटने का ठेका ले रखा है क्या?”
आवाज़ सुन कर वह अन्दर से दौड़ आया, हाथ में एक और पतला सा कंबल लिए- “बाबू जी, यह कंबल के बदले बस एक बोतल ला दो, कलेजा जल रहा है ये मुआं कंबल अब क्या करेगा?”
उसकी बात सुन कर पत्नी कुछ असहज हो गयी तो कहने लगा-“गर्म चाय ही पिला दो बाबू, चाय से भूख मर जाती है और सीने की जलन भी।”
तभी पति पत्नी ने भीतर झांका, झीने कंबलों के ऊंचें ढेर को देखा और अपने हाथ के कंबलों को भी।
अब कंबलों को वहीं छोड़ दोनों गर्म चाय की तलाश में निकल पड़े थे
लघुकथा-5
शून्य, सन्नाटा और सूनी सांझ
‘मैं पिछले कई वर्षों से मृत्यु की प्रतिक्षा कर रहा हूँ पर मृत्यु मुझे नहीं आई, नर्क जैसा जीवन कब तक….?’
हे प्रभु! अब तो सुन लो!’
कुलश्रेष्ठ ने डायरी को बंद करते हुये ऐनक उतार कर डायरी पर रख दी और भरी आँखों से छत को टकटकी लगा कर देखने लगे।
सुविधाओं से युक्त कमरा उन्हें काट रहा था। जब से दुर्घटना में दोनों पैर कटे हैं वह बिस्तर पर हैं, दवा, खाना सब समय पर जरूर मिलता है पर कोई मिलने नहीं आता। अकेलेपन ने जिन्दगी बोझ बना दी।
आँसुओं से धुंधलाई आँखों के सामने पत्नी मोक्षदा उभर आई- ‘ मोक्षदा पर कितनी बंदिशें लगाईं उसका करियर बर्बाद कर दिया, अपनी हुकूमत थोपता रहा और वह सहती गयी, घुट- घुट कर आखिर चली ही गयी। और दीपिका? उसका दोष बस इतना था कि वह निर्धन परिवार से थी, बेटे ने उससे अपनी मर्जी से शादी की थी और उनके स्टेटस को चोट पहुँचाई थी सो तलाक करवा दिया और अपने स्टेटस की सिम्मी से दूसरा विवाह करवा दिया।
सिम्मी ने इस कमरें में कभी पैर भी नहीं रखा, कहती हैं- ‘स्मैल आती है’
तीन बरस से वह इस कमरें में कैद हैं, बेटा एक्सपोर्ट बिजनेस में इतना व्यस्त हैं कि इन तीन बरसों में छ: सात बार ही इस कमरें में आया होगा।
यादें कलेजा फाड़नें लगीं। पौरूषता से पॉवर छिटक चुकी है, बचा है तो बस…..शून्य, सन्नाटा और सूनी सांझ।
‘पृथ्वी पर ही है स्वर्ग और नर्क! मेरा नरक यही है।’
कुलश्रेष्ठ फफक पड़े।
पाँच लघुकथा

डॉ स्वाति चौधरी 
लघुकथा-1
ख़ामोश तस्वीर
दीवार पर एक पुरानी तस्वीर टँगी थी — एक छोटा-सा बच्चा गोद में, अपनी माँ की बाहों में मुस्कुराता हुआ। तस्वीर के नीचे धूल जमी हुई थी, जिसे माँ रोज़ उसे कपड़े से साफ़ करती, जैसे; हर बार बेटे को जीते जी छू रही हो।
श्रीमती सावित्री देवी, उम्र लगभग सत्तर, अकेली रहती थीं। उनके बेटे रोहन को शहर में नौकरी लगी थी। शुरुआत में हर हफ़्ते कॉल आता था, फिर महीने में एक बार… और अब कई सालों से कुछ भी नहीं।
गाँव वालों में से जब कोई पूछता, “माँ जी, बेटा कैसा है?”
वो मुस्कुराकर कहतीं, “बहुत अच्छा है… बहुत व्यस्त है… बड़े काम करता है अब… फोन नहीं कर पाता, पर उसका प्यार रोज़ दिल से सुनाई देता है।”
कभी-कभी उनके कमरे से धीमी आवाज़ें आतीं — जैसे कोई किसी से बात कर रहा हो।
एक दिन पड़ोस की लड़की रश्मि आयी। दरवाज़ा खुला था, पर भीतर सन्नाटा।
अंदर पहुँची, तो देखा — सावित्री देवी उसी तस्वीर को गोदी में लिए बैठी थीं… आँखें बंद… शरीर ठंडा… और होंठों पर एक अधूरी मुस्कान।
बगल में रखा उनका मोबाइल लगातार बज रहा था।
स्क्रीन पर लिखा था: “रोहन कॉलिंग…”
बहुत देर हो चुकी थी। इस बार, माँ ने फ़ोन नहीं उठाया।
लघुकथा-3
उड़ान
छोटा-सा गाँव था… कच्चे रास्ते, मिट्टी के घर और बीच में एक टूटी-सी चौपाल। वहीं रहता था अर्जुन — जन्म से ही दोनों पैरों से अपाहिज।
लोग कहते थे, “बेचारा! किस काम का?”
माँ हर बात पर चुप रह जाती, लेकिन आँखों में उम्मीद का एक कोना कभी बुझने नहीं देती।
अर्जुन को किताबें पढ़ने का शौक था। चल नहीं सकता था, तो स्कूल नहीं जा सका, लेकिन पुराने पन्नों से वह दुनिया देखता था — समंदर, आकाश, तारे, विज्ञान और सपने।
एक दिन गाँव में मोबाइल लाइब्रेरी आई। अर्जुन रेंगते हुए गया। वहाँ मौजूद अधिकारी ने उससे पूछा,
“क्या चाहिए बेटा?”
अर्जुन ने कहा, “मौका।”
अधिकारी चौंका… और अगले ही महीने अर्जुन के लिए एक व्हीलचेयर और एक टैबलेट भेजा गया।
अर्जुन ने घर में ही पढ़ाई शुरू की। धीरे-धीरे उसने कोडिंग सीखी, ऑनलाइन काम करना शुरू किया… और कुछ सालों में वह वही “बेचारा अर्जुन” गाँव का पहला ऑनलाइन शिक्षक बन गया।
अब वह बच्चों को पढ़ाता है — सपने देखना, गिरकर उठना, और उड़ना।
एक बार किसी ने पूछा, “तू तो चल नहीं सकता, फिर उड़ान कैसी?”
अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा,
“पैरों से नहीं, इरादों से उड़ते हैं लोग…”
लघुकथा-4
पुराना टिफ़िन
निखिल बाबू स्कूल में चपरासी थे। रोज़ सुबह सबसे पहले पहुँचते, झाड़ू लगाते, पानी भरते और फिर स्टाफ रूम के कोने में चुपचाप बैठकर अपना टिफ़िन खोलते — वही पुराना एल्यूमीनियम का डिब्बा, जिसमें हमेशा सूखी रोटी, सब्ज़ी (कभी होती, कभी नहीं) और थोड़ा नमक-मिर्च होता।
वह चुपचाप अकेले बैठकर खा लेते। किसी ने कभी पूछा नहीं और उन्होंने कभी बताया नहीं।
एक दिन स्कूल में “शेयर योर लंच डे” मनाया गया। बच्चों ने रंग-बिरंगे डिब्बों में — नूडल्स, चॉकलेट, सैंडविच, पिज़्ज़ा …आदि लेकर आए। सब अपने-अपने दोस्तों के साथ बाँटकर खा रहे थे।
निखिल बाबू चुपचाप खड़े थे।
तभी तीसरी कक्षा की एक बच्ची — सिया — आयी और बोली, “चाचू, आप हमारे साथ खाना खाइए न!”
निखिल बाबू मुस्कुरा कर बोले, “बिटिया, मेरा खाना थोड़ा अलग है।”
सिया ने झट से कहा, “तो क्या हुआ? आज तो सब बाँटते हैं। आप भी बाँटिए।”
टिफ़िन खोला गया — सूखी दो रोटियाँ, आलू की सब्ज़ी और एक छोटी-सी हरी मिर्च।
बच्ची ने बिना कुछ कहे एक टुकड़ा लिया, रोटी में सब्ज़ी और मिर्च का एक टुकड़ा रख मुँह में डाल लिया। थोड़ी तीखी लगी, आँखें आधी बंद हो गयीं, पर चेहरा मुस्कुराता रहा।
“स्वाद तो बहुत अच्छा है!” उसने कहा।
निखिल बाबू की आँखें भर आईं।
उस दिन पहली बार किसी ने उनके टिफ़िन से खाना खाया।
उस दिन पहली बार उन्होंने घर जाकर अपनी पत्नी से कहा — “कल एक पराठा और रख देना… किसी के लिए हिस्सा रखना है।”
चप्पलें
बारिश का मौसम था। स्कूल छूटते ही बच्चे दौड़ते-भागते अपने घरों की ओर निकल गए। सबके पास छाते थे, रेनकोट थे, जूते थे।
बस एक बच्चा धीरे-धीरे भीगता हुआ चल रहा था — नाम था ‘चिंटू’। उसके पैरों में चप्पलें नहीं थीं। कीचड़ में पैर धँसते, पत्थर चुभते, लेकिन वो बिना कुछ बोले चलता जाता।
उसी की कक्षा का एक लड़का — अर्जुन — उसके पास आया और बोला, “तू रोज़ बिना चप्पल के आता है?”
चिंटू ने मुस्कुराकर कहा, “मेरे पापा कहते हैं, कि जब तक मैं अपनी पहली रबड़ की चप्पल खुद नहीं खरीदूँगा, तब तक उसकी अहमियत नहीं समझूँगा।”
अर्जुन चुप हो गया। वो अमीर था, उसके पास हर रंग की चप्पल थी। उस रात वो अपनी सबसे महँगी चप्पलें देखकर सोच में डूब गया।
अगले दिन चिंटू स्कूल आया, तो दरवाज़े पर एक जोड़ी चप्पल रखी थीं — बिलकुल उसके नाप की। उसने चारों ओर देखा, कोई नहीं था।
उसने चप्पल पहन लीं, किंतु अंदर चुपचाप बैठा रहा। अर्जुन ने उसे देखा और कुछ नहीं बोला।
बस, अवकाश (Recess) में दोनों एक ही छतरी के नीचे खड़े थे — बिना कुछ कहे, भीगे हुए मगर एक-दूसरे को समझकर मुस्कुराते हुए।
“कभी-कभी इंसान बोलकर नहीं, चुपचाप भी बहुत कुछ दे देता है।”
लघुकथा-5
नाम का बोझ
रात का सन्नाटा गाँव की गलियों में डर की तरह फैल गया था। झोपड़ी के अंदर ‘सोहिनी’ अपनी आठ साल की बेटी ‘छोटी’ को सीने से लगाकर बैठी थी।
बाहर शोर था —
“डायन है ये औरत!”
“इसके कारण ही सुखी की बीवी मरी!”
“जला दो इसे!”
कुछ दिन पहले गाँव के मुखिया की बहू की अचानक मौत हो गई थी। औरतें चुप थीं, मर्द गुस्से में। किसी को दोषी चाहिए था — और सबसे आसान शिकार थी अकेली विधवा सोहिनी, जो जड़ी-बूटियों से लोगों का इलाज करती थी।
भीड़ ने दरवाज़ा तोड़ा। सोहिनी को घसीटते हुए बाहर लाया गया। बाल नोचे गए, कपड़े फटे, बच्ची रोती रही — “मेरी माँ को मत मारो… माँ डायन नहीं है… माँ रोती है, गाती है, कहानियाँ सुनाती है… माँ दर्द मिटाती है…”
किंतु, भीड़ को एक बच्ची की पुकार सुनाई नहीं दी।
सुबह गाँव के कुएँ के पास दो जोड़ी चप्पलें मिलीं — एक बड़ी, एक छोटी।
उस दिन पहली बार गाँव ने सच में शांति देखी… क्योंकि सोहिनी और उसकी बेटी अब वहाँ नहीं थीं।
कुछ सालों बाद वही गाँव एक पोस्टर से भरा था:
“डायन प्रथा एक अपराध है – इसे रोकिए।”
कोने में एक नाम लिखा था: “डॉ. छोटी सोहिनी”— सामाजिक कार्यकर्ता।
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