शैल अग्रवाल, जया आनंद, वंदना गुप्ता

पाँच लघुकथा

शैल अग्रवाल
लघुकथा-१
आजादी
नन्ही उपहारों से लदी-फंदी आजादी का उत्सव मनाकर स्कूल से लौटी तो खुशी उसके रोम-रोम से झलक रही थी। घर में घुसते ही दौड़कर माँ के पास गई तो देखा माँ जूम पर बैठी थीं और सहेलियों संग आजादी का उत्सव मना रही थीं। तुरंत पापा की तरफ पलटी तो पाया कि पापा के मोबाइल पर भी तिरंगा लहरा रहा था और बधाई संदेश लिख रहे थे वह।
‘…चारो तरफ इतना उत्साह, इतनी खुशी? यह आजादी है कौन, जिसका उत्सव हम सभी मना रहे हैं पापा ? ‘
पूछते ही मैंने जबाव दिया, ‘ आजादी, माने स्वतंत्रता अपनी तरह से जीने की , अपने और देश के निर्णय खुद हमारे अपने हाथ में लेने की। अपने हित के हर कर्म की पूरी स्वतंत्रता। माँ, माँ बोली और मातृभूमि को पुराना गौरव व इज्जत देने का समय। बड़े संघर्ष और बलिदान से मिली है हमें यह आजादी। कितनों ने जान दी, खून बहाया तब। ‘
‘अब यह मां बोली क्या होती है?’ नन्ही का अगला सवाल था।
‘ मां बोली यानी जिस भाषा को हम घर में बोलते हैं। हमारे बड़े, माँ दादी और नानी बोलते आए है।‘
‘ ओह! पर हम तो घर और स्कूल में अभी भी अंग्रेजी में ही बोलते हैं? हिन्दी में बोलो तो टीचर और माँ दोनों ही ड़ांटती हैं।
क्या हम अभी भी आजाद नहीं हुए हैं? बस अंग्रेज चले गए हैं यहाँ से!‘

लघुकथा-२
दूध मलाई
बन्ने तेरे दादा की ऊंची हवेली…
गाती -बजाती और हवा की तरह पूरा लॉन पार करती, मंडली सर्र से सीढ़ियाँ फलांग कर बरांडे में आ पहुंची थी और अब और भी जोर-शोर से नाच-गाना शुरु कर दिया था उन्होंने।
पर जब धूप सेकती दादी के कानों पर जूँ तक रेंगती नहीं देखी तो एक जो सबसे ज्यादा चुस्त और सजी-धजी थी, लचक-लचककर उस तक पहुंची और कूल्हे पर हाथ टिका कर सामने खड़ी हो गई।
आँखें मटकाते हुए बोली- ‘पोता यूँ ही ब्याह लाएगी क्या दादी, न्योछावर नहीं देगी हमें?’
‘मेरी तबियत ठीक नहीं, अंदर जाकर मांगो।’
बिना उसकी तरफ देखे ही दादी ने बेरुखी से जवाब दिया और वह तुरंत ही मान भी गईं।
‘अल्ला, तुझे सेहत बख्शे!’
अब तरह-तरह की आवाजें और शोर आंगन से आ रहा था। दादी के कान भी उधर ही लगे हुए थे।
‘इत्ती बड़ी हवेली और बहू की गोद भराई के बस 11 हजार? हम तो 11 लाख लेंगे।’
‘लूट मचा रखी है? हट्टी-कट्टी हो कुछ काम क्यों नहीं करतीं?’
‘काम करें हमारे दुश्मन! हम तो यूँ ही नांचें-गायेंगे, मौज करेंगे।’
‘हमारे पास तुम्हारी मौज के लिए पैसे नहीं। निकलो बाहर।’
‘निकलें कैसें? पहले आशीर्वाद तो ले लो। लाल आए तुम्हारे घर भी , हमारे जै…’
अभी वाक्य पूरा हो कि सहमे दादा जी आए और लाख की गड्डी गोदी में रखते हुए पैर पकड़ लिए -‘बस, अब आगे कुछ और नहीं कहना।’
हंसते हुए बात संभाल ली उसने भी तुरंत -‘ ना जी ना। हमारा तो बस यह आने-आने का, मांगने का सिलसिला बना रहे। अगले बरस फिर आएंगे पोता खिलाने और माखन-मिश्री खाएँगे। ‘
अभी उनकी पीठ मुड़ी भी न थी कि खुले मुख और फटी आँखों के साथ खड़े दादा के आगे एक नया उलझन भरा स्वांग चालू हो गया था।
होठों पर लिपिस्टिक और आंखों में उन्ही-सा मोटा काजल लगाए 14 साल का गुड्डू गोल-गोल घूम रहा था और उन्ही की तरह ताली पीट-पीटकर गा रहा था-‘ बन्ने तेरे दादा की उंची हवेली-‘
‘ यह क्या बद्तमीजी है?
बात बर्दाश्त के बाहर हो चली थी। सटाक-एक जोरदार चांटा गुड्डू के गाल पर पड़ा। परन्तु उसकी आग्नेय आंखों में एक आंसू नहीं, बस एक लपट थी- वह भी तो यही कर रहे थे । साल भर से वह मोपट मांग रहा था और दादा-पापा सभी टाल रहे थे। दादी देख रही थी – वह लपट अब सब को ही झुलसा रही थी।
दादी खुद भी तो यही सोच रही थी,
‘ क्या सारी मक्खन मलाई इनके हिस्से की और अपनों के लिए बस चांटा !’

लघुकथा- ३
प्रेम में…
‘ मेरे पास आओ, सहज कर दो मुझे । उर्जा दो अपनी स्निग्ध हरियाली की, आकाश मचल रहा था।
‘ अलग कहाँ हम? महसूस करो उस क्षितिज रेखा को। अलग नहीं धरती और आकाश कभी, सदा ही जुड़े और एक दूसरे की शक्ति व आभा से जगमग! ‘
आकाश पर बिखरे असंख्य झिलमिल तारों को देखते हुए प्यार से समझाया धरती ने।
‘ झूठ सब झूठ। एक भ्रम एक छलावा मात्र ही तो यह ।‘
सपनों का ताप और अपनी ही आंच में पिघलता आकश अब हताश् था।
निराश धुँआ था अब उसकी उदास आंखों में और उसकी अकुलाहट धरती के अंतस की हर उठती गिरती उर्मि में।
झिलमिल झिलमिल चमकते रहे आकाश के आंसू तारों संग रात भर। हठीली उच्छवासों की ओस भिगोती रही धरती के भावकुसुमों को ।
आंदोलित, आलोड़ित, पर सारे ज्वार-भाटों को समेटे-दबाए थिर ही रही धरती ।
नदी नहीं समंदर थी वह अब, अपनी ही मर्यादा में बंधी-थमी।
‘ नारी हो या पृथ्वी अंततः शिला ही तो हैं दोनों।‘
एक आह फिसली तब आकाश के बंद होठों से और नियति बन गई धरती की ।…

लघुकथा-४
जननी जन्मभूमि…
विदेश आए चालीस से अधिक वर्ष हो चुके थे, पर भारतीयता आज भी शिवदयाल और उनके परिवार में कूट-कूटकर भरी हुई थी। अपने भारतीयता के इस एहसास को वह अपने जीवन की अमूल्य निधि मानते थे। देश और अपने लोगों को पूरी वफादारी और ईमानदारी से प्यार करो, यही एक मूलमंत्र उन्होंने बारबार परिवार के कान में मात्र फूंका ही नहीं था, जिया भी था।
संक्षेप में कहें तो अपने परिवार पर गर्व था उन्हें। चाल-चलन और संस्कार और समझ बच्चों तक की वही थी जैसी वह चाहते थे।
ब्रिटेन के अपने घर आलीशान शिव-कुटीर में बैठकर वह ब्रिटेन और भारत का मैच बड़ी ही तन्मयता से देख रहे थे उसदिन। मैच टांके का था और बेहद रोमांचक भी।
अचानक बाजी पलटी और ब्रिटेन की टीम जीत गई।
अभी वह हार का शोक मना तक पाते कि बगल में बैठे सात साल के पोते ने ताली बजाते हुए कहा-‘ हुर्रे मेरा देश जीत गया।‘
उन्होंने उसे सही करने के इरादे से समझाया, ‘ नहीं बेटा, तुम शायद गलत समझ बैठे हो, अपना देश भारत जीता नहीं, हार गया है। ‘
पोता तुरंत पलटा ‘ माफ करिएगा दादाजी,, मैं यहीं पैदा हुआ हूँ। यहीं की बोली बोलता हूँ और यहीं के स्कूल में पढ़ता हूँ और यहीं पर मेरा घर भी है । तो यही तो मेरी मातृभूमि हुई। और मैं बहुत खुश हूँ कि मेरा देश इंगलैंड आपकी इंडिया से जीत गया। बुरा मत मानिएगा दादाजी, आप ही तो कहते हो कि अपने देश की खुशी में खुश होना चाहिए और दुख में दुखी । ‘
बुरा कैसे मानते दादाजी? गलत तो नहीं थी उसकी बात… पोषण करती, गोदी में सुरक्षित बिठाए बैठी मिट्टी भी तो माँ है… जननी, जन्मभूमि स्वर्गात् अपि गरीयसी । रोज ही तो विह्वल पाठ करते थे वह और अपने देश को पूरी शिद्दत से प्यार करो, यही तो सिखलाया था उन्होंने अपने बच्चों को !…

लघुकथा-५
पिता

कठिन दिन था वह पिता के लिए। इकलौती बेटी की शादी थी।
भगवान की दया तो पूरी थी। कोई कमी नहीं थी कहीं। फिर भी सीने से कशिश नहीं जा रही थी और दर्द की लहर रह-रहकर परेशान कर रही थी उन्हें ।
बीस वर्ष तक जिस बेटी को पल पल अगोरा और सांस-सांस जिया, आज उसी को अन्य को सौंपने का दिन आ गया था। अब उनकी लाडली आँखों के आगे नहीं, दूर कहीं, एक अजनबी परिवार में अजनबी के संग रहेगी ।
उसका परिचय परिवार, सबकुछ वही नए लोग होंगे अब।
बेटी जिसे उन्होंने बेटे की तरह पाला था , बेटी समझा ही नहीं था उसे ही विदा करने की घडी आ पहुँची थी। सोच मात्र असह्य थी। इतनी जल्दी पर यह दिन आ जाएगा कब सोचा था उन्होंने? पढ़ाई खतम हुए तीन दिन भी नहीं बीते कि शादी और विदा की घड़ी भी! मानो इंतजार ही कर रहे थे ससुराल वाले! पर उन्होंने खुद ही तो यह सुयोग्य दमाद चुना था। भाभी कहती भीं थीं कि इतना प्यार मत करो इससे, इतना मत जुड़ो। बेटियाँ पराई अमानत हैं। बहुत दुख पाओगे वरना एक दिन। तो लड़ पड़ते तुरंत ही। ‘मेरी बेटी नहीं बेटा है यह।‘
फिर एक और धर्म संकट भी तो था उनके सामने, जिसका समाधान नहीं मिल रहा था उन्हें।
पिता होने के नाते कन्यादान करना था और दान की हुई वस्तु से कोई पापी ही नाता रखेगा?
पत्नी उत्साहित थी, बड़े भाग्य से मिलता है यह कन्यादान का पुण्य । पर उनकी लाडली कोई वस्तु तो नहीं, जिसका वह दान कर दें?
अपने शहर से दूर निर्जन पार्क में अकेले बैठे पिता की पूरी रात निकल गई इसी उधेड़ बुन में। थककर कब आँख लग गई पता ही नहीं चला। आँख खुली तो सुबह हो चुकी थी।
घर की तरफ दौड़े तो पाया कि बेटी की विदा की तैयारियाँ चल रही थीं।
बड़े भाई ने राहत की सांस के साथ देखते ही
गले लगाया।
‘ कहाँ चला गया था तू? एक ही तो बेटी थी, कुछ तो सोचता!
शुभ महूर्त निकला जा रहा था तो पंडित जी के कहने पर मैंने और तेरी भाभी ने कन्यादान कर दिया।‘
‘ कहीं नहीं भैया। बस एक उलझन सुलझा रहा था। दान की वस्तु से तो कोई वास्ता नहीं रखा जाता। और मेरी बेटी तो मेरी जान है। अपनी जान को कैसे दान कर देता? ‘
आँसूभरी आँखों के संग अब एक संतुष्ट मुस्कान थी पिता के चेहरे पर ।
दान की हुई वस्तु को प्यार करते रहने के महापाप से जो बचा लिया था उनके भैया-भाभी ने एक बेटी के पिता को।….

पाँच लघुकथा


जया आनंद
लघुकथा-१
जवाब
काशी विश्वनाथ के बाहर भिखारियों की लंबी लाइन है। मैं भीतर काशी विश्वनाथ पर जल चढ़ा रहा हूं और मेरे होंठ बुदबुदा रहे हैं ‘ हे ईश्वर !,हे भोला-भंडारी ! यह कैसी विडंबना है कि तुम्हारे मंदिर के आगे कटोरा लिए भीख मांगते इतने दीन -हीन चेहरे ।तुम बस चुपचाप दूध जल से नहाते रहते हो ,फूल ,बेलपत्र से सजते रहते हो ।कितने दुखी हैं ये सब और तुम बस चुपचाप मूकदर्शक बने रहते हो। सब इसलिए तो कहते हैं हमारे समय का ईश्वर चुप है…। ‘ मेरी आंख नम हो रहीं थीं ,कहीं मेरा भी विश्वास डोल रहा था ।गर्भ गृह से निकल कर मैंने काशी विश्वनाथ का घंटा बजाया और फिर बाहर गली में आ गया ।
‘शंकर तेरी जटा से ,भोले तेरी जटा से बहती है गंग धारा ..’गीत गाते गुनगुनाते हुए. एक चालीस – पैंतालीस साल का व्यक्ति गली में झाड़ू लगा रहा है। मंदिर के द्वार के सामने आते ही उसने बड़ी श्रद्धा से सर झुकाया और फिर मगन होकर झाड़ू लगाने लगा। मैं उसे जेब से सौ रुपये का नोट निकाल कर देने लगा ।
“नहीं ….नहीं साहब ! हमें अपने काम का पैसा मंदिर के ट्रस्ट से मिलता है । हम काम करते हैं ,कमाते हैं और फिर खाते हैं ।सब भोले शंकर की कृपा है ” झाड़ू वाले ने कहकर आपना काम फिर शुरू कर दिया।
“अरे !रखो भैया!” मैंने उसे जबरदस्ती नोट पकड़ाने की कोशिश की ।
“नहीं …नहीं साहब ! आपको देना है तो इन भीख मांगने वालों को दे दीजिए हमें नहीं…”
मैं उस व्यक्ति की खुद्दारी पर मुस्कुराते हुए सौ का नोट एक भिखारी को दे आया। वह भिखारी भी लगभग चालीस -पैंतालीस साल का ही है। उसी पंक्ति में बैठे अधिकांश भिखारी शरीर से हृष्ट- पुष्ट हैं। मैं दस- दस का नोट उनके कटोरे में डालता जा रहा हूँ ।पीछे से वही गीत कानों में गूंज रहा है “शंकर तेरी जटा से बहती है गंग धारा…..” झाड़ू वाला मस्त होकर झाड़ू लगाए जा रहा है।
मेरी नजर काशी विश्वनाथ के शिखर पर चली गई भोले भंडारी की विजय पताका लहरा रही है। मैंने फिर एक बार उस झाड़ू वाले को देखा और फिर उन भिखारियों पर दृष्टि चली गयी।…..मुझे भोले भंडारी का जवाब मिल गया था ।

लघुकथा-४
आम्ही सक्सेसफुल आहोत
नीरजा प्रिंसिपल के केबिन से निकलकर बहुत तनावग्रस्त थी प्रिंसिपल की अपेक्षाओं पर खरा उतरना कितना मुश्किल है ।कितनी जी-जान से कोशिश करती है वो, चाहे विद्यार्थियों को पढ़ाना हो या कॉलेज का कोई भी साँस्कृतिक कार्यक्रम पर फिर भी आलोचना सुननी ही पड़ जाती।
घर गृहस्थी के झंझावातों से निकलकर अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद में नीरजा ने नासिक में यह नौकरी की थी। उसकी डिग्री की तुलना में य़ह नौकरी उसके लिए छोटी थी पर कुछ नहीं से तो कुछ बेहतर यही सोचकर वह अपने मन को समझा लेती थी। कभी -कभी उसे लगता कि वह न तो घर गृहस्थी में पूरी तरह सफल है और न करियर में। उसके साथ की सहेलियां डॉक्टर बन गयीं, इंजीनियर बन गयी और वह एक छोटे से कॉलेज में पढ़ा रही है…….और इस छोटे से कॉलेज में भी सुकून नहीं। यह सब सोचते हुए हाथ में फाइल पकड़े उसके कदम स्टाफ रूम की ओर मुड़ गए। पास की कक्षा से दीपा ठाणेकर का स्वर गूंजा। दीपा आईटी की टीचर है,पढ़ाई में बहुत अच्छी ,छात्र बड़े ध्यान से सुनते हैं उसे ।
“स्टूडेंट्स आप आईटी विषय लेकर क्या करना चाहते हो ? ” दीपा छात्रों से पूछ रही थी।
किसी ने उत्तर दिया “आईटी प्रोफेशनल” ,” बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करना चाहता हूं” ,” फॉरेन जाकर सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहता हूं”…. सब के अलग-अलग उत्तर आ रहे थे ।
“आप जो भी बनो उस काम को बहुत अच्छे से करने का ….चांगला काम करनार पाहिजेत तभी आप सक्सेसफुल होंगे। मैं चाहती तो बड़ी आईटी कंपनी में नौकरी कर लाखों कमाती पर मेरी सिचुएशन ऐसी नहीं थी ।मै ये नौकरी कर के खुश हूँ ,मी मह्णते आम्ही सक्सेसफुल आहोत ” ।
नीरजा के कानों में दीपा ठाणेकर का स्वर स्पष्ट सुनाई पड़ रहा था पर नीरजा कुछ अनसुना करते हुए स्टाफ रूम में आकर निढाल हो कर बैठ गयी । टेबुल रखी पानी की बोतल से एक घूंट पानी पिया और मोबाइल देखने लगी। तभी मैसेंजर पर एक संदेश आया ।
“हैलो मैम मैं राजीव आपका पुराना विद्यार्थी ..”
“राजीव …… !! ” नीरजा ने उसकी फोटो को गौर से देखा “…..अच्छा- अच्छा राजीव कश्यप …कैसे हो?”
हाल- चाल लेने के बाद नीरजा ने राजीव से पूछा
” हिन्दी पढ़ते हो या नहीं ?”
“हाँ मैम !पढ़ता हूँ कभी- कभी और आपको याद भी करता हूँ….सच पूछिये तो मैम !आपने जो पढ़ाया वो कभी भूला ही नहीं और इस कॉलेज से पास होने वाला हर विद्यार्थी आपको याद करता है ,आपकी पहचान तो हम विद्यार्थियों के दिलों में है। ”
नीरजा की आँखों से दो बूंद मोबाइल पर ही टपक गयीं और कानो में दीपा ठाणेकर की आवाज गुंजित होने लगी
‘आप जो भी बनो उस काम को अच्छे से करने का…..मैं ये नौकरी कर के खुश हूँ आम्ही सक्सेसफुल आहोत ….’
नीरजा की आंखे राजीव के संदेश पर टिकी थीं और उसके मन की तरंगो पर तरंगायित हो रहा था आम्ही सक्सेसफुल आहोत…. हाँ मैं सफ़ल हूँ ‘

लघुकथा-५
पुढे चला
मुबई सीएसटी से लोकल ट्रेन पकड कर सुरभि लौट रही थी।आज ट्रेन में रोज की भांति उतनी भीड़ नहीं थी।सुरभि आराम से ट्रेन में बैठ गई। मन अद्भुत ऊर्जा से परिपूर्ण था और हो भी क्यों न आखिर स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था। सुरभि को एक विद्यालय में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था, वहाँ उसने झंडा रोहण किया। देशभक्ति में रंगे बच्चों की ओज पूर्ण प्रस्तुति से उसका मन गर्व से भर गया। स्कूल से लौटते हुए सभी घरों में, इमारतों में तिरंगा लहर-लहर कर लहरा रहा था। लोकल ट्रेन में बैठे हुए सुरभि यही सब याद करते हुए ट्रेन की खिड़की से लगकर बाहरी दृश्य का आनंद ले रही थी कि कानों में स्वर लहरियां गूँज गयीं ” सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा..” ।ट्रेन की पिछली सीट पर बैठी कॉलेज की लड़कियां देशभक्ति के गीत गाने में मगन थीं। सुरभि भी गर्वोक्ति का भाव लिए उनके साथ गुनगुनाने लगी ।भारत की आजादी का पर्व सभी भारत वासियों के भीतर देश के प्रति अगाध स्नेह से भर देता है सब तरफ उल्लास, उमंग….। ‘पुढे स्टेशन ठाणे ” ट्रेन में ध्वनि संकेतक की आवाज गूँजी।सुरभि तुरंत ही बैग लेकर ठाणे स्टेशन पर उतरने के लिए तैयार हो गई। ठाणे स्टेशनर पर उतरते ही अगले प्लेटफॉर्म पर जाने के लिए सीढ़ी चढ़ने के लिए कदम बढ़ाया ही था कि नीचे देखा कि शर्ट या साड़ी पर पिन से लगाने वाला अपने देश का बहुत छोटा सा तिरंगा झंडा नीचे गिरा हुआ था। अगली लोकल ट्रेन पकड़ने की जल्दी थी पर कदम स्वतः ही रुक गए, वह झंडा उठाने के लिए झुकी ही थी कि उससे पहले ही एक साधारण वेश भूषा वाले लड़के ने जल्दी से झुक कर झंडा उठा कर सिर माथे से लगाया और उतनी ही शीघ्रता से सीढिया चढ़ता चला गया। सुरभि भाव विभोर हो उठी, और सोचने लगी ‘ जिस देश में ऐसे देश भक्त युवा हैं उस देश को उन्नति की सीढ़ियां चढ़ने से कोई रोक नहीं सकता ‘ …पीछे से आवाज आई “ताई! पुढे चला” ……
” हाँ..हाँ आगे ही बढ़ना है ” सुरभि मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गई।

पाँच लघुकथा


वंदना गुप्ता, उज्जैन
लघुकथा-१
टाइम ट्रेवल
मैंने एलियन्स सिर्फ स्क्रीन पर देखे थे। आज सड़क पर, नदी के किनारे, पहाड़ की चोटी पर, झरने के नीचे, खेल के मैदान में, घर में, बाजार में हर जगह अजीब परिवेश में घूमते लोगों को देखकर आश्चर्य हुआ। न कुर्ती थी न शर्ट, न सलवार थी न जीन्स और तो और वे सब लगभग एक जैसी मिली-जुली वेशभूषा में थे, जो न मर्दानी थी न जनानी। केश विन्यास भी अजीब था। समझ ही नहीं आ रहा था कि कौन स्त्री है, कौन पुरुष? मेरे जाने हुए एलियन्स से कुछ अलग थे वे सब। इतना तो तय था कि वे इस दुनिया के बाशिंदे नहीं थे। मेरी दुनिया में स्त्री और पुरुष को पहचानना बहुत आसान था।
कई युगल भी देखे, लेकिन उनमें प्रेम जैसा कुछ नहीं दिखा। सब अपने काम में व्यस्त और मस्त। कुछ बड़े थे, कुछ बच्चे, लेकिन बूढ़ा एक भी नहीं।
अपनी सोच में गुम मैं एक गुफा के मुहाने पर पहुँच गई। कुछ कलात्मक से अक्षर चमक रहे थे, मैंने पढा… लाइफ यूनिवर्सिटी। प्रवेश करते ही पहले काउंटर पर बहते पानी से लिखा था, ‘वाटर’ दूसरे पर आग की लपटों से ‘फायर’ लिखा था। इसी तरह बहती बयार से ‘एयर’, मिट्टी से ‘अर्थ’ और व्यापकता लिए ‘स्काई’ लिखे हुए काउंटर्स को पार कर मैं बिलिंग काउंटर पर पहुँची। मद्धम संगीत, मद्धम प्रकाश और भीनी खुशबू में मदहोश होते हुए मैंने वातावरण में तैरते शब्दों की आवाज़ पहचानने की कोशिश की… ये लीजिए जल तत्व, ये फायर एलिमेंट का बिल, पृथ्वी आकाश के लिए उस तरफ और ये वायु का बिल पेमेंट कर वर्कशॉप में जाइए। एडवांस दीजिए, नौ महीने बाद प्रोडक्ट की डिलीवरी ले लीजिए।
“ओह! यह नये जीवन के जन्म की वर्कशॉप है।” मैं बुदबुदाई
“जन्म नहीं होता यहाँ, हम सब अपनी मर्ज़ी के मुताबिक पँचतत्वों का अनुपात लेकर अपनी सन्तति तैयार करवाते हैं।” उस एलियन ने मेरी बात सुन ली थी शायद।
“फिर उसके माँ बाप? उसका पालन पोषण कौन करता है?”
मेरी बात के जवाब में उसने अट्टहास लगाते हुए कहा… “स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं, यह बात भूलकर वे प्रतिद्वंद्वी बनते जा रहे हैं। स्त्री पुरुष सा होना चाहती है और पुरुष को स्त्री की भावनाएं समझने के लिए स्त्री सा सोचना होता है। एक को कमतर और दूसरे को बेहतर सिद्ध करने के इस मुकाबले ने एवोल्यूशन कर दिया। स्त्री पुरुष से परे हम सब एक जैसे हैं। गर्भ धारण कौन करेगा? सो अब सन्तति निर्माण होता है जन्म नहीं।”
कहते हुए उसने मुझे टाइम मशीन से बाहर धकेल दिया।

लघुकथा-२
जिजीविषा
आर्यावृत्त, प्रकृति के सानिध्य में सपनों की एक दुनिया, जहाँ बच्चों के साथ बड़े भी अपना गम भूलकर मुस्कुराने लगते हैं। नर्म घास के बिछौने पर बैठा अजय सामने झूले पर बैठी आर्या से बतियाने लगा।
“बेटा! यह बस एक लम्बी नींद होगी। जब तुम जागोगी, दुनिया पूरी तरह बदल चुकी होगी।”
“और नींद की लंबाई कितनी होगी पापा?” दस साल, बीस साल, सौ साल या उससे भी अधिक?”
“पता नहीं… लेकिन…”
“लेकिन क्या पापा? क्या आप और माँ तब तक इंतज़ार कर सकोगे? मुझे जागते हुए देख सकोगे?”
वह मर रही थी। मात्र सोलह वर्ष की उम्र में मस्तिष्क कैंसर से पीड़ित आर्या के लिए उसके धनाढ्य बेबस पिता जब चंद साँसे नहीं खरीद सके, तब उन्होंने उसे क्रायोप्रिजर्व करना चाहा। चिकित्सा विज्ञान ने मनुष्य की औसत आयु बढ़ाने के साथ ही उम्र का प्रभाव नहीं दिखने का वरदान दिया है। अब जिज्ञासु मानव मन मौत के मर्ज का इलाज खोज रहा है। लोग लम्बी ज़िंदगी की चाह में मृत्यु से आलिंगन कर रहे हैं। दुनियाभर की प्रयोगशालाओं में अनेक मृतक फिर से जी उठने की आस लिए डीप-फ्रीज किए जा चुके हैं। अमरता का अवसर भी बड़ी कीमत पर मिलता है और अजय अपनी बेटी के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार था, परन्तु बेटी के सवाल का कोई जवाब उसके पास नहीं था।
माँ की आँखें भर आईं… “बेटा! हम नहीं भी रहे तो क्या? तुम फिर से दुनिया देख सकोगी।”
“जिस दुनिया में मेरे अपने नहीं होंगे, उसकी झूठी उम्मीद क्यों करूँ?”
“सही तो कह रही है आर्या… हम साथ जी नहीं सकते साथ मर तो सकते हैं, हम तीनों ही क्रायोप्रिजर्व हो जाते हैं, यदि प्रयोग सफल रहा तो साथ में जी उठेंगे। सही है न?” माँ की आँखें चमक उठी।
और फिर अजय ने आर्या को लगभग दो लाख अमेरिकी डॉलर खर्च कर बर्फ में लम्बी नींद सुलाने का इरादा छोड़ उस पैसे से आर्यावृत्त बनाया जिसके हर कोने में आर्या मोम की सजीव मूर्ति के रूप में उनके साथ है, जिसे वे देख सकते हैं, छू सकते हैं, उसकी उपस्थिति महसूस कर सकते हैं।
क्रायोनिक्स उन्हें मौका दे रहा था, गारण्टी नहीं, लेकिन आर्यावृत्त से बेटी के साथ जीने का मौका भी मिला और हमेशा के लिए यादों को सहेजने की गारण्टी भी।

लघुकथा-३
मंजिल की ओर
सड़क ने पहली बार उसे इतने ध्यान से देखा।
हर रोज़ कोई न कोई गुज़रता था उस पर… कुछ हड़बड़ी में, कुछ गफलत में, कुछ बेपरवाह।
मगर यह लड़की… यह कुछ अलग थी।
ना फोन, ना संगीत, ना बातचीत।
बस एक चुपचाप चलती हुई परछाई, थकी हुई ऑंखें, किंतु बुझी नहीं।
ऊपर से उड़ते पक्षी ने नीचे झाँका और पत्तों से पूछा,
“यह वही है न, जो कल पार्क की बेंच पर देर तक बैठी थी?”
पत्ता धीमे से हिला,
“हाँ! पर आज इसके कदम भारी हैं, जैसे मन के बोझ तले दबे हों।”
जंग खाया बिजली का खंभा बुदबुदाया,
“हर बार जब कोई लड़की अकेली निकलती है, दुनिया उसके साथ नहीं, उसके खिलाफ़ चलती प्रतीत होती है।”
पास पड़ी कुचली हुई पानी की बोतल फुसफुसाई,
“कल एक और लड़की भागती गुज़री थी यहाँ से… डर के मारे, और आज ये चल रही है, बिना डरे, पर शायद भीतर कहीं काँप रही हो… या शायद थक चुकी हो डरते-डरते।”
सड़क उसे कुछ कहना चाहती थी,
शायद ढाँढस बँधाना, या शायद विश्वास दिलाना कि “मैं तुम्हारे साथ हूँ…”
मगर सड़कें बोल नहीं सकतीं। उनके पास आवाज़ नहीं होती। उनके पास एक लम्बी और गहरी खामोशी होती है, जो हर गुजरने वाले के निशान को सहेजती है। वे हर डर, हर हिचकिचाहट, हर संकोच को अपने सीने में समेट लेती है, बिना शिकायत, बिना आवाज़।
लड़की गुज़री तो सड़क ने उसकी परछाईं को देर तक थामे रखा, जैसे कहना चाहती हो,
“तू अकेली नहीं है। मैं हूँ, तेरे हर कदम के नीचे, एक मौन भरोसे की तरह।”
पर लड़की सुन नहीं सकी। वह सुन रही थी उन आवाज़ों को, जो दिखती नहीं, पर लगातार पीछा करती हैं…
“कहाँ जा रही है?”
“अकेली क्यों है?”
“किससे मिलने जा रही होगी?”
और उसके भीतर एक द्वंद्व उफन रहा था,
“क्यों हर रास्ता मेरे लिए दुविधा बन जाता है?”
“क्या मैं सिर्फ़ एक चलती हुई परछाई हूँ सन्देह की?”
तभी हल्की हवा चली, पत्ते फड़फड़ाए, जैसे कह रहे हों,
“चलती रह… जब तक रुकने का फैसला तेरा अपना न हो।”

लघुकथा-४
उत्तराधिकारी
स्टेशन मास्टर के सामने मज़मा लगा है। रामदीन कुली की पत्नी बेटी को बाप का उत्तराधिकारी घोषित कर उनका बैज और नम्बर दिलवाने की जिद पकड़े है, वहीं बेटे की दलील है कि बड़ी बहन तो शादी कर चली जाएगी, मुझे ही माँ का ख्याल रखना होगा।
मेहनती, दयालु और शांत प्रवृत्ति का कुली रामदीन दो महीने पहले ही चलती गाड़ी में यात्री का सामान चढ़ाते हुए पैर फिसलने से पटरियों पर गिर गया था। दुर्घटना में तो पैर ही कटे थे, लेकिन बीबी, बेटी और शराबी निकम्मे बेटे की चिंता ने तन के साथ मन को भी तोड़ दिया। हिम्मत टूटी और ज़िंदगी रूठी।
यूनियन लीडर बोले…”बाप के बिल्ले पर बेटे का ही अधिकार है। कुलीगिरी महिलाओं का काम नहीं है और वैसे भी बेटी कौन सी उनकी अपनी है?”
बेटे ने आग में घी डाला… “स्टेशन पर किसी के छोड़े हुए पाप के लिए आप अपने सगे बेटे का हक मत मारो।”
भड़क उठी वह… “खबरदार जो मेरी बेटी को पाप कहा। मुझ पर लगा बाँझ का कलंक मिटाया है इसने। मेरी ममता फूटने से ही शायद तू मेरी गोदी में आया। तू तो निकम्मा होकर बाप की कमाई भी शराब में उड़ाता रहा, तो हमें क्या कमाकर देगा? रही बात इसके ससुराल जाने की तो सुन, इससे कोई शादी नहीं करेगा, आज बता रही हूँ यह किसी का पाप नहीं मजबूरी थी शायद… हम सबकी किस्मत अच्छी थी, वरना यह आज कहीं ताली बजाकर अपना पेट पाल रही होती।”

लघुकथा-५
फर्क
गाड़ी के पहिए सड़क पर घूम रहे थे और विशाल का मन अतीत की गलियों में।
उसे याद आया कि कैसे बेटी गार्गी के हर पुरस्कार पर वह और सुम्मी गर्व से भर उठते थे। कैसे सुम्मी ने नौकरी के बावजूद परिवार को समय देकर गार्गी को सँवारा।
गार्गी ने एम.बी.ए. किया और विवाह के समय उसकी पसंद को विशाल की पसंद बनाने में भी सुम्मी को काफी मशक्कत करनी पड़ी। गौरव के पिता का आर्थिक स्तर ही एकमात्र माइनस पॉइंट था, लेकिन गार्गी और गौरव का प्यार, उनका बौद्धिक स्तर और सुम्मी के अकाट्य तर्क उस कमी पर भारी पड़े,
“इकलौती बेटी है, हमारा सब कुछ तो उसी का है। इसी शहर में रहेगी तो हमें भी सहारा मिलेगा। वक़्त के साथ पैसा कमाया जा सकता है, प्यार नहीं…”
शादी में जी खोलकर खर्च किया था उन्होंने। एम.बी.ए. दामाद को सुपर मेगा स्टोर खोलने में तन-मन-धन से सहयोग भी दिया। जल्दी ही बेटी और दामाद ने धन के साथ ख्याति भी अर्जित कर ली। गौरव अपने माता-पिता की तरह ही सुम्मी और विशाल को भी पूरा अधिकार और सम्मान देता।
“रिटायरमेंट के बाद यहीं समय और ऊर्जा खपाएँगे…” उसने सुम्मी से कहा था।
“यह बेटी का घर है, हमें यह बात याद रखनी चाहिए।” सुम्मी की इस बात पर वह उसकी नादानी पर खूब हँसा था…
“किस जमाने की बात कर रही हो तुम? जब गौरव ही फर्क नहीं करता तो गार्गी तो हमारी अपनी बेटी है।”
लेकिन आज… समधी जी ने स्टोर की शेल्फ से एक एनर्जी ड्रिंक की बॉटल उठाते हुए कहा था कि “यह हमारी उम्र वालों के लिए वरदान है, आप भी ट्राय करना।” उत्सुकतावश विशाल ने भी एक बॉटल ले ली। कॉउंटर पर बिल देखकर वह चौंका और समधी जी की ओर देखा। सेल्समैन ने तुरंत कहा कि…
“उनका तो हक है, उनका बेटा स्टोर का मालिक है।”

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