पाँच लघुकथा

शैलजा सक्सेना, कनाडा

लघुकथा-1
कीमत
भीड़, ट्रक और ट्रक के नीचे कुचली दीनू की लाश को घेर कर खड़ी थी। दीनू की पत्नी, माँ-बाप, उसके तीन बच्चे, दोनों भाई-बहन सब चिल्ला-चिल्ला कर रो रहे थे। बस्ती के लोगों की आँखें नम थीं। आलुओं की बोरी से भरे ये ट्रक रोज़ यहाँ से जाते, पास की मंडी में फुटकर ख़रीददारों की लारियों में अपने बोरे लादते और फिर ख़ाली होकर इसी सड़क से गुज़रते। दीनू इसी मंडी में सुबह पाँच से शाम देर तक बोरे लादता, उतारता . . . पर आज जाने कैसे अचानक अपनी ज़िन्दगी का बोरा उसने काल के काँधों से उतार दिया।
सुबह का समय, लोग अपने-अपने कामों पर जाने को निकल रहे थे। सड़क पर भीड़ बढ़ती देख, ट्रक ड्राइवर ने पैंट की पिछली जेब से बटुआ निकालने को हाथ लगाया कि दीनू का एक साथी रोते हुए बोल उठा, ”रोज़ कहता था कि हम से अच्छे तो ये आलू के बोरे हैं, एक बार घर आ जाएँ तो कई दिनों तक घर वालों का पेट भरें, हम तो रोज़ इन्हें सिर-माथे उठा कर भी, दो समय का खाना ठीक तरह जुटा नहीं पाते! देखो अब उन्हीं बोरों के ट्रक ने इसे कुचल दिया।”
ट्रक ड्राइवर के तेज़ दिमाग़ ने पल्टा खा, कुछ हिसाब-किताब लगाया। हाथ पर्स पर से हटा, ट्रक खोल, भीतर जा कर दो बोरे आलू उतरवाए और दीनू के परिवार के पास जा कर बोला, ”ये दो बोरे आलू रख लो। यूँ तो जाने वाले की ही पूरी ग़लती थी, जाने कहाँ से मेरे ही ट्रक के सामने आकर मरना था इसे।” फिर और झुँझलाई पर अहसान करने वाली आवाज़ में बोला, ”देखो, पुलिस आई तो मैं कुछ नहीं कर पाऊँगा। ट्रक का मालिक आएगा और ये भी नहीं देगा, पुलिस-कचहरी के चक्करों में तुमको कमाने तक की फ़ुर्सत नहीं मिलेगी, भूखे मरोगे सब।”
नम आँखॆं अचानक इस कठोर सच के भविष्य में स्थिर हो गईं। दीनू की बीबी और बच्चों के गले में आवाज़ें फँस कर रह गईं। दीनू का बाप कुछ पल को दीनू की कुचली लाश को साँस थामें ताकता रहा . . .!बच्चे आँखें पोंछ कर चोर निगाहों से बोरों की तरफ़ देखने लगे, उनकी निगाहों में ही जैसे सबकी आँखें आ समाईं। कुछ देर बाद दीनू के पिता की रुँधी आवाज़ गूँजी, ”आओ रे, उठाओ इसे . . .!!”
लघुकथा-2
यह दुनिया:वह दुनिया
वर्मा जी बहुत परेशान हैं। उनके छठे कहानी संकलन पर एक बड़ी गोष्ठी ज़ूम पर आयोजित की जा रही है और उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि वे कल कहाँ बैठ कर इस मीटिंग में बोलें?
हर कोना अपने पुराने और बदरंग होने का दर्द बयान कर रहा है। कहीं पेंट उखड़ा दरवाज़ा मुँह बाए खड़ा है तो कहीं प्लस्तर तक ऊँचा-नीचा! हर कमरे को मरम्मत की ज़रूरत है। स्कूल मास्टर की कमाई पर वे अपना परिवार कैसे चलाते हैं, ये वे ही जानते हैं। कमाई का कोई और ज़रिया नहीं। छपी किताबों के दो-दो, तीन-तीन संस्करण निकल जाने पर भी एक पैसे की रॉयल्टी तक नहीं। बीबी उनके दिन-रात बिना पैसे लिए काग़ज़ काले करने पर झल्लाती रहती सो अलग। प्रकाशक उनकी किताबों की लोकप्रियता देखते हुए बिना पैसे लिए किताबें छाप देते हैं, सीधे-सादे वर्मा जी उसी में ख़ुश हैं। बाहर सभा होने पर तो वे अपनी इकलौती बंडी पहन कर सादा जीवन वाले मंत्र के ब्रांड एम्बेसेडर बन कर काम चला लेते थे पर अब तो ज़ूम पर सारी दुनिया उनके साथ-साथ उनका घर भी देखेगी, समस्या यही है! अब वो भद्दे जीवन के एम्बेसेडर बन कर अपनी भद्द तो नहीं उड़वा सकते? क्या करें? उन्होंने आज पहली बार ज़माने और कैमरे की आँख से अपनी ग़रीबी देखी और अपनी कम आय और प्रकाशकों की सीनाज़ोरी को कोसा।
हार कर उन्होंने अपने भतीजे को फ़ोन किया। नए ज़माने के लड़के कुछ सुझा सकते हैं। दो घंटे की मग़ज़मारी के बाद अमित को एक आइडिया आया।
अगले दिन नियत समय से आधा घंटा पहले पहुँच कर अमित ने उनको हत्था हिली कुर्सी पर बिठाए हुए ही स्क्रीन पर उनके पीछे एक बहुत ख़ूबसूरत कमरा तैयार कर दिया। गद्देदार सोफ़ा, बड़ी चौड़ी खिड़की, उसमें ऊपर से लटकता खूबसूरत गमला और लताएँ, कोने में रखा लैम्प, किनारे पर अलमारी में क़रीने से लगीं किताबें! अहा! वे स्वयं मुग्ध हो गए। ज़ूम पर तैयार इस पृष्ठभूमि को देख कर एक ठंडी आह उनके दिल से निकली।
कार्यक्रम में अपने साहित्य के विवेचन से अत्यंत प्रभावित, आत्मसंतोष और गर्व से वे पूरा दिन भरे रहे। अगले दिन उन्होंने ग़रीबी के अफ़सोस को अपने पर से झाड़, पत्नी को लेखन की अमीरी पर भाषण दिया और फिर स्थानीय समाचार पत्र में तीसरे पन्ने को उत्सुकता से खोल, कार्यक्रम की रिपोर्ट ज़ोर-ज़ोर से पढ़ कर सुनाने लगे पर अंतिम पंक्तियों तक आते-आते धूप सी चमकती उनकी आवाज़ पर क्षोभ और दु:ख के काले बादल छा गए, लिखा था: ’वर्मा जी के भव्य घर को देखते हुए उन्हें आधुनिक युग का प्रेमचंद तो नहीं ही कहा जा सकता। उन्होंने साहित्य को बहुत कुछ दिया है तो साहित्य ने भी उनका घर भर दिया है। हम इसके लिए उनके ईमानदार प्रकाशकों को भी धन्यवाद देते हैं!’
लघुकथा-3
दाह
खट-खट का जबाब दीना को देना ही पड़ा। दरवाज़ा खोलने से पहले उसने एक लाचार नज़र घर की औरतों पर डाली। अपने एक कमरे के इस झोंपड़े में वे सिर ढके, अपने में कुछ और सिकुड़ गईं।
“क्या रे, सुना बेटी का दाह-कर्म भी कर दिया?” पुलिस के बड़े अधिकारी के स्वर में तीखापन था। पीछे मीडिया के लोग अपने माइक और कैमरे खोले सारे क़िस्से को दिखाने को आतुर! टोले वालों को छोड़ कर गाँव भर के लगभग १०० लोग जमा थे।
“इतनी जल्दी क्या थी? कितने लोग उसके दाह को पूरे देश को दिखाना चाहते थे, जानते हो? पूरे देश की बिटिया थी वो और तुमने अकेले ही सब चुपचाप कर दिया?”
“साहब, तीन दिन बाद अस्पताल से शरीर मिला, और कितने दिन रखते? बलात्कार और मौत की सब जाँच हो तो गई थी,” दीना ने सफ़ाई दी। “उसे देखने आने के बहाने जाने कितने ऊँची-नीची जातियों के लोग, नेता, ये कैमरे वाले, हमारे घर की लड़कियों, टोले की दूसरी लड़कियों और बहुओं का अपनी नज़रों से बलात्कार कर रहे थे, उसे तो चलने नहीं दिया जा सकता था सो निपटा दिया सब! वो तो मर गई पर बाकी को जिन्दा ल्हास कैसे बना दें? हमें नहीं बनाना इन्हें इस देश की बिटिया!”
उसके शब्दों की सच्चाई काँच की तरह कैमरे को चुभी और एकाएक स्क्रीन पर छुपती, सिमटती, सिसकती, शोक से बिलखती औरतों के चेहरों को लीलती मक्कार और लोलुप नज़रें पल भर को झुक गईं।
लघुकथा- 4
वापसी
कोरोना के तीन साल! लाखों लोगों की मृत्यु से होकर गुज़रे हैं ये साल। साल भर पहले माँ भी इसी काफ़िले में शामिल हो सदा के लिए खो गईं।
30 घंटे की लंबी यात्रा कर वह न्यूयार्क से कल शाम ही ग्वालियर पहुँची। माँ के जाने के बाद उसकी पहली यात्रा, वह भी उनकी बरसी पर! उसके पैर ठिठक रहे थे, माँ के बिना उस घर की कल्पना से दिल दहलता था, जबकि भाई-भाभी और बच्चे सभी तो थे वहाँ। पिता के न रहने पर माँ उसका घोंसला थीं, जिसमें चैन से वह पर फैलाकर लेट भी सकती थी और उनके सीने में सिर गड़ाकर फड़फड़ा भी सकती थी, अब वह घोंसला नहीं था और न सिर गड़ाने को वह सीना! कैसे रहेगी वह माँ से खाली घर में? आँखों में आँसू उमड़े पड़ते थे!
रात खाना खा, वह बिस्तर पर जो गिरी, तो सुबह भाभी के चाय लाने पर ही जागी। भैया भी अपनी चाय लिये उसके पास आ बैठे थे। अलसाई सुबह की उदास आँखें खुलने लगीं। सब नया लगा, कमरे का पेंट नया, सामने का सोफ़ा भी नया! अलबत्ता कमरे की चौखटें उसी लकड़ी की थीं। मन में कहीं इस नएपन से चिढ़ हुई- “अभी से सब नया?”
इतने में भाभी ने पुकारा, “खाली चाय नहीं, साथ में यह भी लो नीता!”
वह अचकचाकर भाभी को देखने लगी। भाभी के हाथ में वही पुराना डिब्बा था।
अचानक बिसरा हुआ पुराना दृश्य आँखों में घूम गया…
माँ इसी डिब्बे से सबको पारले- जी के दो-दो बिस्कुट सुबह की चाय के साथ देतीं, वो मना करती तो कहतीं, “खाली पेट चाय मत पियो, पेट खराब होता है। ”
डिब्बा वही था, पर उसे पकड़ने वाले हाथ अलग थे। वह फिर यादों में खोई चाय का कप पकड़े बैठी रह गई। भाभी ने हल्के से उसे हिलाया, “चाय ठंडी मत करो। पीकर नाश्ते के लिए तैयार हो, तुम्हारे भैया हीरा हलवाई से तुम्हारे लिए गर्मागर्म कचौड़ी -जलेबी मँगवा रहे हैं। ”
भाई ने उसकी तरफ़ मुस्कुराकर देखा और उसकी पीठ पर हाथ रखकर बोले, “तुझे पसंद है, तो सोचा आज मँगा लें, कल से पूजा की तैयारी शुरू…और सुन, यह नया सोफ़ा और पेंट माँ के सामने ही कोरोना शुरू होने से पहले हुआ था, उन्हीं की पसंद का रंग है यह। तुझे बताया था, पर शायद तू इतने दिन बाद आई सो भूल गई होगी। ”
वह झेंप गई, भाई ने उसकी नज़रें पढ़ लीं थीं।
पीठ पर भाई के हाथ और सामने खड़ी भाभी की मुस्कुराहट ने उसके सूने मन को गरमाई से घेर लिया। क्षण भर को लगा, माँ चौखट के पास खड़ी मुस्कुरा रही हैं।
लघुकथा-5
कागज की कश्ती
माँ गाँव के खुले आँगन से बेटे के शहर के बंद फ्लैट में आईं थीं। माँ गाँव में ही रहना चाहती थीं, अपने रहने से वो पुराने रिश्तों को बचा लेना चाहती है, हल्दी-अक्षत वाले त्यौहार बचा लेना चाहती हैं, अपने पेड़-पौधों के बीच रहना चाहती थीं, बेटा माँ को बार-बार देखने जाने में समय बचाना चाहता है, पैसा बचाना चाहता है, अपने और अपने बच्चों के बीच रखना चाहता है। वैसे भी गर्मियों की छुट्टियाँ! बच्चों को अकेले छोड़ना ठीक नहीं! माँ बच्चों को गाँव ले जाना चाहती थीं, वहाँ आम, अमरूद के पेड़ों के बीच झूला झुलाना चाहती थीं। दोनों की अलग-अलग सोच और अलग-अलग फिक्र!
माँ बच्चों को पुरानी कहानियाँ सुनाती हैं, रात उनके सिर पर तेल मल देती हैं और बहू के दफ्तर चले जाने पर उनके मन के पसंद की चीज़ें खिलाती, और कभी ताश तो कभी गिट्टे खेलना सिखाती। बहू को लगता कि माँ बच्चों को बिगाड़ रही हैं। वह मुँह बनाती और बच्चों को रोकती, बच्चे न सुनते तो पति को कहती। उसे लगता ऐसे बच्चों का मन पढ़ने से हट जायेगा, ऐसे में उनका भविष्य क्या होगा? वह गंभीर चिन्ता में पड़ कर घबरा उठती।
पिछले तीन दिनों से बारिश हो रही थी। इतना पानी गाँव में पड़ता तो ज़मीन पानी पी कर लहलहा उठती पर यहाँ शहर में कंक्रीट पानी पीती नहीं, केवल जमा करती है और सड़कों पर जाम लगवा देती है। पूरा शहर बारिश के मारे परेशान था। बेटा-बहू झींकते हुये जाते और झींकते हुये आते। माँ को गाँव के झूले और सावन के गीत याद आ रहे थे। आज शाम बेटा लौटा तो घर खाली लगा। पत्नी से पूछा तो वह पता लगा कि वह भी अभी आई है और उसे भी घर खाली मिला। तेज़ न सही पर बूँदा-बाँदी अभी भी हो रही थी, ऐसे में माँ बच्चों को लेकर कहाँ गई होंगी। दोनों परेशान हो गये। पत्नी को चिन्ता थी कि पानी जमा होने से जो मच्छर-कीड़े पैदा हो गये हैं, उनके काटे से छोटे बच्चे बीमार न पड़ जायें फिर छुट्टी लेकर घर बैठना पड़ेगा, क्या मुसीबत है। दोनों छाता लेकर निकल पड़े। कॉलोनी के पीछे ही एक बाग है, सोचा पहले वहीं जा कर देखॆं। वाकई में दूर से ही एक पेड़ के नीचे तीनों घास पर उकडू बैठे दिखाई दिये। ’कर क्या रहे हैं ये लोग?’ सोच कर दोनों ने तेज़ी से कदम बढ़ाये तो देखा कि पाइप डालने के लिये जो लंबीं खुदाई करके मज़दूर डाल गये थे, वह जगह पानी से लबालब भरी थी और माँ बच्चों के साथ उसमें कागज़ की नाव तैरा रहीं थीं, बच्चे नाव के हिलते-डुलते आगे बढ़ने को मुग्ध होकर देख रहे थे और माँ होंठों ही होंठों में कुछ गुनगुना रहीं थीं। पत्नी एकबार को घबरा गय़ी थीं कि बच्चे कहीं उस खड्ड में गिर न जायें, उसने शिकायत और गुस्से की कड़ी निगाहों से पति को देखा, पति मुग्ध भाव से तीनों को देख रहा था, कितने मगन, कितने निश्चिन्त, कितने खुश! बूँदा-बाँदी की फिक्र से परे, घड़ी के समय की सोच के बाहर! उसे अपना बचपन याद आया जब माँ उसके साथ कागज़ की नाव बना कर तैराती थीं। माँ वहीं थीं, बच्चे बदल गये थे।
उसने अपनी छतरी नीचे रखी और माँ के पास धीरे से जाकर बैठ गया। माँ ने चौंक कर उसे देखा, एक पल हड़बड़ायी जैसे कुछ गलत करते पकड़ ली गयी हो फिर बेटे के चेहरे में पुरानी परछाईं देख सहज हो आयी, पलट कर देखा तो बहू स्तब्ध सी खड़ी थी, उसके शहरी संस्कार शायद पाँव रोक रहे थे। माँ ने सहज हाथ बढाकर उसे बुलाया, तब तक बच्चे भी माँ को देख खुशी से उस से लिपट गये और वह अनायास ही उनके नन्हें हाथों के खिचाँव पर साथ आ बैठी, पानी पर कागज़ की कुछ नन्हीं कश्तियाँ हिलती डुलती चली जा रहीं थीं, बूँदा-बाँदी और घड़ी की टिक-टिक से बाहर! उन्हें ताकती कई जोड़ी आँखों में बचपन का उल्लास तैर रहा था।
पाँच लघुकथा


अन्नपूर्णा श्रीवास्तव
बेतिया पश्चिम चम्पारण
वर्तमान निवास-पटना बिहार
मोबाइल 9576815977
लघुकथा-1
भीख
“गरीब पर दया करो साहब… दया करो..” . दयनीय दृष्टि से देखते हुए गंदे बस्त्रों में लिपटी एक प्रौढ़ महिला ने सामने कटोरा बढ़ा दिया… मनीष ने जल्दी से पाकेट में हाथ डाले 10 का एक सिक्का झंकार के साथ उसके कटोरे में आ गया… उसने पुनः अपने स्वर दुहराते हुए जोगेश की ओर देखा… ” मैं पैसों की भीख नहीं देता , कुछ खागोगी अम्मा…?” जोगेश ने भीख माँगने वाली से पूछा… “नहीं…! पैसे दे दो बेटा”
योगेश आगे बढ़ चला…
पंचमंदिर के पास वाइक रोक कर मनीष हनुमान जी के दर्शन हेतु भीतर गया… पाँच मिनट में बाहर आकर योगेश को ढ़ूँढ़ने लगा… तभी दोनों हाथो में लिट्टी – छोले की कई थैलियाँ लिए योगेश दिखा, वह बड़े मनोयोग से सड़क पर फटे- चीथड़े बस्त्रों में लिपट बैठे भीखमंगों को बारी- बारी से लिट्टी के थैले थमा रहा था, वे अपनी चमकती आँखें एवं दुआएँ भरी होठों से आशीर्वाद दे रहे थे… “तुम भी खूब हो योगेश .. पाँच नहीं दिए. उस भीखमंगिन को… यहाँ सैकड़ों गँवा दिए…! मैं तो यूँही दस–रोज – पाँच रोज दान करता रहता हूँ.” हिकारत भरी नज़रों से योगेश की ओर देखकर गर्व पूर्वक मनीष ने कहा…
” मनीष, तुमने जिसे पैसे दान दिए, वे व्यवसायी हैं, भीख माँगना उनका धंधा है, पता किया जाय तो या तो उनके पास लाखों रूपये मिलेंगे या वे किसी गुर्गे के द्वारा भीख की कमाई देने aको विवश होंगे…
इसलिए उन्हें पैसे चाहिए होता है… हमें इसे बढावा देने से बचना चाहिए…
लघुकथा-2
दरकिनार
रोहतक हरियाणा के एक बडे साहित्यिक समारोह में’विलक्षणा समाज सारथी’ सम्मान से सुसज्जित होकर दोनों पति- पत्नी अपने ठिकाने होटल कार्निश वापस लौट रहे थे… रात के पौने बारह बज रहे थे होटल में खाना मिलने की उम्मीद नहीं थी, भूख से अंतड़ियाँ ऐंठा रही थी! अचानक सामने एक मिठाई की दुकान खुली दिखी, कुछ लोग तंदूरी रोटी, मटर – पनीर, रायता वगैरह पैक करवा रहे थे… पत्नी को पीछे छोड़ पतिदेव आगे काउंटर पर पहुंचकर खाने के बारे में पूछने लगे। रश्मी( पत्नी)कुछ कदम पीछे खड़ी चुपचाप इंतजार करने लगी।’ हटो भागो यहाँ से, नहीं मिलेगा दूर हटो… कहाँ से मर पड़ते हैं कंगले’ वहाँ उपस्थित सभी सभ्य लोक उस भीखमंगे को अपने- अपने तरीके से दुत्कार रहे थे … वह बार बार गिड़गिड़ा रहा था… भूख की दुहाई दे रहा था… शरीर पर फटे- चीथरे कपड़े, हाथों में आल्मुनियम के कटोरे, आँखों में भरपूर दीनता लिए वह हर आने- जाने वालों से खाना देने की गुजारिश कर रहा था… हाथ में खाने के दो पैकेट लिए पतिदेव लौटे तो रश्मी ने जिद्द कर एक पैकेट भीखमंगे को दिलवा दिये, भीखमंगा सलाम कर के चला गया… पतिदेव भुनभुनाते हुए पुनः एक पैकेट लेने के लिए बढ गये… और लेकर दोनों पति- पत्नी होटल की ओर बढ चले… ज्योहिं नुक्कड़ पर पहुंचे देखा वह भीखमंगा दो अन्य भीखमंगों के साथ खाने का पैकेट और देशी दारू का बोतल खोले बैठा है तथा मटर – पनीर को चीखना बना कर वे तीनो दारू बारी – बारी से खा – पी रहे हैं…देखकर रश्मी ने दाँतोंतले ऊँगली दवायी .. पतिदेव ने लम्बे चौड़े भाषण दिये, उसकी दानवीरता की प्रवृत्ति पर कालिख पोती! कहा ‘फिर कभी तुमने मेरे ंसाथ ऐसी पेशकश की तो तुम्हारे साथ कहीं किसी आयोजन या भ्रमण- यात्रा वगैरह के लिए नहीं जाऊँगा ‘… वह सोच में पड़ गयी, क्या भारत के सभी भीखमंगे ऐसे हैं ..? ऐसों के कारण जो सचमुच भूखे हैं, जरूरत मंद हैं. उन्हें दरकिनार कर देना चाहिए….?
लघुकथा-3
खंजर
” डॉ अंशु आप 10th क्लास में हिन्दी की कक्षा ले लें ” अमृता के साथ कैंटिन की ओर बढ़ते देख प्रधानाध्यापक ने कहा… वह मन मार कर वापस लौट गयी… उसका सिर भारी लग रहा था, अमृता की भी कक्षा नहीं थी, सोचा कि साथ – साथ चाय पी ली जाय… “पाठ्यक्रम के आधार पर पढ़ा देंगी” पुनः प्रधान ने कहा… वह तेज कदमों से कक्षा की ओर बढ़ गयी…
बच्चों ने उठ कर हर्षोल्लास से स्वागत् किया, वे आश्वस्त थे कि मैडम आज भी कुछ नया बताएँगी… खाली घंटियों में वह जब भी कक्षा लेती कुछ न कुछ विशेष बताती…जीवन- जगत, नीति-ज्ञान, संस्कार संस्कृति, स्वालंबन, स्वतंत्रता , अनुशासन जैसे शब्दों के विशेष, सार्थक, वैज्ञानिक अर्थ , उसके उचित उपयोग आदि बातें विस्तार से समझाती…. उसकी समझ से किताबी ज्ञान से ज्यादा इन शब्दों के व्यावहारिक उपयोगिता है… ये चरित्र – निर्माण में सहायक होते हैं..
मगर आज तो आदेश था पाठ पढ़ाने का… संयोग से आज “मित्रता” कविता पढानी थी…संदर्भ में वह मित्र के गुण लाभ बताने लगी… कक्षा में पूरी तरह शान्ति थी, सभी बच्चे सुनने में तल्लीन थे… “जीवन में सबसे अच्छी मित्र माँ होती है… बच्चों को माँ से सब कुछ बताना चाहिए… नित दिन के अच्छे- बुरे सभी कार्य, विद्यालय, घर, पड़ोस, मित्र – बंधु रिश्तेदार सभी के साथ बिताये पल, किये जानेवाले व्यावहार, अपने मन के सभी एहसास, अच्छाई- बुराई सभी कुछ माँ से साँझा अवश्य करना चाहिए.क्योंकि एक माँ ही है जो तुम्हारी बातें किसी से नहीं कहेगी। तुम्हारे पिता से भी तभी कहेगी, जब उस सम्बंध में उनसे सहयोग या संरक्षण लेना अति आवश्यक होगा…! तुम्हारी गल्तियों, बुराइयों के लिए तुम्हें समझाएगी, तुम्हारी परेशानियों में सहयोग करेगी… सबसे बड़ी बात कि उसे तुम्हारे संगी, साथी, से संबंधित प्रत्येक गतिविधियों का ज्ञान रहेगा,जिस कारण बहुत बार मिलनेवाले धोखे और भारी मुसीबतों से तुम बच जाओगे…! दोस्त को हमराज बनाओगे तो वह ” किसी से नहीं बताना” कह के अपने जिगरी दोस्त को कहेगा, फिर वह अपने जिगरी दोस्त को कहेगा… इस प्रकार तुम्हारी बातें न जाने कितने लोगों के बीच पहुंच जाएगी.. इसलिए बच्चों, आज से संकल्प लो कि अपनी माँ से सभी बातें बताओगे… ” अंशु ने जैसे ही अपनी बातें समाप्त की एक बच्चा उठ खड़ा हुआ…” क्या बात है रवि ..? तुम्हें कुछ कहना है बेटा …? ” निकट पहुँचकर प्यार से अंशु ने पूछा.. वह चुपचाप सिर झुकाये खड़ा रहा ..प्रश्नसूचक दृष्टि से . वह उसे देखने लगी ” मैम जिसकी माँ नहीं हो, वह किससे कहेगा…?” अचानक बड़े उदास लहजे और डबडबायी आँखों से उसे देखते हुए रवि ने कहा… वह सकते में आ गयी… उसे लगा कि किसी ने उसकी छाती में खंजर उतार दिए…!’
लघुकथा-4
मजबूरी
उसने कीचन की खिड़की खोली तो देखा – सामनेवाले मैदान में कुछ मजदूर जलती धूप से बचते हुए झाड़ियों के बीच गमछा बिछाकर सोये पड़े हैं । अनेक तरह के जंगली पौधे एवं झाड़ – झंखार से भरी उस जमीन पर पाँव रखने में भी डर लगता था , अक्सर वहाँ जहरीले साँप बड़े आराम से टहलते हुए दिखायी पड़ते हैं.. मगर ये मजदूर कैसे बेफिक्र सोये पड़े हैं… हृदय पीड़ा से भर उठा। शायद वे काम करते-करते थक कर सो गये थे। सहसा वे जागकर उठ बैठे। रश्मी ने इशारे से उन्हें खिड़की के पास बुलाया.. कहा “आपलोगों को पता है, इस जमीन पर जहरीले- जहरीले सर्प हैं? वैसे जंगल – झाड़ों में सर्प – कीड़ों का भय तो होता ही है…! ” मेम साहब भूख के नाग का ज़हर साँप के जहर पर भारी पड़ता है… साँप डँसे तो मरकर आराम मिल जाएगा, भूख तो रोज सुबहो- शाम डँसती है… हर पल उसका डर बना रहता है.. थोड़ा आराम नहीं करेंगे, तो काम में फुर्ति नहीं आएगी…. काम पूरे नहीं होगे,तो पैसे नहीं मिलेंगे, फिर भूख का नाग डँसता रहेगा….! धूप से बचने के लिए फटे गमछे को पगड़ी की तरह लपेट कर उस मजदूर ने कहा….
लघुकथा-5
मैं हूँ न
गेट के अन्दर प्रवेश करते ही पड़ोस के बच्चे ने हाथ में लिफाफा थमा दिये। लिखावट पहचानी थी धड़कते दिल से पत्र खोला, साँसे रुकती सी- महसूस हुई… पाँव ने जबाब दे दिए वह धम्म से सोफे पर बैठ गया… दुर्घटना के बाद डॉ के जाँच – रिपोर्ट (वह अब कभी वैवाहिक जीवन निभाने योग्य नहीं हो पायेगा) से वह नहीं टूटा, मगर रश्मि की चिट्ठी ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया…। अर्चना को छोड़ कर उसने रश्मि को अपनाया था, दस वर्षों से उसके साथ रिलेशन शिप में रह रहा था। आज इस मुकाम पर उसने उसे छोड़ कर अमित की वाँह थाम ली… ताकिया में मुँह छिपाकर वह फफक- फफक के रोने लगा.. . सहसा किसी की गर्म साँसों एवं नर्म हथेलियों की गरमाहट के एहसास से रोमांचित हो उसने सिर उठाया, आँखों में आँसू लिए उसकी परित्यक्ता पत्नी अर्चना बोली ‘मैं हूँ न’ समाज और भगवान को साक्षी कर हिन्दू धर्म संस्कृति के एक – एक विधान से सिंचित, संपादित, विवाह बंधन अटूट होता है… यह ईश्वर निर्मित दो प्राणों का बंधन है, स्वार्थ की आँधी इसे उजाड़ नहीं सकती..! वह मासूम बच्चे की तरह अर्चना के वक्ष में सिर छिपा कर फूट – फूट कर रोने लगा ……
पाँच लघुकथा

कुसुम पारीक,

लघुकथा-1
छलावा
जैसे बरसों की थकान से निचुड़ चुके शरीर को लगभग भूमि पर गिराता हुआ वह धम्म से पेड़ के नीचे बैठ क्या पसर गया था|
तन की थकान से ज़्यादा, मन की थकान थी |
किसी तरह बोझिल आँखों को उसने हल्का सा खोला तो नज़र ऊपर पेड़ की शाखाओं की ओर चली गई—
जहाँ शाखाओं से लिपटी एक बेल — हरी, कोमल और लचीली।
थोड़ी सजीव, थोड़ी सज़ावटी।
वह देर तक उसे देखता रहा, फिर जैसे एक बुझे स्वर में बुदबुदाया —
“बेचारी लता… इसका अपना कोई आधार नहीं, अपना कोई आकाश नहीं।”
“बस पेड़ की जड़ों से चिपकी हुई, उसी के दम पर जीवित… जैसे कई रिश्ते, जो खुद नहीं होते — बस टिके होते हैं किसी और के भरोसे।”
वह खुद से बात कर रहा था, पर जैसे उस लता ने सुन लिया हो।
उधर हल्की सी सरसराहट हुई ,
“क्यों, इतना ही जानते हो मेरे बारे में?”
उसने चौंककर ऊपर देखा।
हवा नहीं चली थी, पर बेल हिली थी।
“तुम्हें लगता है मैं निर्बल हूँ, पर मैं जानती हूँ — मैं कौन हूँ।
मैं एक सहारा नहीं, एक घेराबंदी हूँ।”
“घेराबंदी उसने हैरानी से पूछा |
“हाँ,” बेल ने धीमे से कहा, “मुझे देखकर लगता है कि मैं इस पेड़ पर आश्रित हूँ। पर भीतर से देखो — मैं इसकी हर साँस पर छायी हूँ।
इसके तने में मेरी पकड़ है, इसकी छाल में मेरा स्पर्श।
इसे हर कोई ‘मजबूत’ समझता है — पर यह अब मेरी गिरफ़्त में जीता है।”
वह स्तब्ध हो गया और उत्कंठा में उठ बैठा और बोला,
“परन्तु तुम तो परजीवी हो!”
लघुकथा-2
तुम्हारे शब्द सच नहीं।
जो रिश्ता बाहर से ‘पालन’लगता है, वह भीतर से ‘नियंत्रण’ भी हो सकता है।
जो दिखे कि कोई किसी को थामे हुए है — जरूरी नहीं कि वह उसके पकड़े जाने से मुक्त हो।”
अब उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी उतरने लगी थी|
“तुम्हें दुख नहीं होता इस पर चढ़कर जीने में?”
बेल हँसी — एक खोखली, थकी हँसी।
“दुःख ??
“दुःख तो उसे होता है जो सच को जानता है और सहता है।
मैंने तो खुद को भ्रम में रंग लिया है —
मैं उसकी शोभा बनती हूँ, लोग वाह-वाह करते हैं।
पर वह… वह भीतर ही भीतर घुटता है।
उसे हर कोई बड़ा कहता है — पर वह मेरी पकड़ में दम तोड़ता है।
तुम्हें क्या लगता है, ये पेड़ क्यों चुप है?”
उसने देखा — सच में, पेड़ पर नई पत्तियाँ कम थीं, शाखाएँ कुछ मुड़ी-टूटी थीं।
कहीं कोटर से गोंद की तरह कोई बूंद रिस रही थी।
“क्या… तुम उसे भी जकड़ कर दुःख दे रही हो?”
“नहीं–
मैंने उसे केवल वो दिया जो वह लेने को तैयार था।
जब मैं कोमल थी, उसने मुझे अपने ऊपर चढ़ने दिया।
वह यह समझता रहा कि वह मुझे थाम रहा है।
पर जो सहारा बनता है — वह धीरे-धीरे बंधन बन जाता है।
उसने सोचा मैं निर्बल हूँ — और यही उसकी सबसे बड़ी चूक थी।”
अब उसके चेहरे पर गहरी थकावट थी।
उसने अपनी हथेली से आंखें पोंछीं —
पर आँसू नहीं थे, कोई गिरा नहीं।
जैसे कोई बूँद भीतर गिरती हो — और वहीं गुम हो जाती हो।
और अचानक…
उसने देखा कि पेड़ की कोटर से एक बूंद गिरी —
ठीक उसी कोटर में, जहाँ वह बैठा था।
लघुकथा-3
चिदम्बर रहस्य
कानों जी कानो में बात घूमती हुई सर्वत्र फैल चुकी थी।
पहुँचती भी कैसे नहीं, आखिर आज शिव और शक्ति के बीच नृत्य प्रतियोगिता थी।
सारे देवी-देवता, गंधर्व,किन्नर,यक्ष सब व्यग्रता से उत्सुक थे इस अद्भुत पल के साक्षी बनने को।
जैसे ही नृत्य शुरू हुआ–अद्भुत ताल,लय और कला का संगम देखते ही बनता था।
सभी मंत्र मुग्ध हो उन्हें देख रहे थे।
कोई कयास नहीं था जीत-हार का।
शक्ति की प्रत्येक मुद्राएँ प्रशंसनीय थीं।
लग रहा था कि आज वही जीतेंगी।उत्सव, खुशी, मिलन, कृतज्ञता, उत्साह और असीम शांति से भरी एक दिव्य अनुभूति थी उस नृत्य में।
नृत्य करते हुए अचानक शिव ने अपना एक पाँव ऊपर उठा दिया, दूसरा पाँव *अपस्मार*पर था
शक्ति हतप्रभ थीं; मंत्रमुग्ध सी वहीं थम गईं, चकित,भाव विभोर होकर। चकोर की भांति एक तक देखती रही।
वाक और विचार दोनों ही अपना अर्थ उद्घटित किये बिना ही शक्ति के पास से लौट गए थे। उसके अंदर धीरे-धीरे सब कुछ पिघल रहा था।
अब वहाँ केवल सत्य था, वही होश था, वही बोध था।
लघुकथा-4
मन-डे
रसोई से उठती खुशबू से उसकी ज़िद जलेबी खाने के लिए बढ़ती जा रही थी लेकिन मैं मूड में नहीं थी कि उसकी यह इच्छा पूरी की जाये।परन्तु उसकी व्यग्रता देख,अनदेखा भी नहीं कर सकी और उससे पूछ बैठी, “तुम जलेबी ही क्यों खाना चाहते हो?
मुझे खुद में रुचि लेते देख वह प्रफुल्लित होकर बोला,”मुझे अच्छी लगती है इसलिए।“
और जीभ ने भी लार टपकाते हुए उसका साथ दिया |
तुम्हे अच्छे लगने भर से थोड़े ही मिल जाएगी जो तुम चाहोगे वह चीज “ और यह कह कर मैं फिर काम में लग गईं लेकिन गाहे-बगाहे वह उछल-उछल कर मुझे परेशान करने लगा।
मैंने दुबारा पूछा,” ऐसा क्या फायदा है जो तुम उसके बिना नहीं रह सकते?”
मुँह से लार टपकाने की प्रक्रिया को बढ़ाते हुए आँखों में पाने की चाहत के साथ बोल पड़ा,”तुम्हें क्या पता मुझे कितनी अच्छी लगती है? आज मुझे हर हाल में जलेबी चाहिए।”
अब मैंने थोड़ा कड़क होते हुए कहा,”नहीं मिलेगी और वापिस अपने काम में लग गई|
अब वह परेशान होकर सहायता के लिए इधर उधर अपने मित्रों की ओर देखने लगा लेकिन मेरे गुस्से को देखते हुए कोई भी उसकी सहायता करने को तैयार नहीं था।
अंत में थक-हार कर वह कोने में दुबक कर बैठ गया ,जीभ भी अपने दायरे में आकर शांत हो गई और मैं अपने फिटनेस प्लान को पूरा करने में जुट गई |
लघुकथा-5
वामा-ग्रन्थि
मैं उस अद्भुत नारी को देखकर सोच में पड़ गया था .. ऐसा साहस विरलों में ही मिलता है ।
जब उसने कहा, “मुझे इस समर्पण व त्याग के जीवन से निजात पानी है शायद भगवान ने ही ऐसी कोई ग्रन्थि बनाई होगी ..…” मैं चाहती हूँ कि आप इसे खत्म करने की दवाई दें।”
कितनी संजीदगी से उसने कहा दिया….” मैं जिस चक्रव्यूह में हूँ उसकी ज़िम्मेदार मैं हूँ न कि मेरे पति”
मैने कई बार जोर दिया कि गलती तो आपके पति की ज्यादा है जो आपकी भावनाओं व त्याग को न समझकर आपको मानसिक प्रताड़ित करते हैं लेकिन उसका कहना था…”त्याग ,दया सहनशीलता व समर्पण के गुण मेरे हैं जो मैंने उन्हें इस जीवन में दिए और इतने गूढ़ स्तर तक दिए कि उनके जीवन में यह मात्र व्यर्थ की हवाई बातें बन कर रह गईं।
जब पुरुषोचित अहम के वशीभूत…. यह मुझे अपने इशारों पर नचाना चाहते थे तो वह कठपुतली जैसी मौन स्वीकृति मेरी ही थी जिन्हें मैं पत्नी के कर्तव्यों व प्रेम का नाम देकर निभाती चली गई… और उन्होंने इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लिया।
“जीवन हो या कैनवास .. आप जितने रंग भरते हो वे खुद की खुशी के लिए भरते हो लेकिन इतराता तो केवल चित्र ही है न !
वह तुम्हें वापसी में कुछ नहीं देता ।”
बड़े-बड़े मनोरोगियों का इलाज करते हुए आज महसूस हुआ कि वह मुझे एक नया पाठ पढ़ा गई ।
“शायद कोई भारतीय स्त्री ही थी ……..”
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