शिशुगीतः शैल अग्रवाल


पन्नों के अंदर

आ से आम और क से कबूतर
बोले एक दिन पन्नों के अन्दर
चलो उड़ें आकाश में हम
देखें चन्दा और सूरज के घर
आम छुपा चन्दा में जाकर
थके कबूतर के टूटे पर
मुन्ना ढूँढे अब पलटके पन्ने
ब से बिल्ली और ख से खरगोश
उछलेंगे जो घास पे आकर
खेलेगा वह उनके संग।

चूँ चूं चिड़िया सभा बुलाए
शहर-शहर पर्ची छपवाए
सुबह-सुबह ही आना है
मिलने और मिलाने बाद
अच्छा अच्छा खाना है।

बिल्ली मासी

बिल्ली मासी बिल्ली मासी
घूमी आज फिर तुम मनमानी
कभी छतपर तो कभी पेड़पर
देखे खूब जाकर चंदा मामा
फूलों पर उड़ती तितली रानी

डराया क्या उस चूहो को भी
कुतर किताब फाड़के चुन्नी
करता जो हमसे शैतानी ?


झटपट मियाँ लाल बन्दर
समझें खुद को बड़ा सिकन्दर
जा डाली पर ये उलटे लटके
देते फूल फलों को झटके
डाली से टपका जब आम
झटपट मियां संग धड़ाम।

बंदर ने एक पैंट सिलाई
अच्छी सी जैकेट मंगवाई
फिटिंग पूंछ की सही ना आए
दरजी की आफत है आई।

सु-मन

आज खिले हैं कल बिखरेंगे
बिखर-बिखरके फिर संवरेंगे
कोमल है तन-मन इनका
इरादा पर अटल और पक्का
कांटों पर भी जो मुस्काए
वह किसके मन को ना भाए
फूलों सा जिसने खिलना सीखा
उसने ही सबका मन जीता।

हवा ने मारी सीटी
बादल ने लगाई छलांग
बरखा रानी छमछम नाचें
परियों की शादी में आज।

रिमझिम बूंदे उझलें कूदें
आंगन हिलमिल लंगड़ी खेलें
हाथ बढाऊं तो फिसली जाएं
बादल ने कितने मोती बिखराए।

काले बादल में भूत छुपा
गोरी बिजुरी हाथ तलवार
रुके कैसे ये युद्ध घमासान
मेंढक राजा टर्र टर्रकर
अब करें यह विचार।

छतरी रानी तनी खड़ीं
बरखा से हैं खूब लड़ीं
रोज रोज तू सताती है
गरज बरस भिगो जाती है
अगली बारिश जब आएगी
भिगो नहीं तू पाएगी।

गिलहरी रानी बड़ी सयानी
जाड़े की करती रहतीं तैयारी
कुछ खातीं, कुछ ये बचाती
जहाँ-तहाँ छुपाकर आ जातीं
बुरे वक्त को रहो तैयार
संदेश हमें ये देती जातीं।

तारों की ठंडी छांव तले
तोता मैना उड़ते फिरे
नीले खुले आसमान में
तोते ने फिर गाया गीत
मैना, ओ प्यारी मैना
कितनी सुन्दर हो तुम
मेरी मनमीत।।

तुनतुन तुक तुनतुन तारा
गीत सुनाए हमें एकतारा
सच्चे ने जग जीता
झूठे का मुंह काला
तुनतुन तुक तुनतुन तारा
गीत सुनाए यही एकतारा
जिसकी मीठी बोली
दुनिया उसकी ही हो ली
तुनतुन तुक तुनतुन तारा
गीत सुनाए यही एकतारा
रोता है सब कुछ खोता
हंसते का ही जग होता।।

झिलमिल झिलमिल प्यारे
नभ पर फैले हैं सारे
हीरे से जगमग जो तारे
मुन्ने ने देखा और सोचा
रोज रात कहां से आ जाते
नभ पर चढ़के मुझे लुभाते
कैसे मैं इनसे झोली भर लाऊँ
पहले सबको मनचाहा बांटूँ
फिर कुछ मम्मी की साड़ी पर
कुछ पर्स पर, और कुछ
अपने बालों पर मैं टांकू।।


एक दो तीन चार
गिनती कितनी करो विचार
पांच छह सात और आठ
खूब बनाए अपने ठाठ
नौ और दस को ले के संग
दौड़ दौड़ के चढ गए बस
घूमेंगे अब ये शहर-शहर
लहराएंगे खूब इधर-उधर।।

चार और चार होते हैं आठ
थकी पढ़ाती मैं तुमको पाठ

इक्कड़-दुक्कड़, घूम घुमक्कड़
हल्ला गुल्ला, लुका छिपी
खेलो मिलजुल तुम आंख-मिचोली
फिसल गिरे जब गुड़िया रानी
हाथ बढ़ाना मेरे गुड्डे राजा
चुनमुन ने जब बस्ता लगाया
जाते-जाते खिलौनों को समझाया।

हंस-हंसनी से दादा दादी
मम्मी-पापा, चाचा-चाची
बुआ-फूफा, मामा-मामी
प्यारे-प्यारे नाना-नानी
हरेक की होती है एक जोड़ी
प्रेम-प्यार से पगी-बढ़ी
अकेला तो बस रहे अकेला
दुनिया ना हो पावे इसकी!

कभी बॉल सा इत उत घूमे
नीबू की फांक बना कभी ललचाए
कभी फूल के कुप्पा हो जाए
कभी सर्कस के जोकर-सा
पेड़ पहाड़ी चढ़े, दौड़े-भागे
नदी में सोए, जमीं पर जागे
रातभर देखा हमने इसे खेलते
बहुत ग़ज़ब का है खिलाड़ी बंदा
चलो, छत पे चढ़कर ढूंढे इसको
छुपा आज की रात कहाँ पर चंदा !

तोता-तोता

तोता, तोता, बोली मैना
सच्ची सच्ची मुझसे तुम कहना
रहता कहाँ है ध्यान तुम्हारा
फुदक-फुदककर यूँ उड़ते-फिरते
रह- रहके बस मिर्ची तुम कुतरते
दोहराओ मेरे संग यह गान


चिड़िया रानी

चिड़िया रानी बड़ी सयानी
फुदक-फुदक करतीं मनमानी
ले-ले तिनके चोंच में उड़तीं
सुन्दर सुन्दर घर को सजातीं
उड़कर पहुंचूं मैं भी वहाँ
दे दो कोई वो पंख जरा।

चंदा मामा
चंदा मामा नीचे आ जा
दूध-मलाई संग-संग खा जा।
मम्मी तो सो गई हैं कबकी
तू ही आकर मुझे सुला जा।।

रात की कड़ाही में
पूरी-सा चंदा
कितने पास आ बैठा है
देखो माँ यह दूरी-का चंदा
प्लेट में दे दो इसको ज़रा
मैं भी तो देखूँ इसे अब
ठंडा है, या गरम बहुत
छत पर आ लटका जो
जाने किस मजबूरी में चंदा !

पत्ती रानी

बगिया के नाटक में देखी
हमने एक नयी कहानी
पानी बरसे धूप भी निकले
हवा के बैंड पर झूम-झूमके
नाची कितनी पत्ती रानी।

-शैल अग्रवाल

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