हास्य व्यंग्यः हरि अनंत हरिकथा अनंता-प्रभुदयाल श्रीवास्तव/ लेखनी-सितंबर-अक्तूबर 17

एक दिन सुबह सुबह मेरी नन्हीं पोती अखवार उठा लाई और पूछने लगी दद्दा ये दो लाख करोड़ कितने होते हैं?

मैंने कहा आप ही बताओ कितने होंगे, आप भी तो तीसरी कक्षा में पढ़ने जाती हैं|

सच बात तो यह है कि मुझे खुद ही समझ में नहीं आया था कि दो लाख करोड़ कितने होते हैं|मैं क्या मेरे पिताजी भी यदि जीवित होते तो वह भी शायद ही बता पाते कि दो लाख करोड़ कितने होते हैं|दो चार करोड़ तक तो भेजे में घुस जाते हैं कि यह बहुत बड़ी राशि होती है परंतु दो लाख करोड़ सुनके माथा ही चकरा गया । अक्ल भी गधे के सिर से सींग की मानिंद गायब हो गई|

पोती ने फिर से जोर मारा कहने लगी दद्दा एक करोड़,दो करोड़, तीन करोड़.. सौ करोड़ ऐसे ही दो लाख करोड़|

मैंने कहा ऐसे कैसे दो लाख करोड़ ठीक से समझाओ बिन्नू, कितने रुपये हुये?

वह कुछ देर तक माथे पर हाथ फेरती रही, फिर सिर खुजलाने लगी और कहने लगी दद्दा दो लाख में एक करोड़ का गुणा कर देंगे तो दो लाख करोड़  हो जायेगा|

बिन्नू पढ़ने में इंटेलीजेंट तो थी ही क्लास में हमेशा अब्बल आती थी| मैंने कहा बात तो ठीक है बिन्नू आप बिल्कुल सही कह रहीं हैं| वह दौड़कर स्लेट उठा लाई और गुणा करने बैठ गई| मुझे भी राहत‌ मिल गई| मैंने सोचा ये बिन्नू यह सवाल पूँछ क्यों रही है और उससे ही पूँछा- बिन्नू आप ये सवाल क्यों पूंछ रहीं हैं, क्या आपकी कक्षा में इतने बड़े सवाल पूंछे जाते हं?

वह कहने लगी नहीं दद्दा, इस अखवार में लिखा है और एक अखवार मेरी तरफ सरका कर अपनी नन्हीँ अँगुलियां उस जगह रख दीं जहां दो लाख करोड़ लिखा था| कहने लगी दद्दा ये लिखा है| हमने देखा की एक खबर छपी थी कि इसरो घुटाला में सरकार को दो लाख करोड़ की चपत|

मैंने पूरी खबर पढ़ डाली| अब सिर खुजलाने की बारी मेरी थी| सच मे ये दो लाख करोड़ होता क्या है? आजकल‌ तो घुटालों का मौसम है। सत्तर हज़ार अरब डालर सुनकर ही दिमाग चकर घिन्नी हो जाता है । सुना है इतने डालर देश की महान महान आत्माओं के विदेशी बैंकों में धरे हैं| इन महान आत्माओं को परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है, की ये देश के बड़े नेता अफसरान और उद्योगपति हैं| मैंने स्कूली दिनों में इतिहास भी पढ़ा है और उसी इतिहास की खबर आ गई कि प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेज सेनापति लार्ड क्लाइव आठ सौ पानी के जहाजों में अपने भरत देश का माल लूटकर इंग्लेंड ले गया था| क्लाइव तो था विदेशी इस देश का माल लूटकर अपने देश ले जाकर राज धर्म निभा रहा था| पर अपने ही भाई लोग यहां का माल लूटकर विदेशों में काहे धर के आ रहें हैं, यह बात समझ से परे है| टूजी स्पेक्ट्रम घुटाला एक लाख सत्तर हज़ार करोड़ का है| कामन वेल्थ गेम घुटाला कितने लाख करोड़ का होगा अभी ठीक से किसी को पता नहीं है| परंतु शेरनी का दूध पीने वाले वह कारकून कितने बहादुर होंगे जो बाज़ार में बिक्री भाव से चौदह गुने ज्यादा भाव मे किराये से सामान ले आये| 15 मार्च 2011 का दैनिक भास्कर हाथ में लिये बैठे हैं जिसमें लिखा है जो चीजें बाज़ार में दो करोड़ अस्सी लाख में आराम से खरीदीं जा सकतीं थीं, वही चीजें देश के बहादुर लोग ब्यालीस करोड़ चौंतीस लाख में किराये से ले आये| भारत रत्न नामक उपाधि देने की इच्छा हो रही है ऐसे वीर सपूतों को, किंतु एक निरीह लेखक बेचारा सोचने के सिवाय क्या कर सकता है| भैइयाजी देश की दशा देख लो लोग बाग कैसे गपागप बेहिचक खा रहे हैं| एक दिन हम भी हिसाब लगाने बैठ गये कि दो लाख करोड़ कितने होंगे| बचपन में पढ़ी सारी गिनती भेजे में डाउन लोड की और मेमोरी के माउस को क्लिक किया तो दिमाग के स्क्रीन पर इकाई दहाई सैकड़ा हज़ार दस हज़ार लाख दस लाख करोड़ दस क‌रोड़ अरब दस अरब‌ खरब दस खरब नील दस नील पदम दस पदम शंख दस शंख अंक प्रिंट हो गया|बस इसके आगे मेमोरी फुल हो गई| शायद इसके बाद कुछ था भी नहीं| हमने बिन्नूजी की अक्लानुसार दो लाख में एक करोड़ का गुणा कर दिया,मतलब200000गुणे10000000 बराबर2000000000000 मतलब‌ बीस खरब रुपैया आ गये| बाप रे बाप इतने सारे रुपये यार लोग सरकारी खजाने से खा गये,और हज़म कर गये| इसी तरह हमने हिसाब लगाया कि टूजी स्पेक्ट्रम घुटाले में सत्तरह खरब रुपये डकार लिये गये|ये ही समझ में नहीं आया कि जो आंकड़ा पढ़ने सुनने में भी अटपटा लगता  हो उतने आंकड़े वाला माल लोग कैसे डकार जाते हैं| भाई सहिब धांधली मची है जिसको जो करना होता है कर जाता है,कोई सुनने वाला नहीं होता वह तो ‘मीडिया सर’ की यदा कदा मेहरवानी हो जाती है तो कुछ हो हल्ला हो जाता है और सरकार की चिरैया थोड़े कान पूंछ हिलाने लगती है| यह तो वे घुटाले हैं जो पकड़ में आ जाते हैं।  विरोधी उचकने लगते हैं । मिडिया वाले हो हल्ला करते हैँ और दुनिया को पता लग जाता हैं| ऐसे घुटाले तो रोज ही होते रहते हैं जो नज़र ही नहीं आते और लोग खाये पड़े रहते हैं| लॊग सड़क बनाने में खा जाते हैं। सड़क मिटाने में खा जाते हैं। पुल गिराने में खा जाते हैं। पुल बनाने में खा जाते हैं| रेल चलाने में भी कोई मुरौअत‌ नहीं करते हैं| यार लोगों ने गाय भैंसो का चारा तक खाया है, तारकोल पिया है, तोपें खाई हैं और कुछ जनों ने तो सैनिकों के ताबूत तक गटक लिये|

अब क्या बतायें कि भगवान ने इंसानों को इसलिये बनाया है कि वे खायें और अच्छे काम करें . परंतु रोटी खाने के लिये बनाया है पैसे खाने के लिये थोड़े ही कहा था| जिंदा रहना है तो रोटी खाओ,  पर भईया लोग रुपये सूंतने लगे ,डालर पेलने लगे| लोग कहते हैं कि  डालर खाने का अपना अलग ही आनंद है, बहुत मीठे होते हैं| इस खाकसार को तो आजतक यह सुअवसर प्राप्त ही नहीं हुआ,और लगता है कि होगा ही नहीं| अढ़सठ साल की उम्र में रिटार्यर्ड आदमी को कौन खिलायेगा| खैर ये खाने वाले इतने बेशर्म हैं कि इनके कानों पे जूं भी नहीं रें‍गती| लाख चिल्लाओ ये तो खा पीकर मस्त पड़े रहते हैं| कहीं दूध पीकर दंड पेलते नज़र आते हैं तो दारू पीकर मुरगा सूंत रहे होते हैं| कहीं धोके से पकड़े गये तो जमानत नाम की राहत तो मिल ही जाती है| कुछ दिन कोर्ट कचहरी होता है फिर मूंछों पर ताव देकर बाइज्जत बरी हो जाते हैं| किसकी माँ ने दूध पिलाया है कि इन खरबपति डकारुओं का बाल बांका कर सके| हमारे भारतीय संविधान में भी तो इन बड़े डाकुओं को बचाने का पूरा पूरा तरीका बताया गया है| हां गरीबों को जरूर बहुत सी दफाएं सजा देने के लिये बनी हैं| जो जुर्म करेगा उसे सजा मिलेगी ही| जिसका कोई माई बाप नहीं है जिसके पास पैसे नहीं हैं, उसे सजा देना हमारी व्यवस्थाओं का दायित्व है| इसमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने जुर्म ही न किया हो| हां बड़े लोग जो अरबों खरबों रुपये खाते हैं उन्हें बचाने के लिये आयोग बिठाए जाते हैं|आयोगों की यह भरसक कोशिश रहती है की किसी तरह नाज़ों नखरों में पले पुसे ये लोग छूट जायें| कहीं कहीं तो आयोग मुजरिमों को छोड़ने की प्रक्रिया में बीसों साल पदमासन मारे बैठे रहते हैं| इतने साल में या तो मुजरिम बाइज्जत मर जाता है या सबूत ही गायब हो जाते हैं| कभी कभी कोई कड़क और सिरफिरा आयोग जुर्म सिद्ध करने की ठान लेता है तो उसके ऊपर एक आयोग और बिठा दिया जाता है| आखिर कैसे भी हो छूटे तो|

वह आयोग जब तक बैठा रहता है जब तक मुजरिम बेदाग बरी न हो जाये| कहीं-कहीं छोटे कोरट बड़ों को सजा देने की हिमाकत कर बैठते हैं, किंतु हमारा प्रजा तंत्र इतना पुखता है की इन बदमाशों को बचाने के लिये हाई कोरट और सुप्रीम कोरट बना दिये हैं| ये बेचारे सब पतियों के पति कैसे भी तो छूटें| सरकार जी भी इनपर इतने मेहरवान रहते हैं कि मामला इतना लचर और ढीला बनाती हैं कि कोरट इन्हें बाइज्जत भगा देते हैं।आखिर इनकी समाज में इज्जत है कि नहीं| फिर सोने का अंडा देती मुरगी को कौन हलाल करना चाहेगा| मिलजुल कर खाने के यही तो फायदे हैं| पकड़े गये तो हम बने तुम बने एक दूजे के लिये| कोई बीस अरब रुपये अकेले थोड़े ही खा सकता है| खाने के इस  महाभियान में समाजवाद, धर्मनिर्पेक्षता, एकता में अनेकता और अनेकता में एकता के दिव्य दर्शन‌ होते हैं| हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई खाने में सब भाई भाई । यदि कहीं पकड़े जाते तो एक दूजे पर जान लुटाई|

बीसवीं सदी के मध्य तक तो सोना चांदी और  माल असबाब को धरती में गाड़ देने की परंपरा थी| हमारे दादाजी को हमने धरती में माल दफनाते और निकालते देखा है| परंतु इसमें लोचा ये था कि कहीं किसी को भनक पड़ गई तो वह सारा माल खोदकर ले उड़ता था|धनी धोरी बेचारा हाथ मलता रह जाता था| इस मुसीबत का तोड़ विदेशी बैंकों ने निकाल दिया| जितना चाहो धर आओ वहां| स्विस बैंकों में तो मजे ही मजे हैं जितने चाहे बच्चे पैदा करो, कोई भी बाप का नाम नहीं पूछता। हां कोख का किराया देते जाओ|बस भाईजी क्या कहने हैं इसी भरोसे तो इन बैकों में अरबों खरबों रुपये जमा हो गये| हमारे भरतवंश के व्यवस्थापक गण भी हमारे जांबाज धुरंधरों की सहायता करते रहते हैं, कि भैया माल रखो हम तुम्हारे साथ हैं| हमने एक दिन इन व्यवस्थापकजी से पूछने की जुर्रत की ‘सरजी ये जो विदेशी बैंकों मे इंडियन माल भरा पड़ा है, वह काहे नहीं बुला लेते हमारे देश की भुखमरी दूर हो जायेगी’ वह कहने लगे ‘,ऐसे कैसे बुला लें यह बेईमानी की मेहनत का पैसा है फिर ये बेईमान हमारे ही देश के तो हैं कोई गैर नहीं। इत्ती बात के लिये विदेशों से क्यों संबंध खराब करें|’ सरजी आगे बोले ‘आतंकवादियों के लिये भी हमने यही कहा था कि जो निर्दोष मर रहे हैं वे इसी देश के हैं और आ‍तंकवादी भी इसी देश के हैं तो फिर क्यों किसी को सजा दी जाये| लोग इतनी सी बात नहीं समझते, फालतू हो हल्ला करते रहते हैं|’

बात तो सोलह आने सच है कि जब मरने वाले और मारने वाले इसी देश के हैं तो क्यों  किसी को सजा दें| यह तो मरने वालों की सरासर मिस्टेक लगती है, क्यों मरने के लिये यहां पैदा हुये? बिना पूंछतांछ के हिंदुस्तान में पैदा हो गये बेबकूफ कहीं के| डाकुओं चोरों और लूटेरों पर भी यही फलसफा लागू होता है|अपने अपनों को ही लूट रहे हैं,अपने अपनों को ही मार रहे हैं- ऐसे में सजा देने का कोई मतलब भी तो नहीं होता| पुख्ता प्रजातंत्र में सजा देने भी नहीं चाहिये|

आजकल एक नया फिनामिना देखने को मिल रहा है कि जब बदमाशों, चोरों को मिडिया के सामने लाया जाता है तो वे खुशी से हँसते हुये अपना चेहरा पब्लिक को दिखाते हैं| पहले तो शरम के मारे ऐसे लोग मुँह छुपा लेते थे| मुझे लगता ऐसे कृत्यों को घटिया नहीं माना जाता| राजनीति की आधुनिक परिभाषा मे ऐसे लोग बोल्ड की श्रेणी में आते हैं|वे इन कृत्यों को अपने आपको महापुरुष बनाने की ओर अग्रसर पहला कदम मानते हैं और आशा करते हैं कि टी वी पर उनको मुस्कराता हँसता देखकर कोई राजनैतिक पार्टी अवश्य ही उनके पास बुलौआ लेकर आयेगी कि भाई साहिब सांसदी या विधायकी की टिकिट ले लो और हमारा उद्धार करो| बात तो सच भी है बड़े घुटाले करने से इज्जत अपने आप बढ़ जाती है| अंग्रेजी में इसे मार्कॆट वेल्यू कहते हैं|अब जिसकी मार्केट वेल्यू बढ़ गई उसके तो पौ बारह हैं| सब उसको हाथों हाथ लेने लगते हैं,केमरा वाले पीछे पड़ जाते हैं,अखवार में पहले पेज पर नाम छपता है और पुलिसवाले सलाम ठोकने लगते हैं| कभी रिमांड पर मौका आये तो थाने बहुत खातिरदारी करते हैं|वे जानते हैं कि यह आदमी मंत्री बनने लायक हो रहा है|जनता भी सोचने लगती है कि जेल से छूटने पर ये चुनाव लड़ेगा और जीतेगा भी|इसी को वोट दे देंगे|पूत के पावं पालने में दिख जाते हैं|अब तो यह लगता है जो जितना ज्यादा खाता है वह उतना ही महान होता जाता है|आजकल हवा की तर‍गों में बहुत फायदे हैं,तरंगे बेचो और मालामाल हो जाओ|कमवखत ये तरंगे दिखती भी तो नहीं हैं,तभी तो लोग अरबों खा गये और पता भी नहीं लगा|इलेक्ट्रानिक मीडिया तरंगो वाला है सो पकड़ लिया|एबियों ,चोट्टों और मक्कारों की ही आजकल जय जय कार हो रही है|सच्चों को कोई नहीं पूँछता|बैठे हैं एक कोने में|तुलसी बाबा पहले ही कह गये हैं कि “जो कह झूठ मस्करी नाना| कलयुग सोई गुणवंत बखाना”|  हंस कूड़ा कचरा खा रहे हैं और कौये मोतियों पर हाथ साफ कर रहे हैं|रामचंद्र कह गये सिया से ऐसा कलियुग आयेगा हंस चुगेगा दाना चुनकर कौआ मोती खायेगा|आज सब आदमी पैसे के लिये पागल हैं| जिसको जहां मिल रहा है वहीं मार रहा है।

यमराज यदि मरने के बाद संपत्ति  साथ ले जाने की परमीशन दे दें तो आसमान में गठरिओं के ढेर लग जायें|खरबपतियों की आत्मायें तो स्विस बैंकों से अपनी तिजोड़ियां ही  उखाड़ लायें|परंतु यमराज इजाजत ही नहीं दे रहे हैं| इन बेचारों को स्विस बैंकों में ही डालर छोड़कर मरना पड़ेगा|रामदेवजी कहते हैं कि यदि विदेशों में रखा धन यदि देश मेँ आ जाये तो देश की सारी गरीबी दूर हो जायेगी और हमारे देश के हर आदमी को एक लाख रुपया मिल जायेगा|समाचार वाकई रोचक है| हमारे घर में आठ लोग बड़े और पांच बच्चे हैं|बच्चों का हाफ टिकिट माने तो साढ़े दस लाख तो ….|मगर भईया ये पैसे आते कैसे हैं|रामदेव बाबा की तो पिटाई कर दी|धुरंधरों के पैसे इतनी सरलता से नहीं आयेंगे|हमारी अम्मा हमसे एक ही बात कहतीं थी कि बेटा पैसा हाथ का मैल है आता जाता रहता है किंतु स्वास्थ और चरित्र बचाना जरूरी है|इसलिये कहा गया है कि जिसने धन खोया उसने कुछ नही खोया जिसने स्वास्थ खोया उसने कुछ खोया और जिसने चरित्र खोया उसने सब खो दिया|परंतु अब तो यह कहावत आउट आफ डेट लगती है|क्योंकि जिसके पास पैसा है उसके सारे गुनाह माफ हो जाते हैं|चरितर वरितर को कौन पूँछता हैं|अब यह कहावत हो जायेगी कि जिसने पैसे खोये उसने सब खोया,चरित्र और स्वास्थ अपने हाथ में है|पैसा हो तो खरीद लो|पैसे वाले भगवान के समान पूजे जाते हैं । उनकी जय जय कार हो रही है। कितने घुटाले कितने हवाले कितनी बेईमानी कितनी धोखेबाज़ी ये जैसे खुद ही ब्रह्मा विष्णु महेश बनकर लीलायें कर रहे हैं ये पवन देव हैं, ये सूर्य देव हैं ,ये इंद्र देव हैं….. हरि अनंत हरि कथा अनंता|