नमन मेरे देशः शैल अग्रवाल/ लेखनी-सितंबर-अक्तूबर17

फिर हमने जनगणमन गाया

समझा वही जो गया समझाया

पर बन्द दरवाजों के पीछे
बनी योजनाओं के सही ब्योरे का
कुछ अनुमान है
कितने निर्दोष सरहदों पर कुर्बान हुए
खबर है क्या हमें

कितना चंदा उघा

कितना सही जगह पहुंचा

कितना नेताजी के घर पहुंचा

उठो और ऐसे किरकते सवाल पूछो

आम आदमी इस लायक ही कब पर
जो शामिल हो सके देशहित के निर्णय में
मन की बात तो हरेक के मन में रहती
पर सुनने वाला कौन
माइक और प्रसारण सब उनके
जिनके सारे तंत्र और यंत्र
जागो जब तक वक्त है

सुनो, समझो और देखो
कबतक दरकिनार होते रहोगे तुम
मेरे देश वासी, देश प्रेमी!

उम्मीद जगी थी, एक आस लगी थी
युवाओं का प्रतिनिधि है मेरा देश

युवा जो फुर्तीले, युवा जो प्रखर
पर तंत्र तो वही स्वार्थ और लालच का
षडयंत्र भी उन्ही घाघ और गुर्गों का

देश हो या विदेश आज भी
वही नियंत्रक, वही सलाहकार
तुम मेरी पीठ खुजाओ और मैं तुम्हारी
कटोरा लेकर भरे पेट भीख मांगो
कैसे बर्दाश्त हो यह स्वार्थी शिक्षा
यह गुटबाजी

आज अगर होते वे अमर सेनानी
जिन्होंने सारे स्वार्थ और लालच को भूल
रंगा था बसंती चोला, माथे पर कफन बांध

दी थी हमें आजादी
क्या खुश होते वे
देश का यह स्वस्थापना अभियान देखकर
लेन देन का खुला व्यापार देखकर
अमीर फलते और गरीब नित मरते
फुटपाथों पर अस्पतालों में, खेत खलिहानों में
खुले आम इज्जत लुटती ललनाओं की उम्र आठ की या अस्सी की

क्या नोच ना लेते वे ये सारे झूटे मुखौटे
यदि जिम्मेदारी समझने और निभाने का वक्त अभी नही तो कब?
हर हर महादेव और वन्दे मातरम् के गगन भेदी नारों से
गुंजा दो गगन

हर आंगन में कैसे आएगी खुशियाली
मिलजुलकर सोचो, आगे बढ़ो

आवाहन है हर देशप्रेमी का अपनी लड़ाई खुद लड़ना सीखो
देश हमारा हम देश के, सही बात है,

पर सब अपने ही हों, यह भी तो जरूरी नहीं

सब सही हों, यह भी तो जरूरी नहीं
जयचंद भी छुपे होंगे यहीं कई…
यूँ टीवी के आगे बैठे सच्ची झूठी खबरें सुनते, नारे लगाते, मिठाई खाते
आजादी का उत्सव कैसा और कबतक,

कोरी हैं बातें सारी
नंगी उघड़ी है आज भी देखो सत्तर साल बूढ़ी आजादी

लूट रहे जिसे मिलजुलकरसाधु नेता और अपराधी…

निर्बल के संग कौन गुसाई

सूना बिस्तर
सूने घर आंगन
लौटे ना कान्हा

रीती है गोद
देवकी यशोदा की
रीती उम्मीदें

कान्हा जन्मेगा
मां की कोख से नहीं
खीरा चीर के

बिना बांसुरी
रण भेरी बजाता
अब आएगा

फीकी फीकी है

यह जन्माष्टमी
आंसू भीगी है

रंभाती माएँ
दुलारें सहलाएँ
मुड़ मुड़ के

ठीक था कल

हंसता किलकता
जागे ना अब

पैसे बहुत
देश के खजाने में
पर बेकार

झुंड के झुंड
विदेश यात्रा पर
किसी बहाने

पर सूना है
गरीबों का आंगन
भूखा औ नंगा

सौ हैं सोए
चालीस का बिस्तर

अस्पताल है

मुफ्त इलाज

होटल नहीं कोई

काम चलाओ

बदनामी ना                                                                                                                                                                                                                                               आगे बढ़ता देश
निर्माण करो

देश अपना
रखवाला कौन है                                                                                                                                                                                                                                              आगे बढ़े जो

बात बनेगी
बुलेट ट्रेन नहीं
सुखशांति हो