कविता आज और अभीः लेखनी-सितंबर-अक्तूबर 17

दुनिया से लेते समय

हमने प्रार्थना की
कि हम निरोग रहें
हमने प्रार्थना की
कि हमारा वंश गोत्र
बढ़ता रहे धरती पर
और हम सुखी रहें,

हमने कभी धरती के लिए
प्रार्थना नहीं की कि
धरती बनी रहे हरीभरी
न प्रार्थना की कि
नदियों में बना रहे जल,

पक्षियों के लिए भी हमने
प्रार्थना नहीं की कि
वे बने रहें हमेशा धरती पर
गुँजाते रहें अपनी बोलीबानी का गीतसंगीत

हमेशा हमें अपनी आयु बढ़ने
और धरती पर
बने रहनें की चिन्ता रही
सो हमने चीज़ें जुटाने की चिन्ता में
हमने जीवन की चिन्ता नहीं की कि
चीज़ों से कितना
दबता जा रहा है उसका गला,

इसी तरह हमने अपनी
ज़िन्दगी सँवारने की चिन्ता में
हमने कभी सोचा नहीं कि
हमारे विचार कितने मर चुके हैं
अपने सपनों की ही चिन्ता करते हुए
हमने शब्दों में विश्वास के बने रहने की
चिन्ता नहीं की कि
उनमें भी वह बना रहे
ताकि आवाज़ लगाने पर
वे आ खडे़ हों,

समय से अपने लिए
कभी लेते हुए समय
हमनें पीछे मुड़ कर नहीं देखा कि
दूसरे भी खड़े हैं हमारे पीछे,

न भन्ते का यह कहना सुना की
कि अकेले का सुख
जितना हल्का होता है
अकेले का दुख होता है
उतना ही भारी।

-नरेन्द्र पुण्डरीक

इच्छा

अंतिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ

एक वृक्ष जाएगा

अपनी गौरेयोंगिलहरियों से बिछुड़कर

साथ जाएगा एक वृक्ष

अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझसे पहले                   

कितनी लकड़ी लगेगी

श्मशान की टाल वाला पूछेगा

ग़रीब से ग़रीब भी सात मन तो लेता ही है।

लिखता हूँ अंतिम इच्छाओं में

कि बिजली के दाहघर में हो मेरा संस्कार

ताकि मेरे बाद

एक बेटे और बेटी के साथ

एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में।

नरेश सक्सेना

कलकल

बहती हूँ नितनित

नदीसी ही

पर नदी नहीं हूँ मैं

काश्

जीवन देती

वीराने में फूल खिलाती

नदी हो पाती मैं

अचल खड़ी रह जाती हूँ अक्सर

जड़  पर्वतसी

अपने ही खयालों में डूबी

झर जाती हूँ परागसी

एक ही उपहास की फूंक से

तेजाब , कांचके टुकड़े और लोहे की छड़

जाने क्या क्या डालकर

मेरी शुचिता को भंग करने वालों

तुमसे ही तो डर कर शायद

मांओं ने तजा है अजन्मी बेटियों को

दम तोड़तीं जो इधरउधर

कूड़ों के ढेर पड़ी।

याद रखो, मात्र रमणी नहीं, जननी हूँ मैं

सुन्दर कोमल और शाश्वत जो प्रकृति में

उस सबकी शाश्वत धरणी हूँ मैं

खुश हूँ कि गंगा जमुना को

जीवित इन्सान का हक दे दिया तुमने

हजारों बिलखती बहन बेटियों को भी

काश् यह हक दे पाते तुम

बह रहीं जो, गूंज रहीं जो आज भी कलकल 

नदीनालों सी अनसुनी आसपास ही

मां बहन सखी प्रियतमा ही नहीं

देवी मान मंदिर बनवाना स्वार्थ तुम्हारा

कोई परवाह नहीं।

चलो मान लूँ मैं बस एक जिस्म ही सही

पर इतनी क्रूरता इतनी अभद्रता क्यों

क्या साबित करना चाहते हो तुम

पुरुषत्व, एकक्षत्र आधिपत्य या फिर अपना बहशीपन

पान के गुटके के साथ चबाकर थूक देना मुझे

आसान तो है, पर इतना आसान भी नहीं

मुझसे ही है तुम्हारा अस्तित्व और संसार

मुर्गी से अंडा और अंडों से मुर्गी का व्यापार

गन्दे में गन्दा और कूड़े पर कूड़ा स्वाभाविक है

साफ सुथरे पर थूकने में हिचकिचाता आदमी

स्वच्छता के पुजारी हो तो

सफाई स्वयं से शुरु करो

कैमरे की आंख और प्रचार से परे

जो हजारों की सिसकियों को न सुन पाया

वह तुम्हारा समाज और कानून

रक्षा क्या करेगा मेरी

बेजुबान नदी का विलाप तो वैसे भी

उसके अपने ही कलकल में डूब जाता है….

  -शैल अग्रवाल

 

एक शहीद दहशतगर्द की चाह

मुझे नहीं चाहिये मय का दरिया
और नहीं चाहिये सत्तर हूरें
तुम बस उस शिशु से मिलवा दो
जिसकी आंखें हैं आज भी घूरें

मैं जब इक नन्हा सा बालक था
दांत तक नहीं निकल पाये थे पूरे
कठमुल्ला ने तब उल्लू बनाया
और कहा- जन्नत जाना है छोरे?

मय के दरिया का देकर लालच
दिखाये थे सब्ज़बाग हूरों के
बहक गया मैं कच्ची उमर में
हाथ थाम ली फ़ोर्टीसेविन ए. के.

काफ़िरों को मैंने चुन-चुन मारा
और कुछ ईमां वाले भी थे भूने
रहम करना किसी पर गुनाह था
जहां में ईमां लाने की जिहाद में

खड़ा हुआ था ग़ुस्से में एक दिन
इक नन्हें शिशु पर राइफ़िल ताने
भौचक्का वह मुझे देख रहा था
बहुत डरी हुई थीं वे भोली आंखें

कुछ ऐसा था उन मासूम आंखों में
कि रहम घुस रहा था मेरे मन में
तभी अपनी तालीम याद आ गयी
और दाग दिये बुलेट सब सीने में

तब से मेरे ख़ुद गोली खाने तक
वे आंखें नहीं हैं मेरा पीछा छोड़ें
मासूम आंखों में छाया गहरा डर
हरदम इक सवाल है मुझसे पूछे

“मैं भी औलाद उस परवरदिगार की
जिसे तुम और तुम्हारा मुल्ला पूजे
क्या सचमुच खुश होगा ऊपर वाला
देख मेरे ख़ूं से तेरे ये हाथ रंगे से?”

मुझे नहीं चाहिये मय का दरिया,
और नहीं चाहिये सत्तर हूरें
तुम बस उस शिशु से मिलवा दो,
जिसकी आंखें हैं आज भी घूरें

महेश चन्द्र द्विवेदी

 

आसमान आज भी नीला है 

न समय बदला

न सूर्य ही बदला

न बदले चाँद-तारे

बदला सिर्फ मनुष्य

उसका पेंच ढीला है

आसमान आज भी नीला है

नूतन पुरातन हो चला

सोचता अपना भला

नस्ल का अपने दुश्मन

अक्ल का अपने दुश्मन

अपनों से रण में मिला है

आसमान आज भी नीला है

हारता-जीतता अपनों से

उम्मीद रखता सपनो से

बिन पंख परवाज़ भरे

सबको मारे खुद मरे

बस अपनों को लीला है

आसमान आज भी नीला है ।

दिनेश चंद्र , मुग़लसराय

 

 

मैंने अपनी बाल्कनी के गमले में

मैंने अपनी बाल्कनी के गमले में

वयस्क आँखें बो दीं वहाँ कोई फूल नहीं निकला

किंतु मेरे घर की सारी निजता भंग हो गई

मैंने अपनी बाल्कनी के गमले में

वयस्क हाथ बो दिए

वहाँ कोई फूल नहीं निकला

किंतु मेरे घर के सारे सामान चोरी होने लगे

मैंने अपनी बाल्कनी के गमले में वयस्क जीभ बो दी

वहाँ कोई फूल नहीं निकला

किंतु मेरे घर की सारी शांति खो गई

हार कर मैंने अपनी बाल्कनी के गमले में

एक शिशु मन बो दिया

अब वहाँ एक सलोना सूरजमुखी खिला हुआ है

-सुशांत सुप्रिय