चांद परियाँ और तितलीः शैल अग्रवाल/ लेखनी-सितंबर-अक्तूबर 16

owlसुमति की संपति

कहने को तो वह जादूगर बूढ़ा हो चला था पर उसके जादू में गजब का बल था। जाने कब चुपचाप रात का चोंगा पहनकर वह धरती पर उतर आता और अपनी जादू की झड़ी से धरती को छू देता। छूते ही सबकुछ बदल जाता। कभी पानी गिरने लगता तो कभी गरमी से झुलसने लगते लोग। कभी बाढ़ में बहते तो कभी ठंड से ठिठुर कर मर जाते। कपड़ों की तरह उसके मूड बदलते रहते और उसके बदलते मूड के साथ ही पृथ्वी का मौसम भी बदल जाता। मानो एक-सा उसे कभी कुछ भाता ही नहीं था। इसबार भी उसने कुछ ऐसा ही किया, आया और छूभर दिया फिर से धरती को। फिर क्या था झर-झर सारे पत्ते पेड़ों से झर गए और डालियों पर हंसते फूल देखते-देखते ही मुरझा गए। कुछ साहसी जो उसकी खिल्ली उड़ाते डाली पर डंटे रहे, उन्हें भी अगले ही पल पाला मार गया। चारो तरफ बर्फीली हवाएं चलने लगी और हरी भरी धरती ठंड से सिकुड़ कर बिल्कुल बूढ़ी दिखने लगी, एकदम उसी बूढ़े जादूगर की तरह ही। अब तो उसके हो होकर जोर से हंसने की गूंज चारो दिशाओं तक हवा के संग फैल गई। बच्चे डरकर घरों में घुस गए और पशु-पक्षी अपने-अपने दरबे और कोटरों में। सयाना उल्लू जो बरगद की ऊँची डाल पर बैठा सबकुछ देख रहा था बस वही नहीं हिला अपनी जगह से। ना ही डरा ही। सोचने लगा कि कैसे अब जादूगर के इस तिलिस्म को तोड़ा जाए? पर इसके लिए उसे दूसरे सभी जीव जन्तुओं की मदद चाहिए थी, उनका विश्वास चाहिए था। खासकरके गिलहरी, घोंघे और केंचुए आदि का । उसने पेड़ों से विनती की कि वे अपनी जड़ों से कसकर इस धरती को पकड़े रहें। हिम्मत न हारें और बिल्कुल न डरें। इसके जादू में कोई दम नहीं है और अगर उन्होंने धैर्य व समझ से काम लिया तो धरती फिर से अपने पुराने रूप गुण को जरूर वापस पाएगी। पहले की तरह ही फले-फूलेगी और हँसे -खिलखिलाएगी।
उसने आवाज दी आस पास बसे हर प्राणी को- “ट्वीट दुहू, ट्वीट टुहू। मेरे साथ आओ। मिलजुलकर एकजुट हो जाओ।”
शेर, बन्दर, भालू, हाथी, यहाँ तक कि आदमी भी, सब उदास बैठे रहे। किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। विश्वास नहीं किया। पर तभी नन्ही गिलहरी आई और बोली- ” तुम ठीक कहते हो, मित्र उलूक, इस नेक काम में मैं तुम्हारी कैसे और क्या मदद कर सकती हूँ?”
“ओह , गिलहरी तुम सभी फलों की गुठलियों को जमीन में गाड़ दो ताकि वक्त आने पर वे फिरसे फल-फूल सकें।”
उसने देखा छोटे मोटे सभी कीड़े मकोड़े भी कुलमुला रहे थे, कुछ करने को अकुला रहे थे।
” और तुम घोंघे और केंचुए आदि तुम छोटे जीव-जन्तु अवश्य हो पर तुममें अदम्य साहस और बल है , तुम धरती की परतों को गोड़ते रहो तकि वे जमें नहीं और उपजाऊ बनी रहें।” बुद्धिमान उल्लू ने तुरंत ही उनके हिस्से में भी काम बांट दिया।
सब अपने-अपने काम में जुट गए । चिड़िया, तितली और भंवरों ने मौसम के खुलते ही बीज खूब इधर उधर छितराए ताकी कहीं कोई उदास या भूखा न रह पाए। दो तीन महीने का वक्त जरूर कठिन बीता, परन्तु धरती पर फिर से हरियाली आई और चारो तरफ तरह तरह के फल-फूल और अनाज फिरसे चारो तरफ लहलहा उठे। जादूगर अब भी आता है पर अब कोई उससे डरता नहीं ।
आदमी ने भी इस परिवर्तन को देखा, समझा और मौसम से डरना नहीं उसके साथ रहना सीख लिया और तब से आजतक वह इसी समझ की वजह से ही तो इस पृथ्वी पर रह पा रहा है, जिन्दा है।

फिर तो वैभव की देवी लक्ष्मी खुद बुद्धिमान उल्लू को शाबासी देने आईं। यही नहीं, उन्होंने उसे अपना वाहन भी बना लिया और नतीजा यह कि उल्लू को खूब मान-सम्मान मिला। जिसका वह पूरा हकदार भी था। सभी लक्ष्मी के साथ-साथ उल्लू की भी पूजा करने लगे।
बच्चों, बाबा तुलसीदास भी तो हमें यही समझा रहे थे जब उन्होंने लिखा था-जहाँ सुमति तहँ संपति नाना…

पत्ती रानी


बगिया के नाटक में देखी
हमने एक कहानी सुहानी
पानी बरसा,धूप भी निकली
हवा के बैंड पर खूब ही थिरकी
झूम-झूमके फिरकी-सी पत्ती रानी।