कहानी समकालीनः इत्ती-सी बात-शैल अग्रवाल/ सितंबर-अक्तूबर 18


पंडितानी चौके में बैठी अभी भी खुद से ही बातें किए जा रही थी और दाल के अदहन से भी ज्यादा खुद उबल रही थीं- ‘हिन्दी हो या माथे की बिन्दी दोनों का एक ही तो हाल-बेहाल है आज कल। दोनों का ही जमाना ना ही रहा, फिर काहे की हिन्दी अउर कइसी यह माथे की बिन्दी, पर हमरे पडित जी के बात समझ में आए तब न… गांव-गांव तो अंगरेजी सकूल हैं, जाने कबतक यूँ मरी बछिया को छाती से चिपकाए रहेंगे?’

नाश्ते की थाली में ढेर सारा गुड़-चना उडेल दिया पंडितानी ने और छाछ गिलास में भरकर देने ही जा रही थीं कि हाथ खुद-बखुद माथे पर चला गया, टिकुली है भी कि नहीं, सरक तो नहीं गई कहीं, उंगली से छूकर ही जान जाती हैं पंडितानी, और सूने माथे का अपसगुन तो कभी नहीं होने दिया-काजर बिन्दी और बिछुआ यही तो तीन लच्छन हैं सुहागिन के आखिर…

सुबह-सुबह नहा धोकर रोज की तरह ही सीधे बाहर बरांदे की कुरसी पर जा बैठे थे पंडित जी। यही तो है उनकी रोज की दिनचर्या और पूजा-आरती -बच्चों को पढ़ाना, नीति धर्म और जीने का एक सीधा और सच्चा तरीका सिखलाना, बस्स और कुछ नहीं चाहिए उन्हें जिन्दगी से।

पंडितानी देखती और मन-ही-मन खूब कुढ़तीं। ‘ चाहे बचवा लोग आएँ या न आएँ, पेट में अन्न पड़े या न पड़े, पर ये तो वहीं बैठे रहेंगे सांझ देर तक। दिया-बाती तक का होश नहीं। करे तो वही करे वरना बैठे रहें ठाकुर भी उसी की तरह अँधेरे में…बस यही एक लगन और यही एक सपना रह गया है अब तो इनका।‘ कभी-कभी तो गुस्से में उनके मुंहपर ही भाड़ से खिड़की तक बन्द कर देती थी पंडितानी और तब पंडित जी जान जाते कि आज की रात सत्तू खाकर ही सोना है उन्हें।

अक्सर ही पंडित जी खुद पर हंसते-इत्ती-सी बात जब पंडितानी , उनकी जीवन-संगिनी तक को न समझ में आई तो वह किस-किस को कैसे-कैसे और क्या खाक समझा-सिखा पाएंगे ! पर हर शक-सुबहे के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी थी।
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राधेश्याम पंडित हर पल एक नई आस, नई उम्मीद में रहते। बरांदे में चारो तरफ नजर घुमाई तो घीसू चमार और कालू कुरमी के बेटों के साथ-साथ अपने दोनों बेटों को ही चटाई पर पालथी मारे बैठे और इंतजार करते देखा उन्होंने- जो अब ‘जाने कब गुरुजी आएँगे और कब पाठ शुरु करेंगे।‘ कि चिंता में थोड़े-थोड़े उद्विग्न दिख रहे थे। राधा, गौरी, तस्मीना और कुलबंत, चारो लड़कियों को लगता है फिर घर पर ही रोक लिया गया था। सारा चूल्हा -चौका निपटाकर ही आ पाएंगी, बेचारी। पर हैं बड़ी होनहार और मेधावी। वक्त और किस्मत ने साथ दिया तो बहुत आगे जाएंगी चारो- जानते थे वह।

‘यही हाल है और यही रहेगा इस देश का। प्रतिभा वह भी कन्या में , कोई कद्र और कीमत नहीं। ई बात दूसरी है कि चाहे हिन्दी के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च हो जाएँ , विदेश में प्रचार -प्रसार की बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनें, आयोजन हों, पर यहाँ अपने देश में वही ढाक के तीन पात…हिन्दी और हिन्दी बोलनेवाले दोनों ही फटेहाल और बेरोजगार। छत चूती हैं तो चुए, दीवार गिरती हैं तो गिरे, लोग भूखे प्यासे हैं तो मरें…यही हाल रहा तो ना ही कोई हिन्दी बोलने वाला बचेगा और ना ही इसे सुनने-समझने वाला ही।‘

अब पंडित जी भी खुद से बातें कर रहे थे और वह भी जोर-जोर से ।

सहमे बच्चे कभी एक-दूसरे को देखते, कभी धुली-धुलाई, चमकती और साफ अपनी पट्टी को।

‘अरे जब माई-बाप की नाही सुनते तो हिन्दी की का सुनिहँ! फिर सुनके भी का… कौनो फायदा, का करिहँ? हिन्दी से का पेट भरेला !‘

कभी-कभी तो पंडित और पंडितानी के इस एकल वार्तालाप में बच्चों को सवाल-जवाब की प्रतियोगिता का सा आनंद आ जाता। अक्सर ऐसे ही चलती रहती थी उनकी कक्षा। बीच-बीच में पंडितानी आतीं और पानी का खाली घड़ा भर जातीं। गुड़ चना की झबरी भी रख जातीं कभी-कभी तो घड़े के पास बच्चों के लिए भी।

बेमतलब बड़बड़ाएँ कितना भी. माई जितना ही प्यार है उन्हे भी बच्चों से। मुड़कर नेह से देख तक पाते अपनी अपन्नपूर्णा को, कि आंख-कान सब चौके की छत से परनाले सी चूती धार पर जा अटकी। जाने कबसे पंडितानी एक बाल्टी भरते ही दूसरी लगा दे रही थी तुरंत ही उसके नीचे। खुद भले ही गीली हो जाए, पर मजाल है जो चौका जरा-सा भी कहीं पर गीला हो जाए। साफ -सफाई और बूढ़ी हड्डियों का बहुत ध्यान था पंडितानी को फिर इन मिट्टी के माधो से कुछ न होगा -इसका भी खूब पता था उसे।

‘जरा सी बरसात होते ही चूने लगता है, ससुरा। चल मटकू , थोड़ा पलस्तर बना ले, जबतक और बच्चे आएँ, छत ठीक कर लेते हैं ।‘ वहीं कुर्सी पर से ही बैठे-बैठे हांक लगाई उन्होंने और तब मटकू और गपलू ही नहीं, रामू और रजत भी उठकर खड़े हो गए, राधेश्याम मास्टरजी की मदद के लिए।

मास्टर तो वह कहते थे खुदको और अब सभी गांववाले भी, पर वाकई में अपना एक स्कूल खोल पाएँ इतना पैसा न कभी उनके पास था और ना ही शायद कभी होगा। खासकरके तब जब एक पैसा तक नही लेते वह अपने शिष्यों से।

‘ जब खाने तक को नहीं, अन्याय ही होगा इनसे कुछ भी लेना। कमाने लग जाएँ तो भले ही श्रद्धानुसार कुछ भी दें, या चाहें तो न भी दें, ज्ञान तो है ही बांटने के लिए।‘

बस एक इसी लगन, एक सपने के भरोसे ही तो चल रही थी उनकी गृहस्थी की गाड़ी। और फिर उनके परिवार लायक पुश्तैनी खेत-खलिहानों से आ ही जाता था। इससे ज्यादा की जरूरत ही नहीं थी गांव के सादा रहन-सहन में, न उन्हें और ना ही उनके परिवार के किसी अन्य सदस्य को।

‘ यह जो वेद-पुरान हैं, हमारे गीता रामायन का ज्ञान हैं -यह जिन्दा रहे बस्स। कहीं उनकी पीढ़ी के साथ ही न चल बसे !’ इसी एक फिक्र के मारे अक्सर ही पूरे परिवार का एक वक्त के खाने से ही गुजारा करवा देते राधेश्याम पंडित पर पिछले पांच साल से उनकी कक्षा लगातार वैसे ही चल रही थी और राधेश्याम पंडित जबतक रहेंगे, ऐसे ही चलती रहेगी-संकल्प ले चुके थे वह मन-ही-मन ।

पर पंडितानी ऐसा नहीं सोचती थी।

‘चलो माना, दो चार सिरफिरे तुम्हारी तरह के, यह सब पढ़ ही लें , तो भी क्या कर लेंगे? क्या उनकी भी वही दुर्दशा नहीं होगी, जो तुम्हारी हो रही है …खाने-पीने तक के लाले पड़ हुए हैं !’

पंडितानी के कर्कश बोल अक्सर बन्दूक की गोली-से दनदनाते हुए उनके कान के ऊपर से निकल जाते पर हृदय या मस्तिष्क को न बेध पाते।

रोज ही- इतनी शक्ति हमें दो दाता मन का विश्वास कभी कम हो ना -प्रार्थना के साथ ही बच्चों के और उनके दिन की एक आस्थाभरी शुरुवात हो जाती और चटाई पर बैठे बच्चों के साथ अगले दिन का पाठ भी- ‘तो हाँ बच्चों, गीता में कृष्ण ने कर्म के बारे में क्या कहा है? ‘

पूछा पंडित जी ने उसदिन और मनचाहा जबाव दिया उन्हें राधा ने, जो अभी-अभी घर का पूरा काम निबटाकर दौड़ती भागती जैसे-तैसे वहाँ पहुँच पाई थी- काम करो, बिना किसी फल की अपेक्षा या लालच के, क्योंकि परिणाम हमारे हाथ में नहीं।’ बिल्कुल सही। कितना खटती है बीमार मां के साथ अकेली यह बारह साल की बच्ची- उन्होंने सहानुभूति और प्रशंसाभरी नजर से राधा की तरफ पुलक कर देखा, मानो मन-ही-मन आशीर्वाद दे रहे हों।

पर तुरंत ही अगला सवाल पूछा तस्मीना ने- ‘ पंडित जी हम तो छोटी जात के लोग हैं, हमें तो यह सब पढ़ना मना है। आपको पाप नहीं लगेगा क्या, अगर आप हमें यह सब वेद-पुराण और गीता रामायण की बातें सिखाओ और पढाओगे?’

‘नहीं। क्योंकि जात जन्म से नहीं, कर्म की ही होती है, बेटी।‘ पंडित जी की आवाज में अब कड़कती बिजलियों की गूंज थी।

क्या गांव वाले भी इस बात को मानेंगे? कल ही चौधरी के बगीचे के हैंडपम्प से जब मैं पानी लेने गई तो मुझे चमरिया कहीं की कहकर भगा दिया गया था। डांटा भी गया था -‘ हिम्मत कैसे पड़ी तेरी यहाँ आने की!’

‘ वक्त बदल गया है, मेरे बच्चों। हमारी जरूरतें बदल गई हैं। हर संस्कृति का एक वक्त होता है और वक्त की अपनी एक संस्कृति। बहुत पीछे रह गए हैं, हम दुनिया में आज इन्ही वजहों से। आज हरेक को सब कुछ जानना, जरूरत पड़े तो अपने हक के लिए लड़ना चाहिए। हर काम सीखना जरूरी है, विशेषतः अब जब परिवार का हर सदस्य काम पर जाता है। घर-घर में, बच्चों बच्चों में फैला दो इत्ती-सी यह बात। जैसे दिए से दिया जल जाता है, बांटना ही है तो ज्ञान की रौशनी बांटो, अपना तजुर्बा बांटो, खुद को यूँ इन जात-पांत में, बेकार की बातों में नहीं।‘

‘ हाँ गुरुजी, धरती और आकाश सा है हमारा और समाज का यह रिश्ता ….चाहे आग बरसाए या पानी, यही छत है और यही बिछौना… हमारा असली संरक्षक। इसके नीचे और इसके साथ रहना सीखना ही होगा हमें। एकबार आदत पड़ जाए तो फिर यहीं पर तारों भरी जगमग रात भी तो है और मुस्कुराता यह चांद भी। ‘

इसबार उन्हें जबाव खुद में डूबी रहने वाली गौरी ने सिर झुकाकर नहीं, वरन् उनकी आंखों में सीधे देखते हुए दिया था। गुरुजी जान गए इन दियों की रौशनी बहुत दूर तक फैलेगी।

‘और यहीं खेत खलिहानों में लहलहाती धरती भी तो है, जो मां की गोद-सी हमें पालती है, हमारी जरूरतें पूरी करती है। मेरा बापू कहता है हमें भी नदियों सा ही बह-बहकर सींचना है इन्हें अपने खून-पसीने से । इत्ता वादा तो मेरा भी है मां की तरह ही सेवा करूँगी मैं भी इनकी।‘

कुलविन्दर के चेहरे पर सुबह के सूरज-सा नया तेज दिख रहा था।

‘आपकी चिन्ता हमारी समझ में आ रही है गुरुजी; जब हमारे तौर तरीके, बोली-भाषा ही नहीं रहेगी, तो हम ही कहाँ बच पाएंगे? बह नहीं जाएंगे इस विश्वीकरण की आंधी में ? हमें ही तो बचाकर रखना है सब…अपना देश, अपनी संस्कृति!’ हमेशा खिलखिल करते गपलू और मटकू तक गंभीर हो चुके थे अब तो।

‘बात बच्चे समझ रहे हैं। सोच बदल रही है तो कल इंकलाब भी आएगा। दुनिया कुछ भी कहे , बदलाब के इस सैलाब को रोक पाना अब किसी के बस की बात नहीं। उजाला कबतक अंधेरे की कैद में रह सकता है, भला?’

आस की पहली किरणें थी यह, हजार वाल्ट के बल्ब की रोशनी लिए, उन सभी की आंखों के आगे ।

पंडितानी ने भी चौके की खिड़की से वह अद्भुत नजारा देखा।

‘नहीं जानती, इत्ती सी बात पहले कैसे समझ में नहीं आई मुझे?’ पंडितानी ने अपनी सदा अधभिड़ी खिड़की पूरी खोल दी इसबार। चौका ही नहीं चेहरा भी भक् रौशनी से भर गया।

‘लो जी चाय पी लो सुबह से भूखे प्यासे ही आ बैठते हो।’ पंडितानी ने चाय के साथ दो रामदाने के लड्डू भी प्यार से पंडितजी के आगे सरका दिए।

‘कितना ख्याल रखती है मेरा भगवान सातो जनम का साथ दे।’

पाठ फिरसे शुरु हो गया था। और इसबार तो पंडितानी भी वहीं बच्चों के साथ ही बैठ गई थीं।

‘कितना खाते हो क्या खाते हो वह जरूरी नहीं, जितना कि मनचाहा मिले।’

बात सभी को पूरी तरह से समझ में आ रही थी। पंडित जी भी पूरी तरह से संतुष्ट थे आज । शिष्य , पत्नी, जीवन सब मन-माफिक, फिर और क्या चाहिए आदमी को…

पंडित जी की वह आसभरी संतुष्ट मुस्कान एक अलौकिक दीप्त आभा लिए हर शिष्य के चेहरे पर ही नहीं, अब तो खुद पंडितानी के चेहरे पर भी थी ।…