दिवाली विशेषः हायकू-रमा द्विवेदी, शैल अग्रवाल

दीपावली’ पर हाइकु

अँधेरी रात
अकेला है जलता
माटी का दिया ।

उजालों में भी
पलते हैं अँधेरे
दीपक तले

रंगोली सजी
हर देहरी द्वार
दीपों के साथ

स्नेह का दीप
खुशियों से भरता
घर -आँगन ।

जिस घर में
नारी का हो सम्मान
लक्ष्मी का वास

लक्ष्मी की पूजा
करता दरिद्र भी
लक्ष्मी न आएं ।

घर – महल
उजास ही उजास
दीवाली रात

झोपड़ी -दीप
जला है रात भर
तम न हटे

कभी न बुझे
आशा का दीप जले
अँधेरे पिए ।

अँधेरी रात
ढिबरी का प्रकाश
जलती रूह ।

उजाले देता
मुफलिसी में जीता
अँधेरे पीता ।

बिकती कला
कौड़ियों के भाव में
मिट्टी के दीये ।

दीये गढ़ता
प्रकाश भरने को
कुम्हार हूँ मैं ।

दिया व बाती
संग -संग जलते
प्रीत निभाते

दीप लघु हूँ
अंधेरो को पीता हूँ
तन्हा जीता हूँ ।

डॉ रमा द्विवेदी

माटी के दिए
उजास वही
ले आएँ फिर फिर
नेह में डूबे


जगमग हैं
घर-आंगन सारे
अपनों साथ

आकाशदीप
बन राह दिखाए
एक विश्वास

जल उठें जो
दिये ये प्यार के
अँधियारी रात।

शैल अग्रवाल