प्रवासः चन्द शब्द चित्र-शैल अग्रवाल- लेखनी-नवंबर-दिसंबर 17

इंतजार

गरीब घर में पला बढ़ा तो क्या , आज सबकुछ है उसके पास, गाड़ी बंगला, अच्छी नौकरी , यार दोस्त… अब बीबी बच्चों को भी जल्दी ही बुला लेगा वह , बस एकबार जरा बीसा मिल जाए…

बड़ा आदमी

बड़ा नाम, बड़ा घर और बड़ा व्यापार है उसका। उसके जैसा चन्दा देने वाला भी कोई नहीं। टैक्स की चोरी और गबन के सिलसिले में जेल रह आया तो क्या, साल भर की ही तो बात थी। किसी को याद तक नहीं रहतीं ये बातें पैसों की खनक के आगे….

समझौता

रोजी भी उसकी है और सरला भी । बिस्तर गरम रहना जरूरी है ठंडे परदेश में और मां-बाप की सेवा करने वाले बेटे के कर्तव्यबोध के अपराध से मुक्त रहना भी। जिन्दगी ठीक से चल रही है; पत्नी सरला देश में रहकर मां बाप के प्रति उसके सारे कर्तव्य निभा रही है और रोजी परदेश में पत्नी के सारे उसके प्रति…

परिवार

प्यार से बस एक शोपीस रख आई थी वह बेटे के घर में और अगले दिन ही बहू ने उठाकर कूड़े में फेंक दिया।
जिस मोहवश बेटे को बगल में बुलाया, जमा पूंजी का बड़ा हिस्सा जीते जी दे दिया उस परिवार का वह हिस्सा नहीं थी…

गलत बात

अगर मोहवश पूछ लेती पोते, पोती से कुछ खाया? तो मां शेरनी सी गुर्राती- हाँ मैं तो भूखा रखती हूं ना, यही तो खिलाती-पिलाती हैं इन्हे। सहमे बच्चे आते और कतराकर बिना बात किए ही बगल से गुजर जाते, ना ही हाथ से कुछ खाते और ना ही बात ही करते इस भय में कि मां नाराज न हो जाए। वह भी सहमी रहती फिर कोई गलत बात न पूछ बैठे…

अपने पराए

वृद्धाश्रम में बूढ़ी हड़्डियों को बिना चौके में खटे खाने-पीने को मिल जाता है, बातचीत करने को भी हैं कुछ संगी साथी। तीज त्योहार पर कभी-कभी घर के नाम पर बेटा मां को वापस लाता है तो बहुत तकलीफ पाती है वह भी और घरवाले भी, क्योंकि कमरा अब उसका कमरा नहीं, पूरे घर का स्टोर रूम है…

पश्चाताप

इज्जत का फलूदा न हो इसलिए एक नरक में जीते हैं वे । अक्सर ही वह सोचता जरूर है कि बच्चों को तो उनके ही मन का ही जीवन साथी चुनने देगा…