तेवरियाँः शैल अग्रवाल/ लेखनी-नवंबर दिसंबर 17

1.

शब्दों की नाव में बैठकर
चला आता है वो अक्सर
पद चिन्ह छोड़ जाता है।

दपदप लिबास सा चेहरा
तह में मगर गहन अंधेरा
रस्ता दूजा न नजर आता है

लौट गई हैं रेतीली लहरें
किनारे तक आ-आ आकर
इस बेबसी से कौन बच पाता है

चेहरा वो खो नहीं सकता भीड़ में
जैसे समंदर में डूब जाता नित सूरज
समंदर से फिर निकल आता है

जहाज ही था अकेला वो एक
भटकता रहा जो लहरों पर
थका पक्षी जहाँ लौट आता है

रौशनी कम ही सही मगर
हिम्मत बहुत है इस जुगनू में
अंधेरे को जो जगमगाता है

2.

किसी को गुलाब कहता रहा उम्रभर
किसी और के जूड़े में इन्हें रहा टांकता
प्यार भी शायद एक शगल ही जिन्दगी का

गुलाब कहा जब तो गुलाब ठठाकर हंसा
दूर ही रहना इस खूबसूरत झांसे में
प्यार करने वालों को कांटों की दुआ नहीं देते

थे वहाँ और थे भी नहीं
अजब इत्तफाक ही था वो कि यूँ मिले
फिर फिर भूल जाने को …

प्यार बुत परस्ती नहीं, जोर जबर्दस्ती भी नहीं
खुदको मिटाकर पर राधा कान्हामय हो जाए
सब के बस की बात भी तो नहीं…

3)

अपनों की भीड़ थी
और चेहरों पर चेहरे थे…
भरम कितने पाले जिन्दगी ने

मशाल हाथ में लेकर
तकते रहे अंधों की भीड़ को
इधर उधर भटके

कोरी बातें थीं सारी
जिनको हम अपना कहते
वो ही रहे दूरदूर छिटके

भरम कितने पाले जिन्दगी ने

लिबास ही नहीं
सीरत भी बदल कर आ
हंस कर कहा तब आइने ने

बातों की चासनी थी
जी भरकर जिसमें तले-छने
डूबे ही रहे कभी ना उबरे

भरम कितने पाले जिन्दगी ने

धूल चेहरे पर थी
पोंछते रहे आइना उम्र भर
आंसुओं से हम धो-धो के

भरम कितने पाले जिन्दगी ने