कहानी समकालीनः मन की आंखें- नमो नारायणी/ लेखनी-नवंबर-दिसंबर 17


जिंदगी अनुभवों से भरी रंगीन किताब ही तो है- कुछ खट्टे, कुछ मीठे, कुछ सबक की तरह और कुछ जीवन को नया मोड़ देने वाले अनुभव। उनमें से एक बच्चा है- बाताश! जैसे- हिंदी में पवन होता है न!

पति की नौकरी के तबादले कहीं टिकने ही नहीं देते थे और नए माहौल में ढलने के साथ-साथ आसपास के स्कूल में नौकरी भी ढूंढ़नी पड़ती, क्योंकि स्कूल जाये बिना मेरा मन नहीं लगता था- चाहे छुटपन में पढ़ने जाना हो, चाहे अब पढ़ाने। जहाँ जाती शिक्षिका की आवश्यकता मेरा इन्तजार कर रही होती।
पति को नागालैंड, दीमापुर ट्रांसफर मिलते ही लगा, शायद अब मैं नहीं पढ़ा सकूंगी क्योंकि वह जगह हमारे लिए न सिर्फ नई थी, बल्कि कई भ्रांतियां भी सुनने को मिल रही थीं। असम बहुत बुरे दौर से गुजर रहा रहा था। बोडो आन्दोलन का असर दीमापुर में भी था। भारत के अन्य प्रांतों से आए लोगों को जिन्हें नागा लोग ‘प्लेन मानु’ कहते, उनके बारे में कोई अच्छी राय नहीं रखते और स्कूल में सिर्फ दक्षिण भारतीय इसाइयों को पढ़ाने के लिए चुना जाता है आदि आदि। स्टाफ़ ने हमारे लिए तीसरी मंजिल पर मकान भी ढूंढ़ रखा था, लेकिन रात-बिरात आते भूकम्पों से परेशान हो गए। ऐसे में एक पड़ोसन ने सुन्दर सा मकान दिखाकर सूचना दी कि यह डीएफओ साहब के बंगले का आउट हाउस है। वह सिर्फ एक टीचर को ही किराये पर देंगे। अगर आप नौकरी ढूंढ़ लें तो काम बन सकता है।
दो-चार स्कूलों के पते के साथ नौकरी ढूंढ़नी शुरू की और एक मिशनरी स्कूल में हिंदी टीचर की जगह खाली मिल गई। मिशनरी स्कूल सुबह से दोपहर तक सामान्य बच्चों के लिए चलता और दोपहर बाद ग़रीब बच्चों को पढा़या जाता था। उन बच्चों को पढ़ाने लोग स्वेच्छा से आते थे। आवश्यक सामग्री भी मिशनरी और लोगों की चैरिटी से जुटाई जाती। सिस्टर्स के ग्रुप्स न सिर्फ पढ़ाते, बल्कि गरीब, कमजोर तबकों से आये बच्चों का एक हॉस्टल भी चलाते, जिनमें उन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई काम-धंधे भी सिखाये जाते। देखा-देखी मैं भी चल रहे प्रयासों में हाथ बंटाती या कहूं मुझे ऐसी सेवा देने में अजीब-सा सुकून मिलने लगा था।
हम छुट्टियों में अन्य संस्थाओं द्वारा किये जा रहे कामों को देखते, कहीं लूम पर बुनाई होती तो कहीं कपड़े सिले जाते और उससे हुए लाभ से संस्थाओं के बच्चों का भरण पोषण होता। उनमें कई बच्चे मंदबुद्धि, हाथ-पैरों से लाचार, लेकिन अपनी दिनचर्या कर सकने लायक होते। फिर भी सामान्य से कमजोर ही रह जाते, ज्यादा दिक्कत अंधे बच्चों के साथ होती। उनका दीमापुर में कोई अलग से विद्यालय न होने की वजह से ख़ास ट्रेनिंग नहीं दी जा पा रही थी और वे सिर्फ गिरिजाघरों में गाये जाने वाले कोरस सीखते या कोई वाद्ययंत्र सीखते।
मैं प्रभु के बनाये संसार के हर अणु की प्रशंसक हूं। माँ कहती- कभी किसी की कमजोरियों पर मत हँसों क्योंकि यह उस व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस महाप्रभु की कृति का अपमान होगा जिसने उसे बनाया।
कभी सोचती- अगर मेरी एक टांग न रही तो? लंगडा के चलती… कभी चीजें टटोलती, गिर-गिर पड़ती और घरवाले समझ जाते कि आज मेरे नयन छुट्टी पर हैं। कभी बहरी और कभी गूंगी…
मुझे गूंगा होना सबसे ज्यादा भाया और आज तक इस्तेमाल में लाती हूं- न जाने कितनी खरीददारी में होने वाली झक-झक, झगडे़ टालना, समय को उसका हिसाब करने देना जैसे बड़े प्रोजेक्ट, गूंगे रह कर पूरे किये। दीमापुर सब्जी मंडी में सब्जीवाले मुझे कई महीने तक गूंगा समझ कर इशारों से मोलभाव समझा देते और मैं शांति से काम चला लेती, क्योंकि भाषा आती नहीं थी और कहीं सुना था कि नहीं बोलने से एनर्जी भी बचती है।
जाड़े के दिनों में स्कूल सबसे ज्यादा कार्यशालाएं आयोजित करता। बच्चों में स्फूर्ति भी रहती और बड़े-बड़े मैदानों का उपयोग होकर शारीरिक वर्जिश भी होती। एक दिन कोहिमा की एक संस्था जो अंधे और बहरे बच्चों के लिए काम करती थी, से आग्रह आया कि वह एक पखवाडे़ के लिए इच्छुक टीचर्स को आमंत्रित करते हैं ताकि वे इस संस्था में आकर अपनी सेवाएं दें- क्राफ्ट, डांस, मार्शल आर्ट या सिलाई-कढ़ाई ताकि बच्चों को कुछ नया सिखाया जा सके। सच कहूं तो ये मौके टीचर्स को बहुत कुछ सिखा जाते हैं और कोहिमा घूमने का आकर्षण भी था।
मदर ने हम पांच लोगों को भेजने का निर्णय लिया और काम भी निर्धारित किए। किसी भी तरह के शारीरिक कमजोर बच्चों की संस्थाओं में सामान्य बच्चों से कुछ अलग कई काम होते हैं। इसलिए क्राफ्ट या कुछ भी सिखाने के लिए भी अलग तरीके अपनाने पड़ते हैं और ये हम सब के लिए एक चुनौती भी था। लेकिन बच्चों का मनोरंजन एक ऐसा काम था, जिसके लिए एक बचकाने व्यक्तित्व का होना जरूरी था, जो उन बच्चों में घुल मिल सके। नई-नई कहानियां बना सके और पूरे फील या आवाजों से उसे और मनोरंजक बना सके क्योंकि वहाँ उपलब्ध हर किताब की कहानियां, कवितायें बच्चे सुन-सुन कर ऊब चुके थे। जैसे ही कोई रटी रटाई कहानी या कविता शुरू करता वे शोर मचा देते…ये नहीं..ये नहीं…।
मुझे अपनी बेटी को बहलाने के लिए दिन में दो-चार कहानियां तो गढ़नी ही पड़ती थीं और इस काम से मानो मेरी कल्पनाशीलता को एक दिशा और उद्देश्य मिल गया था। चलते-फिरते बस कहानियां याद करने की कोशिश करती, कुछ अंग्रेजी में, कुछ हिंदी में, लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि कहानियां समझने में भाषा कभी बाधा नहीं बनी। मैं बड़ों की कहानियों को छुटका बनाती…उसमें बचकाने भाव भरती और अपनी आवाज में बदलाव और मुरकियों के साथ उन्हें सुनाती, तो वहां उपस्थित करीब पचास बच्चे सांस भी बिना आवाज के ले रहे होते कि कहीं कुछ छूट न जाए…कोई मुझे देख नहीं पाता था तो मैं भी शर्म से परे आराम से उन्हें प्रसन्न होता देखती।
एक दिन कक्षा में घुसते ही एक किलकारी सी आवाज आई… शशि दीदी!
मैंने सोचा- शायद कोई नार्मल बच्चा भी इनके बीच है, जो मुझे देखता और पहचानता है और बात आई गई हो गई।
मैंने कुछ खेल भी विकसित कर लिए थे। इसलिए उन्हें खेलने के दौरान पाया कि इनमें से किसी को कुछ भी दिखाई नहीं देता, तो आखिर मुझे पहचाना किसने? और कैसे ? अगले दिन क्लास के दरवाजे पर पहुंचते ही फिर वही आवाज आई, लेकिन आज मैं चैतन्य थी। पाया कि एक किशोर, दुबला और अति आकर्षक बच्चा ऊपर की तरफ देखते हुए मेरा नाम ले रहा है। मैं उसके पास पहुंची और पूछा कि उसने मुझे कैसे पहचाना?
‘आपकी खुशबू से।’ बच्चा मुस्कराया। मैं निरुत्तर..हालाँकि ऐसा कुछ ख़ास नहीं था, लेकिन हां, चन्दन की खुशबू लगाई थी। दूसरे दिन फिर पहचान गया, जबकि आज चन्दन नहीं था।
कैसे पहचाना?
आपकी खुशबू से।
तीसरे दिन पावडर त्यागा, चौथे दिन क्रीम और पांचवें दिन सादे पानी से नहाई, लेकिन पहुंचते ही उसकी कुहुक ने मुझे फेल कर दिया।
विज्ञान के पास हजारों तर्क होंगे, विशेषज्ञ भी अपने मत रखेंगे, लेकिन मैंने अपने जीवन में पहली बार यह जाना कि दरवाजे पर कदम रखते ही मुझे पहचानने वाला यह बच्चा अति विशिष्ट है। मैदान में मैं उससे दूर घेरे में बैठती और वह पता नहीं कब आकर मेरी बगल में बैठ जाता और पल्लू को अपनी उंगलियों में लपेट रहा होता। उसने उन तमाम तरह के बच्चों की गंध के बीच मुझे कैसे पहचाना? मैं उठने की सिर्फ सोचती और वह पूछ बैठता- दीदी जा रही हो क्या?
मुझे उससे डर लगने लगा- और भी न जाने मेरे बारे में क्या-क्या जान जाता हो!
पंद्रह दिन बीतने तक यूं लगा कि हम तो हमेशा से साथ हैं- दिन-रात, मेस में, ऑडिटोरियम में, बाग़ में हर समय साथ रहते। साथ ही यह और लगा कि अब तो कार्यशाला खत्म होने वाली है। इन मासूमों को छोड़ कर कैसे जायेंगे?
मैं बच्चों से खुलकर बात करना चाहती थी, लेकिन उससे पहले ही सिस्टर्स ने राय दी कि तुम अचानक अपने घर चली गई हो और कुछ दिन बाद आओगी, कहकर बच्चों को बहला लेंगे। इन्हें जाने की सूचना मत देना, क्योंकि इनका जुड़ाव तुमसे बहुत ज्यादा हो गया है। रोना-धोना करेंगे और तुम्हे भी असुविधा होगी। इसलिए मुझे चुप रहना पडा।
लेकिन वह लाठी टेकता स्टाफ रूम तक आ गया और बिना किसी की सहायता से सीधे मेरी जगह पर आकर बोला, ‘‘आप, कल से नहीं आएँगी ना?’’
मैंने सर पकड़ लिया क्योंकि अगर हंगामा हुआ तो सिस्टर्स मुझे दोष दे सकती थीं।
मुझे चुप पाकर बोला, ‘‘दीदी, आज आपकी आवाज में वह बात नहीं थी। आपने बहुत गलतियाँ भी कीं।’’ बात सच थी क्योंकि मैं अन्दर ही अन्दर उन बच्चों के लिए भावुक थी कि कल से इन्हें कौन कहानी सुनाएगा।
कुछ पल हम दोनों चुप रहे और बहुत साहसी होकर वह बोला, ‘‘अच्छा जब मैं बुलाऊं, तब आओगी क्या एक बार?’’ मैं बोल न सकी और उसका हाथ पकड़ कर थपथपा दिया।
छह महीने बाद मुझे संस्था की तरफ से एक समारोह में बुलाया गया। समारोह बोर्ड पर नजर पड़ी तो कुछ नवीन कहानियों को ब्रेल में परिवर्तित करने का सन्देश लिखा था। और मेरे आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा, जब मैंने कहानी पढ़ने वाले की स्टाइल और कहानियां सुनीं। वे मेरी कहानियां थीं, जो किचेन में खाना बनाते, बर्तन धोते या अपनी बच्ची को बहलाते यूं ही बनाई थीं और उनको इस तरह से सराहे जाते देख कर निशब्द थी।
उस बच्चे ने उन कहानियों को ब्रेल में बदल कर अपने जैसे और बच्चों के लिए भी संरक्षित कर दिया।
इस बात को बीस साल से ज्यादा हो गए हैं। मुझे नहीं पता कि अब वह बच्चा कहाँ होगा, लेकिन जहाँ भी होगा कुछ आश्चर्यजनक ही कर रहा होगा, ऐसा मुझे विश्वास है।
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