कहानी समकालीनः घर चले गंगा जी? – प्रियदर्शन / लेखनी-नवंबर-दिसंबर 17


गंगा जी बेहद मामूली आदमी हैं – इतने मामूली कि उनकी कहानी नहीं बन सकती।
इसके बावजूद मैं उनकी कहानी लिखने बैठा हूँ।
क्या यह मेरा दुस्साहस है? एक लेखक के भीतर छुपा यह अभिमान कि वह बेहद सामान्य लोगों के भीतर छुपे विशिष्ट अनुभवों को पकड़ कर एक अच्छी कहानी लिख सकता है?
या यह मेरा सयानापन है? कई बड़े लेखकों को पढ़कर हासिल हुआ यह सयानापन कि अगर आप शिल्प को ठीक से साध सकें और जीवन को उसमें बाँध सकें तो एक सामान्य-सी दिखने वाली चीज से भी एक बड़ी कहानी बना सकते हैं?
हो सकता है, मेरे इस प्रयत्न में दोनों बातें शामिल हों। लेकिन ज्यादा सच्ची और ईमानदार बात यह है कि गंगा जी से मिलने के बाद कुछ ऐसा था जिसकी वजह से मैं देर तक सोचता रहा और इस नतीजे तक पहुँचा कि बिना कहानी लिखे यह समझना मुश्किल होगा कि गंगा जी ने क्यों मेरे भीतर कुछ ऐसा छू लिया जिसकी वजह से एक छूटी हुई विधा मुझे फिर याद आ गई।
यानी यह कहानी आपसे ज्यादा मैं अपने लिए लिख रहा हूँ। गंगा जी हमारे पास रोज आते हैं, फिर भी अदृश्य रहते हैं। यह उनकी खूबी नहीं, हमारी कमजोरी है। हम बहुत सारी चीजें देखते हैं, दुनिया भर की खबर जुटाते हैं, लेकिन मेज और कंप्यूटर के पार आते-जाते,चाय पिलाते गंगा जी हमें नजर नहीं आते। यह सिलसिला छह साल से जारी है।
गंगा जी को मैं छह साल से जानता रहा हूँ – या कहना चाहिए, जानता नहीं देखता रहा हूँ। वे हमें चाय पिलाया करते हैं। वे हमारे दफ्तर के किचेन के स्थायी स्टाफ हैं। छह साल पहले जब मैं इस दफ्तर में दाखिल हुआ तो लगातार काम करने के तनाव के बीच अचानक दोपहर तीन बजे के आसपास आई एक चाय मुझे कुछ राहत दे गई। खास लोगों के चेहरे भूल जाने वाला मैं चाय देने वाले इस चेहरे को तब याद नहीं रख सका। लेकिन धीरे-धीरे गंगा जी एक परिचित चेहरा और नाम हो गए। जब वे एक बड़ी सी ट्रे में 20-25 कप चाय लिए हॉल में दाखिल होते तो हर तरफ उनकी आवाज लग जाती – ‘गंगा जी, इधर भी, अरे गंगा जी उधर भी।’
गंगा जी अपनी विनम्र मैथिली भीगी हिंदी में सारे सर जी को हाँ हाँ करते हुए चाय बाँटते रहते। लेकिन चायवाले से ज्यादा बड़ी पहचान गंगा जी की तब तक नहीं बन सकी – एक ऐसे शख्स की पहचान, जो आता है तो भाप उड़ाती चाय लाता है और फिर हमारी स्मृति से भी भाप की ही तरह गायब हो जाता है।
लेकिन उस दिन चाय बाँटते-बाँटते गंगा जी ठहर गए। न्यूज रूम में लगे टीवी चैनलों में एक पर उनकी नजर चिपक गई, ‘ये बाबरी मस्जिद है न सर जी’?
यह 6 दिसंबर था। चैनलों पर बाबरी की बरसी चल रही थी- मंदिर और मस्जिद के बीच की वह राजनीति, जो बड़ी जल्दी इतिहास हो गई।
मैं 6 दिसंबर, 1992 के बाद भारतीय समाज में आए बदलावों पर एक पैकेज लिखने की सोच रहा था – कैसे बाबरी मस्जिद की टूटन सारे देश की टूटन में बदलती चली गई, कैसे बाबरी मस्जिद की वजह से मुंबई में दंगे हुए और फिर धमाके, कैसे आतंकवाद इस देश की दिनचर्या का हिस्सा हो गया। मैंने उड़ती हुई नजर डाली, और मुस्कुराते हुए गंगा जी के सामान्य ज्ञान का हौसला बढ़ाने की कोशिश की – ‘अरे गंगा जी, आपको तो ठीकठाक जानकारी है।‘
‘काहे नहीं होगी सर जी, बाबरी मस्जिद के चलते तो हमको बंगलौर छोड़ना पड़ा।’
अचानक मैं ठहर गया। कंप्यूटर की स्क्रीन पर टिकी मेरी निगाह हैरानी से गंगा जी का चेहरा टटोलने लगी। बाबरी मस्जिद की वजह से हमें तो कुछ छो़ड़ना नहीं पड़ा? फिर ये गंगा जी तो मुसलमान भी नहीं हैं। फिर इनका नुकसान क्या हुआ।
सवाल पूछने की जरूरत नहीं पड़ी। गंगा जी खुद बताने लगे। ‘बंगलौर में हम पान की दुकान लगाते थे सर – एक बड़े होटल में। होटल मुसलमान का था। बदमाश लोग आकर होटल जला गए, सब लूट ले गए। हमारा पान दुकान भी नहीं बचा।’
‘कोई मुआवजा नहीं मिला? दुबारा नहीं खोली दुकान?’
‘इतना आसान थोड़े होता है सर जी। मुआवजा भी बड़ा लोग को मिलता है। हम जिसको बताते कि मेरा भी नुकसान हुआ है, वही हँसता। मुसलमान के खिलाफ दंगे में हिंदू को मुआवजा कैसे मिलेगा।’
अचानक मेरी समाजशास्त्रीय दिलचस्पी जाग उठी। मैंने एक दरार पकड़नी चाही। पूछा, ‘यानी आपको हिंदू होने के चलते मुआवजा नहीं मिला, मुसलमान होते तो मिल जाता।’
लेकिन इस मोड़ पर गंगा जी मुझसे ज्यादा खरे निकले। बोले, ‘हिंदू-मुसलमान का मामला नहीं है, सर जी। बहुत तरह की मुसीबत है। गरीब आदमी की सुनने वाला कोई नहीं होता है। फिर हम बिहारी – बंगलौर में सबको ऐसे ही गड़ते थे। पुलिसवाला पान खा के चला जाता था, पैसा माँगते थे तो बोलता था, कन्नड़ बोलो। किसी से कंप्लेन करो तो हँसता था, बोलता था, कावेरी का पानी पीना है तो कन्नड़ बोलना होगा।’
मैं हैरान था। देख रहा था, गंगाराम को, जिन्हें अपनी हैसियत, अपनी हकीकत मालूम थी। वे बाबरी मस्जिद के नतीजों पर मेरे शोध और अध्ययन से कहीं ज्यादा प्रामाणिक राय रखते थे।
यह अलग बात है कि यह राय उनके पूरे वजूद की तरह उनके ही भीतर कहीं अदृश्य थी। गंगा जी अपनी खाली ट्रे घुमाते, मुस्कराते हुए चले गए। शायद कुछ कृतज्ञ भी कि इस दफ्तर के एक आदमी ने छह साल बाद ही सही, उनसे इतनी देर बात तो की।
उस शाम बाबरी मस्जिद को निबटा कर, कुछ संतुष्ट सा मैं घर के लिए निकला तो फिर गंगा जी पर नजर पर पड़ गई। वे भी शायद निकलने वाले थे। अचानक मैंने कुछ बेतकल्लुफी से पूछ लिया, ‘क्या गंगा जी, घर चले।’
गंगा जी कुछ खुश से हो गए, ‘हाँ सर जी,’ फिर अचानक सकुचाते हुए उन्होंने पूछा, ‘आपके साथ चलें सर, मदर डेयरी के पास उतर जाएँगे?’
मैंने फौरन उनकी बात मान ली। एक अपनी सहज आत्मीयता की वजह से, दूसरे, शायद इसलिए भी कि गंगा जी की कहानी में मेरी दिलचस्पी जाग गई थी। आखिर यह मैथिल मानुस बंगलौर कहाँ पहुँच गया था। और फिर दिल्ली के इस शानदार दफ्तर में कैसे चला आया।
‘आपकी उम्र क्या होगी गंगा जी?’ मैंने गाड़ी पार्किंग से बाहर निकालते हुए पूछा।
‘सब लोग बहुत कम समझते हैं सर जी, लेकिन 35 पार तो होगा ही।’
कुछ उत्साह के साथ गंगा जी ने कहा।
‘अच्छा!’ मुझे भी हैरानी हुई। मैं भी उन्हें 25-30 के आसपास का मानता था।
‘हाँ, सर जी, जिस साल इंदिरा गांधी मरी थी, उस साल हम दसवीं का इम्तहान दिए थे।’
‘अच्छा, आपने दसवीं कर रखी है।’
‘अरे नहीं, सर जी, दसवीं में फेल हो गए तो घर से भाग गए।’ कार के अँधेरे में भी गंगा जी की आवाज में छुपा पछतावा जैसे चमक रहा था।
‘भाग क्यों गए? पढ़ने में मन नहीं लगता था?’ मुझे इससे बेहतर दूसरा सवाल सूझा ही नहीं।
‘नहीं सर जी, स्कूल में बहुत परेशानी था। मास्टर आता नहीं था। आता था तो किताब-कॉपी नहीं होने पर मारता था। किताब-कॉपी के लिए पैसा माँगो तो पिताजी मारते थे। किसी तरह दसवीं तक पहुँच गए। फेल होने के बाद डर से भाग गए।’
‘कहाँ भागे थे?’
‘दरभंगा से पहले बस पकड़ के पटना आए। पटना में दो दिन भटकते रहे। फिर राँची में एक चाचा जी थे। उनके पास चले आए।’
‘चाचा जी ने समझा कर भेजा नहीं।’
‘नहीं, चाचा जी के साथ ही काम करने लगे। वैशाली कॉपी बेचते थे। राँची वीमेंस कॉलेज के सामने। अच्छा भी लगता था।’
‘फिर?’
‘मेरी किस्मत भी खराब है, सर जी। एक दिन पुलिस पकड़कर ले गई।’
‘क्यों?’
गंगा जी चुप हो गए। फीकी-सी हँसी के साथ। फिर बातचीत का छूटा हुआ सिरा पकड़ा।
‘एक दिन खूब पानी बरस रहा था। लड़की लोग कॉलेज से निकली और भीगने से बचने के लिए मेरी गुमटी के नीचे खड़ी हो गई। वहीं कुछ लड़का लोग भी चला आया। कुछ बदमाशी हुई और मेरा नाम लग गया। पुलिसवाले सबके सामने झापड़ मारते ले गए। जबकि मेरी कोई गलती नहीं थी।‘
‘अच्छा?’ अब मुझे सहानुभूति होने लगी थी।
‘अगले दिन चाचा जी पैसा देकर छुड़ा लिए। लेकिन सबकी नजर से उतर गए थे। वो भी काम से हटा दिए।’
‘उसके बाद क्या किया?’
‘बहुत काम किए, सर जी। वीमेंस कॉलेज के पास ही एक दोस्त बन गया था। वो एक फैक्टरी में लगवा दिया। बोएलर तक चलाए। लेकिन एक दिन इंस्पेक्टर आया और बोला कि इसकी उम्र 18 साल से कम है। ये बोएलर नहीं चलाएगा। मालिक ने फिर निकाल दिया।’
गंगा जी का गंतव्य आ चुका था। मुस्कुराते हुए वे उतर गए – ‘थैंक्यू सर जी।’ मैं कार बढ़ाता गंगा जी की कहानी पर सोचता रहा। 40 पार की अपनी उम्र में मेरा किसी हादसे से वास्ता क्यों नहीं पड़ा। न पुलिस पकड़ कर ली गई, न गुंडों ने दुकान जलाई, न किसी इंस्पेक्टर ने नौकरी से निकलवाया। ये गंगा जी की किस्मत का मामला है या इसका वास्ता कुछ हालात से भी है? गंगा जी की उस हैसियत से, जो उन्हें कमजोर और कातर बनाती है, एक ऐसा आदमी जिसे पुलिस बिना कसूर झापड़ मारती हुई ले जा सकती है?
अगले कई दिन गंगा जी से भेंट नहीं हुई। फिर एक दिन मिल गए। वे भी खुश हो गए, मैं भी। उन्हें घर पहुँचने की जल्दी थी, मुझे उनकी छूटी हुई कहानी पूरी करने की हड़बड़ी। कार में कोई अच्छा-सा गाना चल रहा था। मैंने माहौल हल्का करते हुए पूछा, गंगा जी, सिनेमा देखते हैं कि नहीं?’
गंगा जी हँसने लगे, ‘अब तो सर जी, बहुत साल से नहीं देखे। लेकिन 10-15 साल पहले अनिल कपूर और शाहरुख खान का कोई सिनेमा छोड़ते नहीं थे। तब बंबई में थे।’ मैं फिर हैरान हो गया, दिल्ली और बंगलौर ही नहीं, मुंबई भी हो आए हैं गंगा जी।
‘अरे, आप मुंबई कैसे पहुँच गए?’
‘मुकद्दर जहाँ ले गया, चले गए सर जी।’
‘आप भी एकदम मिस्टर इंडिया हैं?’
मैंने अनिल कपूर की ही फिल्म से बात जोड़ने की कोशिश की।
‘अरे नहीं, सर जी, कुछ नहीं हैं।’ उन्हें अपनी हैसियत का पूरा अंदाजा था।
‘राँची छोड़ने के बाद हम एक दोस्त के साथ बंबई चले गए। शुरू में बहुत मारामारी था। कई तरह का काम किए। लेकिन कोई दो दिन चला, चार दिन। फिर एक पेट्रोल पंप पर लग गए।’
‘मुंबई में तो आपको किसी ने तंग नहीं किया न?’ मैंने कुरेदना चाहा।
‘बंबई में तो जो बीमारी मिली, अब तक नई गई सर।’
‘मतलब?’ मेरी समझ में आया कि मैंने उनकी कहीं ज्यादा दुखती रग पर हाथ रख दी है।
लेकिन इसके बाद मेरी चुप्पी में भी छुपा हुआ सवाल गंगा जी ने पढ़ लिया था।
‘पेट्रोल पंप पर हम दिन भर रहते। शुरू में ठीक लगा। लगा कि पेट्रोल भरने का सीधा-सादा काम है। अच्छा भी लगने लगा। उसी समय इतवार को नाइट शो देखने की आदत पड़ गई थी। बंगलौर और दिल्ली तक सिनेमा देखते रहे।’
‘फिर मुंबई क्यों छोड़ दी।’
‘दिक्कत धीरे-धीरे समझ में आती है, सर जी। 18 घंटे पेट्रोल भरते थे। पेट्रोल की गंध अच्छी नहीं लगने लगी। खूब खाँसी आती थी। बहुत बीमार पड़ गए। एक बार तो लगा कि साँस नहीं ले पाऊँगा, सर जी। डॉक्टर ने चेक किया तो बोला पेट्रोल से एलर्जी है, ये काम मत करो।’
‘तो छोड़ दिया आपने।’
‘इतना आसान थोड़े था। पेट्रोल पंप का मालिक समझाता रहा कि मुँह-नाक पर पट्टी बाँध के करो। जब हम जबरदस्ती छोड़ दिए तो मेरा महीना भर का पैसा भी नहीं दिया।’
‘तभी से बीमारी लग गई। एक बार खाँसना शुरू करते हैं तो लगता है जान नहीं बचेगी।’
‘फिर वहाँ से कैसे निकले?’
‘वहीं मिला एक दोस्त, जो बंगलौर भेजा। उसका दूर का चाचा एक कंट्रैक्टर का मैनेजर था। होटल बनवाने में वही लगा हुआ था। वहीं पान की गुमटी खोलके बैठ गए। और जब होटल बना तो हमको पान दुकान खोलने का मौका मिल गया।’
‘ये बात कब की थी।’
‘1991 की, जब राजीव गांधी मरे थे। साल भर ठीक से कटा। फिर वही बाबरी का झगड़ा में दुकान चला गया। लगा कि सब देख लिए,दिल्ली चलते हैं। यहाँ दरभंगा से बहुत लोग मजदूरी करने आ गया था। हम बोले, हम भी कर लेते हैं।’
‘इस कंपनी में कैसे आ गए।’
‘बस, किस्मत अच्छी थी सर। एक फर्नीचर वाले के साथ काम करते थे। उसका कुर्सी टेबल चढ़ाने-उतारने, लगाने का काम था। एक बार यहाँ भी आए। बहुत भारी टेबुल था। उठा रहे थे कि साँस उखड़ गई। खाँसते-खाँसते हालत खराब। उस समय ये ऑफिस बहुत छोटा था। सब लोग जमा हो गया। मालकिन भी। बाद में जब पता चला कि हमको साँस की बीमारी है तो बोलीं, इसका यहाँ किचेन में रख लो। तब से हम यही हैं। 14 साल हो गया सर।’
‘अब तो लाइफ सेट हो गई?’
‘हाँ सर जी, अब तो बहुत आराम है। अब तो आठ हजार मिलता है।’
‘एकदम सरकारी नौकरी। नहीं?’
‘हाँ सर जी, हमको तो कोई नौकरी मिलनी नहीं थी। हम छोटी जाति के हैं न। हर जगह ब्राह्मन-राजपूत लोग बैठा है। बोलता था, अब तो मंडल कमीशन लागू है, ले लो सरकार से नौकरी। और सरकार के पास नौकरी है तो पता नहीं किसके लिए है।’
मैंने उनकी जाति जाननी चाही। लेकिन संकोच में पड़ गया। वैसे मन ही मन इस उदारीकरण का शुक्रिया अदा किया, जिसने गंगा जी जैसे आदमी के लिए भी गुंजाइश निकाली। मंडल और कमंडल दोनों की मार झेल चुके इस शख्स को भूमंडलीकरण ने ही जगह दी।
लेकिन गंगा जी इतने आश्वस्त नहीं थे।
‘वैसे एक बात है सर जी, जब कंपनी छोटी थी तब बहुत अच्छी थी। एक-एक आदमी का खयाल रखती। लेकिन जैसे-जैसे बड़ी होती गई है, सबका सुर बदल गया है। पुराना लोग तो फिर भी कुछ इज्जत करता है, नया लोग बहुत बदतमीजी से बात करता है।’
‘अच्छा?’ मुझे याद आया, अक्सर दफ्तर में शिकायत होती कि किचेनवालों से चाय लाने को कहो तो वक्त पर कभी नहीं लाते।
मेरे कुछ कहे बिना गंगा जी समझ गए। उन्हें पता था कि मैं किस तरफ हूँ। उन्होंने बिना पूछे कैफियत दे डाली, ‘देखिए सर जी, पहले डेढ़ सौ लोग थे, हम तीन लोग मिलके सबकी जरूरत पूरी कर देते। अब हजार लोग हैं, और हम लोग बस छह लोग हैं। दौड़ते-दौड़ते हालत खराब हो जाती है। फिर कंट्रैक्टर पूछता है कि इतना चाय किसको पिला देते हो। जब चाय और कॉफी की मशीन लगी है तो तुम क्यों सबको चाय पिलाते रहते हो?’
उनकी बात मेरी समझ में आ रही थी। लेकिन गंगा जी का असली सवाल बचा हुआ था, ‘सर जी, अब तो सुन रहे हैं, छँटनी भी होगी। नौकरी बचेगी कि नहीं’?
‘अरे नहीं, गंगा जी, आप इतने पुराने हैं, आपको कौन छुएगा,’ मैंने तुरंत कहा, हालाँकि अपनी बात के प्रति मैं खुद आश्वस्त नहीं था। ये मालूम था कि कंपनी ऊपर-नीचे, नए-पुराने हर किसी का जायजा ले रही है। घाटा काफी ज्यादा है और सैलरी को ‘रैशनलाइज’ करना है। ऐसी हालत में कुछ लोगों को जाना होगा। देखा जा रहा है कि कहाँ-कहाँ कितने लोगों के बिना काम चल सकता है। कौन-कौन लोग फालतू हैं, या कंपनी पर बोझ हैं।
मुश्किल यह है कि हर महकमे में ऐसे लोगों की सूची बनाने वाले वे लोग थे जिनकी वजह से कंपनी का यह हाल हुआ। इसलिए किस पर किस वजह से तलवार गिरेगी, किसी को नहीं पता था। फिर भी मुझे लगा, गंगा जी जैसे पुराने आदमी को निकाल कर कंपनी कितना पैसा बचा लेगी। इसलिए मैं मान रहा था कि उनका कुछ नहीं होगा।
फिर दो महीने बीत गए। अनिश्चिचतता के तार तनते गए और एक दिन टूट गए। हमारे सेक्शन से आठ लोगों को बाहर किया गया था। पूरे दफ्तर से बाहर होने वालों की सूची 50 के आसपास थी।
दफ्तर में सन्नाटा था। मेरे भीतर और ज्यादा। खाने-पीने की इच्छा जैसे मर गई थी। जैसे घर में लाशें पड़ी हों।
शाम तक सिर बुरी तरह दुखने लगा था। मन अब तक ठीक नहीं हुआ था। आम तौर पर मैं किचेन वालों को चाय के लिए नहीं बोलता। लेकिन मैंने फोन मिलाया। उठानेवाले की आवाज नहीं पहचान सका। मैंने पूछा, गंगा जी?
‘गंगा जी तो चले गए। उनकी छुट्टी हो गई है?’
‘अच्छा?’ मुझे जैसे झटका लगा था, इस गिरी हुई लाश की खबर क्यों नहीं मिली? इन दिनों उनका खयाल मुझे आया तक क्यों नहीं? मैंने धीरे से फोन रख दिया। तय किया, अब चाय नहीं पिऊँगा।
गंगा जी को आठ हजार मिलते थे। उदारीकरण ने दिए थे। लेकिन उदारीकरण को उनकी हैसियत मालूम थी। जब तक चाय पिलाने का काम चलता रहा, गंगा जी चलते रहे। जब मशीनें लग गईं, गंगा जी को बाहर कर दिया।
मेरी कहानी अधूरी छूट गई।
रात 10 बजे मैं दफ्तर से निकला। पार्किंग में आने से पहले कोने की तरफ देखा, जहाँ गंगा जी खड़े रहते थे, मेरी राह देखते और संकोच से पूछते, ‘आपके साथ चलें, सर?’
वह जगह खाली थी। मैं अकेले निकला। सड़क के आखिरी सिरे पर पेट्रोल पंप था।
मैंने हमेशा की तरह कार पंप के आगे लगा दी।
अचानक मैं चिहुँक गया। मुँह पर पट्टी बाँधे एक आदमी पेट्रोल भर रहा था।
वही आदमी, जो दरभंगा में दसवीं में फेल करके भागा, राँची में पुलिस के हाथों पिटा, मुंबई में पेट्रोल से खाँसता परेशान रहा, उसने बेंगलुरु में अपनी पान दुकान जलती देखी और फिर दिल्ली में 14-15 साल की नौकरी के बाद एक रात निकाल दिया।
वह आदमी मुझे सलाम कर रहा था, ‘सर जी, देखिएगा कुछ हो सके तो। अभी तो यहाँ लग गए हैं।…’
गंगा जी से आँख मिलाते मुझे मुश्किल हो रही थी। साँस लेना भारी हो गया था। लगा, उनकी बीमारी मेरे भीतर उतर आई है।
गंगा जी की कहानी अब मैं यहीं छोड़ रहा हूँ।
इस उम्मीद में कि कभी इस कहानी में कुछ अच्छे मोड़ आएँगे।