कविता आज और अभीः किसकी धरतीः लेखनी-जनवरी/फरवरी 16

Dawn

।। एक अकेली पत्ती।।

डाली से टूटी
आश्रय ढूंढती
फिर-फिर के घूमी
इधर-उधर
हवा के थपेड़े खाती
ताकि सघन पेड़ बन
स्थापित हो पाए पुनः
बढ़ सके
अपनों के साथ
एक अकेली पत्ती
तूफान से जूझी
अस्तित्व के बीज बचाती
रेशे-रेशे जा बिखरी
-शैल अग्रवाल

 

 

 

 

॥ कोलकाता के राजा ॥

वे शहर की सड़कों पर रहते हैं
दिन में भी और रात में भी
ठीक राईटर्स बिल्डिंग से …
पचास गज की दूरी पर
धर्मतल्ला में या रासबिहारी या कहीं भी
यहीं जन्मते हैं बच्चे
और यहीं पर खत्म होता है
ज़िंदगी का खेल
पर वे जोंक की तरह चिपके रहते हैं
नहीं छोड़ते शहर का दामन
शहर की सड़कों पर
दिन भर रेंगते हैं वाहन
कई तरह की छोटी बड़ी बसें
काली-पीली टैक्सियाँ और कारें
धुएं की सिगरेट सुलगाए हुए
एक दूसरे की पूँछ मुँह में दबाएं
ये बिल्कुल नहीं होते आक्रांत
इन्हें भाती है,
पैट्रोल, डीज़ल और धुएं की गंध
ये हर बार देते हैं वोट
जीतने वाली पार्टी को
होते हैं वादे इन्हें कायदे से बसाने के
ज़िंदगी की ज़रूरतों को पूरा करने के
पर चुनाव के बाद
ये फिर से बना दिए जाते हैं बिहारी
और लटका दिए जाते हैं सलीब पर
पर ये घबराते नहीं
भरपूर बेशर्मी के साथ करते रहते हैं
ईमानदारी से मेहनत मजदूरी
आँखों में ज़िंदगी के स्वप्न लिए
वे जानते हैं कला और संस्कृति का स्वांग
कभी पूरा नहीं होता बिना अथक श्रम के
वे जानते हैं “होबे ना”, “चोलबे ना” चिल्लाते
कामरेड़ों या घासपात नेताओं के कपड़ों पर
करनी ही होगी इस्त्री बेनागा
वे जानते हैं उन्हें पूरी रात चलानी ही होगी टैक्सी
ताकि लोग पहुँच सकें अपने घर
पूरे शहर को लोग या तो जानते हैं
विक्टोरिया मैमोरियल की वजह से
या इन मेहनतकशों की वजह से
जिनके पसीने से बनता आया है यह शहर
और वे सड़कों पर जीते हैं राजाओं की तरह
वे जानते हैं इस शहर में
उनकी मेहनत और हावड़ा ब्रिज का
कोई विकल्प नहीं!
——— राजेश्वर वशिष्ठ

 

 

 

 

।। सरकारें ऐश करें ।।
दाल नहीं, भात नहीं,
थाली में स्वाद नहीं
खेतों में फसलों की…
कोई सौगात नहीं
जनता की मेहनत को आढतिये कैश करें।
सरकारें ऐश करें।
नहरें सब सूखी हैं
धरती यह भूखी है
काश्तकार के हक़ में
नियति आज रूठी है
राहत के पैसे पर चैनल में बहस करें।
सरकारें ऐश करें।
जाति की सियासत है
धर्म की सियासत है
मुद्दे सब हवा हुए
गाय की सियासत है
राजनीति के पंडे हिंसा इनकैश करें।
सरकारें ऐश करें।
सच के अनुगायक अब
अपने सिर धुनते हैं
शब्दों के व्यापारी
सिक्कों पर तुलते हैं
यश के दौलतियों को पेंशन से लैस करें।
सरकारें ऐश करें।
-ओम निश्चल

 

 

 

 

।। यही तो जिन्दगी।।

जिन्दगी एक किताब
पन्ने-पन्ने पलटते रहे हम बेचैन
कभी सुकून से

पलटते-पलटते यूँ ही
पहुंच जाते अन्तिम पन्ने तक
पर बांच न पाए कभी इसका एक भी शब्द
ना ही कभी जाना
कौन सा है किसका अंतिम पन्ना

दौड़ते भागते ही नापी हमने
पगपग धरती अपनी रफ्तार चलती
असीम मान सीमित यह जिन्दगी …

-शैल अग्रवाल

 

 

 

 

अकेले‬ आना :
—————-
‪‎पहले‬ ही पेड़ के नीचे छोड़ देना झोली…
दूसरे के नीचे कमंडल रख देना
आगे भी बहुत पेड़ हैं, सामान भी बहुत
कुछ छोड़ देना, कुछ छूट जाएगा
जाने से पहले कहा फकीर ने–जो गया अकेला होकर.
छोड़ देना पेड़ भी वहीं रास्ते पर
पहुंचने तक रखना रास्तोंस को
और साथ लिए हुए मत आना कोई रास्ताक भी
अक्सार चिपक जाते हैं रास्ते पैरों से बिना बताए
यात्राएं छूट जाती हैं अगर छूट जाए चलने का मोह
छोड़ आना यात्राएं पहले ही पड़ाव पर
पड़ाव पर ठहरे हुए पलों को वहीं से कर देना विदा
जहां पहली बार सोचा तुमने बची हुई यात्रा के बारे मेंं
नदी को किनारे पर छोड़ देना
किनारे छोड़ देना नदी के भरोसे
जो किनारों में बहे उसे नहीं होना होता कभी मुक्त
मुक्तन होने की शर्त है किनारे तोड़ देना
चहकते पंछी छोड़ देना,
उड़ान भरते उनके पंख आसमान से बंधे हैं
हवाओं में बंधा हुआ है खुला सा दिखता आसमान
हवाओं को रहने देना वहीं, जो बंधी है सांसों में
अपनी सांसें छोड़ आना किसी बंधे हुए जीवन के लिए
अकेले का पथ है अकेले आना
अपने को साथ लेकर नहीं हो पाओगे अकेले
सावधान रहना,
कामनाओं को छोड़ने का गर्व आ जाता है साथ
या कि अकेले के साथ हो लेता भय
अकेले आना—कहा था फकीर ने–जो अकेला गया इस रास्ते से
-माया मृग

 

 

 

 

अट्टाहास सुन रहे हो काल का ?
अबूझ गति
खंड की
जो क्षण का वेग है।

अनसुलझे किस्सों में
हिन्दू मुसलमान हैं…मानव हैं
असंख्य धर्म हैं
अनंत मर्यादायें हैं
सब जीवंत हैं और सब मृत हैं।

शिव के शाश्वत बृह्माण्ड में युगों से लिखी लहरियाँ हैं
राक्षसों की मौत है देवताओं की विजय है

रावण की ढहती लंका है
समुद्र को लांघता सेतु है
बीस दिनों में लौटता विमान है
कपि मानव हैं और विभीषण की भूख से
एक सभ्यता का अवसान है
-रामसिंह यादव

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