मेरी सिक्किम यात्राः पद्मा मिश्रा

`बारिश थी क़ि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी, सड़कों पर ,गलियों में, पानी उफन उफन कर बह रहा था. होटल के कमरे में बैठे बैठे मन उब रहा था. बारिश रुके तो गंगटोक तक जाने की कोई व्यवस्था हो पायेगी. वह भी जब रास्ता खुला हो, कल सिक्किम के बार्डर तक जाकर लौट आना पड़ा था. रास्ते में पहाड़ का एक बड़ा टुकड़ा टूट कर गिर पड़ा था. रास्ता जाम हो गया तो सेना के जवानो ने उसे बन्द कर सबको वापस लौट जाने का निर्देश दिया. निराश, मायूस बारिश में भींगते हुए सिलीगुड़ी के इस होटल में शरण मिली थी. किसी तरह रात कटी, पर आज गंगटोक पहुंचना बहुत जरुरी था. वहां बुक किये गए टाटा गेस्ट हॉउस में पैसे कट रहे थे, और हम यहाँ बुरी तरह फंसे हुए थे. …सुदूर जमशेदपुर से चल कर हावड़ा, सियालदह,नु जलपाईगुड़ी होते हुए सिलीगुड़ी में रुकना पडा था. ..निरुद्देश्य. मेरे साथ आये मेरे गाँव के देवर और उनका बेटा राजा भी निराश हो चुके थे. बरदंग पहुंचना मुश्किल लग रहा था. वहां ए..टी.टी,सी,अडवांस टेकनिकल सेंटर में उसका नामांकन कराना जरुरी था. पर यहाँ तो होटल के कमरे में बैठे हुए काम पूरा न हो पाने की निराशा व् हताशा के पल काटने मुश्किल हो रहे थे. तभी मैनेजर ने आकर सूचना दी क़ि एक नेपाली दम्पति भी गंगटोक जा रहे हैं, यदि आप चाहें तो उनके साथ जा सकते हैं, ”हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था, वे बड़े भले लोग थे, कहा क़ि ”यदि रास्ता बन्द भी रहा तो मै जरुर कुछ करूँगा. अभी अभी खबर मिली है क़ि बन्द रास्ता खुल गया है, और एक कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है. ”हम लोग फिर एक कठिन यात्रा पर चले. बारिश और भी तेज हो गई थी, पर वे पति- पत्नी बिलकुल निश्चिन्त थे ,वे बड़ी कुशलता से अपनी सुमो ड्राइव करते हुए बढ़ रहे थे, सिलीगुड़ी की सीमा पार करते ही जैसे हम सीकिम की सीमा पर पहुंचे एक बार फिर नियति ने अपना खेल दिखाया, ..रास्ता अभी भी जाम था और पहले से भी बड़ा एक भूखंड किनारों को तोड़ता, नष्ट भ्रष्ट करता आ गिरा था, जिसे हटाने का कार्य चल रहा था, जिसमे लगभग चार घंटे लगते. हम हतप्रभ और निरुपाय थे. फिर उन सज्जन ने ही एक उपाय सुझाया क़ि -”देखिये, मै गंगटोक होते हुए दार्जिलिंग जाता पर अब सीधे दार्जिलिंग होते हुए गंगटोक पहुंचा दूंगा.क्योंकि वहां मेरा घर है, मुझे वहां जाना ही है, पर किराया चार हजार लगेगा”. मजबूरन हमें उनकी बात माननी पड़ी. , पर सिलीगुड़ी वापस पहुँचने के बाद जब हमारी गाड़ी दार्जिलिंग की और मुडी ..तो धीरे धीरे जैसे प्रकृति की किताब के रहस्यमयी पृष्ठ खुलते जा रहे थे. प्रकृति अपने कई रूपों में ,कई रंगों में, बाहें फैलाये हमारा स्वागत कर रही थी. ..हमारे मन से दुविधा ,निराशा,और हताशा के बादल छंट गए थे, और नीले आकाश में उमड़ते घुमड़ते ..बरसते बादल मानों हमारे आसपास मंडरा कर कह रहे हों –”स्वागतम”. …हरी भरी वादियाँ.. दूर दूर तक बिछे चाय के बागान और ऊपर से रसधार गिराती मेघमालाएं ….तन-मन और आँखों को अनोखा सुख़ प्रदान कर रही थीं. …बादल हमारे आगे .पीछे….ऊपर..नीचे, आ जा रहे थे. कभी गाड़ी के आगे आकार अँधेरा कर जाते ,तो कभी खिडकी के रास्ते मेरे गालों, बालो, और चेहरे को भिंगो कर तुरंत उड़न छू हो जाते. मेरे पति की यह पहली पर्वतीय यात्रा थी, वे रोमांचित थे, हर्षित भी. ..इन अनूठे दृश्यों को देख कर, परन्तु इन संकरे ,घुमावदार सर्पीले मोड़ वाले रास्तों को देख कर..हम सभी भयभीत भी हो रहे थे. रास्ते भी कहीं कटे हुए थे तो कहीं उबड़ खाबड़ पथरीले ..जहाँ दो गाड़ियाँ सामने आतीं तो एक को रुक जाना पड़ता था. .रास्ते में भू स्खलन से दुर्घटना ग्रस्त हुई गाड़ियों की क्षति ग्रस्त कतारें देख, हम डर गए थे.हमारे साथी ड्राइवर ने बताया क़ि वे आते जाते इनकी संख्याओं को देख कर अनुमान लगाते हैं क़ि आज कौन सी दुर्घटना हुई?..मुसलाधार बरसते बारिश के बीच गाड़ी चलाना कितना मुश्किल होता होगा उनके लिए यह समझा जा सकता था..
पर प्रकृति का सौन्दर्य उसकेउग्र रूप पर भारी पड़ रहा था. वह सुन्दरता चारो और बिखरी हुई थी.आँखें तृप्त नहीं हो पा रही थीं. .हम इन्हीं खूबसूरत दृश्यों को आत्मसात करते ,और फिर नीचे उतर कर कैमरे में उन पलों को कैद करते जा रहे थे. …कर्सियांग में रुक कर हमने चाय पी ..बारिश में भींगे मन और शरीर को बहुत राहत मिली…यहीं पर हमने प्रसिद्द टाय ट्रेन भी देखी, जो दार्जिलिंग की पहचान है. इसे अंग्रेजो ने १८६९ ,में प्रारंभ किया था अपने चाय बागानों की देखभाल के लिए. चाय पीकर हमारा कारवां फिर आगे बढा ..इस बार केवल चाय बागानों से होकर गुजरना था,बारिश रुक रही थी, ..हम जैसे ही एक दो दृश्य कैमरे में लेते ..अचानक कही से बादलों का एक समूह आकर हमें भिंगो जाता ,जैसे आँख मिचौनी खेलते बच्चे. चाय के हरे भरे खेत अत्यंत लुभावने लग रहे थे. यहाँ चारो तरफ पाइन के वृक्ष बहुतायत में नजर आ रहे थे. और अन्य औशधीय पौधे भी. हमने खूब तस्वीरें खींची ..हम सब बच्चों की तरह उल्लसित थे. उन दृश्यों में मुझे ..नैनीताल में बिताया अपना बचपन दिख रहा था, आज सचमुच मै बहुत पीछे लौट गयी थी. ….दार्जिलिंग का सौंदर्य हमारे मन प्राणों पर छा गया था. मोहित कर गया था. …मै यहाँ पर स्थानीयता, वेशभूषा, परम्पराओं की तलाश कर रही थी, पर आधुनिकता का रंग इन पर भी चढ़ चुका है. …पर्वतीय बालाओं की मोहक पोषक और खुबसूरत परिधानों ने जींस,पैंट और टॉप धारण कर लिया है. …चाय बागानों में काम करने वाली रेजाओं को मैंने धूप का चश्मा लगाये ,हाथ में मोबाईल थामे काम करते देखा है. पर मेरी नज़रों की अधूरी तलाश खिलखिलाकर कुछ ग्रामीण- श्रमिक युवतियों के गाने की आवाज से ही तृप्त हो गयी, हमारी गाड़ी में गाना बज रहा था -ये कहाँ आ गए हम, यूँ ही साथ साथ चलते”. …अपनी यात्रा तय करते हुए हम गंगटोक आ पहुंचे थे, यहाँ का नजारा तो कुछ और ही था, उंची उंची पहाड़ियां,उन पर मंडराते बादल, हरी भरी गहरी घाटियाँ ..सभी आकर्षित कर रहे थे. चाइना- सिक्किम की सीमा युमथांग से निकल कर पूरे सिक्किम प्रदेश के बीचो बीच बहती हुई ,सिक्किम की जीवन रेखा ,पवित्र तीस्ता नदी, हमारे साथ लगातार चल रही थी. इसकी लहरों में तीव्र करेंट था, लहरें कभी उछाल मारती, कभी शांत होतीं, कभी चट्टानों के बीच से सर्पिल आकार लेती बराबर हमसे बातें करती जा रही थी. एक और ऊँचे पहाड़ तो दूसरी तरफ घाटी में बहती तीस्ता नदी दोनों ही कभी मन मोहते तो कभी भय उत्पन्न कर रहे थे. …तीस्ता जैसे मानव की जिजीविषा की प्रतीक है, जो हर बाधाओं ,मुश्किलों, तूफानों से टकराकर आगे बढ़ते जाने का सन्देश देती है, मैंने तीस्ताको मन ही मन प्रणाम किया. ..
..अब शाम हो गयी थी ,पहाड़ों में अँधेरा भी आकर्षक लगता है, दूर तक जुगनुओं सी जलती बुझती रोशनियाँ बहुत प्यारी लग रही थीं, सच कहूँ तो आज इस सुहानी शामने मेरे जीवन के मधुरतम रिश्ते को भी असीम स्नेह -प्रेम से भर एक नई ताजगी दे दी थी. इन रास्तों की तरह ही जीवन के दुर्गम रास्तों पर भी जब हमसफ़र का साथ हो तो हर मुश्किल आसान हो जाती है. हम रान्गपो आ पहुंचे ,अब हमारे सहयात्रियों को भी हमसे विदा लेनी थी. …हमने दूसरी गाड़ी लेकर अपने दोस्तों का धन्यवाद कर उन्हें विदा कियाऔर फिर सफ़र पर चल पड़े. इस बार हमारी राहों से गुजरने वाले हर एक पेड़, पत्ता,फ़ूल,पहाड़,सबसे एक लगाव,सा महसूस हो रहा था. एक ऐसा आकर्षण जो हमें बांध रहा था प्रकृति के अटूट बंधन में….यहाँ बने लकड़ियों के ,और पक्के घरों की सुन्दरता मोहक थी. वे लोग घरों को रंगने में पक्के चटक रंगों का प्रयोग करते हैं.विशेष रूप से नीले,लाल,हरे और पीले रंग. जहाँ तहां बौद्ध मठों और गुम्पाओं की उपस्थिति, आस्था भी उत्पन्न कर रही थी. बुद्ध के उपदेशों को प्रसारित करती धार्मिक पताकाएं ऊँचे तारो पर, वृक्षों पर लहरा रही थीं.बौद्ध मठों के अतिरिक्त कहीं कहीं शिव,हनुमान के मंदिर भी सुखद आश्चर्य उत्पन्न कर रहे थे…सिक्किम में मात्र सत्तात्मक परिवार की परंपरा होने के कारण वहां व्यापार से लेकर दुकान तक और शिक्षा ,व्यवस्था तक सब महिलाएं ही संभाल रही थीं.वहां उन्मुक्त घूमती महिलाएं अपने सशक्त होने का प्रमाण थीं.हंसती, खिलखिलाती, साथियों से हास परिहास करती… वे प्रबुद्ध,कर्मठ,परीश्रमी,एवं शालीन लगीं. ..गंगटोक के सौंदर्य का यह दूसरा पहलू भी कम आकर्षक नहीं था. …हमारी टैक्सी आगे बढ़ रही थी ,तीस्ता अभी भी हमारे साथ थी. हमारी मंजिल टाटा स्टील का गेस्ट हॉउस ”होलीडे होम ”पास आ रहा था. जो तमांग गुम्पा के नजदीक था. …इतनी लम्बी यात्रा के बाद मिला आश्रय आह्लादकारी था. रूम न० १०८ में हमारा बसेरा था…आज रात भर के लिए, सामान रख मुंह हाथ धोकर वहां से मिली गर्म चाय ने थकान मिटा दी. गर्म गर्म खाना भी तुरंत आ गया था -डाल,चावल,दो सब्जियां,सलाद और अंचार. अत्यंत स्वादिष्ट लगे अमृतोपम. घर छोड़ने के बाद पहली बार भरपेट खाना तृप्त कर गया था. हम तो यात्रा में अल्पाहार चिप्स,काफी,चाय,और कोल्ड ड्रिंक्स लेकर चल रहे थे, … एक निश्चिन्त ,खुशनुमा ,उम्मीदों भरी रात बीती. सुबह होते ही सामने जो दृश्य दिखाई दिया ,वह अकल्पनीय था. ठीक सामने कंचनजंघा की चोटी दिखाई दे रही थी, मैंने जल्दी से कैमरे में उसे कैद करना चाहा पर बादलों ने उसे ढँक लिया. बस पल भर की एक झलक ही मिल सकी, लेकिन मौसम साफ़ होने से गंगटोक का सौन्दर्य निखर आया था. यह सुन्दरता अभिभूत कर रही थी. ..हमें बरदंगअपने भतीजे राजा के नामांकन के लिए निकलना था. ए .टी.टी.सी.एडवांस ट्रेनिंग सेंटर सिंगतम के पास ही था. नामांकन की प्रक्रिया पूरी होते होते दोपहर हो आई थी.हमें सिल्लिगुडी पहुँच कर सियालदह के लिए ट्रेन पकडनी थी, अत; हम एक बार फिर से वापसी की यात्रा पर निकल पड़े.लौटते हुए वही सारे दृश्य फिर आँखों के सामने साकार थे, पीछे शोर करती तीस्ता का पानी छोटी बड़ी चट्टानों से टकराता अनोखे संगीत की सृष्टि कर रहा था, तो किनारे किनारे ऊँचाई पर स्थित एकमात्र सड़क पर गाड़ियों की आवाजाही जारी थी. ऊँचे पहाड़ थे, दूर तक बिछी असीमित हरियाली और चहचहाते पंछी ..बहुत ही सुहावना दृश्य था, ..आँखे उन्हें निहारती थक नहीं रही थी, कालिदास की शकुंतला सा क्षण क्षण परिवर्तित प्रकृति का रूप मनोहारी था -”क्षणे क्षणे .यन्नावातामुपैती …तदैव रूपं रमनीयाताया; ”एक बात गंगटोक में मुझे बहुत अच्छी लगी क़ि वहां म्यांमार,दामन,लक्षद्वीप,नेपाल सभी जगहों से लोग आये थे, वहां के सौंदर्य को आत्मसात करने पर वे सभी हिन्दी बोल रहे थे, यद्यपि उच्चारण में विभिन्नता थी,पर वे सब केवल भारतीय थे, मुझे अपनी राष्ट्रभाषा और अपने देश पर गर्व हो रहा था. चाइना की संस्कृति से प्रभावित प्रदेश में अंग्रेजी या अन्य भाषा की जगह हिदी.. बहुत ही सुखद अहसास था. आज उन बहुमूल्य पलों ,वहां फैली हरीतिमा को छोड़ते बहुत दुःख हो रहा था. मेरी सखी के रूप में तीस्ता फिर मेरे साथ थी, बातें करती..गुनगुनाती खिलखिलाती, और कभी शोर मचाकर प्रतिवाद करती ,समय बीतता जा रहा है, उन यादों को कैमरे में कैद कर रही हूँ, साथ ही नेत्रों की प्यास और अंतरतम के एक एक बिंदु पर उन्हें आत्मसात करती हुई .यह यात्रा जीवन की सबसे सुन्दरतम अनुभूतियों की यात्रा बन गयी है, दो पंक्तियाँ कहना चाहती हूँ–”
अक्षरों में गुंथती हूँ,
प्रकृति की सौंदर्य मा प्यार बरसाता रहा नभ
भींगती यह काव्य-बाला ”


पद्मा मिश्रा
कवियत्री, कथाकार