भारत में “विश्व का एकमात्र ” ध्वनिकी-स्थलः कोनी हावर्ड

पेशेवर रंग-कर्मी, पेनसिलवानिया की इंडियाना यूनिवर्सिटी के डॉ. टॉम आल्ट और नई दिल्ली के ध्वनि विशेषज्ञ उमाशंकर मंथरावादी की खोज से पता चला है कि भारत में एक ऐसा स्थल है जो समस्त विश्व के ध्वनिकी प्रदरेशन कक्षों में संभवतः एकमात्र अक्षुण्ण कक्ष है और जो दूसरी शताब्दि ई.पू. में निर्मित किया गया था। उनके परीक्षणों के आरंभिक परिणामों से पता चला है कि वह वास्तव में ध्वनिक कक्ष हैं जिनमें नीचे स्वरों वाली पुरुष ध्वनि से ऊँचे स्वरों वाली नारी ध्वनि को फैलाने की क्षमता है।

भुवनेशवर के समीप स्थित ‘रानी-गुफा ‘ नामक इस स्थल को केवल जैन ध्यान गुफाएँ समझा जाता था। शोधकर्ता आल्ट और मंथरावादी के अनुसार प्रकृति द्वारा गुफा बनती है जबकि चट्टान को काटकर बनाई गुफा ‘कक्ष ‘ कहलाती है। कई वर्षों तक रानी गुफा के वास्तविक इतिहास के बारे में कुछ छोटी मोटी असहमतियां रही हैं।

प्रदर्शनकारी कलाओं विशेषकर उड़ीसा के लोक रंगमंच के क्षेत्र में एक जाने माने प्रितष्ठित व्यक्ति स्वर्गीय धीरेन दास ने सर्व प्रथम यह जानकारी दी थी कि इस गुफा की बनावट अन्य सामान्य गुफाओं से भिन्न और विशिष्ट है। उनकी शोध से निष्कर्ष निकल कि रानी गुफा की बनावट भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित बनावट के अनुसार है। नाट्यशास्त्र भारतीय नाट्यकला और रंगशाला निर्माण पर भारत का प्राचीनतम ग्रन्थ है।

अपने गहन शोध के बाद दास ने एक पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने उदाहरणों और कारणों से यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि रानी गुफा का निर्माण प्राचीन कलिंग काल में राजा खरावेला ने किया था। अपनी पुस्तक ज्ञेत्र जथ यात्रा—द थियेटर जिसका प्रकाशन भारत में 1976 में हुआ था, दास बताते हैं कि किस प्रकार यह स्थल नाट्यशास्त्र में वर्णित तीन प्रकार की रंगशालाओं में से एक के निर्माण के सभी निर्देशों का अनुकरण करता है। यह विक्राफ्ता शैली की रंगशाला है। इसके निर्माण निर्देशों के अनुसार एक ऊपरी और एक निचला मंच निर्माण शामिल है (जो रानी गुफा में है)। अपनी पुस्तक में वह लिखते हैं कि “आज भी … इस रानी गुफा रंगशाला में कलाकारों तथा गायकों और वाद्ययंत्रों की ध्वनि का वर्धन किया जा सकता है। ”

कई वर्ष तक भारत में रहने और शिक्षण कार्य करने वाले आल्ट रंगशाला बनावट के एक जाने-माने विशेषज्ञ भी हैं। उन्होंने ऐसी वास्तुशिल्प शैली पर व्यापक शोध-कार्य किया है और उनके लेख अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने और दास ने रानी गुफा पर एक साथ कुच शोध कार्य किया। आल्ट बताते हैं कि किसप्रकार 1989 में जब वह और दास साथ-साथ रानी गुफा में थे तो दास गायन स्थल पर गये और गायन आरंभ किया। आल्ट के कथनानुसार जब उन्होंने वह द्वनि और उससे उत्पन्न होने वाली प्रतिध्वनि सुनी तो उन्हें निसंदेह यह विश्वास हो गया कि वह वास्तव में मनुष्य द्वारा बनाया गया ध्वनिकी कक्ष है।

दास और आल्ट ने अपने शोद कार्य को आगे बढ़ाना था लेकिन दास के असामयिक निधन ने इन सब योजनाओं पर पानी फेर दिया। लेकिन आल्ट ने अपने शोध कार्य को जारी रखने के लिए अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज के अनुदान प्राप्त किए। नई दिल्ली स्थित अमेरिकन इन्स्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज के अभिलेखागार निर्देशक शुभा चौधुरी ने उनका परिचय मंथरावादी से करवाया। मंथरावादी एक ध्वनि विशेषज्ञ हैं जो बीस वर्षों से अधिक समय से फिल्म सांउन्ड ट्रेक पर काम कर चुके हैं। उन्होंने साथ मिलकर उस स्थल पर व्यापक द्वनि रिकार्डिंग और शोध-कार्य की योजना बनाई। उनके शोध कार्य से पता चला कि बनावट में रानी गुफा दुमंजिला, अंग्रेजी के ‘सी’ वर्ण के आकार का निर्माण है। इसके सभी तल घुमावदार हैं परन्तु ऊपरी मंजिल के कक्षों में घुमावदार चढ़ाई है। अन्य बातों में सभी तल समान हैं। मंच के दोनों तरफ कक्ष हैं जो प्रदर्शन कक्ष की तरफ खुलते हैं। दांयी तरफ चार कमरे हैं और बांयी तरफ केवल एक जो उनके अनुसार सबसे प्रतिष्ठित विशिष्ट कलाकार के लिए आरक्षित रहता होगा। सभी कमरों को प्रसाधनागार और ध्वनिकी के लिए प्रयुक्त किया जाता था।

मंच के साथ ही एक विशेष कक्ष है जो दास के अनुसार मंच संचालक का होता होगाजहां बने एक छिद्र से वह दर्शकों और प्रदर्शन को देख पाता था। प्रस्तर खंडों में कुछ सीटें गढ़ी गई हैं जिनके बारे में यह सुझाया गया है कि वे प्रदर्शन समारोह में आमंत्रित विशेष अतिथियों या गणमान्य व्यक्तियों के लिए बनी हैं। इन सीटों के ठीक सामने एक ‘सुपीठम ‘ है जो राजा और रानी के लिए है। प्रस्तर में गढ़ी इस विशाल सीट का पृष्ठ भाग ऊंचा है और उसके दोनों ओर नक्काशी की गई है। ऊँचाई के कारण अन्य अतिथि राजा और उसके साथ सुपीठम पर बैठे अन्य व्यक्तियों को देख सकते हैं। इसके विशेष आकार के कारण मंच संचालक को भी प्रदर्शन देखते समय राजा की प्रतिक्रिया भांपने की सुविधा मिलती है।

रानी गुफा 96 फीट लम्बी और 48 फीट चौड़ी है। रंगमंडल एक खुला प्रांगण है जो 48 वर्ग फुट का है। राजा और अन्य विशेष अतिथियों के अलावा दर्शकगण नीचे बैठते होंगे।

प्रदर्शन कक्ष के पृष्ठ भाग में ऐसे कक्ष हैं जिनमें कई छिद्र हैं और यह जाँचे-परखे अनुनादी कक्ष हैं। निचले तल पर तीन कक्ष हैं जिनमें सामने की तरफ सात छिद्र हैं और एक अन्य कक्ष है जो रंगमंच पर खुलता है। ऊपरी तल पर चार कक्ष हैं जिनमें एक जूसरे के सामने दो-दो क्षिद्र हैं। इन कक्षों में पर परवलीय ढलान लाले फर्श हैं। आल्ट बताते हैं कि इन कक्षों का ध्वनि पर प्रभाव ‘ असाधारण ‘ ही कहा जा सकता है। इस स्थल पर हर तरफ अनेक सुंदर नक्काशियां हैं जिनमें संगीतकारों और नृत्यांगनाओं के अलावा ‘ सुपीठन’ पर विराजमान राजा और रानी की दो परिचारिकाओं के साथ नक्काशी शामिल है।

रानी गुफा की ध्वनि व्यवस्था पर गहन और सफल शोध के बाद आल्ट और मंथरावादी दोनों का कहना है कि वे चाहते हैं कि रानी गुफा में एक संगीत प्रदर्शन हो जो आज के दर्शकगणों को प्राचीन भारत की कला और प्रतिभा के इस उदाहरण को सही ढंग से समझने का अवसर प्रदान करे। साथ-साथ आगन्तुक इस स्थल की उत्कृष्ट वास्तुकला का आनंद भी उठा सकते हैं।