पैरिसःचन्द शब्द चित्रः शैल अग्रवाल

लगता है दुनिया के सभी खूबसूरत और आकर्षक शहर किसी-न-किसी नदी के किनारे ही बसे हैं,चाहे वह लंदन हो या वैनिस, या फिर अपनी वाराणसी ही। ऐसे ही नदी के किनारे बसे, दो बेहद खूबसूरत शहरों को घूमने का हाल ही में अवसर मिला- पैरिस और बुडापेस्ट। बुडापेस्ट की भी बात करेंगे, परन्तु पहले युवा-दिलों की धड़कन पैरिस की सैर करते हैं। इसकी ही यादों में भीगते-घूमते हैं—चन्द शब्द चित्र बनाते और संवारते हैं साथ-साथ मिल-बैठकर।

सेन नदी के किनारे बसा खूबसूरत पैरिस शहर सपने देखता नहीं, सपने जीता है। वैभव और रुचि- परिष्कृता में दुनिया में अग्रणी माने जानेवाले इस शहर में करीब-करीब सभी कुछ सुन्दर और संचनीय है। लगता है जैसे सभी कुछ तो है इनके पास—रुचि, धन-दौलत और बहुत सारा आत्मविश्वास…सभी कुछ। ये जो भी सपना देखते हैं, करीब-करीब सच कर लेना जानते हैं। इनके डिस्नी वर्ड में काल्पनिक के साथ सचमुच की परियां और राजकुमार भी घूमते दिख जाते हैं अक्सर ही।

टेम्स के किनारे बसा लंदन जहां एक कौलोनियल शान और ठहराव लिए हुए है, पैरिस में चारो तरफ एक चंचल सुन्दरी-सा खुलापन और ताजगी है। अंगूर सा रस और पकी वाइन-सा उन्माद है। जगह-जगह गिटारों पर गाते युवा, चित्र बनाते कलाकार वातावरण में एक अकथ रूमानियत ला देते हैं, तो चारो तरफ छितरे सैलानी एक उत्साह। चाहे आप इनके भव्य महलों में घूम रहे हों या विशाल संग्रहालयों में एक संपन्नता और आनन्द का आभास मुखर रहता है। यहां के खिले गुलाबी मौसम का भी इसमें एक बड़ा हाथ हो सकता है पर पैरिस आज भी यौवन और रोमांस का शहर…कला और फैशन की राजधानी माना जाता है। चारो तरफ घूमते तस्बीरों से सुन्दर चेहरे सीधे किसी कैटवॉक से आए दिखते हैं और उसी नज़ाकत से बगल से निकल भी जाते हैं—शैनेल और रिवेगौश की खुशबू में मन को संग-संग लपेटते-झटकते। बाँधे रखना इन्हें भी अच्छी तरह से आता है…बात चाहे फ्रेंच शिफौन की हो, या फिर फ्रांस के इत्रों की। वैसे भी यह स्कार्फ और हैटों का शहर है। साड़ी की तरह इनके भी इस छोटे-से टुकड़े में बहुत जादू है। जिस कलात्मक ढंग से इसे यहां बांधा जाता है, एक-से-एक प्लेन जेन को मिनटों में ही मडोना बना देता है यह। रूप और यौवन दोनों के ही प्रदर्शन में यहां किसी को कोई झिझक नहीं, फिर वह लूडो या मौलिनारूज़ के किसी शो की कैन-कैन डान्सर हों या फिर शॉजेलिजा में शॉपिंग करती आधुनिक युवतियां। और तारीफ यह है कि इस प्रदर्शन में भी न जाने क्यों एक सुरुचिपूर्ण कला ही नजर आती है देखने वाले को, नग्न भोंडापन नहीं। कई बार तो एक सादे पंख या पत्ते से ही बड़े कलात्मक रूप से ये अपने को संवार भी लेती हैं और ढक भी। मंत्र-मुग्ध-सा देखने वाला बस देखता ही रह जाता है और यहां के युवा व प्रौढ़ दोनों ही अश्लीलता और फौंडेपन के आरोप से बचे, इतराते, मस्ती बिखेरते घूमते रहते हैं।

कला प्रेमियों के लिए तो यह शहर किसी भी खजाने से कम नहीं। मोनालिसा की मुस्कान के जादू से भला कौन बच पाया है। यहां के प्रसिद्ध म्यूजियम और चित्रघरों की तो बात ही छोड़िए, सड़कों और नावों में घूमते हुए भी एक-से-एक सुन्दर मूर्तियों और कलाकारी के नमूने पुलों के नीचे, खम्बों पर, चारो तरफ देखे जा सकते हैं। नदी के किनारे घूमते हुए तो ऐसा लगता है मानो सड़क पर नहीं, किसी म्यूजियम के अन्दर ही घूम रहे हैं। ग्रीक और रोमन असर बहुत स्पष्ट है। सुन्दर कलाकृतियों के बीच ब्रिटिश बुलडॉग श्रीमान चर्चिल जी को देखकर एक सुखद आश्चर्य हुआ। नीचे लिखा था कि फ्रांस इनका आभारी है और साथ में थे वे प्रेरणादायक शब्द भी, ‘ हम कभी आत्म-समर्पण नहीं करेंगे।’ चरित्र की यही वफादारी और दृढ़ता थी, जिसकी वजह से यहां के लोगों ने इन्हें बुलडॉग की उपाधि दी थी।
एफिल टावर पर चढ़ते ही शहर का जो दृश्य सर्वाधिक मन मोहता है, वह है इनका प्रकृति प्रेम और हरे भरे लॉन व ऊँची-ऊँची अठखेलियां लेते फब्बारे। असलियत में तो पूरा पेरिस ही प्रेमियों और कलाकारों का एक नाजुक और जीवंत शहर लगता है। दिनरात कला और संस्कृति की अनूठी खुशबू से महकता-गमकता।

पैरिस के मशहूर नाइट क्लबों में जाए बगैर पैरिस की घुमाई पूरी नहीं होती। संयोग की ही बात है कि हाल ही में भारत से (वह भी वाराणसी से) आए स्वजनों के साथ पैरिस के एक बेहद नामी और फैशनेबल नाइट क्लब में बैठे हम वही अपने पौराणिक सफेद एरावत हाथी और उसपर सवार कमल से प्रकट लक्ष्मी जी को देख रहे थे-बोनिहेम नामक उस रंगारंग, भड़कीले और मादक कार्यक्रम में बेहद लचीली कलाबाज और अर्धनग्न लड़कियों के साथ नाचते गणपति भी थे, वह भी एक नहीं दर्जनों—पर मुझे यह परेशानी और शर्म क्यों महसूस हो रही थी? खुद ही तो टिकट खरीदकर, पैसे देकर आयी थी ! और फिर सब कुछ ही तो बहुत ही कलात्मक, सुरुचिपूर्ण था, क्लब की ख्याति के पूर्णतः अनुकूल। तीस साल पहले इसी क्लब में देखे कार्यक्रम की बेहिसाब तारीफ भी तो मैने ही की थी…और सबको लेकर भी आयी …और अगर भारतीय संवेदना को भूलकर, एक यूरोपियन की तरह सोचूं तो कार्यक्रम कला और मनोरंजन की दृष्टि से अति सफल और अभूतपूर्व ही तो था। रंगारंग था। साज-सज्जा, कला और रुचि में अग्रणीय और अद्वितीय होने के साथ-साथ भव्य और मनोरंजन से भरपूर था।

पर मन था कि कुछ समझ ही नहीं रहा था-भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथा-वह भी पैरिस के फैशनेबल शो-केस नाइट क्लब में —एक गर्व की बात होनी चाहिए थी हमारे लिए—वैसे भी तो पूरे विश्व को हम अपनी संस्कृति के बारे में बताना चाहते हैं—यदि हम प्रचलित होंगे तो थोड़ा बहुत दुरुपयोग तो होगा ही। क्यों इस मशहूर नाइट क्लब ने इतना विचलित कर दिया है, उलझन में क्यों हूं?… आखिर यही तो हम चाहते हैं कि विश्वीकरण के इस व्यापारिक आधुनिक समाज में खूब सारी विदेशी मुद्रा और भरपूर ख्याति मिले हमें। भारत और भारतीय कला विश्व के आगे आए, पर शायद इस कीमत पर और इस रूप में नहीं—देवी लक्ष्मी वह भी अर्ध नग्न केन-केन गर्ल्स के साथ गरिमाहीन कूदती हुई—दर्जनों गणेश, मात्र एक विचित्र अलंकरण बने हुए आगे पीछे घूमते हुए? अभी अपनी सोच को सुलझा तक पाऊं की वेट्रेस ट्रे भरकर बेचने के लिए चीजें ले आई । कौतुक भरी आंखों से मैने देखा कि तरह-तरह के सुविनियर पर छपी हमारी तस्बीरें एक दूसरे को आंखें मार रही थीं। बचपन के वे दिन याद आ गये जब हम ऐसी स्केल खरीदा करते थे जिनपर शेर

शो के अंत में एक बार फिर सारी नेक-नीयती और खैर-खयाली को पर्स में समेटे, एक अच्छे , सभ्य और सहिष्णु ( साहसहीन) भारतीय की तरह बिना कोई आपत्ति उठाए, आयोजकों से शिकायत किए बगैर ही शैम्पेन और पैरिस के नशे में धुत् हम अन्य यूरोपियन्स की तरह ही, ताली बजाते—यादों के सुविनियर उठाते, चुपचाप वापस लौट आये। मन में उठते असंतोष का जिक्र तक नहीं हुआ।

लौटते-लौटते रात के ग्यारह बज गये थे। जगमग नियोन लाइट्स के बीच उस पांचतारा होटल के मंहगे रेस्टोरैंट में बैठी देख रही थी कि परीशियन्स और टूरिस्ट दोनों ही अपने गर्म और मुलायम बिस्तर में जाने से पहले, कैसे हंस-हंस कर भरे पेट का जायका बदल रहे थे और वहीं पास में परछांई-सा खड़ा वह चुपचाप लोगों की बची झूठन में से अपने खाने लायक सामान बीने जा रहा था। काउन्टर से ढेर सारे टिशू नैपकिन्स भी उठा लिए थे उसने…रात के खाने के साथ-साथ सोने का भी तो इन्तजाम करना था उसे।

इन भव्य इमारतों के शहर में भी सैकड़ों लोग स्टेशन और पुलों के नीचे सोते दिख जाते हैं। हर महानगरी की तरह यहां भी सड़क पर सोने वालों की कमी नहीं, फ़र्क बस इतना ही है कि इनमें से कई के बगल में गिटार या पेन्ट ब्रश दिख जाएंगे—रोल्ड स्केच दिख जाएंगे। हर देश की तरह यहां भी किसी को ये दिखाई नहीं देते—आर्टिस्ट बनकर जीना शायद कहीं भी और कभी भी आसान नहीं !

सफेद सुरमई बादलों के कालीन पर जहाज हमें लेकर घर की तरफ वापस दौड़ रहा था पर मन बारबार पीछे की ओर ही लपका जा रहा था। झरने-सी चंचल, चिड़ियों-सी मुखरित और नदी-सी बहती पिछले चन्द दिनों की अनगिनत यादें बिखरी पड़ी थीं चारो तरफ। कहीं कुछ छूट न जाए, आहिस्ता-आहिस्ता सब सम्भाल और समेट लेना चाहती हूँ। कितना संभव हुआ नहीं जानती, क्योंकि यह तो बिल्कुल उस पैरिस के डिस्नीलैंड की इंडियाना जोन्स की राइड जैसी ही कठिन बात है। उस राइड में भी बिठाया तो सीधे ही जाता है पर हम उलटे चलते हैं। तेजी से घूमते चक्कर खाते और गुरुत्वाकर्षण के साथ-साथ दीन-दुनिया सब भूल जाते हैं। समय और दिशा तक का ध्यान नहीं रख पाते। पीछे की तरफ झुकते हैं तो आगे को गिरते हैं और आगे झुककर संतुलित होने का प्रयास करते हैं, तो पीछे लुढ़क जाते हैं। पर मजा यह है कि एक अजब आल्हादित भय से रोमांचित, हम कितनी ही कसमें क्यों न खाएं कि अब ऐसी हिम्मत दोबारा नहीं करेंगे, अगले ही पल बच्चों सी ललक लिए फिर एक और नयी राइड पर जा बैठते हैं—तेजी से उलटे-सीधे घूमते। इस पैरिस शहर की लत भी कुछ ऐसी ही है…किसी न किसी बहाने सैलानी पहुंच ही जाता है…कभी जीवन का कोई विशेष उत्सव मनाने तो कभी प्रियजनों को घुमाने और जबसे डिस्नीवर्ड खुला है, पैरिस से दूर रह पाना इतना आसान नहीं। परिवार के नन्हे-नन्हे वी.आई. पी. आपको वापस उंगली पकड़ कर ले ही आते हैं । और एकबार पहुंच जाओ, तो स्पेस- माउन्टेन पर बैठे उन चीखते-चिल्लाते, सीटी बजाते लोगों के हुजूम में बैठकर यह तो नहीं सोचा जाता कि हम यहां पर क्या कर रहे हैं-या क्यों आए…यह उम्र तो नहीं यह सब करने की! जब चारो तरफ बहता खुशी और आवेग का रेला इतना जबर्दस्त हो तो क्या फर्क पड़ता है उम्र पांच की है या पचपन की…।

पैरिस-2004.