हास्य-व्यंग्यः सेक्स सिंबल का इंटर्व्यूः गोविन्द शर्मा

टी.वी. खोला तो सेक्स सिम्बल का इंटर्व्यू चल रहा था। सेक्ससिम्बल जानबूझकर, बेखबर चहचहा रही थी। वात्स्यायन, कोणार्क, खजुराहो, मदनोत्सव, विश्वामित्र, मेनका, उर्वशी, रम्भा, विषकन्य, गीत-गोविन्द, कुमार संभवम् यौन शिक्षा, कोकशास्त्र, रेड लाइट जैसे शब्द इंटरव्यू को रोचक बना रहे थे, इंटरव्यू कर्ता की चोर-नजर झेंपती सजग होती साफ दिख रही थी, लेकिन अलमस्त गुरूर से लबरेज सेक्स सिम्बल के चेहरे से आत्मविश्वास और नूर जैसे चू रहा था।

इ.क.-अभी आपने कहा कि आप अपने शरीर को पूंजी मानती हैं, इसे अधिक स्पष्ट करेंगी।

सै. सिं.- देखिए, जिस तरह आप अपने धन और बुद्धि के मालिक हैं, वे आपकी ‘पूंजी’ हैं, उन्हें आप जैसा चाहें यूज करते हैं, उसी तरह हम भी अपने शरीर के मालिक होने के नाते, उसका मनचाहा यूज करते हैं। अपने अपने रास्ते हैं…(शरारती नजर से मुस्कराहट में कटाक्ष करती आगे बोली) हमारे अंग प्रदर्शन वाले रास्ते से तो यथार्थ के साथ परमार्थ भी सजता है, हमें धन और प्रसिद्धि मिलती है और देखने वाले को खुशी, नयन सुख एवं सभी दुखों से छुटकारा मिल जाता है।

इ.क. -(चौंकते हुए) दुखों से छुटकारे से आपका क्या अभिप्राय है?

से. सि.- सीधा-साधा मतलब है, हमारी खूबसूरती और अदायें देखने वाले के दिलोदिमाग पर छा जाती है, तन मन की सुधि बिसर जाती है, पहाण सा दुख क्षण भर में छू मन्तर हो जाता है।

इ.क.- लेकिन यह तो क्षणिक सुख हुआ?

से.सि.- तो आप मुझे किसी स्थाई सुख का नाम बता दीजिए? सुनिए जीवन क्षण भंगुर होता है। इसमें कोई सुख स्थाई नहीं है, बस जो लम्हा खुशी खुशी गुजर जाए वही असली सुख है। चार्वाक का श्लोक आपने अवश्य सुना होगा-भस्मीभूतय देहस्य पुनरागमनो कुतः

ऋणं कृत्वा घृतम् पिवेत्, यावज्जीवेत सुखम जीवेत।

इ.क.- आपका मतलब है सुख पाने का साधन केवल शरीर है?

से.सि.- शरीर के अलावा और क्या हो सकता है, क्या बिना शरीर के सुख का अनुभव संभव है?

इ.क.- अपनी बात, और खुल कर बता सकती हैं?

से.सि.-क्या खुल के बताना है, जीवन में सारा तामझाम भागादौड़ी इसी शरीर के लिए ही तो है, तन सुखी तो मन सुखी। किसी ने शेर कहा है-

सैर कर दुनिया की गाफिल जिन्दगानी फिर कहां

जिन्दगानी भी रही तो ये नौजवानी फिर कहां?

मुझे पढ़ने का शौक है। संस्कृत और हिन्दी साहित्य तो स्त्री-देह के नख-शिख चित्रण से भरा पड़ा है। आदमी की बात तो छोड़िए, तन-सुख की कामना में शिव-मोहिनी, ब्रह्मा-सरस्वती, नारद-विश्वमोहिनी, इन्द्र-अहिल्या, जैसे देवताओं के प्रसंग शरीर के महत्व को खुलकर बताते हैं। कालीदास और जयदेव जैसे महाकवियों के साहित्य से शरीर निकाल दीजिए तो क्या बचेगा, उदाहरण के लिए गीत गोविन्द और श्रंगार शतक के श्लोक सुनाती हूँ

किसलयशयननिवेशितया चिरमुरसिममैवशयानम्
कृतपरिरम्भणचुम्बनया परिरम्भकृताधरपानम् ।।

(हे सखि, मैं कुंज कुटीर के मध्य कोमल पत्तों की शय्या
बनाकर शयन करूंगी तब श्यामसुन्दर श्री कृष्ण मेरे
साथ विराजमान होकर मेरे ही वक्षस्थल पर चिरकाल
तक शयन करते हुए आलिंगन कर मेरा अधरामृत पान करेंगे
ऐसे श्री कृष्ण चन्द्र जी से हमें मिला दो।)

इ.क.- मैडम आपने इतना पढ़ा है, अच्छी बात है। काश आपने उसे सही समझा होता, जिस लौकिक शरीर की आप चर्चा कर रही हैं वह तो वहां है ही नहीं। कला और नंगई, अध्यात्म और रतिसुख के अन्तर को समझने के लिए गहरी समझ व पारखी नजर की जरूरत है। देहधर्मी मानसिकता और वासना भरी दृष्टि की वहां पहुंच नहीं। शरीर की भर्त्सना का साहित्य भी भरा पड़ा है। जिन भर्तहरि के श्रृंगार शतक का उदाहरण आपने दिया , उन्ही ने आगे विषय भोगी की कितनी निंदा की है, मालूम है आपको?

से.सि.- हां मालूम है, हमें। वह भृतहरि की कुंठा है, अवसरवादिता है, यह क्या बात हुई कि जब उन्हें प्रेम मिला तो नारी स्वर्ग थी, जब वह वंचित हुए तो नारी नर्क हो गयी।

जानती हूं पोथियांदेह-निन्दा से भरी पड़ी हैं, लेकिन उसके पीछे की सचाई आपको नहीं मालूम है, ये सभी देह-निंदक कुंठित लोग हैं। जो प्रत्यक्ष की कद्र न कर सकेगा वह परोक्ष की कद्र क्या करेगा, जो देह को न जान सका, वह आत्मा को क्या जानेगा ?

इ.क.- स्त्री देह पर समाज की वर्जनाओं पर कुछ कहेंगी?

से.सिं- हम वर्जनाओं से दो-दो हाथ करके निकल पड़े हैं, पुरुषों की गुलामी अब और बर्दश्त नहीं होगी। हमारी पीढ़ी समाज की लगाई हर बंदिश को कुचल कर रख देगी। हमें जो अच्छा लगेगा, वो करेंगी। मां बाप, बुजुर्ग, धर्म समाज को अब हमारी सोच के पीछे-पीछे चलना होगा, वर्जनाएं, बन्दिशें…माई फुट।

इ.क.- आप यह तो मानेंगी कि अंग प्रदर्ळन नई पीढ़ी पर दूषित प्रभाव पड़ता है।

से सिं- (खिलखिलाते हुए) ज्यादातर यह प्रश्न इंचरव्यू के शुरु में ही पूछ लिया जाता है, आपने काफी देर से पूछा , देखिए हमारे अंग प्रदर्शन का समाज के सभी वर्गों पर । पहले बच्चों को लेते अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। पहले बच्चों को लेते हैं- बच्चे पेड़ पर नहीं उगाए जाते, फैक्ट्री में नहीं ढाले जाते, बिस्तर पर बनाए जाते हैं, भोले बच्चों में स्वाभाविक जिज्ञासाएं होती हैं, वे छोटे क्यों हैं, बड़े बड़े क्यों हैं, वे इस दुनिया में कहां से आए, मां बाप , कुटुम्बी, टीचर उन्हें सही उत्तर देना गन्दी बात समझते हैं-हमारे अंग प्रदर्शन से उन्हें काफी जानकारी मिल जाती है, जो उनके मानसिक विकास में बहुत काम आती है। जहां तक यंग लड़के लड़कियों का प्रश्न है तो उनके लिए हमारा अंग प्रदर्शन एक वरदान है। इससे उनमें साहस और आत्मविश्वास, खासतौर से लड़कियों को तो अपनी बाडी की ताकत और कीमत का अन्दाज लग जाता है।

अब लीजिए काम धंधे में फंसे और पिसते वर्ग को हमारा अंग प्रदर्शन पल-दोडपल चैप देता है प्रदर्शन उनके घुटन भरे जीवन में ठंडी हवा का झोंका है, तपते रेगिस्तान में शीतल छांव है। मैं एक ट्रेड सीक्रेट बताती हूं, खर्च करने की पावर के चलते यह वर्ग हमारी इंडस्ट्री का मेन टारगेट है।

अब बात करें स्त्री की, हम उन्हें पुरुष की गुलामी से छुटकारा पाने का मंत्र दे रहे हैं, शरीर के सटीक प्रयोग से, वे जो चाहें जहां चाहें, हर चीज़ हासिल कर सकती हैं। आसिकी से लेकर नौकरी तक , ग्लैमर की दुनिया से लेकर पालिटिक्स हर जगह यह सिक्का अमोघ बाण का काम करता है।

रही बात बुजुर्ग पीढ़ी की, उनकी छोड़िए। जब से दुनिया बनी है तभी से नई पीढ़ी के रहन-सहन, पहनने-ओढ़ने, उठने-बैने, चलने-फिरने हर बात में माथा पीटते हैं। खुद अपने टाइम में मजे मार लिए और हमें उस मजे से रोकते हैं। हम जानते हैं कि उम्र के चलते अंगूर खट्टे हैं वरना क्या-क्या नहीं करते। गलिब ने इनकी अन्दर-बाहर की सोच का बड़ा अच्छा नक्शा खींचा है।

गो हाथ में जुंबिश नहीं, आखों में तो दम है,
रहने दो अभी सागरो मीना मेरे ।

दरअसल यह जनरेशन गैप है, इसलिए हम उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते। पिटी औन देम।

इ.क.- लेकिन आप यह जरूर मानेंगी कि सेक्स के भौंडे प्रदर्शन से समाज में सांस्कृतिक, धार्मिक और नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है।

से.सि.- प्लीज माइंड योर लैंगवेज। अंग प्रदर्शन एक कला है, भौंडा वह होता है जिसके मूल में मूर्खता हो, फूहड़ता हो, अव्यवस्था हो। हमारा हर मिलीमीटर प्रदर्शन योजनानुसार आकर्षक और शानदार होता है। उसको भौंडा कहना अपनी नासमझी ज़ाहिर करना है। मैने अभी आपको अँग प्रदर्शन के लाभ गिनाए हैं।

जहां तक आपके इन सोकाल्ड मूल्यों का प्रशन है तो मेरी राय है कि आप लोग पहले अपने इन मूल्यों को मजबूत बनाइये। एक आँख मिचकाने या जरा सा बाडी हिला देने से जो मूल्य भरभरा कर गिर पड़ें, उन्हें कोई नहीं बचा सकता। आप धर्म की बात कर रहे हैं, मुझे बताइये कि शिलिंग क्या है, किस पर टिका है, कामाख्या मंदिर में किसकी पूजा होती है, लाखों की भीड़ के बीच से नागा साधु त्रिवेणी नहाने जाते हैं। नैतिकता का दोहरापन देखिए, खजुराहो और कोणार्क की मिथुनरत मूर्तियां और पैरिस के चित्रों की तारीफ में जिनकी जुबान नहीं थकती, वही हमारी अर्धनग्नता पर नाक भौंसिकोड़ते हैं। पतन-पतन कर छाती पीटते हैं। अरे नग्नता तो नग्नता है, चाहे पत्थर में हो, कागज पर हो या सशरीर सामने हो! यदि उन्हें आपने कला का दर्जा दिया है तो आपको हमारे अंग प्रदर्शन को कला मानना ही होगा।

इ.क.- मैडम बुरा न मानें आप लोगों पर नंगई इतना हाबी है कि कला जैसे पवित्र शब्द को गन्दगी में घसीट रही हैं।

से.सिं.-(टोकते हुए) …मैं कला में गन्दगी नहीं घसीट रही हूं, थोथी कूपमंडूकता को झिंझोड़ रही हूं। दोहरेपन की नकाब उघाड़ रही हूं जो औरत को देखते ही बिस्तर पर बिछाने की कल्पना में डूबने उतराने लगते हैं। और ऊपर से कला पारखी, समाज सुधारक जैसे मुखौटे लगा लेते हैं। यह लोगों को मूर्ख बनाना है, जिसे हमारी पीढ़ी ने समझ लिया है। मेरी सलाह है आप लोगों को मांस के लोथड़े से हटकर देखना चाहिए और हम पर कीचड़ उछालने से बाज आइये।

इ.क.- यानी अंग प्रदर्शन ही आपके जीवन का लक्ष हो गया है! अच्छा बताइये इसे आप किस सीमातक जायज समझती हैं।

से.सिं.- जिस सीमा तक लोगों को अच्छा लगे…

इ,क. -यानी लोगों के चाहने पर आप और छोटी…

से.सिं.-(बीच में ही टोकते हुए) मैं समझ गयी आप अंग प्रदर्शन की सीमा को क्वांटिफाई करना चाहते हैं। देखिए यह तो आप जानते ही होंगे कि वेश्या की नग्नता कौड़ियों में बिक जाती है, जबकि हमारी अर्धनग्नता हमें लाखों-करोड़ों दिला देती है। लुकाछिपी के इस खेल में कपड़ों की सीमा जरूरत के हिसाब से घटती-बढ़ती रहती है। दरअसल यह प्रश्न अर्थशास्त्र का प्रश्न है, आप जितना इसको समझने की कोशिश करेंगे उतना उलझकते जाएंगे। चलिए एक सूत्र देती हूं विश्व भर की वित्रापन-दुनिया का बजट करोड़ों नहीं अरबों में है और वह समूची दुनिया औरत के कपड़े पहनने, उतारने की बैसाखी पर टिकी है, ड्रेस का साइज उसी के मुताबिक तय होता है।

इ.क.- लोग आपकी आलोचना करते हैं आपको इसका बुरा नहीं लगता।

से.सिं.- (हल्की मुस्कुराहट) बुरा लगने का तो प्रश्न ही नहीं होता, बल्कि यह तो हमारी सफलता की निशानी है। जितनी अधिक चर्चा होगी, उतनी पब्लिसिटी मिलेगी। पब्लिसिटी आगे बड़े बड़े काम दिलाती है और फिर तरक्की की राह में रोड़े अटकाना, बढ़ते की टांग खींचना लोगों की आदत है, इसमें उन्हें मजा मिलता है। हम तो नके इस मजे का मजा लेते हैं।

रही बात कठमुल्लों की तो उनकी न पूछिए, हर चेंज और तरक्की पर हाय-तौबा मचाना उनकी प्रकृति है, उनका बस चलता तो इन्सान को गुफा-युग से बाहर नहीं निकलने देते, उनकी बकवास का हम कतई परवाह नहीं करते।

इ.क. भविष्य में आपकी क्या योजनाएं हैं।

से.सि.- फिल्म, सीरियल, माडलिंग सभी जगह से अच्छा रिसपांस मिल रहा ह, एक फिल्म रिलीज होने वाली है, बाथरूम और बेडरूम के काफी बोल्ड सीन हैं, उम्मीद है इस फिल्म से मुझे काफी बड़ा ब्रेक मिलेगा।

इ.क.-इस लाइन में आने वाली लड़कियों को क्या पैगाम देना चाहेंगी।

से.सि.-यही कहूंगी कि अपने शरीर की ताकत को पहचानो, इसके समझदारी भरे इस्तेमाल से-कर लो दुनिया मुठ्ठी में।

इ.क.-समय समाप्त हो रहा है, चलते-चलते एक पूर्णतः व्यक्तिगत प्रश्न पूछना चाहता हूं अन्यथा न लीजिएगा। क्या आप अपनी बेटी को ‘सेक्स बम’ बनाना चाहेंगी।

से.सि.- मैं एक अच्छी मां का रोल निभाऊंगी, लालन-पालन,पढ़ाई-लिखाई में कोई कमी नहीं रखूंगी, लेकिन उसके व्यक्ति-स्वातंत्र्य में कोई दखल नहीं दूंगी, वह जो भी बनना चाहेगी उसे खुशी-खुशी मंजूर करूंगी।

(धन्यवाद की औपचारिकता से इंटरव्यू समाप्त हुआ, मैने टी.वी. बंद किया और एक गहरी सांस ली।)

गोविंद शर्मा