साक्षात्कारः लावण्या शाहःजयप्रकाश मानस


लावण्या शाह जी से जयप्रकाश मानस की बातचीत
प्रश्न- लावण्या जी, आप उम्र के इस मुकाम में वह भी विदेशी भूमि में रहते हुए भी रचना-कर्म से संबंद्ध हैं ।
यह हम भारतीयों के लिए गौरव की बात है । लेखन की शुरूआत कैसे हुई ?
अपनी रचना यात्रा के बारे में हमारे पाठकों को बताना चाहेंगी ।
अपनी कृतियों के बारे में विस्तार से बतायें ना !
उत्तर- अन्य लेखक व कवि मित्रोँ से और समस्त पाठकोँ से, मेरे सादर नमस्कार !
मेरी रचना यात्रा के सन्दर्भ में यही कहूंगी कि, भारतसे मेरी भौगोलिक दूरी अवश्य है किँतु,
सं. १९८९ से मैं अमरीका में, विदेशी भूमि पर रहती हूँ। किन्तु अब भी मेरी जन्मभूमि
पुण्यभूमि भारतवर्ष के प्रत्येक प्राँत के प्रति, मेरा आकर्षण व खींचाव उतना ही प्रबल है
जितना भारत की पुण्यदा भूमि पर जन्म लेकर, युवा होने तक रहा ।
अब तो आधुनिक सँचार माध्यमों के उपयोग से यह शारीरिक दूरी भी मानों कम लगने लगी है। यूँ लगता है मानो, विश्वव्यापी, विश्वजाल के उपयोग हेतु आधुनिक सँचार माध्यमों का सँयोजन और आविष्कार हुआ ! शायद बृहत भू- मँडल के बुध्धिजीवी वर्ग को एक समतल ,पृष्ठभूमि प्रदान करना ही इस का आशय बन चुका है।
अन्यन्योआश्रित, विचार व सँप्रेरणा प्रदान करना ही इस मुहीम का आशय हो और उद्भव का हेतु हो, क्या पता ? अब तो कुछ ऐसा ही ज्ञात हो रहा है।
आगे आपने प्रश्न किया कि ” आप उम्र के इस मुकाम में वह भी विदेशी भूमि में रहते हुए भी
रचना-कर्म से कैसे संबंद्ध रख रहीं हैं । ”
उत्तर में यही कहूँगी कि यदि आप मेरे निजी जीवन के बारे मेँ पूछ रहेँ हैँ तो, मैं,
मेरे पूज्य पापाजी पंडित नरेंद्र शर्माजी की यह काव्य पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं कि,
” उम्र का बढना न कह कर, उम्र का घटना कहो !
सफर मेँ हर एक डग को, सफर का कटना कहो ! ”
( पं. नरेन्द्र शर्मा : सम्पूर्ण रचनावली के काव्य सँग्रह ” बूँद ” से साभार ” )
ऐसी अनेक काव्य पँक्तियाँ जो मेरे दिवँगत पिताजी स्व. पॅँ नरेन्द्र शर्माजी की लिखी हुई हैँ
वे दीप ~ शिखा की भाँती, मेरे जीवन पथ को सही दिशा दिखलाते हुए मेरा मार्ग प्रशस्त करतीँ हैँ !
वाग्देवी के प्रति रुझान तथा साहित्य व हिंदी भाषा के प्रति समर्पण, शायद पितासे प्राप्त, नैसर्गिक देन है।
मेरी अम्मा , स्व. श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्माजी ने, एक खास ” बेबी – रेकोर्ड – बुक ” मेँ मेरे बचपन से जुडी कई बातों को रेखांकित किया था उसी में पूज्य अम्माँ ने यह लिखा था कि, ” आज लावण्या, ३ वर्षकी हो गई है
और गंभीरता से कह रही है कि,’ उसने मैँ तो माँ को मेरा मन कहती हूँ रे ! ” ये कविता रची है “~
उसके बाद, जैसे जैसे मैं बड़ी हुई परिवार में सभी सदस्यों ने मेरा साहित्य व पुस्तकों के लिए
जो नैसर्गिक लगाव था उसे पहचाना ! मेरी बडी मौसीजी, स्व. विध्यावती जी पंडित कि जिन्हे हम ” मासीबा ” पुकारते थे, उन्होँने एक बडी सुँदर हल्के पीले रँग की डायरी मुझे उपहार स्वरुप देते हुए आशिष के साथ कहा था कि, ” लावण्या तू इसमेँ अपनी कथा – कहानी और गीत लिखती रहना ”
मैंने उसी डायरी में एक बाल – कथा लिखी थी। यह ३ सहेलियोँ की साहस गाथा थी। एक और कहानी लिखी
” मिनी बिटिया की कहानी ” जो बरसों बाद मेरे कहानी संग्रह ” अधूरे अफ़साने ” पुस्तक में
” सोने का अनार ” शीर्षक से छपी ! मिनी बिटिया की कहानी लिंक देखिये ~ https://www.lavanyashah.com/2009/06/blog-post.htm
तो उसी कहानी से रचना कर्म का श्रीगणेश हुआ। मैँने इस तरह बचपन से लिखना शुरू किया।
आज मुडकर देखती हूँ तब भी वही शैशव के मीठे दिन और उत्साह, को अक्षुण्ण पाती हूँ। मैंने बहुतेरा
लिखकर रखा हुआ है। अब उसे धीरे धीरे छपवा, रही हूँ।
प्रथम कविता ~ सँग्रह, ” फिर गा उठा प्रवासी ” बडे ताऊजी की बेटी
श्रीमती गायत्री, शिवशँकर शर्मा ” राकेश” जी के सौजन्य से, तैयार हुआ ।
” प्रवासी के गीत ” पापाजी की सुप्रसिध्ध काव्य – पुस्तक है। यह गीत ” आज के बिछुडे न जाने कब मिलेँगे ? ” अमर कृति इसी कविता संग्रह में है जिसे हिँदी साहित्य जगत से परिचित हर मनीषी जानता है।
साहित्य प्रेमी जन को यह बत्ताते हुए मुझे अपार हर्ष हो रहा है कि, ‘ मेरा विनम्र प्रयास, मेरे सुप्रतिष्ठित
कविर्मनीषी पिता के प्रति मेरी निष्ठा के श्रध्धा सुमन स्वर स्वरुप हैँ। शायद मेरे लहू मेँ दौडते उन्ही के आशिष , फिर हिलोर लेकर, माँ सरस्वती की पावन गँगाको, पुन:प्लावित कर रहे होँ क्या पता ?
दुसरी पुस्तक ’ सपनों के साहिल ‘ उपन्यास है।
तीसरी पुस्तक कहानी संग्रह ‘ अधूरे अफ़साने ‘ कहानी संग्रह है।
गत वर्ष सुन्दर ~ काण्ड : भावानुवाद का प्रकाशन हुआ।
सं २०२० में पुस्तक ” अमर युगल पात्र ” पुस्तक प्रकाशित होगी।
आगे अपने जीवन से जुड़े ‘ संस्मरण ‘ तैयार कर रही हूँ ।
प्रश्न—साहित्य की किस – किस विधा में आप लिखती है ?
कौन सी विधा आपको अधिक प्यारी है।
उत्तर– यात्रा वृन्तांत, संस्मरण, कहानी, कविता, निबंध इत्यादि सभी लिखा है और जो भी लिखा है।
सच्ची अनुभूति और अभिव्यक्ति से ही संभव हुआ है।
विधा कोई भी हो
प्रश्न– क्या कविता छंद में लिखी जानी चाहिए ?
उत्तर— ‘ कविता ‘ , सच कहूं तो , स्वत : उभरती है ! कविता अगर छंद मे हो तो अच्छी बात है
पर महाप्राण निराला जी ने हिन्दी भाषा की गरिमा बढाने वाली कविताओं से,
छंद मुक्त काव्य का प्रसाद दिया है। जो आज भी उनकी रम्य भव्यता लिए,
मनीषा को मुग्ध करने मे सक्षम है।
सो, यही कहूँगी कि सच्चा काव्य वही होता है जो सदा सर्वदा पाठक के ह्रदय को छू लेता है।
अर्थ लाघव भाषा के प्राण हैं और काव्य है , प्राणों का कम्पन !

आगे आपका प्रश्न सृजन प्रक्रिया के विषय में है तो मेरा विनम्र मत है कि सृजन ~ स्वाभाविक व सहज प्रक्रिया है। उस प्रक्रिया को शब्द बँधन की डोर से बाँधना या उसे समझाना अत्यंत कठिन है। ” सृजन ” कुछ अंशों में व्यक्ति केंद्रित एवं दूरुह प्रक्रिया है। जो रचनाकार हिँदी साहित्य के सवाँगीण विकास के प्रति सजग हैँ, क्रियाशील हैँ व कटिबध्ध हैँ उन का यह कर्म तप के सदृश्य है। साहित्य सृजन यज्ञ सफल हो, यह मेरी इच्छा है। अस्तु: सभी रचनाशील, उद्यमी साथियों को शुभकामनाएं !

प्रश्न- आपकी रचना प्रक्रिया के बारे में बतायें । आप भारत के अलावा इन दिनों विदेश में बस गयी हैं । क्या प्रवासी संसार में आपकी रचनाधर्मिता प्रभावित नहीं होती ? यदि हाँ, तो कैसे ?
जहाँ आप निवसती हैं, वहाँ का सृजनात्मक माहौल क्या है । खास कर हिन्दी, साहित्य लेखन के कोण में ।
उत्तर – प्रवासी भारतीय विश्व के अनेकानेक भूखंडों पर अलग अलग परिस्थितीयोँ मेँ जीते हैं । प्रवासी भारतीयों का अपना अपना आजीविका उपार्जन से जुड़ा कार्य -क्षेत्र भी होता है। उनके कांधों पर
पारीवारिक जिम्मेदारीयाँ और यदि किसी अन्य सँगठन से जुड़े हों तो उस संस्था की कार्य प्रणाली की ज़िम्मेदारियाँ भी होतीं हैँ उनकी सक्रियता समय ले लेती है।
मेरी अपनी कहूँ तो मेरे लिए रचना प्रक्रिया, स्वाँत: सुखाय है। विश्व – जाल के जरिये,
असँख्य हिँदी भाषी वेब – पत्रिकाओँ व जाल घरोँ से मेरा लगातार सँबँध बना रहता है।
जैसे १) – http://www.aparnaonline.com/lavanyashah.html
२ ) http://www.nrifm.com/
Remembering Pt Narendra Sharma: Bollywood’s greatest Hindi poet
Hindi poet Pt Narendra Sharma fought for India’s independence and then
went to Mumbai to write some memorable songs like ‘Jyoti Kalash Chalke’ and ‘Satyam Shivam Sundaram’. Lata Mangeshkar revered him like her father. In this interview, first broadcast on Cincinnati local radio, his daughter Lavanya Shah remembers her legendary father. The All India Radio’s entertainment channel was named by him as ‘Vividh Bharati’. To listen click here (Hindi)
३ ) http://www.manaskriti.com/kaavyaalaya/smritidp1.stm
४ ) http://www.hindinest.com/lekhak/lavanya.htm
५ ) http://www.hindinest.com/bachpan/bodh.htm
६ ) http://www.abhivyakti-hindi.org/phulwari/natak/ekpal01.htm
७ ) http://www.boloji.com/women/wd5.htm

८ ) http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/bachchan/patra_mool.htm

९ ) http://www.abhivyakti-hindi.org/visheshank/navvarsh/vinoba.htm
आजके युग का ” गूगल ” चमत्कारिक आविष्कार अल्लादीन के चिराग की तरह है जो आपको , अँतर्जाल पर, ‘ मेरा नाम, ” लावण्या शाह ” टाइप करने पे तुरँत कई सारी मेरी लिखी सामग्री, तक आप को ले आएगा। सिर्फ चँद क्षणोँमेँ , आपके सामने, मेरी असंख्य रचनाएँ गूगल प्रस्तुत कर देगा।
२१ वीँ सदी के आरँभ मे, लेप टोप के जरिये, समस्त जगत की गतिविधियोँसे जुडना आसान हो गया है। मेरे पति श्री दीपकजी के साथ अक्सर काम के सिलसिले मेँ, हमने उत्तर अमरीका के विशाल भूखंड पर लम्बी लम्बी यात्राएँ कार से कीं हैं। ऐसे में लिखने पढने की सामग्री, हमेशा मेरे साथ रहती है। हाँ साथ विशुध्ध शाकाहारी, खानपान की सुविधा भी अक्सर किये रहती हूँ। आरामदेह हाई वे पर कर सरपट दौड़ती रहती है और काम भी।

पापाजी की कुछ कविताओँ का गुजराती भाषा में अनुवाद भी किया है। गुजराती भाषा मुझे मेरी पूजनीया
अम्मा से विरासत मेँ मिली मेरी मातृभाषा है। पापाजीने हम तीनों बहनोँ को गुजराती माध्यमकी
पाठशाला मेँ ही दाखिला दिलवाया था और उनका कहना था कि, ” पहले, अपनी मातृ भाषा सीख लो
फिर विश्वकी कोई भी भाषा सीखना आसान और सरल होगा ! ”

आगे यह भी कहना चाहूँगी कि, विश्व के पश्चिम गोलार्ध में बसे पाश्चात्य जगत मेँ, अँग्रेजी का वर्चस्व है। भारत और चीनकी उन्नति ने पश्चिमी समाज की आँखेँ खोल दीँ हैं। ऐसे बदलाव में यदि भारत
विश्व का तेजी से सम्पन्न होता हुआ, विकासशील देश है तब, भारत के वैभव व सम्पन्नता मेँ शामिल होना समझदारी का पहला कदम होगा। यह पश्चिमी देशों के राजनेता भलीभांति समझते हैं।
परँतु, मुझे बारम्बार यह विचार भी आता है कि भारतवर्ष मेँ बदलाव आना भी जरुरी है।
हम जानते हैं कि भारत के कई महानगरोँ से पढ लिख कर, शिक्षित वर्ग, जीवन यापन की दौड मेँ
अक्सर विदेशी भूमि पर पहुँचा है। एँजीनीयर, डोक्टर और तकनीकि विशेषज्ञ बहुधा
ब्रिटन या अमरिका आकर तगडा वेतन पाना चाहते हैँ। भले ही, मन से वे भारतीय सँस्कृति से
विलग नही हो पाते, फिर भी परिवार की समृद्धि व खुशहाली के लिये, परदेस आकर बस जाते हैँ।
स्थिती आज के समय में प्रत्येक मुल्क में बदल रही है। खुशी की बात है की आनेवाले कल को,
प्रबुध्ध विश्व नागरिक जैसी अपनी सँतानोँ के भारत की भूमि पर उनके पुनरागमन से
भारतवर्ष को तथा उसकी संतान जो लौट कर पुनः भारत आ कर बसना चाहती है उनके इस निर्णय से
दो तरफ़ा सम्पन्नता बढे। मेरी तो यही प्रार्थना है कि, आनेवाला कल, २१वीं शताब्दि, हमारे
भारतीय संस्कृति की यशोगाथा व गौरव – गाथा बने व जिसे हम और आप साथ साथ देखें।
हिँदी भाषा में लेखन जब तक हिँदी लिखनेवाले और बोलनेवाले, जहाँ कहीँ भी रहेँगेँ,
अबाध गति से आगे बढ़ेगा। आगामी युवा पीढी हिँदी से जुडी रहती है या नहीँ इस बात पर
ही भविष्य के हिँदी लेखन का स्वरुप अधिक स्पष्ट होगा।

प्रश्न- अपने वर्तमान निवास राज्य में आप हिन्दी और हिन्दी साहित्य, संस्कृति और सभ्यता की स्थिति
कैसे मापना चाहेंगी ? २१ वीं सदी में वहाँ हिन्दी का भविष्य कैसा होगा ?
उत्तर – जैसा कि मैँने आगे कहा है, हिँदी भाषा का विकास पहले तो हम भारतीय, भारत मेँ प्रशस्त करेँ। राजधानी नई देहली मेँ ही कितने ऐसे वरिष्ठ नेता हैं जो हिँदी को अपनाये हुए हैँ ? बडे शहेरोँ के अँग्रेजी माध्यम से पढे लिखे लोग, क्या हिँदी को फिल्मोँ के या टी.वी. कार्यक्रमोँ से परे, की भाषा मानते हैँ ?
सोचिये, क्या अगर आप स्वयं उसी वर्ग से होते तब आपका झुकाव हिँदी साहित्य के प्रति इतना ही समर्पित रहता ? हाँ उत्तर भारत हिँदी भाषा का गढ है। हमारी साँस्कृतिक घरोहर को हमेँ, एक सशक्त्त और सम्पन्न भारत मेँ, इस २१ वीँ सदी मेँ, आगे बढाना है।
पश्चिम के सशक्त मुल्क जैसे अमरिका और ब्रिटन को लें तो उन की अपनी अलग सभ्यता है तथा अंग्रेज़ी इन मुल्कों की विकसित व समृद्ध भाषा है। अमरीका के विषय मेँ इतना अवश्य कहूँगी कि, अमरीका
आज, एडी चोटी की मेहनत कर के, विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली महादेश बना हुआ है।
यहाँ, सँगीत की कई विभिन्न शाखाएँ हैँ जिन के कलाकार हर सप्ताह, हर विधा मेँ हजारोँ नए गीत रचते हैँ। लोक प्रसारण के माध्यमोँ का अपने हितमेँ, अपने प्रचारमेँ उपयोग करना इन सभी क्रियाओँ मेँ पश्चिम सिध्धहस्त है। अफसोस की बात यह है कि एम. टी. वी. MTV / CNN जैसे कार्यक्रमोँ की देखादेखी
भारत के मीडीया भी अमरीकी मीडीया तथा कार्यक्रमों अँधा अनुकरण कर रहे हैँ।
सर्वथा भारतीय विषय वस्तु और ढोस तत्वोँ से सँबँधित, सर्वथा भारतीय प्रकार के कार्यक्रम ही कालजयी बन पायेँगेँ। जिस मेँ सार नहीँ वह, काल की लपटोँ मेँ जलकर भस्मीभूत हो जायेगा। ऐसा मेरा मानना है।
हिँदी भाषा के उज्जवल भविष्य के प्रति मैँ आशावान हूँ परँतु, अटकलेँ नहीँ लगाऊँगी।
आखिरकार, आजके हिँदी भाषी क्या योगदान कर रहे हैँ और विश्व की परिस्थीति पर भी आगे
बहुत कुछ निर्भर रहेगा कि हिंदी भाषा की क्या स्थिति होगी। हम जो हिंदी भाषा के उत्थान के लिए
कटिबद्ध हैं उन्हें तो यही याद रख कर कार्य करते रहना होगा कि,” कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन” …
प्रश्न- आप मूलतः गीतकार हैं । आपका प्रिय गीतकार (या रचनाकार) कौन ? क्यों ?
वह दूसरे से भिन्न क्यों है ?
उत्तर -अगर मैँ ये कहूँ, मेरे प्रिय गीतकार मेरे अपने पापा , स्व. पॅँ नरेन्द्र शर्माजी हैं और उनके गीत मुझे सबसे ज्यादा प्रिय हैँ तो अतिशयोक्ति ना होगी। हाँ, स्व. श्रध्धेय पँतजी दादाजी, स्व. क्राँतिकारी कवि,
ऋषि तुल्य निरालाजी, रसपूर्ण कवि श्री बच्चनजी, अपरामेय श्री प्रसादजी , महान कवियत्री आदरणीया महादेवी वर्माजी, श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी विभूतियाँ, हमारे हिँदी साहित्य गगन के
जगमगाते नक्षत्र हैँ जिनकी काँति अजर अमर रहेगी।
( क्यों ?? ) ~ इन सभी के गीतोँ मेँ देवी सरस्वती की वैखरी वाणी उदभासित है। उनकी रचनाएँ ना सिर्फ मेरे लिये, सभी साहित्य प्रेमी जन के लियेउन की कृतियाँ प्रणम्य हैँ।
( वह दूसरे से भिन्न क्यों है ? ) ~ भिन्न तो नही कहूँगी ! अभिव्यक्त्ति की गुणवत्ता, ह्रदयग्राही उद्वेलन, ह्रदयगँम भीँज देनेवाली, आडँबरहीन कल्याणकारी वाणी ! सजीव भाव निरुपण, नयनाभिराम द्र्श्य सजीवन करने की विलक्षण क्षमता, भावोत्तेजना, अहम्` को परम्` से मिलवाने की वायवी शक्त्ति ,शस्यानुभूति, रसानुभूति की चरम सीमा तक प्राणोँ को, सुकुमार पँछीके , कोमल डैनोँ के सहारे ले जानेकी ललक ! और भी ऐसा कुछ, जो वाणी विलास के परे है। ऐसा बहुत कुछ इन अमर साहित्यकारों की कृतियोँ मेँ विध्यमान है।
कव्य सँग्रह ” प्यासा ~ निर्झर ” की शीर्ष कविता मेँ कवि नरेँद्र कहते हैँ,
” मेरे सिवा और भी कुछ है , जिस पर मैँ निर्भर हूँ ~~
मेरी प्यास हो ना हो जग को, मैँ, प्यासा निर्झर हूँ ” ~~
प्रश्न- लंबे समय तक हिन्दी-गीतों को नई कविता वालों के कारण काफी संघर्ष करना पड़ा था । आप इसे कैसे देखती हैं । गीत के भविष्य के बारे में क्या कहना चाहेंगी ?
उत्तर – नई कविता भी तो हिँदी की सँतान है। हिँदी भाषा भारती के ममतामय आँचल तले
उसके हर बालक के लिये स्थान है। क्योँकि, मानव मात्र को, अपनी अपनी अनुभूति को पहले
अनुभव मेँ रच बस कर, रमने का जन्मसिध्ध अधिकार है। उतना ही कि जितना खुली हवा मेँ साँस लेने का !
ये कैसा प्रश्न है की किसी की भावानुभूति अन्य के सृजन मे आडे आये ?
नई कविता लिखनेवालोँ से ना ही चुनौती मिली गीत लिखनेवालोँको नाही कोई सँघर्ष रहा। ” किसी की बीन, किसी की ढफली, किसी के छँद कीसी के फँद ! ” जीवन गतिशील जीवन प्रवाह है हमेँ उसमेँ सभी के लिये, एक सा ढाँचा नहीँ खोजना चाहीये। हर प्राणी को स्वतँत्रता है कि, वह, अपने जीवन और मनन को अपनाये। यही सच्चा ” व्यक्ति स्वातँत्रय ” है। ” बँधन” व नियम मेमन कैद खाँचे तो निषक्रीयता ध्योतक है।
गीत मुझे प्रिय हैं ~ जब तक खानाबदोश व बँजारे गीत गाते हुए, वादियोँमेँ घूमते रहेँगेँ, प्रेमी प्रेमिका
मिलते या बिछुडते रहेँगेँ, माँ बच्चोँ को लोरीयाँ गा कर सुलाया करेँगीँ या बहने, सावन के झूलोँ पर
अपने वीराँ के लिये सावन की कजली गाती रहेँगीँ … या, पूजारी, मँदिर मेँ साँध्य आरती की थाल धरे,
स्तुति भजन गायेँगेँ, या गाँव मुहल्ले भर की महिलाएं, बेटीयोँ की बिदाई पर ” हीर ” गायेँगीँ,
“गीत ” ….गूँजते रहेँगेँ ! ग़ीत प्रकृति से जुडी और मानस के मोती की तरह पवित्र भेँट हैँ।
उनसे भला कौन होगा जो विलग हो पायेगा ?
प्रश्न- हिन्दी के जानेमाने गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा की बेटी होने का सौभाग्य आपके साथ है । आप स्वयं को एक गीतकार या पं.नरेन्द्र शर्मा जी की पुत्री किस रूप में देखती हैं ? और क्यों ?
उत्तर ~ आपने यह छोटा – सा प्रश्न पूछ कर मेरे मर्म को छू लिया है। सौभाग्य तो है ही कि
मैँ पुण्यशाली, सँत प्रकृति कवि ह्रदय के लहू से सिँचित, उनके जीवन उपवन का एक फूल हूँ।
उन्हीँ के आचरण से मिली शिक्षा व सौरभ सँस्कार, मेरे मनोबल को हर अनुकूल या विपरित जीवन पडाव पर मजबूत किये हुए है। उन से ही ईश्वर तत्व क्या है उसकी झाँकी हुई है और मेरी कविता ने प्रणाम किया है।
” जिस क्षणसे देखा उजियारा,
टूट गये रे तिमिर जाल !
तार तार अभिलाषा तूटी,
विस्मृत घन तिमिर अँधकार !
निर्गुण बने सगुण वे उस क्षण ,
शब्दोँ के बने सुगँधित हार !
सुमन ~ हार, अर्पित चरणोँ पर,
समर्पित, जीवन का तार ~ तार !!
गीत रचना ~ लावण्या
प्रश्न- अपने पिता जी के साथ गुजारा वह कौन-सा क्षण है जिसे आप सबसे ज्यादा याद करती हैं । आपके पिता जी के समय घर में साहित्यिक माहौल कैसा था ?
उत्तर ~ मेरे पापा उत्तर भारत, खुर्जा, जिल्ला बुलँद शहर के जहाँगीरपुर गाँवके पटवारी घराने मेँ जन्मे थे। प्राँरभिक शिक्षा खुर्जा मेँ हुई। ईल्हाबाद विश्वविध्यालय से अँग्रेजी साहित्य मेँ M/A करनेके बाद, कुछ वर्ष आनँद भवन मेँ, अखिल भारतीय कोँग्रेस कमिटि के हिँदी विभाग से जुडे और बनारस विश्व विद्यालय में प्राचार्य भी रहे वहीं से युवा कवि नरेंद्र शर्मा को ब्रिटिश साम्राज्य के प्रमुख वाइसरॉय के डायरेक्ट ऑर्डिनेंस के तहत
उन्हें कारावास में फर्स्ट क्लास कैदियों के साथ रखा गया। देवली डिटेंशन जेल राजस्थान प्रांत तथा आगरा जेल में, कवि नरेंद्र शर्मा जी ने कारावास भोगा। १४ दिन अनशन किया जिस में, प्राण गंवाने की घड़ी आते ही, जेल के गोरे अधिकारीयों ने उन्हें, जबरन सूप पिलाकर, हाथ पैर, निर्ममता से बाँध कर ,नलियों द्वारा मुंह से द्रव्य पिलाकर, देशभक्त नरेंद्र को, जेलरों ने ” एक और शहीद न हो जाए ” यह सोचकर, जीवीत रखा। देवली जेल से लिखी कामिनी पुस्तक में ” बंदी की बैरक ” से यह पंक्तियाँ बंदी जीवन अनुभव समेटे हुए है ~
” यहां कँटीले तार और फिऱ खींची चार दीवार
मरकत के गुम्बद से लगते हरे पेड़ उस पार ” और
” एक और दिन आया प्यारे, यह जीवन दिनमान जैसे
हुई सुबह पीलो उड़ आई मेरे पुलकित प्राण जैसे !
खींचे कँटीले तार सामने, चुभते से से शूल जैसे ! ”
राजस्थान देवली डिटेंशन कैम्प जेल मेँ नरेंद्र शर्मा ने अन्य स्वतंत्रता सैनानियों के संग १४ दिनों तक भूख हडताल की थी। वे कमज़ोर हो गए तो बीमार हाल मेँ रिहा किए गए तब गाँव, मेरी दादीजी गँगादेवी से मिलने गये। खुर्जा में नजरबँद रहे। |
भगवती बाबू” चित्रलेखा ” के सुप्रसिध्ध लेखक के आग्रह से सं. १९४३ में नरेंद्र शर्मा बम्बई आए।
बॉम्बे टाकीज़ फिल्म निर्माण संस्था की मालकिन नायिका व निर्मात्री देविका रानी ने
गीतकार पटकथा लेखन के लिए नरेंद्र शर्मा को अनुबंधित किया।
बंबई में गुजराती कन्या सुशीला से वरीष्ठ पँतजी के आग्रह से व आशीर्वाद से पाणि ग्रहण सँस्कार सम्पन्न हुए।
बारात मेँ हिँदी साहित्य जगत और फिल्म जगत की महत्त्व पूर्ण हस्तीयाँ हाजिर थीँ।
दक्षिण भारत से गान कोकिला : सुब्बुलक्षमीजी, नायिका सुरैयाजी, दीलिप कुमार, अशोक कुमार,
सुप्रसिद्ध कथाकार श्री अमृतलाल नागर व श्रीमती प्रतिभा नागरजी, श्री भगवती चरण वर्माजी, सपत्नीक, संगीतकार श्री अनिल बिश्वासजी, निर्माता व नायक गुरुदत्तजी, चेतनानँदजी, देवानँदजी इत्यादी बरात में थे
जैसी भव्य बारात थी उसी प्रकार बम्बई के उपनगर खार में १९ वे रास्ते पर शर्मा दम्पति का आवास
डो. जयरामनजी के शब्दोँ मेँ कहूँ तो, ” हिँदी साहित्य का तीर्थ – स्थान ” बम्बई जेसे महानगर मेँ एक शीतल सुखद धाम मेँ परिवर्तित हो गया वहीं साहित्य मनीषी की अनोखी सृजन यात्रा निर्बाध गति से
६ दशकोँ को पार करती हुई, महाभारत टीवी सीरीझ के प्रसारण के समय सं १९८९ , की ११ फरवरी की
काल रात्रि के ९ बजे तक चलती रही।

आज याद करूँ तब मेरे शैशव के ये क्षण मेरी स्मृति वीथिका मेँ कौँध – कौँध जाते हैँ।
( अ ) हम बच्चे दोपहरी मेँ जब सारे बडे सो रहे थे, पडोस के माणिक दादा के घर से कच्चे पक्के आम
तोड कर किलकारीयाँ भर रहे थे कि, अचानक पापाजी वहाँ आ पहुँचे। गरज कर कहा,
” अरे ! यह आम पूछे बिना क्योँ तोडे ? जाओ, जाकर माफी माँगो और फल लौटा दो ”
एक तो चोरी करते पकडे गए और उपर से माफी माँगनी पडी !!! पर पापाजी की उस दोपहरी में
डाँट का ये असर हुआ कि अपने और पराये का भेद आज तक भूल नही पाए। यही उनकी शिक्षा थी।
( ब ) मेरी उम्र होगी कोई ८ या ९ साल की – पापाजी ने, कवि शिरोमणि कवि कालिदास की कृति
” मेघदूत ” से पढनेको कहा। सँस्कृत कठिन थी परँतु, जहीँ कहीँ , मैँ लडखडाती, वे मेरा उच्चारण
शुध्ध कर देते। आज, पूजा करते समय, हर श्लोक के साथ वे पल याद आते हैँ।
( क ) मेरी पुत्री सिँदूर के जन्म के बाद जब भी रात को उठती, पापा , मेरे पास सहारा देते मिल जाते !
मुझ से कहते, ” बेटा, मैँ हूँ , यहाँ “, आज मेरी बिटिया की प्रसूती के बाद, यही वात्सल्य उँडेलते समय,
पापाजी की निश्छल , प्रेम मय वाणी और स्पर्श का अनुभव हो जाता है।
जीवन अअतित के गर्भ से उदित हो, भविष्य को सँजोता आगे बढ रहा है।
प्रश्न- अपने पिताश्री के साहित्य-वैभव को किस तरह संरक्षण दिया जा रहा है ?
आप या आपका परिवार निजी तौर पर इसमें किस हद तक समर्पित है ?
उत्तर -मेरे छोटे भाई कु. परितोष नरेन्द्र शर्मा ने अथक परिश्रम के बाद, पूज्य पापाजी की,
सभी साहित्यिक कृतियाँ एकत्र कर एक भागीरथ यज्ञ को सँपन्न करने का आरँभ किया है।
मैँ पुत्री होने के नाते, अपना सहयोग दे रही हूँ। भारत सरकार से हमेँ सुझाव मिला था कि,
राजकीय सँग्रह कोष के लिये वे इस साहित्य वैभव को ले जाना चाहते हैँ। परँतु, मेरे भाई ने
उसे सहेज कर रखा और ” “ज्योति ~ कलश ~स्वरूप स्व. पँ. नरेन्द्र शर्मा सम्पूर्ण ग्रँथावली ” का
प्रकाशन किया है। अनुज परितोष ने स्वयं, देहली के प्रकाशकों से, आकाशवाणी स्टाफ से, दूरदर्शन से,
कई सारी दुर्लभ जानकारियां एकत्रित कर, १६ खण्डों में पंडित नरेंद्र शर्मा सम्पूर्ण रचनावली में समाहित किया है। भारत की विभिन्न संस्थाओं व विश्व विद्यालयों के पुस्तकालयों में पहुँच चुकी हैं।
प्रश्न- भारत में रचे जा रहे हिन्दी गीतों को तो आप पढ़ती ही होंगी । आप तब और अब हिन्दी गीतों में क्या अंतर देखती हैं ? एक श्रेष्ठ गीत की विशेषता क्या होनी चाहिए ?
उत्तर ~ भारत के ज्यादातर गीत, या तो अन्तर्जाल के विभिन्न जाल घरोँ के माध्यम से, या फिल्मी गीतोँ के जरिये ही विदेश मेँ पहुँच रहे हैँ – दुसरा साहित्य प्राप्त करने के कडे प्रयास करने पडते हैँ।
एक श्रेष्ठ गीत की विशेषता या की महत्ता यही है कि, जो दिलोदीमाग मेँ बस जाये।
देर तक हम जिसे गुनगुनायेँ, कालजयी साहित्य हो या एक श्रेष्ठ गीत !
विशेषता दोनोँ की खास बात यही होती है जो गीत की रचना, उसकी गेयता और माधुर्य ही हमेँ बाँधे रखते हैँ।
प्रश्न- समकालीन अँगरेज़ी साहित्य से तो आप अवगत होती होंगी ही । शायद पढ़ती लिखती भी होंगी । इस प्रसंग में आपकी टिप्पणी क्या है ? अंगरेज़ी साहित्य और हिन्दी साहित्य की विभाजन रेखा कहाँ है ?
उत्तर ~ हर प्राँत के अपने अनुभवोँका साहित्य , ” दर्पण ” होता है। अँग्रेजी साहित्य लेँ तब मध्य युगीन व नए पुन: स्थापित युरोपीय प्रजा से बसे अमरीका के साहित्य मेँ भी काफी अँतर है। वीक्टोरीयन साहित्य मेँ
गृहस्थ जीवन के प्रति आदर, आदर्शवाद के गुलाबी चश्मे से दुनिया के नजारे देखना, अब मासूम लगता है।
अमरीका, गणराज्य की सार्वभोमिकता, स्वाधीनता, अबाध गति से २०० वर्षोँ से अधिक समय हुए,
चली आरही है। २ विश्व – युध्ध, आँतरिक युध्ध के बाद , अश्वेतोँ की आजादी के बादतकनीकी विकास,
व्योम व अंतरिक्ष में अवकाश पर पहुँच, चँद्रमा पर विजय पताका लहराती हुई, तकनीकी अगवानी के साथ समाज की बदलती हुई छवि उभरना अनिवार्य सा था।
भारत को आजाद हुए अभी कुछ दशक ही हुए हैँ। प्रगति हो रही है। उन्नति अवश्य होगी।
साहित्य सृजन भी अनुरुप होगा। इन दोनो के बीच की विभाजन रेखा साँस्कृतिक है। जिसे आजका आधुनिक रचनाकार, लाँघने को उध्ध्यत है। सफलता कितनी मिलेगी यह मैँ नहीँ कह सकूँगी।
क्योँकि, अमरीका मेँ रहती जरुर हूँ परँतु, आज भी, मैं नारी मन के, गुप्त भावोँ को प्रकट करता हुआ
साहित्य मैँ नहीँ लिखना चाहती। यह मेरा अपना रवैया है। शायद आप मुझे ” पुरातनपँथी ” कहेँ,
तो वही सही ! ज़ो एसा साहित्य लिख्नना चाहते हैँ उनसे मेरा विरोध भी नहीँ। ” तुँडे तुँडे मतिर्भिन्ना ”
प्रश्न- कहते हैं अब पठनीयता खासकर साहित्यिक बिरादरी में कम हुई है । इसे आप किस तरह लेती हैं ?
उत्तर – साहित्यिक बिरादरी के लोग अब शायद अन्य कार्य – क्षेत्रोँ से जुड कर , आजके महत्त्वपूर्ण विधाओँ से कुछ नया सीख रहे होँ — क्या पता ?आज का युग, मशीन युग से भी आगे, सँचार व सम्प्रेषणाओँ का युग है। मनुष्य भौतिक सुख भोग, स्व केन्द्रीत आत्मानुभूतियोँ से समाज से जुडे रहकर भी स्वेच्छाचारी बना है। स्वतँत्र निर्णय लेने का हर इंसान हिमायती होता जा रहा है। युग बदला है, और जोर जबर्दस्ती से नहीँ
मगर जब साहित्य आकर्षण का केन्द्र बिँदू बनेगा तब शायद झुकाव भी ज्यादा होगा।
जिस किसी को भी साहित्य के प्रति भक्ति भाव य समर्पण भाव हो उसे बाहरी गतिविधियोँकी
चिँता किये बिना ,एक लक्ष्य को सामने रख कर अपना काम इमानदारी से करते रहना चाहिये। ये मेरा मत है।

प्रश्न- कहते हैं आजादी के बाद भारत अन्दरुनी तौर पर कमजोर हुआ है पर सारे जहान में इसका कद बढ़ा है ? यह कैसा अंतर्विरोध है ? वह कौन –सी अच्छाई है जो पश्चिम में है किन्तु यहाँ भारत में नहीं ? और वह कौन-सी बुराई है जो पश्चिम में किन्तु भारत में नहीं ।
उत्तर~ नाही तो मैँ कोई विशेषज्ञ हूँ ना ही प्रकाँड विद्वान !! मैँ एक साधारण स्त्री के अपने अनुभवोँ से
तौलकर मेरी बातें आपके सामने रख रही हूँ। आशा करती हूँ कि, पाठक गण मेरी जीवन परीक्षा मेँ,
मुझे, अपने समकक्ष खडा रहने देँगेँ। टिप्पणीयोँ से वे भी ज्ञान- वर्धन करेँगेँ।
हर पाठक के अभिप्राय से कुछ सीखने की आशा है। तो हाँ, आपके प्रश्न के उत्तर मेँ यही कहना चाहूँगी कि, बदलाव के पहले, घर्षण होता ही है। सँघर्ष के बिना क्राँति और अँतर्द्वँदोँ के बाद ही निष्कर्ष निकलता है। आशावान हूँ तो यही कामना है कि, भारत भूमि पुनः ” शस्य श्यामला स्वरुप ” मेँ परिमार्जित हो। सम्पन्न हो। किसी भी एक देश मेँ, या व्यक्ति मेँ, सभी अच्छाईयाँ होँ ये असँभव सी बात है।
भारत के पास प्राचीन सँस्कृति के विभिन्न वरदान हैँ। पाश्चात्त्य देशोँ ने कटु अनुभवोँ की दुर्गम लडाईयाँ लडी हैँ। विश्व – युध्धोँ के दर्म्यान, हर पुरुष ने पराई धरती पर मर खप कर, स्वाधीनता की ध्वजा को, उठाये रखा था। जब कि, स्त्रियों ने फेक्टरी, कारखानोँ और खेत खलिहानोँ मेँ काम किया, बालकोँ को पाला पोसा, बडा किया। ये आसान तो नहीँ था। पश्चिमी समाज व्यवस्था मेँ इन युद्धों के कारण असंख्य परिवर्तन हुए।
भारत मेँ कर्मठता का बोध, जागा है। स्त्री शक्ति को लाँछित य अपमानित ना करके, उन्हे सक्षम बनाते हुए, पश्चिम के स्वयम पर प्रमाणित अनुशासन से सीख कर, २१ वीँ सदी के काल को नए नजरिये से देखना जरुरी है।
हाँ पश्चिम की, समाज के कुछ वर्ग और तबकोँ मेँ आध्यात्मिक अनुशासनहीन अराजकता को नकारना भी अनिवार्य है। सँम्`-लैँगिक विवाह, विवाह – विच्छेद, १ ही वरिष्ठ / मुखियावाला परिवार, कामसाधनोँका असीमित, अविवेकी उपयोग, सँवेदनहीन मानसिकता से उपजी कोरी भाव शून्यत, जीवन के प्रति गहरी उदासीनता, सिमटते पारिवारिक दायरोँ मेँ पनपती घुटन, इत्यादि भी इसी पश्चिम की विशिष्ट्ताएँ हैँ।उनसे बच कर, उनको लाँघकर, आगे निकलते हुए, भारतीय या पूर्व के सुविचार / सँस्कारों को सहेजे हुए
हम अबश्य, सुखद मनोनभूमि पर आ पायेँगे यह मेरा विश्वास है।
प्रश्न- इन दिनों वैश्वीकरण, विश्व बाजार, उदारीकरण और कंप्युटर प्रौद्योगिकी का नारा सकल जहान में तैर रहा है, एक दीर्घ अनुभवी, बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी होने के कारण इसे आप किस नज़रिए से देखती हैं ? खास कर भारत जैसे नवविकासशील देश के परिप्रेक्ष्य में
उत्तर~ आपने तो इतने सारे अलँकरण मुझे पहना दीए !!!” एक दीर्घ अनुभवी, बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी ” कह कर उन के लिये आपकी आभारी हूँ। भारत को आज विश्व के सामने अपनी प्रतिभा दीखलाने का अवसर इन्हीँ ” कंप्युटर प्रौद्योगिकी” – ” उदारीकरण ” etc . से मिला है। परँतु याद रहे, यह विश्व के बाजार मेँ हर विक्रेता अपनी मँडी सजाये, अपना सामान बेचनेकी पहल मेँ पैँतेरे आजमा रहा है। अगर अमरीका का हथियारोँ के उपत्पादन मेँ अग्रणी स्थान है तो युध्ध कहीँ भी हो, अपने आयुध बेचकर फायदा तो लेगा ही ? चीन भले ही छोटे मोटे लघु उध्योग कर , निकास बढा ले, पर २० जम्बो जेट खरीद कर वही धन फिर BOEING CO.
( बोइँग कम्पनी ) को मिल जायेगा। हाँ इतना जरुर हुआ है कि, आज जो भी घटना घटती है, वह दुनिया के
हर अखबार मेँ सुर्खीयोँके साथ छप जाती है। इस लिहाजसे, ” वैश्वीकरण, विश्व बाजार,” शब्द
अवश्य चरितार्थ हुए हैँ।
प्रश्न- अन्य वह बातें जो आप हम सबके बीच बाँटना चाहेंगी ।
उत्तर- सभी को धन्यवाद कहना चाहूँगी। चूँकि आपने इतनी धैर्यसे मेरे उत्तरोँको सुना / पढा।
आज यहीँ बातोँ का सिलसिला समाप्त करते हैँ कुछ बडे गँभीर मुद्दे उठाये गए हैँ
अन्य लोग भी अपने विचार रखेँ उत्तर मैँ भी पढना चाहूँगी ताकि कुछ नया सीख पाऊँ।
अब आज्ञा .. सद्` भावना एवं शुभ कामना सहित …
” शुभम्` -अस्तु : इति ”
– लावण्या
– Lavnis@gmail.com


प्रश्नकर्ताः जयप्रकाश मानस
( कवि. लेखक व संपादकः सृजनगाथा. कौम)