साक्षात्कारः रामदरश मिश्र-ओम निश्चल

मेरे अनुभव की दुनिया बहुत बड़ी है
सुपरिचित लेखक रामदरश मिश्र जी से एक बातचीत

हिंदी के सुपरिचित कवि कथाकार आलोचक गद्यकार रामदरश मिश्र ने विगत 15 अगस्‍त को उम्र की 96वीं वर्षगांठ मनाई। वे 15 अगस्‍त 1924 को गोरखपुर के डुमरी गांव में जनमे। काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय से पढ़े। गुजरात में आठ साल अध्‍यापन किया। फिर दिल्‍ली आए। गुजरात में उन्‍हें बहुत स्‍नेह और आदर मिला। पर दिल्‍ली आए तो यहीं के होकर रह गए। बहुत सारी पुस्‍तकें यहीं रह कर प्रकाशित हुईं जिनकी संख्‍या कोई सौ तक पहुंच रही होगी। कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, संस्‍मरण, डायरी, यात्रा विवरण, आत्‍मकथा, निबंध सभी विधाओं को उन्‍होंने अपनी रचनाओं से मालामाल किया है। वे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्‍य रहे हैं और अपने उपन्‍यासों के लिए उनकी भूरि भूरि सराहना भी पाई है। सात दशकों के लेखन ने उन्‍हें बहुत प्रतिष्‍ठा दी है। पौने दो सौ से ज्‍यादा शोध प्रबंध उन पर लिखे गए हैं तथा तमाम पुस्‍तकें । उन्‍हें अब तक सभी प्रतिष्‍ठित पुरस्‍कार-सम्‍मान मिले हैं, यथा, भारत भारती, साहित्‍य अकादेमी, दयावती मोदी कवि शेखर पुरस्‍कार, व्‍यास सम्‍मान, शलाका सम्‍मान सहित अनेक पुरस्‍कार। पर लेखक होने के किसी आडंबर से रहित रामदरश जी मिलनसारिता में दिग्‍गज लेखक रामविलास शर्मा की कोटि में आते हैं कि बिना पूछे भी मिलने चला गया लेखक उनसे मिल कर एक सच्‍चे और बड़े लेखक से मिलने के उल्‍लास से भर कर लौटता है। अभी वे सक्रिय हैं, फुर्सत के समय कविताएं ग़ज़लें लिखते हैं, संस्‍मरण टॉंकते हैं, डायरी लिखते हैं, मिलने वाले को अपनी ताजा कविताएं सुनाते हैं। मिलने आ गए लोगों के साथ प्रसन्‍नता से बोलते बतियाते हैं। 87 वर्षीया पत्‍नी सरस्‍वती उन्‍हें अक्‍सर दुनियावी जंजाल से मुक्‍त रखती हैं तथा उनके लिखे की प्राय: पहली पाठिका होती हैं। उन पर उन्‍होंने एक उपन्‍यास भी लिखा है : एक बचपन यह भी। उनकी 96वीं वर्षगांठ पर उनसे उनके घर पर हुई एक एक्‍सक्‍लूसिव बातचीत।

ओम निश्‍चल: जो समय बीत गया है, जिससे होकर आप गुजरे हैं, जिसके आप द्रष्‍टा और भोक्‍ता रहे हैं, उसे आप आज किस तरह देखते हैं?

रामदरश मिश्र : मेरे समय के दो हिस्‍से हैं। एक हिस्‍सा वह है जब मैं घूमने फिरने में, आने जाने में कभी सक्रिय रहा और गोष्‍ठियों-सभाओं में भी जाया करता था और अपने समय के अनेक साहित्‍यकारों से मिलना जुलना होता था, आना जाना होता था तो उन दिनों का मेरा अनुभव है कि वह बडा अच्‍छा समय था। उन दिनों अच्‍छे कवि और गद्यकार तो थे ही, उनमें आपस में बडा भाईचारा था। एक पारिवारिकता थी। मैं माडल टाउन में था, उस समय अनेक स्‍थानों से अच्‍छे साहित्‍यकार, नए नए लेखक आ गए थे और आए दिन गोष्‍ठियां होती थीं। लोग एक दूसरे को सुनते सराहते थे। यहां तक कि शहर के, बीच के बडे बड़े साहित्‍यकार आते थे हमारे घर । कई बड़े साहित्‍यकार आए, उनसे बातचीत हुई। तो मेरे ख्‍याल से वह समय मुझे बहुत मूल्‍यवान लगता है।

उससे पहले का भी समय बहुत प्रीतिकर था जब मैं बनारस में था। वहां हम नए साहित्‍यकार उठ रहे थे, और एक दूसरे से शक्‍ति प्राप्‍त कर रहे थे। कह सकता हूं कि हम लोगों के बनने की प्रक्रिया में उन गोष्‍ठियों का बडा हाथ था जो प्राय वहां होती रहती थीं । अब इस समय तो मैं घर में बंद-सा हो गया हूँ
। लोगों के यहां आना – जाना भी अब नहीं हो पाता है। इसके साथ ही जो इस वक्‍त लिखा जा रहा है, चाहे वह कविता हो या कथा साहित्‍य हो, उससे सम्‍यक रूप से गुजरने का अब अवसर नही मिल पाता है। अवसर तो है लेकिन मन को वह अवसर प्राप्‍त नही हो रहा है और मुझे यह भी लगता है कि इस वक्‍त साहित्‍यकारों के मिलने जुलने का, एक-दूसरे के साथ हो लेने का परिदृश्‍य सूना हो गया है। अगर परिदृश्‍य है तो भी उन लोगों का है जो एक विचारधारा के हैं, यानी अलग-अलग विचारधाराओं के साहित्यकारों का परस्‍पर साहचर्य अब दिखाई नहीं पडता।

प्रश्न- इन दिनों घर में होते हुए भी आप कितने सर्जनात्‍मक बने हुए हैं। कविताओं, ग़जलों व डायरियों में रमे रहना । लोगों के साथ बैठना तो अपने जमाने से लेकर आज तक के साहित्‍यिक परिदृश्‍य पर बात करना–इस सर्जनात्‍मक सक्रियता का क्‍या रहस्‍य है?

जब से मैंने अवकाश प्राप्‍त किया तब से लेकर आज तक के समय के कई आयाम हैं। अवकाश प्राप्त करने के पश्‍चात मैं अपनी सर्जना में बहुत सक्रिय हो उठा था । अनेक कविता संग्रह आए। अनेक उपन्‍यास आए। अनेक कहानियां आई और गद्य की अनेक विधाओं में भी रचनाएं आईं। लेकिन धीरे-धीरे अब स्‍वास्‍थ्‍य का शैथिल्‍य अनुभव करने लगा हूँ और केवल कविता और डायरी लेखन तक अपने को सीमित कर रखा है और अब तो वह भी संभव नहीं दीखता — तो कई बार मुझे लगता है मेरे दिन यों ही बीत रहे हैं। कभी कुछ पढ लिया, कभी लेट गए, कभी पत्‍नी के साथ बैठ कर बातें कर लीं। कभी आप जैसे मित्र आ गए तो देर तक गपशप का आनन्‍द लिया । अब तो मुझसे टहलना भी छूट गया है। डर लग रहता है कि कहीं गिर न पडूँ और कभी-कभी यों ही अपनी पुरानी फाइलें खोल कर बैठ जाता हूँ और उनसे गुजरने लगता हूँ। आप या अन्‍य साहित्‍यकारों द्वारा लिखित आलोचनाओं का आनंद लेने लगता हूँ। मेरी ग़ज़ल का एक शेर है —

मन कहता हूँ अभी जवां-सा ये चहिए और वो चहिए
तन कहता है, बहुत पा चुके अब तो चुप बैठे रहिए।

पर मेरे गीत की एक पंक्‍ति है :
चुप मगर इस बावरे मन से रहा जाता नहीं है —
तो यदि कुछ नही लिखता हूँ तो भी मन भीतर-भीतर एक सर्जनात्‍मक स्‍वाद अनुभव करता रहता है।

प्रश्नृ- पर इसके बावजूद हर साल आपकी कुछ किताबें आ जाती हैं, आपके ऊपर कुछ पुस्‍तकें भी। रचनात्‍मक सेलीब्रेशन का आपका यह रुख बहुत अच्‍छा लगता है ?

मिश्र : देखिए! जो किताबें आ रही हैं, उनमें से अधिकांश वे हैं जो मेरी पूर्व सर्जना पर आधारित हैं। यानी कविता समग्र आया तो उसमें कुछ नया नहीं है। लिखी गयी कहानियों का कहानी सम्रग्र नाम से प्रकाशन हो रहा है और इन कहानियों में से नई-नई किताबें बनती रहती हैं; तो अधिकांश पुस्‍तकें इसी तरह की आ रही हैं। लेकिन जैसा मैंने कहा कि इस वक्‍त कोई कविता लिख लेता हूँ, कोई अच्‍छा संदर्भ आता है तो उसे डायरी में उतार देता हूं। बातचीत के क्रम में भी मैं बहुत कुछ कह जाता हूँ, जैसे आज आपसे ही बात कर रहे हैं तो चीजें निकल रही हैं। अब ये जरूर है कि प्रारंभ में तो लेखक को प्रकाशक खोजना पडता है। बाद में प्रकाशक लेखक के पीछे पड़ जाते हैं। तो इस समय अनेक प्रकाशकों के आग्रह से भी कुछ न कुछ देने की स्‍थिति बन जाती है। इसीलिए पहले की रचनाओं में से कुछ चयन करके उन्‍हें दे देता हूँ। यह भी होता है कि कुछ सहृदय आलोचक बार-बार मेरी प्रशंसा में कुछ लिखते रहते हैं । उस माध्‍यम से भी मेरी सर्जना की छवियां उभरती रहती हैं। आप सामने बैठे हैं। मुँह देखी बात होगी लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि आपने मेरे साहितय को बहुत अंतरंग भाव से देखा है और बहुत सघन और विस्‍तार के साथ मेरी अनेक विधाओं की रचनाओं पर विचार किया है और लिखा है। तो सच कहूँ तो स्‍वयं मुझे भी आप लोगों के माध्‍यम से अपनी सर्जना के महत्‍व को पहचानने का सुख मिलता है।

प्रश्न- कई शहरों में रहे। पढने के लिए बनारस में, नौकरी के निमित्‍त गुजरात जाना पड़ा। फिर दिल्‍ली आए और अब तो यहीं के होकर रह गए हैं। पर मैं पूछूँ कि इन तीनों में किस शहर में लोगों का सबसे ज्यादा प्‍यार मिला जो आज भी आपका पीछा करता है, तो आप क्‍या कहेंगे?

ओम जी, बनारस मेरे बनने के दिन थे और हम नए साहित्‍यकारों की एक मंडली थी। मैं कह चुका हूँ कि हम लोगों का परस्‍पर मिलना जुलना, गोष्‍ठियों में शिरकत करना बहत अच्‍छा लगता था। इस सिलसिले में मैं एक नाम अवश्‍य लूँगा। वह है भाई ठाकुरप्रसाद सिंह का । उनका प्‍यार, उनकी मस्‍ती, लोगों को और विशेषतया मुझे बहुत ताजगी देती थी और सबसे बडी बात यह थी कि वहां हम लोगों को गुरुदेव आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का शिष्‍यत्‍व प्राप्‍त था। मैं चाहता रहा कि नौकरी बनारस में ही लगे। लेकिन नियति को कुछ और स्‍वीकार था, मुझे नौकरी के लिए गुजरात जाना पड गया। वहां आठ वर्षों के निवास की अनूभूति में दुख भी है सुख भी है। दुख शुरु में स्‍थापित होने का था, किन्‍तु बाद में गुजरात ने मुझे बहुत प्‍यार दिया। वहां नौसारी से लेकर राजकोट तक के छात्रों में मेरी व्‍याप्‍ति हो गयी थी और जो मेरे छात्र निकले उन्‍होंने मुझे बहुत सम्‍मान दिया। आज भी गुजरात का बहुत घना प्‍यार मुझे प्राप्‍त है। एक बार अपने प्रिय शिष्‍य भोला भाई पटेल से मैंने कहा कि गुजरात ने मुझे बहुत प्‍यार दिया तो उन्‍होंने कहा कि आपने भी गुजरात को बहुत प्‍यार दिया। हिंदी जगत से बहुत से लोग वहां अध्‍यापन के लिए गए लेकिन वहां के छात्रों ने आपसे जो प्‍यार की अनुभूति प्राप्‍त की, वह विरल है। मुझे बहुत गर्व है कि भोला भाई पटेल, रघुवीर चौधरी, महावीर सिंह चौहान और अनेक प्रतिभाशाली छात्रों का गुरु होने का मुझे सौभाग्‍य मिला। उन छात्रों के शिष्‍यों के शिष्‍य भी मुझे बहुत प्‍यार दे रहे हैं।

एक बात बताऊँ आपको ! एक गोष्‍ठी में कवि बद्री नारायण मिल गये । उन्‍होंने छूटते ही कहा, ”मिश्र जी मैं गुजरात गया था और आपके प्रति वहां का प्‍यार देख कर मैं दंग रह गया।” वहां से दिल्‍ली आने का मन तो नही था, किन्‍तु आना पड़ा; और जब मैं आ रहा था तो भाई उमाशंकर जोशी ने कहा था कि मिश्र जी, ”आप यहां से जा रहे हैं तो हमें दुख तो हो रहा है लेकिन आपकी असली जगह वही है।” इस कथन का अर्थ शायद यह था कि यहां हमें बड़े-बडे साहित्‍यकारों का साथ मिलेगा, चुनौतियां मिलेंगी, छपने की सुविधाएं मिलेंगी। दिल्‍ली ने शुरु में तो बहुत तकलीफ दी लेकिन धीरे-धीरे यह भी भा गयी और साहित्य जगत में मैं अपने को महसूस करने लगा। यहां मेरी सारी पुस्‍तकें छपीं। सुधी पाठकों, आलोचको, साहित्‍यकारों की प्रीतिकर प्रतिक्रियाओं से मैं अपने साहित्‍य के मूल्‍य की प्रतीति करने लगा। यहां भी अच्‍छे शिष्‍य मिले, अच्‍छे मित्र मिले। लेकिन मैं बलपूर्वक कहता हूँ कि आठ साल के गुजरात निवास में जो प्‍यारे शिष्‍य मिले, वे दिल्‍ली के लंबे निवास-काल में नहीं मिल पाए।

प्रश्न- पहले का जो साहित्‍य था, उसकी आज भी एक मूल्‍यवत्‍ता है। पुराने लेखकों को आज भी लोग पढ़ते हैं, सूर, तुलसी, कबीर, प्रेमचंद, भगवतीचरण वर्मा, बच्‍चन, अमृतलाल नागर, शिवानी, धर्मवीर भारती को लोग आज भी पढ़ रहे हैं। पर आज जो लिखा जा रहा है उसे क्‍या आगामी पीढ़ियॉं उसी तरह पढेंगी जैसे आज के लोग पुराने लेखकों को?

जो सवाल आपने पूछा है वह अपने से लगातार पूछता हूँ। यह चाहे मेरी रुचि का सवाल हो, चाहे आज की मेरी अध्‍ययन संबंधी उदासीनता का सवाल हो; मैं बार बार कहता हूं, अनुभव करता हूं कि उस साहित्‍य की सीमा नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, भवानीप्रसाद मिश्र, गिरिजाकुमार माथुर, मुक्‍तिबोध और अज्ञेय तक आकर रुक जाती है— जो आज भी पढा जा रहा है और कल भी पढा जाएगा। यह सही है कि पठनीयता का जो स्‍तर मध्‍यकाल के कवियों में है या आधुनिक काल के आरंभ के व बीच के कवियों में है, वह यहां भी मंद पड गया है। मैंने कहा कि आज जो कविताएं लिखी जा रही हैं उनसे मैं सम्‍यक रूप से गुजर नही पाता हूँ। इसलिए बहुत निर्भान्‍त रूप से यह नहीं कह पा रहा हूँ कि इनमें से कल क्या बचेगा और क्‍या जाएगा। पर आज के बहुत से सतही लेखन को देख कर कभी कभी मैं भी यह सोचता हूँ कि कौन पढेगा भला ऐसे लोगों को जिनकी रचनाओं में वह रसायन नहीं है जो पहले के साहित्‍य की तरह लोगों को जोड़ता था, कनेक्‍ट करता था।

प्रश्न- आजकल बेस्‍ट सेलर का दौर है। बेस्‍ट राइटिंग का नहीं। बेस्‍ट सेलर बनाम बेस्‍ट राइटिंग के बीच के बढ़ते अंतराल पर क्‍या कहेंगे ?

मैं अभी पठनीयता की जो बात कह रहा था उस संदर्भ में मैं यह कहना चाहूंगा कि कथा साहित्य का स्‍वरूप ऐसा होता है कि कमजोर कहानियां और कमजोर उपन्‍यास तो कुछ दूर तक पाठक को अपने में रमा लेते हैं क्‍योकि उनमें कथातत्‍व होता है। यह भी सही है कि महान उपन्‍यास या महान कहानियां या महान कविताएं लगातार नहीं आती हैं, कभी कभी आती हैं। अब देखिए, ‘रागदरबारी’ के बाद जो श्रीलाल शुक्‍ल ने लिखा वह क्‍या है? मैला आंचल के बाद रेणु ने जो लिखा वह क्‍या है? तो महान साहित्‍य अपनी जगह पर है लेकिन उस साहित्‍य का भी अपना महत्‍व है जो महान न होकर भी अपने समय, अपने समाज की वास्‍तविकताओं से गुजरता हुआ कोई लोक खड़ा करता है।

जहां तक बेस्‍ट सेलर और बेस्‍ट राइटिंग का सवाल है, बेस्‍ट सेलर के संबंध में दो बाते मैं कहना चाहता हूं । एक तो यह कि प्रकाशन ने जिस पुस्‍तक को बेस्‍ट सेलर घोषित किया है, उसकी जांच करने कौन जा रहा है? प्रचार के लिए भी प्रकाशक बेस्‍ट सेलर की घोषणा कर सकता है। कमलेश्‍वर का उपन्‍यास ‘कितने पाकिस्‍तान’ आया था तो प्रकाशक की ओर से घोषणा होने लगी कि यह दूसरा संस्‍करण है, तीसरा संस्‍करण है, चौथा संस्करण है आदि आदि तो मैंने एक प्रकाशक से पूछा कि यह सब क्‍या है। उसने कहा, पचास-सौ किताब छाप कर भी एक संस्‍करण होता है, तीन सौ किताब का भी एक संस्‍करण होता है और आज तो सचमुच ही 300 प्रतियों के संस्‍करण छप रहे हैं। तो बेस्‍ट सेलर का मर्म प्रकाशक ही समझता है।

दूसरी बात यह कि बेस्‍ट सेलर होना तब अच्छा लगता है जब कि वह अच्‍छा साहित्‍य भी हो । जैसे प्रेमचंद हैं। बेस्‍ट सेलर भी हैं और बेस्‍ट राइटर भी हैं। किन्‍तु बेस्‍ट सेलर में वे तमाम किताबें भी आ जाती हैं जो फार्मूलों से लिखी गयी होती हैं और जिनके पाठक बहुत हल्‍की फुल्‍की रुचि वाले होते हैं। तो बेस्‍ट सेलर होने के साथ बेस्‍ट राइटिंग का होना भी जरूरी है। वही मूल्‍यवान है। कई बार कई कृतियों को वह प्रचार नही मिल पाता जैसा उन्‍हें मिलना चाहिए। प्रकाशक या आलोचक उनके बारे में चुप रहते हैं। लेकिन वे धीरे धीरे अपने महत्‍व को, अपनी मूल्‍यवत्‍ता को उजागर करती चलती रहती हैं। मैं अपने तई कहूं कि कभी किसी ओर से मेरी कृति को बेस्ट सेलर की उपाधि नही मिली लेकिन मुझे अपने उपन्‍यासों का महत्‍व मालूम है। मुझे मालूम है कि उन उपन्‍यासों में मेरा समय है, मेरा गांव है, मेरा शहर है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवदी जी ने मेरे दोनों उपन्‍यासों ‘जल टूटता हुआ’ और ‘अपने लोग’ पर लिखते हुए उसके विशेष समय और समाज संबंधी महत्‍व को रेखांकित किया था। अपने लोग जब आया था तो उसकी बडी चर्चा हुई थी। काफी लोग उस पर बोले। लेकिन वह कुछ खास आलोचकों की निगाह में अनुपस्थित ही रहा।

प्रश्न-प्राय: लेखकों को यह कहते सुना जाता है कि आलोचना ने उनके साथ न्‍याय नहीं किया, वे उपेक्षा का शिकार रहे। इस बारे में आपके क्‍या अनुभव रहे हैं?

ओम जी, मैं अपनी उपेक्षा के बारे में सोचता ही नहीं हूँ। क्‍योकि मुझे अपने लेखन पर बहुत गहरा विश्‍वास है । मैं अपनी कविता और गद्य विधाओं की रचनाओं को लेकर बडा भरा-पुरा अनुभव करता हूँ। उपेक्षा की दो दिशाएं हैं। एक तो यह कि कुछ खास तरह के लोग यानी किसी एक खास विचारधारा मे बंद व आपस में जुडे हुए लोग अपने दल से बाहर की रचनाओं को न देखते हैं, न उनकी चर्चा करते हैं। दूसरी बात यह कि क्‍या जिन रचनाओं की उपेक्षा की जा रही है वे वास्‍तव में उपेक्षा के योग्‍य हैं। ? नहीं हैं ना? इसलिए आप के समेत अनेक आलोचकों ने मेरी रचनाओं का बहुत गहरा विवेचन किया है, उनकी मूल्यवत्‍ता की पहचान की है । अनेक समीक्षात्‍मक पुस्‍तकें मेरे साहित्य पर आई हैं। लगभग पौने दो सौ के करीब मेरे साहित्‍य पर शोध प्रबंध लिखे गए हैं। अनेक पत्रिकओं ने विशेषांक निकाले हैं। अनेक भाषाओं में मेरे उपन्‍यासों, कहानियों व कविताओं के अनुवाद हुए हैं। अनेक विश्‍वविद्यालयों के विभिन्न कक्षाओं में पढाए जाते हैं। इतनी बड़ी दुनिया का प्‍यार मुझे मिला है, तब कुछ तथाकथित और अपने को बहुत विशिष्‍ट मानने वाले आलोचको की परवाह कौन करता है।

एक बात इस संदर्भ मे और कहना चाहूंगा कि मैं हर तरह से घर घुसरा आदमी हूं। अपने को घर में सीमित कर लेखन करता रहता हूँ। उस भाग-दौड से बचता हूँ जिसके तहत अनेक लोग जल्‍दी ही कुछ पा लेते हैं। यह बात ध्‍यान देने की है कि कुछ खास तरह के प्रभावशाली लोगों की उपेक्षा के बावजूद थोड़े समय बाद ही मुझे भी अपने आप बहुत कुछ मिलता गया है। पुरस्‍कार के लिए जो भाग दौड मची रहती है उसे आप भी जानते हैं। लेकिन मैं बहुत स्‍वाभिमान के साथ कह रहा हूं कि मैने कहीं पुरस्कार या अन्‍य किसी लाभ के लिए कोई भाग-दौड़ नहीं की। इस बात को मेरी ग़ज़ल का एक शेर अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त कर रहा है : जहां आप पहुंचे छलांगे लगा कर, वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे । और जब भी मुझे सम्‍मान मिला, तो अनंत सामान्‍य लोगो के पत्र मिले, फोन मिले, उनकी प्रीतिकर प्रतिक्रियाएं मिलीं। यह मेरे लिए बहुत बडी निधि है।

प्रश्न- आपकी कहानियों एवं उपन्‍यासों में जाने कितनी कितनी तरह के पात्र व चरित्र आए हैं। इतने बड़े संसार को कैसे आपने अपने लेखन में समेट सके हैं?

घर-घुसरे का प्रयोग एक विशेष संदर्भ में मैंने किया था कि मैं घर से बाहर निकल कर तमाम चीजों की प्राप्‍ति के लिए प्रयास नही करता हूं। मैं जीवन जीने की प्रक्रिया में गांव से गुजरा, कस्‍बे से, शहर से गुजरा हूँ। वाणी विहार उत्‍तम नगर में रह कर यहां के यथार्थ के अनेक आयामों से गजरा हूं । इस तरह मेरे अनुभव की दुनिया बहुत बड़ी है। वह अनुभव मैंने लोगों के बीच होकर जीकर पाया है, घर में बंद हो कर नहीं पाया है। इसलिए मैं घर में रह कर भी अनंत लोगों के साथ अपने को अनुभव करता हूँ। लेकिन उन लोगों का साथ करने से बचता हूं जो जोड-बाकी करते रहते हैं।

प्रश्न- साथ उठने-बैठने वाले लेखक एक एक करके चले गए, चले जा रहे। कैसा लगता है धीरे-धीरे लेखकों की यह अनुपस्‍थिति?

वास्‍तव में यह जीवन का सत्‍य है कि जो आएगा वह जाएगा ही। लेकिन कई बार होता है कि लगातार एक के बाद एक कोई दोस्त लेखक चला जाता है तो एक उदासी की लय छोड जाता है । देखिए कई हमारे अच्‍छे साहित्यकार अच्‍छे मित्र चले गए हम लोगों के भीतर दर्द छोड कर। जैसे केदार जी, नामवर जी, कुंवर नारायण जी, प्रभाकर श्रोत्रिय चले गए। इस बीच और भी कई लोग गए –कैलाश वाजपेयी, भोला भाई पटेल, महीप सिंह, महावीर सिंह चौहान– तो जाना तो सबको होता ही है। आज वह गए, कल कोई और जाएगा, लेकिन यह वास्‍तविकता है कि लोगों का जाना शेष लोगों के मन पर दर्द छोड जाता है। ऐसे ही एक बार जब माडल टाउन, दिल्‍ली में रहा करता था तो घटित हुआ था। तभी यह गीत लिखा था। एक-एक जा रहे सभी/ मन बड़ा अकेला लगता है। जो जा रहे हैं उनके साथ हमारा होना भी सार्थकता रखता था। जिनके साथ खेले-कूदे, पढे-लिखे, साथ उठना बैठना रहा, उनका जाना केवल उनका ही नहीं, उन सबका जाना होता है जिनके साथ उनका सान्‍निध्‍य रहा।

प्रश्न- आपकी कविताओं में बाजार बहुत आता है। बाजार पर तंज भी बहुधा आपने किया है। घर में घुसते जा रहे बाजार की ओर भी आपने अक्‍सर इशारे किए हैं। पर आप जैसे गांव से जुड़े लेखक का भला यह बाजार क्‍या कर सकता है?

बाजार के बीच रह कर भी बाजार से प्रभावित न होना एक बात है और बाजार में रह कर बाजार का हो जाना दूसरी बात है। जैसे शहर में रह कर शहर का हो जाना एक बात है लेकिन शहर में होकर भी गंवई संस्कार लिए चलना एक बात है। मैं शहर में रहकर शहर का नहीं हुआ, बाजार में रह कर भी बाजार का नहीं हुआ। लेकिन शहर और बाजार की जो मूल्‍यवान देन है उसे तो स्‍वीकार करना ही होता है। बाजार एक बात है, बाजारवाद दूसरी बात है। बाजार में लोग जाते थे और सौदा सुलुफ खरीदते थे। खास तौर से गांवों में साप्‍ताहिक बाजार लगते थे, उनका इंतजार होता था और वहां जाकर लोग हफते भर के लिए घर की चीजें खरीदते थे। आसपास के लोग परस्‍पर मिलते थे। हालचाल पूछते थे, खुश होते थे। तो शहर में भी अपनी ठोस आवश्‍यकताओं के तहत बाजार में जाना आवश्‍यक है; जाना ही पड़ता है। लेकिन बाजारवाद तो विज्ञापनों के जरिए तमाम नई नई चीजों का प्रचार करके वह लोगों की आवश्‍यकता बनाए दे रहा है और लोग उन चीजों को ला-ला कर अपना घर पाटते जा रहे हैं । तो बाजार इस रूप में घर में पैठ रहा है और घर की मानसिकता को बदल रहा है ।

देखिए, घर में रसोई बनती थी जो स्‍वादिष्‍ट व स्‍वास्‍थ्‍यकर होती थी। अब बाजार ने इतनी तमाम चीजें परोस दी हैं कि बच्चे टूट टूट कर उन्‍हें खा रहे हैं और बीमार हो रहे हैं । तो बाजार अपनी चीजों के साथ अपनी बीमारियों के साथ नई मानसिकता के साथ घर में पैठ रहा है व घर को घर नहीं रहने दे रहा है। रोज मोबाइल पर दसियों विज्ञापन आते हैं। अनेक अनावश्‍यक चीजों का प्रलोभन पैदा करते हैं।

प्रश्न- डॉ.साब। यों तो बहुत कुछ आपने लिख दिया है। लगभग सात दशकों का लेखन कम नहीं, सौ के लगभग किताबें। पर फिर भी क्‍या कुछ कहना रह गया है?
इस सवाल पर रामदरश जी को अपनी एक ग़ज़ल याद हो आई।
इतना लिखा, इतना लिखा क्‍या-क्‍या नहीं मन कह गया।
लगता रहा फिर भी सदा कुछ और बाकी रह गया।
फिर बोले। ओम जी, बात यह है कि मैंने योजना बनाकर न जीवन जिया, न लेखन किया। समय के साथ चलता रहा जो कुछ कहता रहा, देता रहा, उसे मैं व्‍यक्‍त करता रहा। क्या बाकी रह गया है और क्‍या कहना है यह चिंता मुझे कभी नही हुई। मुझे लगता है कि मैंने कविता, उपन्‍यास, कहानी के माध्‍यम से, निबंधों के माध्‍यम से और अन्‍य गद्य विधाओं के माध्‍यम से जो कहना था, वह कह दिया है। यानी जो लगातार अनुभव कर रहे हैं, उसे आप अपनी सर्जना में उतार रहे हैं। अब क्‍या नया अनुभव करूंगा? कल कौन सी नयी बात चुनौती देगी यह तो कल जानता है । मैं नहीं जानता कि क्या कहना और क्‍या बाकी रह गया है। कई बार ऐसा सवाल लोग करते हैं मेरे सामने भी कि मैंने जो सवाल पूछे हैं इसके बाद आप क्‍या कहना चाहते हैं? तो मैं यह कहना चाहता हूँ कि मेरे पास रचा हुआ कुछ नही रखा है कि आपसे कहूँ। उत्‍तर बने बनाए रखे नही होते हैं। वे तो सवाल से ही निकलते हैं।

मेरे साथ भी यही हुआ है। मुझे क्‍या कहना और रह गया है ऐसा मैं सोचता नहीं हूँ। इसका मतलब यही कि अभी भी कहीं ठहरा नहीं हूँ। कल जो कहेगा, कहूंगा। सर्जना की गतिशीलता मन में है। अपनी वय के शैथिल्‍य के बावजूद अगर समय कहने को कहेगा तो वह कहूंगा। लेकिन वह कल क्‍या होगा, यह मैं नहीं जानता । उपन्‍यास लिख रहा होता हूँ तो इस प्रक्रिया में सोचता हूँ कि क्‍या लिखना है क्‍योंकि यह दो-चार पेज की बात तो है नहीं। जिन्‍दगी की बात होती है । उसे खोजना पडता है, टटोलना पड़ता है। जब मैं उपन्‍यास लिखता हूं तो रात को नींद नहीं आती इस सोच में कि कल क्या लिखूंगा। लेकिन वह प्रक्रिया में होता है। कथा से जुडे संदर्भों की खोज होती है कि उन्‍हें कब कहां जोडें, कहां से ले आएं। इस संदर्भ में ओम जी एक कविता सुनाउंगा आपको —
(रामदरश जी के गीत का नया संचयन आने वाला है, उसकी पांडुलिपि उठा कर वे एक गीत सुनाने लगते हैं)

चाहता हूँ कुछ लिखूं पर कुछ निकलता ही नहीं है
दोस्‍त भीतर आपके कोई विकलता ही नही है।

तब लिखेंगे आप जब भीतर कहीं जीवन बजेगा
दूसरो के सुख-दुखों से आपका होना सजेगा
टूट जाते एक साबुत रोशनी की खोज में जो
जानते हैं जिन्‍दगी केवल सफलता ही नहीं है।

बात छोटी या बड़ी हो, आंच में खुद में जली हो
दूसरो जैसी नहीं, आकार में निज के ढली हो
है अदब का घर, सियासत का नहीं बाजार यह तो
झूठ का सिक्‍का चमाचम यहां चलता ही नहीं है।

यों तो उन्‍हें जब भी देखा और पाया है, खुशमिजाज ही पाया है। पर लगा कि पूछूँ कि क्‍या दुख है जो सालता है?

देखिए, एक तो अपना शारीरिक दुख होता है जो सबको होता है। खास कर इस वय में कुछ छोटे मोटे रोग सालते ही रहते हैं। कभी घर की कोई समस्‍या सालती है। घर में कोई व्‍यक्‍ति कुछ अलग अप्रिय ढंग का निकल जाए तो दुख सालता है। लेकिन एक दुख ऐसा है जो मुझे आपको व सारे संवेदनाशील लोगो को सालता है और वह दुख है— समाज का दुख । अखबार पढते हैं, टीवी देखते हैं, देखते पढते ही दुख जैसे लद-सा जाता है। एक संवेदनशील व्‍यक्‍ति के लिए यह एक बडा दुख होता है और वह दुख एक सर्जनात्‍मक रूप लेकर आपके लेखन में उतर आता है।

हाल ही में मेरी एक कहानी आई थी ‘जनसत्‍ता’ में : ‘एक अच्‍छी खबर’ । कहानी यों है। अखबार में आई हुई बुरी खबरों से लदा फँदा व्‍यक्‍ति उदास बैठा है कि एक कूरियर आता है। वह शादी का निमंत्रण होता है — एक लड़की की शादी का। यह अच्‍छी खबर इसलिए है कि वह लड़की एक गरीब मां बाप की लड़की होती है जिसे उसका मालिक बीमारी की हालत में छोड़ आया होता है एक अस्‍पताल में। जब वह अच्‍छी हो जाती है तो उसे निकाल देता है। वह सडक पर बैठी रो रही होती है कि एक दयालु व्‍यक्‍ति आता है। उसे घर ले जाता है। कहता है, तुम मेरी बेटी हो। उसे मानता है, पढ़ाता है, बी.ए. कराता है। सब घर वाले उसे मानते हैं। उसी लड़की की आज शादी हो रही है। उसे वह ऐसा आत्‍मीय सम्‍मान देता है तो लगता है इस गलाजत-भरी दुनिया में एक ऐसा आदमी भी है कि उसे बेटी की तरह पालता-पोसता है। कहानी का पात्र सोचता है कि बुरी खबरों से लदे फँदे अखबारों में ऐसी खबरों के लिए आखिर कोई जगह क्‍यों नहीं होती। वे ऐसी खबर क्‍यों नहीं देते कि उसे पढ़ कर मनुष्‍य को संसार की अच्‍छाइयों का अनुभव हो, आदमी का मन स्‍वस्‍थ रहे।

उनसे बातचीत करते दोपहर हो गयी है। सोचता हूँ थक गए होंगे वे। बातचीत बंद करता हूँ कि देखता हूँ कि अचानक उनका गीतकार जाग उठा है। वे गीत संग्रह की अपनी पांडुलिपि उठा कर एक ताजा गीत पढ़ने लगते हैं। कहते हैं ओम जी सुनिये —
एक नीम मंजरी मेरे आंगन झरी
कांप रहे लोहे के द्वार।

आज गगन मेरे घर झुक गया
भटका सा मेघ यहां रुक गया
रग रग में थरथरी, सन्‍नाटा आज री
रहा मुझे नाम ले पुकार।

मैं भी इसे उनके साथ गुनगुनाता हूँ। चित्‍त प्रसन्‍न हो उठता है गीत की लय से। मैं उठ चलने को होता हूँ कि वे दरवाजे तक छोड़ने के लिए उठ खड़े होते हैं। उन्‍हें वहीं रोक उनका चरण स्‍पर्श कर बाहर आ जाता हूँ और सड़क पर चलते हुए सोचता हूँ पिछली और इस सदी में आवाजाही करने वाले हिंदी के इस वयस्‍श्रेष्‍ठ लेखक के पास कितने अनुभव हैं, कितने संस्‍मरण हैं, कितना कुछ है भरा भरा था। जैसे फल से लदा हुआ कोई वृक्ष। देश-काल से अप्रतिहत और परिस्‍थिति से रूबरू। धीरे-धीरे भीड़ में खो गया हूँ पर उनकी बातचीत, उनकी कविताएं जैसे भीतर गूँज रही हैं।
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डॉ ओम निश्‍चल हिंदी के सुपरिचित कवि, गीतकार, आलोचक एवं भाषाविद हैं व शब्‍द सक्रिय हैं(कविता संग्रह), शब्‍दों से गपशप(आलोचना), भाषा की खादी(निबंध), कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई एवं बैंकिंग वाड्.मय सीरीज के रचयिता हैं व अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, मलय, अशोक वाजपेयी व लीलाधर मंडलोई आदि कवियों के कविता चयन संपादित किए हैं। कुंवर नारायण पर दो खंडों में संपादित आलोचनात्‍मक कृतियॉं ‘अन्‍वय’ एवं ‘अन्‍विति’ विशेष चर्चित।
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