रूबरूः शैल अग्रवालः अरुणा घवाना

बर्मिंघम से एक चुपचाप सी पर दृढ़ता भरी स्पष्ट आवाज आपके कानों में आए और मन करता रहे कि उसे बस सुनते ही रहें तो कोई और नहीं बल्कि यह व्यक्तित्व होगा लेखनी डाट नेट की संपादिका शैल अग्रवाल का। कला और संगीत प्रेमी यह एक सौम्य दिल इंसान है पर अपने इरादों वादों में शैल सा ही मज़बूत।
प्रश्न-अपने सफ़र के बारे में कुछ बताइए!
सफ़र के बारे में क्या बताऊं कुछ खास नहीं सीधा-सादा सा ही है- मैं शादी के बाद पति के साथ इंग्लैंड आ गई। वे सर्जन थे और आगे पढ़ने के लिए 1968 में आ गए थे। दस साल रहे, इस दौरान मैं तीन बच्चों की मां बन चुकी थी। दस साल बाद स्वेत्छा से वापस भारत लौटे 1978 में वहीं रहने के इरादे से। लेकिन कुछ स्थितियां ऐसी बनी और 1981 में फ़िर बर्मिंघम आ गए।

प्रश्न-भारत में आपकी शिक्षा
मैंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से इंग्लिश, संस्कृत व पेंटिंग में स्नातक व इंगलिश में मास्टर्स किया था। बस, फ़िर 20 वर्ष की उम्र में शादी हो गई तो आगे की जिम्मेदारी का मोर्चा संभाल लिया।

प्रश्न-लिखने की शुरुआत कब की?
छोटी उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया था,शायद जब से कलम पकड़ी। सही उम्र मुझे ठीक से याद नहीं। हां, एक बात जरूर है कि पहले रचनाओं को छुपाती थी, उनके प्रकाशन से शरमाती थी। मेरी पहली रचना आठ साल की उम्र में स्थानीय दैनिक आज में और 11 साल की उम्र में धर्मयुग में कहानी छ्पी थी-बच्चों की कहानी थी –दोनों ही मैंने नहीं पिताजी ने भेजी थीं। कह एक मासूम सी मुस्कान उनके चेहरे पर तैर गई।

प्रश्न-लेखनी शुरू करने का ख्याल कैसे आया?
लिखने की इच्छा तो बचपन से ही थी। पर घर-परिवार में कुछ ऐसी रम गई कि ये सब चीज़ें रुक सी गईं। ऐसी चीज़ें छूटती तो हैं नहीं। बस, मैंने यह तय कर रखा था कि जैसे ही मैं पचास साल की होंगी, अपने कामों को फ़िर से शुरू करूंगी। और वही मैंने किया भी। बच्चों को मैंने भरपूर बचपन जीने का मौका दिया। जब बच्चे कालेज जाने लगे तो समय होने लगा। एक कलम चलाने वाले को और क्या चाहिए होता है, बस शुरू कर दी लेखनी।

प्रश्न-जीवन से कोई शिकायत
शिकायत जीवन से- शिकायत तो नहीं, हाँ हर वक्त वक्त की कमी सी अवश्य महसूस करती हूँ- कह वह मुस्कुरा दीं। बोलीं, सच कहूं अरूणा तो मैं अपनी जिन्दगी में जो भी काम करती हूं उसे पूरी तन्मयता से लग कर करती हूं। तब मैं कभी उसके परिणाम को नहीं सोचती। मैंने घर सँभाला, बच्चों की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी के साथ! कोई कोताही नहीं बरती। बच्चे अपनी परवरिश से खुश हैं इससे ज्यादा खुशी की बात मेरे लिए और क्या हो सकती है। अब लेखनी को गोद ले लिया है।

प्रश्न-इक अधूरा सा ख्वाब
कोई अधूरा ख्वाब कह वह चहक कर कहती हैं अरे! अरूणा तुमने वो गालिब का शेर सुना है …………………हर ख्वाहिश पे दम निकले। सो ख्वाबों का तो कहना ही क्या! जो पूरे हो गए वो ख्वाब कहां रह जाते हैं…अधूरी रही सोच ही तो ख्वाब बनती है ना।

प्रश्न-भारत में अब एक महिला राष्ट्रपति है, इससे भारत में महिलाओं की स्थिति में सुधार की कोई उम्मीद आपके मन में जगी है?
देखो अरूणा आप कितनी भी बात कर लें कि महिलाओं की स्थिति में सुधार हो, पर यह सुधार तभी सिरे चढ़ेगा जब सारी मशीनरी एकजुट होकर इस काम को अंजाम देने की सोचे और उससे ज्यादा जरूरी है कि महिलाओं को उनकी महत्ता खुद पता हो, जो संभवत: शिक्षा से ही आ सकती है। वैसे भी आज भारत में महिलाओं को जिस स्थिति में पहुंचा दिया है उससे उनमें एक ठहराव आ गया है, उनकी सोच कुंद सी पड़ गई लगती है।
कितनी भी बात करें और कैसी भी बात करें 21वीं सदी ज़रूर शुरू हो गई है पर भारत में समाज का ढांचा तो अब भी वही है। औरत को सत्ता या पावर देने के पीछे कहीं न कहीं यह बात रही कि उसे कठपुतली की तरह इस्तेमाल किया जाए…आपने खुद देखा भी होगा।
कुछ जगहों पर स्थिति बेहतर दिखती है और होती भी तो क्या सचमुच घरेलू हिंसा का यह रूप हमें देखने को मिलता।

प्रश्न-आत्मनिर्भरता नारी को आगे बढ़ने में कैसे सहायक है?
देखिए अगर नारी आर्थिक रूप से संतुष्ट है तो संभवत: एक बहुत बड़ी समस्या खत्म हो जाती है। सीधा सा फ़लसफ़ा है कि अगर व्यक्ति संतुष्ट है तो इज्जत और प्यार से जीना खुद-ब-खुद आ ही जाता है। पुरुष के साथ भी ऐसा ही है। सिर्फ़ औरत की बात नहीं है, इट्स नेचुरल। संतुष्ट व्यक्ति फ़िर आगे नयी ऊंचाइयां तो छूने की कोशिश तो करता ही है, जो कुछ नया करने की कोशिश करेगा वो तो आगे बढ़ेगा ही अरूणा।

तभी किसी बच्चे की आवाज़ आती है- दादी! ओह अब इन बच्चों के साथ खेलने का समय हो गया। ठीक है अरूणा इतना इंटरव्यू बहुत है अब ज़रा कुछ देर खेल आऊं, ये मेरी पोती है- कहकर वह पार्क की और चल दीं।
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( वार्ता2008)
अरुणा घवाना

जन्म: 6 जनवरी 1971 , जन्मस्थान: हिमाचल प्रदेश।
शिक्षा : पी.एच.डी. शोधार्थी, साइबर पत्रकारिता
सम्प्रति : नई दिल्ली,भारत के एक प्रकाशन संस्थान में कार्यरत. बाल पत्रिका चंपक की विभागाध्यक्षा।
प्रकाशन : सामाजिक विषयों पर चर्चाएँ, विभिन्न पत्रिकाओं में लेख व कहानियाँ प्रकाशित। चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट द्वारा पुरस्कृत। लेखन में बच्चों की कहानी लिखना सबसे अच्छा लगता है। यूं कभी कलम कविता का रूप और आकार भी ले लेती है। अभी तक बड़ों की कोई सशक्त कहानी लिखने में सफल नहीं हो सकी।
रुचि विशेष : साहित्य के अतिरिक्त दार्शनिकों के विचार पढ़ने में रुचि। संगीत,
सम्पर्क : arunaghawana@gmail.com