चांद परियाँ और तितलीः बाल कहानीः रश्मि बड़ध्वाल, कविताःप्रभुदयाल श्रीवास्तव

असली-नकली

एक चिड़िया थी नन्हीं-सी, प्यारी-सी, सुंदर-सी। बड़ी ही मीठी आवाज में बोलती थी चूं-चूं, चूं-चूं। एक दिन उसने सोचा कि मैं चूं-चूं चूं-चूं बोलती हूं तो कोई मेरी बात नहीं सुनता। जब बड़े-बड़े जानवर अपनी बोली बोलते हैं तब तो लोग उन पर बड़ा ध्यान देते हैं। कुत्ता भौंकता है तो लोग चौकन्ने हो जाते हैं, गाय रंभाती है तो उसे घास डालते हैं, घोड़ा हिनहिनाता है तो उसे चने खिलाते हैं। कौवा कांव-कांव बोलता है तो उसे तक रोटी देते हैं और एक मैं बेचारी हूं! हजार बार बोलूं चूं-चूं चूं-चूं तब भी कोई मेरी नहीं सुनता। अगर मैं बड़े जानवरों की तरह रौबदार बोली बोलूं तो लोग मेरी भी कदर करने लगेंगे।
सबसे पहले चिड़िया हाथी के पास गई। हाथी सबसे बड़ा होता है न! हाथी से वह बोली ”हाथी दादा, हाथी दादा! मुझे अपनी तरह बोलना सिखा दो!“
हाथी जोर से चिंघाड़ा और बोला ”तुम भी ऐसे ही बोलो।“
चिड़िया ने बड़ा सा मुंह खोला। पूरी ताकत लगा कर आवाज निकाली। सुनाई पड़ा ‘चूं’। चिड़िया खिसिया गई। हाथी दो-चार बार चिंघाड़ा। चिड़िया ने उसकी नकल करने की कोषिष की पर हर बार मुंह से निकला ‘चूं’। चिड़िया थक गई।
हाथी बोला ”जाओ-जाओ, मेरा समय न बरबाद करो। चली हैं हाथी की बराबरी करने!“
हाथी की डांट खाकर चिड़िया गाय के पास गई और बोली-”गाय मां, गाय मां! मुझे अपनी बोली सिखा दो न!“
गाय ने कहा ”क्यों मजाक करती हो बिटिया! आओ थोड़ा दूध पी लो, पेट भर जाए तो घर जाकर सो जाना।“
पर चिड़िया को तो सनक सवार थी। वह जिद करती रही ”मुझे दूध नहीं चाहिए। मुझे अपनी बोली सिखाओ।“
गाय ने कहा ”अच्छा, मैं अपनी बोली बोलती हूं तुम मुझे देख-सुन कर वैसा ही करना।“
गाय बड़ा-सा मुंह खोल कर रंभाई ”मांऽऽऽ“
चिड़िया ने भी बड़ा-सा मुंह खोला और मां बोलने का प्रयास किया पर हर बार मुंह से निकला ‘चूं’।
तब चिड़िया ने सोचा हाथी और गाय तो बहुत बड़े पषु हैं शायद इसीलिए उनकी बोली मैं नहीं बोल पाई। मुझे कुत्ते के पास जाना चाहिए। कुत्ते को लोग बहुत प्यार भी करते हैं और उससे डरते भी हैं। उसे खाने को भी अच्छा-अच्छा दिया जाता है। यही सब सोचते-सोचते चिड़िया कुत्ते के पास पहुंच गई और बोली ”कुत्ते भइया, मुझे अपनी बोली सिखा दो न!“
जब कुत्ते ने किया ”भौं-भौं, भौं-भौं“ तो चिड़िया ने खुशी-खुशी नकल की। उसके गले से निकला ”चूं-चूं, चूं-चूं।“
चिड़िया उदास हो गई कि अब उसे इस छोटी ‘चूं-चूं, चूं-चूं’ के साथ ही जीना पड़ेगा। तभी उसे ध्यान आया कि कौवे की बोली तो शायद सीख ही सकूंगी।
चिड़िया कौवे के पास गई और चिरौरी करके बोली ”मेरे सगे बड़े भैया जी! मुझे अपनी बोली सिखा दो न!“
कौवा बोला ”बोलो मेरे साथ ‘कांव-कांव, कांव-कांव!“
चिड़िया ने सुर मिलाया ”चूं-चूं, चूं-चूं।“
कौवा फिर बोला ‘कांव-कांव, कांव-कांव!“
चिड़िया ने सुर मिलाया ”चूं-चूं, चूं-चूं।“
उस घर की मालकिन बाहर निकल कर आई, जहां वे बैठे अभ्यास कर रहे थे। उसने एक ढेला उठा कर कौवे की ओर फेंका। कौवे के पैर में ढेला लगा और वह डर कर भाग गया।
घर की मालकिन अंदर गई और मुट्ठी भर चावल लाकर आंगन में बिखेर दिया। फिर वह बोली
”चावल के दाने खाओ चिड़िया रानी
मीठे-मीठे गाने गाओ चिड़िया रानी।“
चिड़िया रानी ने पहले पेट भर कर दाने खाए फिर चूं-चूं करने लगी।
घर की मालकिन ने कटोरी में पानी लाकर रख दिया। चिड़िया ने पानी पी लिया तो बोली-
”कल फिर आना, भरपेट दाने खाना
मीठे-मीठे गाने मुझको फिर सुनाना।“
अब चिड़िया की समझ में बात आई कि अपनी आवाज से ही तो उसे प्यार मिलता है। तब नकल से क्या फायदा? फिर वह तल्लीन होकर रोज सुबह-शाम गाने लगी ”चूं-चूं, चूं-चूं।“
रश्मि बड़थ्वाल

पानी पीते नए ढंग से

कौए को थी प्यास लगीं,
दिख पड़ा घड़े में पानी।
किसी तरह से चाहा उसने,
अपनी प्यास बुझानी।

पानी था नीचे पैंदे में ,
चोंच पहुंच न पाई।
एक स्ट्रा मिली सड़क पर,
पानी तक पहुंचाई।

उस स्ट्रा के द्वारा उसने,
अपनी प्यास बुझाई।
अपने सभी मित्र कौओं को ,
यह तरकीब सुझाई।

घड़ा देखकर अब ये कौए,
नहीं ढूंढते कंकड़।
ढूंढ -ढूंढ स्ट्रा ले आते,
पानी पीते सुड़ -सुड़।

प्रभुदयाल श्रीवास्तव
१२ शिवम् सुंदरम नगर छिंदवाडा