दो लघुकथाएँः मायका- सुशी सक्सेना, शैल अग्रवाल

मेरा हंसना रोना रूठना मनाना
सब कुछ तो रखा है यहां पर।
आज भी लगता है कि मुझे कोई बुलाता है।
जिसे मैं कभी भूलना नहीं चाहती हूं।
इसलिए
इनसे मिलने चली आती हूं।

मायका-1
( सिर्फ मां बाप से ही नहीं बल्कि भाई से भी होता है।)
मम्मी पापा के गुजर जाने के बाद मायके जाने को दिल ही नहीं कर रहा था। एक कहावत जो सुन रखी थी कि ” मां बाप से ही मायका होता है।” डरती थी कि कहीं ये कहावत मेरे साथ ही न सही साबित हो जाए। भाभी के विचार मेरे विचारों से बिल्कुल अलग थे इसलिए उनसे मेरी कभी नहीं बनी। भाई के अंदर अपनापन तो था मगर वो भी कभी कभी भाभी की बातों में उलझ कर परायेपन का अहसास दिला जाता था। एक दो बार तो मेरी उससे बहस भी हो गई थी, ये नहीं कहूंगी कि इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी क्योंकि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती।
खैर, जाना तो पड़ेगा ही क्योंकि मम्मी पापा के शांत हो जाने के बाद ये मेरा पहला रक्षाबंधन था। हमारे यहां का रिवाज है कि यदि मायके में कोई शांत हो जाए तो पहला त्यौहार मायके में ही करना पड़ता है, और फिर रक्षाबंधन का त्यौहार, जो भाई-बहन के रिश्ते का सबसे बड़ा आधार होता है। इसलिए ये सोच कर तैयारी लगा ली की उसी दिन जाऊंगी और राखी बांध कर उल्टे पांव वापस भी आ जाऊंगी। इसके बाद फिर कभी मायके जाने का मन नहीं किया तो खुद से गिला भी नहीं करूंगी।
मैं रक्षाबंधन के दिन सुबह सुबह पहुंच गई, भाई को स्टेशन में देख कर खुशी भी हुई और आश्चर्य भी हुआ कि वो मुझे लेने आया है। घर पहुंच कर कुछ देर बाद राखी बांधने के बाद तुरंत वापस आना चाहती थी पर न जाने क्यों इस बार भाई के आग्रह को टाल न सकी और एक दिन के लिए और रुक गई।
इन दोनों दिनों में उन्होंने मेरे स्वागत में कोई कमी न उठा रखी थी। पहली बार उनके व्यवहार से मुझे मम्मी पापा की कमी महसूस नहीं हुई, पर फिर भी न जाने क्यों घर में अजीब सा खालीपन था जो रह रह कर मम्मी पापा की ओर खींच लेता था।भाई ने मेरी विदाई में भी कोई कसर न छोड़ी। शायद भाभी को खर्चा थोड़ा ज्यादा लग रहा था, लेकिन वो भी न जाने क्या सोच कर इस बार खामोश थीं। लौटते वक्त वो मुझे स्टेशन तक छोड़ने भी आया, जिसकी मुझे कोई उम्मीद ही नहीं थी। आते समय उसने मुझसे कहा,
” ये मत समझना की मम्मी पापा नहीं है तो यहां तुम्हें कोई नहीं पूछेंगा। ये तुम्हारा अपना घर है। हमेशा आती रहना। मुझे भी सहारा मिलता रहेगा।”
हालांकि उसे मेरे किसी भी सहारे की कोई जरूरत नहीं थी, लेकिन कभी कभी भावनात्मक सहारे की जरूरत सबको पड़ जाती है। उसकी आंखों में पहली बार अपने लिए आंसू देखकर मेरी भी आंखें आंसुओं से लबालब हो गई। हम दोनों ने जी भर के रो लिया, और आंसुओं के साथ सारे गिले-शिकवे बहा दिए। फिर दुबारा आने का वादा भाई से करके वापस घर आ गई। मेरे मन का वो डर दूर हो गया जिसे साथ लेकर गयी थी। और सोचने लगी, ” लोग भी न जाने कैसी-कैसी कहावतें बना देते हैं। मायका सिर्फ मां बाप से ही नहीं बल्कि भाई से भी होता है।”
और आज एक कहावत को मैंने अपनी आंखों के सामने झूठा साबित होते देखा।
सुशी सक्सेना
इंदौर

 

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मायका-2

मनी आ गई थी सारे साजो-सामान के साथ , आखिर यह उसका भी घर था । हक था उसका , बेटी थी वह इस घर की। फिर मायके आना  तो जरूरत है हर बेटी की। पर अम्मा-बाबा क्या गए, उसे लगता है कि जगह ही नहीं रह गई थी अब उसके लिए कहीं। सामान कहाँ रखा जाए- यह तक एक बड़ा सवाल था अब। कमरों की कमी नहीं थी घर में पर बड़ी के भरे-पूरे परिवार में खाली कमरों में से एक बच्चों ने पढ़ने का और दूसरा बहू ने पूजा के लिए बना लिया था और छोटी की बेटी आ रही थी वह भी नौकरानी के साथ, मझली तो वैसे भी महीने भर को अपने हिस्से में ताला लगाकर मायके चली गई थी।  निश्चय किया गया कि सामान सीधा होटल ही भेज दिया जाए। सभी को आराम रहेगा।

ठगी-सी मनी चुपचाप जब सबकी आँखों से आंख बचाती गाड़ी में बैठ रही थी तो घर का पुराना नौकर धीरे से बुदबुदाया-खुदको संभाल बेटी। मुस्कुरा, एक भी आंसू मत गिरने देना इस वक्त, वरना भाभियों को मौका मिल जाएगा यह कहने का कि मिलने नहीं , लड़ने आई थी ननदी।

शैल अग्रवाल