कहानी समकालीनः लेलिया गुनझिक्कू- बिभा कुमारी

“ऐ कुसुमिया देख न! रौदा कितना चढ़ आया है, रोज़ तो तुम हमको बुलाने आती थी, आज हमको आना पड़ा। आज कहाँ है तुम्हारा एचएमटी घड़ी। हमको कहती हो कि बाबू से कहो कि दू ठो सलवार फ्राक नहीं दीजिए, हम काम चला लेंगे, लेकिन हमको घड़ी खरीद दीजिए। आज क्या हुआ?”

ग्रामीण अभ्यास के अनुसार आरती धूप और छांव से समय का अंदाज़ा लगाती हुई, सही वक्त पर संध्या के घर आ गयी थी, ताकि दोनों स्कूल जा सकें। दसवीं में पढ़ रही थीं दोनों, बोर्ड परीक्षा के लिए दोनों का रजिस्ट्रेशन भी हो गया था। इस गाँव की लड़कियाँ घर से निकल कर मंदिर तक चली जाती थीं या बहुत हुआ तो खेत तक रोटी पहुँचा देती थीं, ज्यादा से ज्यादा पास के मैदान से घास काट लाती थीं, ये दोनों लड़कियाँ ही थीं जो दूसरे गाँव के हाई स्कूल में पढ़ रही थीं। दोनों लगभग तीन किलोमीटर दूर स्कूल पैदल जातीं, वो भी प्रतिदिन। चाहे बारिश आए, आँधी आए, ओला-पत्थर गिरे। गाँव के लोग कहते

-“सूर्य भले उगना भूल जाए, पर संध्या – आरती स्कूल जाना नहीं भूल सकतीं।”

इस पर दूसरे लोग कहते कि सब नाम का असर है, संध्या-आरती तो होती ही है बिला नागा।

सारे शिक्षकों का कहना था कि उस हाई स्कूल में जहां आसपास के दस गाँवों के छात्र हैं, सबसे होशियार संध्या और आरती ही हैं। कई बार शिक्षक पूछते दोनों से- कौन पढ़ाता है, तुम दोनों को?

तो वे मुस्कुरातीं और कहतीं- मास्साब हम दोनों ही पढ़ाते हैं, एक दूसरे को। शिक्षक कहते अच्छा तुम दोनों ने लगता है अपना दिमाग़ जोर लिया है आपस में, तभी दुगुनी होशियार हो गयी हो। संध्या कहती – “जी हाँ मास्साब, और जो थोड़ी –बहुत कसर रह जाती है, वो भैया के आने पर उनसे पूछ लेते हैं। संध्या के भैया जिले के सर्वश्रेष्ठ कॉलेज से बीकॉम करके अब बैकिंग की प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, उसी हाई स्कूल से पढ़कर निकले, शिक्षकों के अति प्रिय छात्र रहे हैं।

आरती की आवाज़ सुनकर संध्या ने धीरे से गोद में सोए बच्चे को उतारकर गुदड़ी पर सुलाया। इतना छोटा बच्चा उसने पहली बार देखा था। उसे तो छूते हुए भी डर लगता था, कैसे उठाए समझ नहीं आता था, पर करे क्या?

वह जैसे ही कोठरी से बाहर निकली, देखा आरती बीच आँगन में खड़ी है। उसे देखते ही ऊँची आवाज़ में बोली-

“कुसुमिया तू अभी उठ रही है? तैयार नहीं हुई? ऐसा तो कभी नहीं हुआ? इतना देर से तो तुम इतवार को भी नहीं उठती?

-“उठेंगे तो तब न कुसुमिया, जब सोएँगे। आज तो हमरा रतजगा रहा।”

-“सो अइसन का हुआ? कुमारे बारे कोउन भतार आ गया। तुमको रातभर जगाबे वाला।”

-“कुसुमिया एगो छोड़ दू-दू गो आ गया है। तू जा स्कूल। हो गइल हमर पढ़ाई-लिखाई”

-“दू-दू गो आ गया? त एगो के त हमरा खातिर छोड़ दे कुसुमिया, कि हमको स्कूल भेज के…”

-“ई तोहार हर बखत का हँसी-ठट्ठा आ गारी हमको अच्छा नहीं लगता है। हम कह दे रहे हैं कुसुमिया। हम तोहार सखी हैं, कुसुमिया हैं, ननद नहीं हैं। और सुन! जो हमको गरियाने का इतना शौक है, तो हमरा भैया से बियाह कर ली होती।”

-“हे कुसुमिया, अप्पन-अप्पन भाग्य? तोहार भौजाई बने खातिर हम तैयार रहईं। अइसन दूल्हा त हमर बाप हाथ में दिया छोड़ मरकरी भी लेके खोजे निकले त ना खोज पाए। मगर उ का है न कि पहिला बात कि अपना गाँव के लइका से शादी वर्जित है, त हम त गाँव, जिला देश सब छोड़ देते उनका लिए। असली समस्या ई हई, कि तोहार भैया त बाराती गए आर कनिया लिए लौटे। हमको तोहार भौजी बने खातिर दूसरा जनम का इंतजार करना पड़ेगा।”

आरती की बात सुन संध्या खिलखिलाकर हँस पड़ी। उस हँसी से जैसे उसकी सारी थकान मिट गयी।

-“अब हम भी नहीं जाएँगे अकेले स्कूल। यहीं बैठते हैं।” आरती ने कहा।

-“कै दिन मेरे पीछे बैठेगी कुसुमिया? जा स्कूल जा। हमरा हमरे हाल पर छोड़ दे।”

-“री कुसुमिया बोल न! का बात हई। एक दिन नहीं जाएँगे, त स्कूल से कौनों नाम कट जाएगा क्या?” आरती ने आवाज़ को नरम बनाते हुए कहा और संध्या के कंधे पर हाथ रखने ही जा रही थी कि……..

-“हे… हमको छुओ नहीं, दूरे से बात करो। अभी हम सोइरी घर से निकले हैं। देखो न! परसौती त सोई है बेसुध, आ हम बच्चा सम्हाल्ते –सम्हाल्ते बेदम हैं।”

-“तू सुबह-सुबह बुझौवल पर बुझौवल बुझाए जा रही है। कुछ ठीक से बताएगी भी? तू कब से मानने लगी नियम –धरम और छूआ-छूत? याद है पिछले साल माहवारी में हमको ज़बर्दस्ती कुआँ पर चढ़ाई थी, घैला भरवाई थी। समझाते हुए बोली थी कि इन सभी अंधविश्वासों से बाहर निकलो। पहले सर्फ-साबुन नहीं थे, इसलिए इतने नियम थे, ताकि पीने के पानी में बैक्टीरिया न आ जाये।”

-“ऐ कुसुमी! तुम जिद पसार दी हो तो सुनो, मगर तुमको हमारा किरिया है, किसी को कहना नहीं, अपनी मैया-बहिनिया को भी नहीं। कल अंधेरा होते भाड़ा पर गाड़ी करके हमलोग शहर में डॉ. के क्लीनिक गए, रात को एगारह बज के बीस मिनट पर भौजी को जुड़वाँ लड़का हुआ है। तीन बजे छुट्टी मिला, अभी पाँच बजे भोर में लौटे हैं। अम्माँ न! उ का कहते हैं, डायन-जोगिन, नज़र-गुज़र ई सब से इतना डरी हुई है कि किसी को कानों कान खबर नहीं होने दी, भाभी के गर्भवती होने का। हम भी यही समझते थे कि भौजी मोटी हो रही है, होगी भी काहे नहीं सब काम तो हम करते हैं। थाली परस कर आगे में देते हैं, कुटुम की तरह खाती है और मोरी पर जा के हाथ धो लेती है।”

-“हे कुसुमी! भाग्य बड़ा अच्छा है तुम्हारी भौजाई का। कलजुग में ऐसा पति, ऐसे सास-ससुर, ऐसी ननद।”

-“देख अम्माँ कहती है कि यही चारों ओर से भाग्य-भाग्य का दुहाई ही तो खा गया हमरी भौजाई को। अम्माँ हमको किरिया दे रखी है कि हम किसी को नहीं बताएँ कि जुड़वाँ भतीजा हुआ है, फिर भी हम तुमको बता दिए हैं काहे त तू हमार कुसुमी है। हम दोनों का बहिनापा, उ का कहते हैं दू जिस्म एक जान।”

-“निश्चिंत रह कुसुमी! तुम्हरी बात हमरे पेट में समा गई, कहीं नहीं जाएगी। पर जानती हो, हमारा मन कर रहा है दुनू बचवा को देखे का।”

-“ए कुसुमी स्कूल नहीं गयी तो अपने घर जाओ। कहीं दुनू बच्चा एक साथ रोने लगेगा तो अम्माँ कैसे संभालेंगी? अम्माँ को हम पर बड़ा भरोसा है कि हम उ का किरिया कभी नहीं लाँघ सकते। नहीं तो हमको कोठली से बाहर नहीं निकलने देती। तोहरा परेम में कुसुमी हम अम्माँ से भी धोखा कर लिए, जानती हो काहे?”

-“काहे कि तुम और हम एक ही हैं कुसुमी। अब हम दोनों कैसे घंटों बतियाएंगे? अकेले कैसे हम स्कूल जाएँगे कुसुमी? हमरे बाबूजी अकेले हमको नहीं जाने देंगे उ त तुम्हरा साथ रहने से माँ-बाबूजी भी हिम्मत कर लिए थे और हम भी। रस्ता में चौक पर जो उ किसना बैठा रहता है न चाय दोकान पर, याद है एक दिन हमरा ऊपर कागज़ में लिपटा ढेपा फेंक दिया था।”

-“हाँ खूब याद है। कागज़ में लिखा था- आरती हम खाली तुमको एक नज़र देखने के लिए यहाँ बैठे रहते हैं। तुम हाँ कर दोगी तो मेरी ज़िंदगी बन जाएगी। भगवान ने हमको सबकुछ दिया है, बस तुम्हारी कमी है, तुम हमको मिल जाएगी तो धन्य हो जाएँगे।” कहती हुई संध्या हँसने लगी, रात की थकान हँसी से मिटने लगी।

-“ऐ कुसुमिया हँसना बंद कर। हमको अइसन सड़क-छाप लड़का तनिक्को पसंद नहीं है, और यदि तुमको पसंद है, तो तुम ही बियाह कर लो उससे।”

-“कैसे करें कुसुमी? हम त बूझो अब दुई लईकन की मतारी हो गए हैं। अब जबतक ई दुनु नहीं पले-पुसे तब तक हमरा पढ़ाई-लिखाई, शौक-मौज, शादी-ब्याह सब हड़ताल।”

-“चिंता मत कर कुसुमी। हम चाची से बात करेंगे। इतना प्यार से बात करेंगे कि चाची खुदे हमको पोतों के जन्म के बारे में बता देगी। फिर हम दिन में तनी देर बचवा सब को संभाल देंगे तुम सो जाना और रात में तुम संभालना।”

-“कुसुमी! अभी तो छठी होने में भी पूरे पाँच दिन बाकी है, बरही से पहले तो अम्माँ किसी के सामने भी नहीं पड़ेगी। उ भी का करे बिचारी! उनके भीतर भारी डर समाया हुआ है। जाओ कुसुमी, स्कूल नहीं जाएगी त घरे जाओ, ई हमरा चक्की में तुमको पिसान होने का जरूरी नहीं है। तुम पढ़-लिखकर होशियार हो जाओगी कुसुमी तो हमको भी होशियार बना दोगी जाओ।”

-“कहाँ से होशियार बनेंगे कुसुमी? हमरा भाग्य में तुम्हारे बाबू जैसन बाबू कहाँ हैं, जो हमको स्कूल-कॉलेज खुशी-खुशी भेजेंगे? उ त बस संध्या के सहारे आरती को भेज रहे हैं।”

-“हम पहिले ही बोले न कुसुमी कि भाग्य का दुहाई मत दो। अम्माँ कहती है, भाग्य और सूरत थोड़ा कम्मे अच्छा। काहे त अच्छा भाग्य और सूरत पर आईल-गईल, पार-परोसिन, डाईन-जोगिन, दुष्टी-डाहिन सबका नज़र लगल रहता है। अब हमरे भाई-भौजाई को देख लो। वैसे तो अम्माँ हमरे लिए भी डरले रहती है, मगर अब उसको सबसे ज्यादा डर अपने दुनु पोता के लिए है।”

-“कुसुमी! तुम्हरे भैया को तो अब का हम देखें? उ तो देखे उनकी राजरानी उनको।”

-“का देखेगी बिचारी? कहाँ समझती है कुछो?”

-“ऐ कुसुमी ई जुड़वाँ बालक हो गया, बिना कुछ समझे ही?”

-“अब हम तुमको क्या बताएँ कुसुमी? तू तो जानती ही है कि भैया तो गए थे दोस्त की शादी में बारात, जयमाला की तैयारियाँ होते ही दुल्हन के दादा ने कहा कि ऐ बच्चिया जा लेलिया को ले आ महफ़िल में, अब दूल्हे के कान खड़े हो गए कि लड़की शायद पागल है, तभी लेलिया नाम पड़ा, तो बाथरूम जाने के बहाने जो स्टेज से उतरा तो नदारद ही हो गया। इतने में सजी-धजी दुल्हन आ गई स्टेज पर, सब बाराती दुल्हन का रूप देखने में अइसन मगन हुए कि भूल ही गए कि लड़के को गए तीन घंटे से ऊपर हो गए हैं, और खड़ी-खड़ी दुल्हन थक गई इसलिए उसे कुर्सी पर बैठा दिया गया है। फिर सारे बाराती-साराती ढूँढकर थक गए, दोस्त के पिताजी ने भैया से निवेदन किया कि बेटा तू ही कर ले लेलिया से शादी। शायद इसी को भाग्य कहते हैं कुसुमी, भैया मान गए। उन दिनों शायद ईलाज चला था, कुछ ठीक थी। लेकिन जब मायके से वापस आई तो कुछ होश नहीं। भाभी की अम्माँ बोली कि मेरी बेटी तो बचपन से ठीक थी, अभी उसको डायन ने गुनझिक्कू कर दिया।”

-“ऐ कुसुमी ई गुनझिक्कू का बला है?”

-“ का जानें? बड़ी-बूढ़ी कहती हैं कि अधकचरी डायन-विद्या सीखने से गुनझिक्कू हो जाते हैं।”

-“त ई गई काहे सीखने डायन-विद्या? और सीखी तो पक्की सीख लेती?”

-“सब अंधविश्वास है कुसुमी, मन का भरम! बीमारी है ईलाज चलेगा तो ठीक हो जाएगी। आज सुबह भैया जाने से पहले बताए हमको कि अप्पन भौजाई के ध्यान रखिह बहिन, डॉ. मैडम बोली थी कि बच्चा का जन्म हो जाए, छः महिना साल भर दूध पिला ले तब दवा देंगे, ई दवा सब का साइड-इफेक्ट बच्चा को न हो इसलिए। अब देखो न बच्चा भी जुड़वाँ, उ दूध तो पिलाएगी, पर अम्माँ और हमरे निगरानी में। वैसे तो मायके भी जा सकती थी, वहाँ भाभी की दो छोटी बहनें हैं, तीन भाभियाँ हैं, पर हमरी अम्माँ और भौजाई की अम्माँ दोनों इतना वहम में हैं कि वहाँ जाने का नाम भी नहीं लेने देंगी। भाभी की अम्माँ का कहना है कि शादी के बाद जब पहली बार भाभी मायके गईं तो उनको चार बजे भोर में पड़ोस की काकी जाँता पर मकई पीसने अपने साथ बैठा ली और गीत गाने लगी, इसको साथ में गाने बोली। जब ई गाई तो दुहराने बोली, जब ई पूरा दुहरा दी तो बोली कि हाँ तुम सीख गई, अब हमको खंभा दे दोगी तो पक्की हो जाओगी? ई बोली, खंभा तो हम उखाड़ ही नहीं सकेंगे काकी तो आपको कैसे देंगे? त उ बोली खंभा माने तोहार दूल्हा, अपना दूल्हा का खून हमको पिला दोगी तो पक्की हो जाओगी, ई चिल्ला के बोली काकी तू सच्चे डायन ह का? हम न देब अप्पन दूल्हा और वहाँ से रोती हुई भागी, तब से ही गुनझिक्कू हो गई।”

-“ऐ कुसुमी हमको तो बड़ी डर लगने लगा ई सुनके।”

-“नहीं रे! ई सब अंधविश्वास है, देखना तू ईलाज चलेगा और भाभी ठीक हो जाएगी। हमरे ऊपर बहुत ज़िम्मेदारी आ गई है। ई जुड़वाँ बच्चा अकेली अम्माँ कैसे सम्हालेगी? और बच्चा की महतारी को तो कुछ पता ही नहीं। जा कुसुमी! घर जा हमरी प्यारी सखिया बहिनी, हमरा लोगन खातिर चिंता मत कर बहिनिया।”

संध्या अट्ठारह और आरती बीस साल की थी, ऐसा नहीं था कि वे कभी किसी कक्षा में फ़ेल हुई हों, दरअसल इनका स्कूल जाना ही देर से शुरु हुआ था, वो भी सिर्फ और सिर्फ कलेसर बाबू के अथक प्रयास से। जो स्वयं साक्षर भर थे, दूसरी कक्षा में ही थे, तो उनके पिता बाँस से गिर गए थे और तुरंत चल बसे थे। मजदूर आदमी थे। रोज़ ही बाँस या आम, लीची, अमरूद आदि के पेड़ पर, जब जैसा मालिक का हुक्म होता चढ़ते थे। उस दिन भी भैंस के चारे के लिए बाँस के पत्ते तोड़ने के लिए बाँस पर चढ़े थे, लेकिन कौन जानता था कि ऐसा हो जाएगा। कलेसर बाबू आज तक उस हादसे से पूरी तरह नहीं उबर पाये थे। पिता की बँधी हुई ठठरी और माँ का विलाप, कुछ भी कहाँ भूल पाये थे। एक-एक बात ऐसे याद है जैसे कल की बात हो। आठ वर्ष की छोटी सी उम्र में पिता को मुखाग्नि देते हुए सोच रहे थे-“बाबू ने तो कहा था कि हमको बहुत पढ़ाएंगे। गाँव के बाद दूसरे गाँव, फिर जिला। हमको डाक्टर, वकील जो बनने का मन करेगा, उसकी पढ़ाई का बंदोबस्त करेंगे। अपना शरीर भी बेच देंगे, लेकिन बेटे को पढाएँगे। बाबू ने बेच ही तो दिया था अपना शरीर। ज़मींदार के घर बंधुआ मजदूर बनकर ही तो रह गए थे। अब हम कुछ भी कर लें, बाबू को लौटा तो नहीं सकते । अब बाबू का सपना तो दूर अपना और माई का पेट कैसे भरेंगे, ये सबसे बड़ी चिंता है।”

पिता के जाने के बाद माँ भी जैसे ठठरी ही हो गयी थीं, वो ज़िंदा तो थीं पर उनमें जान नहीं बची थी। दो- तीन दिन के आठों-पहर के विलाप के बाद जैसे ही उसने सुना कि कलेसर के नाम पर ज़मींदार की बही में दो हजार रु. का कर्ज़ लिखा जा चुका है, वो छटपटा उठी। उसे ग्लानि सी हुई, कि मृत पति के शोक में उसने जीवित पुत्र को भुला दिया। पता नहीं बेटे ने कुछ खाया भी है या नहीं जरूर उसे जोर की भूख लगी होगी। उसे अचानक जैसे समझ आ गया कि जाने वाले को याद रखते हुए, जीना पड़ता है, उसके जाने का चाहे कितना ही दुख क्यों न हो, उसके जाने से कितना ही नुकसान क्यूँ न हुआ हो, पानी भी पीना पड़ता है और खाना भी खाना पड़ता है। तेरही तक लोगों का ताँता लगा रहा, पंडित को बुलवाकर, ज़मींदार के घर से पैसा, सामग्री आदि उधार मंगवाकर श्राद्ध की सारी रस्में पिंडदान, श्राद्ध-भोज इत्यादि पूरी करवाई गयी। माँ ने कई बार कोशिश की कि बेटे के सिर पर ज्यादा कर्ज़ न चढ़े, पर उसकी किसी ने नहीं सुनी। उस नन्हें से बालक के वर्तमान और भविष्य की चिंता किसी को न थी। सबको चिंता थी कलेसर के बाप के लिए स्वर्ग में स्थान सुरक्षित करवाने की, या यूं कह लें कि उसके नाम पर अपने फायदे की।

पिछले तेरह-चौदह दिनों के बीच कलेसर अचानक से बड़ा सयाना और समझदार हो गया था। वह पंडित, ज़मींदार और गाँव के लोगों की नीयत भी समझ रहा था, उनका काइयांपन भी भाँप रहा था, फिर भी उनकी बात मान रहा था, क्यूंकि वह कुछ तथ्यों से अवगत था कि वह बच्चा है और अकेला है। उसकी माँ छब्बीस साल की सुंदर युवती है, जिसे सांत्वना और दिलासा देने के बहाने इन लोगों ने कितनी बार गले लगाने की कोशिश की है। इन लोगों से डरकर माँ ने खुद को झोपड़ीनुमा कमरे में कैद कर लिया था, और फरकी को भीतर से मोटी रस्सी से बाँध लिया था, वह मन ही मन सोच रहा था, कि माँ को समझाएगा, उसे बताएगा कि छुई-मुई नहीं आग का गोला बन कर रहे, ताकि कोई माई का लाल उसके करीब आने कि हिम्मत भी न जुटा पाये।

कलेसर बाबू दरवाजे पर गाय-बैल को सानी-पानी दे रहे थे, आरती को घर की ओर लौटते देखा तो आगे बढ़कर उसके सिर पर हाथ रखा और कहा-

“हिम्मत कर बिटिया, हम तोहार साथ हैं, साल भर संध्या के पढ़ाई में बाधा पड़ी, अब का कर सकी, इंसान त परिस्थिति के दास ह बिटिया। हमार त इहे सपना है कि एहि गाँव के बेटा-बेटी खूब पढे-लिखे, बड़ा लोग बने और गाँव के नाम रौशन करे। तू कल से रोज स्कूल जईह, दिक्कत होई त हम तोहार साथ जाईब, खूब पढ़- लिख बेटा, खूब पढ़-लिख”

आरती के बुझे-बुझे चेहरे पर मुस्कान बिखर गई, कलेसर बाबू के चेहरे पर आशा की किरण चमक उठी, कोठरी से संध्या के लोरी गाने की आवाज़ आ रही थी-

“अलिया गे

झलिया गे,

गोला बरद खेत खेलकौ गे,

कहाँ गे

डीह पर गे

डीह के रखबार के गे”

तभी बच्चे के रोने की आवाज़ आई, चाची ने खिड़की दरवाजा बंद कर लिया, आरती चाचा की ओर देखकर बोली

-“जी चाचा, हम रोज़ स्कूल जाएँगे, जिला में टॉप करके आप लोगन का और गाँव का नाम रोशन करेंगे।”

कलेसर बाबू ने कहा -“हाँ मेरी रानी बिटिया!” और उसके पीछे-पीछे चलने लगे ताकि उसके घर जाकर उसके पिता को समझा सकें।