माह के कविः अशोक गुप्ता, विजय सप्पत्ति


किसी सयाने से पूछो

मान लो
तुम एक चिड़िया हो
और
मैं एक पेड़,
लेकिन
पेड़ कहाँ टिक टिक करता है घड़ी की तरह
और
वह घड़ी ही है
जो तुम्हें बाँध कर रखती है
भोर से रात तक.

अरे तुम भी चिड़िया कहाँ हो
अगर तुम चिड़िया होतीं
तो
जानतीं आकाश
लेकिन तुम्हें तो
यह सौ गज का घर
और पांच बाई चार की रसोई
और बस…
तुम भी चिड़िया कहाँ हो..?

मान लो
तुम एक चिमटा हो
और मैं
चूल्हे में धधकती हुई आग
और हमारे बीच सिकती हुई एक रोटी है
लेकिन ज़रा रुको
और किसी सयाने से पूछ लो
क्या
कविता को रोटी का नाम दिया जा सकता है..?

मेरे लिये, तुम.

पहले
हवा ने अपना हाथ बढ़ाया
और उठा लिया
अपने हिस्से का टुकड़ा
मुझसे बिना पूछे.

फिर
रोटी के हाथ लगा कुछ बड़ा ही अंश,
सहमना ही पड़ता है
रोटी के आगे.

अब मेरे सामने जो शेष बचा मेरा दुःख
वह तुमने उठा लिया
मेरे कंधे पर अपना हाथ रख कर,
पता नहीं कैसे
मैं झपट कर छीन पाया कुछ छोटे छोटे कण
कि कुछ तो पास रहे स्मृतियों के लिये.

वैसे
हवा ने
अनगिनत दुःख दिये हैं बार बार मुझे,
वह समेटती ही आती है दुनिया भर के दुःख
और बिखेर जाती है अनायास
मेरी आँखों के आगे,
मैं बीन ही लेता हूँ उन्हें, पता नहीं क्यों..?

दुःख तो
रोटी ने भी कम नहीं दिये हैं
रोटी का कद
बस भूख से ही उन्निस है
भूख के हाथों रोटी
कभी बिना दुःख के नहीं मिलती,
भूख
दुःख के टुकड़ों को समझौते कहती है.

और तुम ?
तुम्हारे दिये दुःख तो मैं समेट कर रखता हूँ,
गिनता नहीं उन्हें
मेरे कंधे पर जितनी बार हाथ रखती हो तुम
उतनी बार
तुम्हारे न होने का दुःख मुझे चीर चीर जाता है.

तुम
पारदर्शी अदृश्य
हवा हो मेरे लिये
हठात छीन कर ले जाती हो
मुझसे मेरे दुःख…..

अपनी दुनिया

उठो,
चलो छत पर
हम अपने दुःख दर्द बाँटें
आकाश के नीचे
खुली एकांत छत पर कहा बांटा दुःख दर्द
न सिर्फ बिसरता है
बल्कि
कुछ सिखा कर जाना भी
नहीं भूलता.

कभी बताया था तुमने,
तुम्हारे
किसी कंधे पर एक दिन
छिपकली गिर गई थी
और तुम्हारे हाथ से छूट गई थी
कविता की किताब.
अब बताओ जरा ढंग से
फिर क्या हुआ था.

अरे हाँ, याद आया
एक बार तुमने बात छेड़ी थी
तुम लौट रहीं थीं बाज़ार से
दोनों हाथों में लादे हुए सामान के थैले
तुम पैदल थीं
और सामने तुम्हें दिख रहा था
साफ़ अपना घर
पर अजीब सी बात थी
कि
मीलों चलने के बाद भी
वह
पास नहीं आ रहा था.

अनकहा रह गया था उस दिन
तुम्हारा वह प्रसंग.

मैं अपनी क्या कहूँ..?
सब
ठीक ही है,
लेकिन उस दिन
मैं मेज़ पर बैठा
लिख रहा था अपनी मां को ख़त
और
मेरा लिखा एक एक शब्द
बस
जुगनू बन कर हवा में उड़ उड़ जा रहा था.
बेबस था मैं
और मेरे सामने कागज़ पर
अँधेरा पसरा पड़ा था.

ऐसा तो अक्सर होता है
कि
सोते सोते अचानक
मैं जाग उठता हूँ
बाहर फैली होती है भरपूर चांदनी
और
मेरे कमरे की अकेली खिड़की
जाम हो जाती है,
खुलती ही नहीं.

नहीं,
मैं सचमुच विश्वास कर सकता हूँ
तुम्हारी बात पर
मान सकता हूँ
कि
अक्सर सपने में तुम्हें दीखते हैं सारे घरवाले
सगे संबंधी,
तुम अस्पताल में भर्ती हो
लेकिन
कोई नहीं पूछ रहा है तुमसे तुम्हारा हाल
सब आपस में ही हंस बोल कर
बस, हाजिरी बजा रहे हैं.

मैं पूछना चाहता हूँ
तुम्हारे पैर के उस गोखरू का हाल
जो
छू जाने पर जरा सा भी
दर्द से तड़पा जाता है
पर
मैं पूछता नहीं,
पूछने से बेहतर है
अपनी उँगलियों से उस ठौर को
जरा सा सहला देना
पर
खुली छत और आसमान की गवाही
यह कहाँ संभव है..?

ओस पड़ने लगी है
बढ़ने लगी है ठंढ
चलो
नीचे चलें
कमरा बेहतर सुरक्षा देता है,
सब घरवाले वहां हैं
वही अपनी दुनिया है..

अंतरंग आख्यान

प्रेम
जब तुम्हारे दरवाज़े पर पहुँच कर दस्तक दे,
तुम चौंक कर मत पूछना
“कौन..?”
उसकी आवाज़ की थरथराहट
खुद उसकी पहचान है..

प्रेम
न कोई क्रिया है

आधिपत्य का अधिकार,
प्रेम
दो नाभियों के बीच
एक
साझा कस्तूरी है.

प्रेम घिरा है
अनेक
भ्रामक
पर्यायवाची शब्दों से
उनमें से एक है,
विवाह.
हिंदुत्व की तरह विवाह भी
एकतरफा प्रतिबंधों का जटिल प्रबंध है,
उसमें कहाँ है समता का भाव
जो प्रेम की सहजता है.
विवाह
आजन्म
मुट्ठी में रेत बाँधने की सतत कवायद है,

प्रेम की नहीं होती कोई स्वतंत्र सी गंध
प्रेम को सांस में
विश्वास की तरह ग्रहण करना.

प्रेम को बिना कुछ कहे चुपचाप सहना.

अशोक गुप्ता

जन्मः 29 जनवरी 1946 जयपुर। मृत्यु 16 अप्रैल 2008 गाजियाबाद।

305 Himalaya Tower. Ahinsa Khand 2 Indirapuram Ghaziabad 201014

………………0…………………….

…………..चल वहां चल ……………

चल वहां चल ,
किसी एक लम्हे में वक़्त की उँगली को थाम कर !!!!
जहाँ नीली नदी खामोश बहती हो
जहाँ पर्वत सर झुकाए थमे हुए हो
जहाँ चीड़ के ऊंचे पेड़ चुपचाप खड़े हो
जहाँ शाम धुन्धलाती न हो
जहाँ कुल जहान का मौन हो
जहाँ खुदा मौजूद हो , उसका करम हो
जहाँ बस तू हो
चल वहाँ चल
किसी एक लम्हे में वक़्त की उँगली को थाम कर !!!!
उसी एक लम्हे में मैं तुझसे मोहब्बत कर लूँगा

“ क्षितिज ”

रूह की मृगतृष्णा में
सन्यासी सा महकता है मन

मिलना मुझे तुम उस क्षितिज पर
जहाँ सूरज डूब रहा हो लाल रंग में
जहाँ नीली नदी बह रही हो चुपचाप
और मैं आऊँ निशिगंधा के सफ़ेद खुशबु के साथ
और तुम पहने रहना एक सफेद साड़ी
जो रात को सुबह बना दे इस ज़िन्दगी भर के लिए
मैं आऊंगा जरूर ।
तुम बस बता दो वो क्षितिज है कहाँ प्रिय ।

“ सोचता हूँ………………. ”

सोचता हूँ
कि
कविता में शब्दों
की जगह
तुम्हें भर दूँ ;

अपने मन की भावों के संग

फिर मैं हो जाऊँगा
पूर्ण

लम्हों का सफ़र….

किसी एक लम्हे में तुमसे नज़रे मिली
और
उम्र भर का परदा हो गया…
किसी एक लम्हे में तुमसे मोहब्बत हुई
और
ज़िन्दगी भर की जुदाई मिली……

लम्हों का सफ़र
लम्हों में ही सिमटा रहा !!!

मुझ से तुझ तक एक पुलिया है
शब्दों का,
नज्मो का,
किस्सों का,
और
आंसुओ का …….

……और हां; बीच में बहता एक जलता दरिया है इस दुनिया का !!!!

एक नज़्म खुदा के लिए………

उस दिन जब मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा
तुमने उस हाथ को दफना दिया
अपनी जिस्म की जमीन में !
और कुछ आंसू जो मेरे नाम के थे ,
उन्हें भी दफना दिया अपनी आत्मा के साथ !

अब तुम हो
और मैं हूँ
और हम बहुत दूर है !
हां; इश्क खुदा के आगोश में चुपचाप बैठा है!

खुदा ने एक कब्र बनायीं है ,
तुम्हारी और मेरी ,
उसने उसमे कुछ फूल और आहो के साथ मेरी प्रार्थनाओ को भी दफ़न किया है !

हां ;
कुछ लोग अब भी मेरी नज्मे पढ़ते है और मोहब्बत की बाते करते है !

…………….यूँ ही …

यूँ ही …
ज़िन्दगी भर कुछ साए साथ साथ ही चलते है
और उन्ही सायो की याद में ये ख़ाक ज़िन्दगी;
…….कभी कभी गुलज़ार भी होती है !!!

सोचता हूँ अक्सर यूँ ही रातो को उठकर …
अगर अम्मा न होती ,
अगर पिताजी न होते .
अगर तुम न होती ..
अगर वो दोस्त न होता …
…चंद तकलीफ देने वाले रिश्तेदार न होते …
…चंद प्यार करने वाले दुनियादार न होते ..

तो फिर जीना ही क्या होता !
यूँ ही ज़िन्दगी के पागलपन में लिखे गए अलफ़ाज़ भी न होते !

||| ज़िन्दगी ||

भीगा सा दिन,
भीगी सी आँखें,
भीगा सा मन ,
और भीगी सी रात है !

कुछ पुराने ख़त ,
एक तेरा चेहरा,
और कुछ तेरी बात है !

ऐसे ही कई टुकड़ा टुकड़ा दिन
और कई टुकड़ा टुकड़ा राते
हमने ज़िन्दगी की साँसों तले काटी थी !

न दिन रहे और न राते,
न ज़िन्दगी रही और न तेरी बाते !

कोई खुदा से जाकर कह तो दे,
मुझे उसकी कायनात पर अब भरोसा न रहा !

प्रेम

हमें सांझा करना था
धरती, आकाश, नदी
और बांटना था प्यार
मन और देह के साथ आत्मा भी हो जिसमे !
और करना था प्रेम एक दूजे से !
और हमने ठीक वही किया !

धरती के साथ तन बांटा
नदी के साथ मन बांटा
और आकाश के साथ आत्मा को सांझा किया !

और एक बात की हमने जो
दोहराई जा रही थी सदियों से !

हमने देवताओ के सामने
साथ साथ मरने जीने की कसमे खायी
और कहा उनसे कि वो आशीष दे
हमारे प्रेम को
ताकि प्रेम रहे सदा जीवित !

ये सब किया हमने ठीक पुरानी मान्यताओ की तरह
और
जिन्हें दोहराती आ रही थी अनेक सभ्यताए सदियों से !
और फिर संसार ने भी माना कि हम एक दुसरे के स्त्री और पुरुष है !

पर हम ये न जानते थे कि
जीने की अपनी शर्ते होती है !
हम अनचाहे ही एक द्वंध में फंस गए
धरती आकाश और नदी पीछे ,
कहीं बहुत पीछे;
छूट गए !

मन का तन से , तन का मन से
और दोनों का आत्मा से
और अंत में आत्मा का शाश्वत और निर्मल प्रेम से
अलगाव हुआ !

प्रेम जीवित ही था
पर अब अतीत का टुकड़ा बन कर दंश मारता था !

मैं सोचता हूँ,
कि हमने काश धरती, आकाश और नदी को
अपने झूठे प्रेम में शामिल नहीं किया होता !

मैं ये भी सोचता हूँ की
देवता सच में होते है कहीं ?

हाँ , प्रेम अब भी है जीवित
अतीत में और सपनो में !

और अब कहीं भी;
तुम और मैं
साथ नहीं है !

हाँ , प्रेम है अब भी कहीं जीवित
किन्ही दुसरे स्त्री –पुरुष में !

अंतिम यात्रा

एक दिन ऐसे ही प्रभु की भेजी हुई नाव में बैठकर
एक न लौटने वाली यात्रा पर चले जाऊँगा !
अनंत में खो जाने के लिए
धरती में मिल जाने के लिए
अंतिम आलिंगन मेरा स्वीकार करो प्रभु
मैं भी तेरा , मेरा जीवन भी तेरा प्रभु
मैं मृत्यु का उत्सव मनाता हूँ प्रभु
बस मेरे शब्द और मेरी तस्वीरे ही मेरे निशान होंगे प्रभु
मुझे स्वीकार करो प्रिय प्रभु
इसी उत्सव के साथ , इसी ख़ुशी के साथ
मैं अंत में तुझमे समां जाऊं प्रभु

मैं, वो और मोहब्बत !

उसकी सोच ये कि,
उसने मुझे सिर्फ आशिक समझा;

जबकि मुझे ये हौसला कि,
मैं इंसान भी बेहतर हूँ !

उसको ये फ़िक्र कि
जमीन और ज़माने का क्या करे;

जबकि मैं ख्वाबो और
आसमान की बाते करता रहा !

उसने मेरे और अपने बीच
बंदिशों के जहान को ला दिया;

जबकि मैं अपने
इश्क के जूनून से फुर्सत न पा सका !

मोहब्बत शायद हो न पाएगी ,
इसका इल्म थोडा सा मुझे भी था;

पर उसने मुझे चाहने की कोशिश ही न की,
इसका गम ज़ियादा हुआ !

पर उम्मीदों के दिये
मैंने अब भी जलाए रखे है

तुम्हारे आने तक
उन्हें बुझने न दूंगा ;
ये वादा रहा !

तुम बस मिलो तो सही !
फिर एक बार !!!
© विजय सप्पत्ति

जन्म 17 नवंबर 1966, मृत्यु 23 अप्रैल 2018