चन्द दोहेः सीताराम गुप्त/ लेखनी-मई-जून 18

पीड़ाओं का और की जब होता अहसास,
सभी विकारों को तभी मिल जाता वनवास।

ऊँचाई पर पहुँचना नहीं कठिन तू जान,
लदा हुआ जो पीठ पर कम कर दे सामान।

परदुखकातर जो यहाँ जिनमें करुणाभाव,
भर जाते हैं आप ख़ुद उनके अपने घाव।

जिनके मन रहते सदा कुत्सित कुटिल विचार,
उनके मन होता नहीं आशा का संचार।

देते हैं जो सदा ही, ग़लत शेर पर दाद,
बन बैठे हैं आज वे बहुत बड़े नक़्क़ाद।

आतिथेय आतिथ्य की, अगर बघारे शान,
शिष्टाचारविहीन वो है बिल्कुल नादान।

ख़ुद करके ख़ुद आप ही करता जो तारीफ़,
या तो वो मग़रूर है, या है बहुत शरीफ़।

चीख चीखकर जब कहे, कोई दिन को रात,
चुप रहना ही है भला, कर मत कुछ भी बात।

कर सेवा निस्स्वार्थ तू कर निष्काम ही कर्म,
निहित इसी में सफलता व्याप्त इसी में धर्म।

संबंधों के बीच में जो आ गई दरार,
बिना गँवाए ही समय उसको करिए पार।

संबंधों की नाव को ले जाना जो पार,
उम्मीदों का भार जो पहले उसे उतार।

स्वस्थ संबंधों के लिए रखना इतना ध्यान,
इक दूजे को दीजिए, पूरा पूरा स्थान।

संबंधों में उस समय आती नहीं खटास,
एक दूसरे में रहे, जब पूरा विश्वास।

रहना चाहो चिर युवा रहे सदा ये होश,
मन न कभी मायूस हो दूर रहे आक्रोश।

समय-प्रबंधन का यहाँ करते सब सम्मान,
भाव-प्रबंधन के बिना हो न कत्र्तव्य ज्ञान।

प्रबुद्धजनों का अनुसरण करता सकल समाज,
जिनके पीछे हम चलें कहो कहाँ हैं आज?

कभी साथ जो और के, नहीं करता इंसाफ़,
उसका क़ुदरत करेगी हिसाब इक दिन साफ़।

पूरे देश समाज में फैला कैसा रोग,
खड़े तमाशा देखते लोग जहाँ दुर्योग।

पूरे मन से पग बढ़ा लगातार दो चार,
जल्दी ही हो जाएगा ऊँचा पर्वत पार।

मन में पूर्वाग्रह न हो चिंतन रहे यथार्थ,
कर्म सदा निष्काम हो, सेवा हो निस्स्वार्थ।

सीताराम गुप्ता
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