कहानी समकालीनः फेसबुक पर-शैल अग्रवाल/ लेखनी-मई-जून 18

‘फोटो हटाइये अपनी वॉल से। और अभी तुरंत हटाइये। कैसे आपने मस्त तस्बीर लिख कर आधी नंगी औरतों के अपने कलेक्शन के बीच मुझे भी खड़ा कर दिय़ा? कोई इज्जत नहीं क्या आपकी आँखों में दूसरों की !’

उप्फ, कितना नियंत्रण रखना पड़ता है इस आभासी दुनिया में भी वरना अराजकता और अश्लीलता फैलते यहाँ भी देर नहीं लगती। परेशानी थी उन्हें लोगों की अश्लील इस मानसिकता से। पर ऐसा क्या था तस्बीर में जो इस आदमी ने ऐसा किया। उन्होंने तस्बीर को एक बार फिरसे निरखा तो एक सीधी-साधी घरेलू औरत को ही सामने खड़ा पाया। शायद इसीका अभाव हो उसके जीवन में ! उन्होंने मन-ही-मन पुनः सोचा। ‘हटाइये, तुरंत हटाइये वरना मैं सबके सामने आपके चरित्र का भाँडा फोड़ दूँगी और आपको मित्रता सूची से भी हटा दूँगी।‘अब उस मध्य वर्गीय सरकारी औफिसर को लेने के देने पड़ते जान पड़ रहे थे।
‘सौरी सिस्टर गलती से ऐसा हो गया। हटा दी मैंने। ‘
वह गुस्से में आग बबूला थीं और वह बारबार माफी मांगे जा रहा था।पाँच मिनट बाद उन्होंने फिरसे उसकी वॉल पर जाकर देखा। फोटो वाकई में हट चुकी थी।
….
शीशे से छनकर आती किरणें पूरी उष्मा और प्रकाश के साथ कमरे में फैल गईं थीं और महीनों से घर के अंदर बंद, दबी-जमी भुरभुराती हड्डियों को राहत दे रही थीं। चन्द मिनटों को तो बन्द पलकों पर जी भरकर सोखा उन्होंने, फिर तुरंत ही उठकर परदे खींच दिए । किसी भी कोण पर अपना कम्प्यूटर रखें , स्क्रीन पर सिवाय काले धब्बों के कुछ भी तो नहीं दिखाई दे रहा था और यह पल भर के लिए भी गवारा नहीं था उन्हें । सुबह-सुबह तो हरगिज ही नहीं। चाय के साथ अब अखबार नहीं, लैपटॉप ही तो रहता था गोदी में। जरूरत ही नहीं थी अखबारों की अब, चाहे जितने अखबार, सारी खबरें यहीं पढ़ लो।

पर कम्प्यूटर खोलते ही एक नई मैसेज के तेवर और संदेश दोनों ने ही फिर से झकझोर डाला उन्हें-

“ सुप्रभात नहीं …सुलगता प्रभात दोस्तों …आँखों में धुआं गर भर जाये तो फफक कर रो भी लो, अब… .”

हर रोज खबरों का एक नया पिटारा…वही गपशप का आनंद…उत्तेजना, राहत और धमाका।
वह सीधी तनकर बैठ चुकी थीं।

“ क्या करोगे तुम इसके लिए? नहीं, यूँ पूछूँ तो, क्या कर सकते हो तुम इसके लिए…है कोई जवाब तुम्हारे पास? …भारत को बंद करके …कोई नयी दूकान खोलो …दूकान ही तो बना दिया है सबने …घाटा घाटा …सब जगह घाटा …पार्टनर सारे लूटने में लगे …शटर परमानेंट डाउन करो …खेल फिर से शुरू करो ….लूसी -भूसी सारे निशाँ …सारी गल्पें मिटा दो अब …आत्मश्लाघा से निजात मिले …महान कहते कहते खुद को …खोखला कर लिया खुद को ….दीमक लगे तने में तन ढूढते हैं हम ….मन में मनों ग्लानी अब भी नहीं …कब होगी ? ”

पान की दुकान कहूँ या आज की कौफी शॉप; अब तो बुद्धिजीवियों के लिए या फिर ठलुआ क्लब के सदस्यों के लिए मानो यही एक जगह रह गई थी। पारिवारिक मेलमिलाप और निजी पलों के फोटो तक इसलिए खींचे जाते हैं कि फेसबुक पर डाले जा सकें। सुबह से राततक लाइक्स अगोरते और कमेंट्स पढ़ते ही तो बीतते हैं उनके भी।

फेसबुक पर पंद्रह अगस्त की वह सुबह, एक खुशनुमा और चहकती सुबह थी। यहाँ यूरोप में भारतीय स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या …

‘ मेरा देश महान जैसी अनगिनित शुभकामनाओं के साथ साथ किसने लिख डाला है यह सब?’
उत्सुकता थी या उत्तेजना , उन्हें नहीं पता था परन्तु सिर की घड़ी ने टिकटिक करना शुरु कर दिया था। समझें या संभालें तबतक एक और संदेश खिड़की उछलकर आँखों के आगे आ खुली और एकबार फिर पूरी तरह से चौंका गई थी उन्हें।

लाइन से कटे पंडितों के सिर और साथ में अध जला तो कहीं पैरों से कुचले जाते तिरंगे की उन तस्बीरों ने अंदर तक तोड़ डाला उनकी सहनशीलता और धर्मनिरपेक्षता को। वह दक्षिणपंथी या कट्टरवादी नहीं थीं । सभी धर्मों का, मानवता का आदर था मन में ..पर यह तस्बीरें तो किसी को भी बीमार करने के लिए काफी थीं।

अक्सर ही उनके शान्त स्वभाव को मौन स्वीकृति समझ लिया जाता था और नतीजा यह था कि बिना अनुमति के ही, जाने कैसे-कैसे खुद को देशप्रेमी और बुद्धिजीवी कहे-समझे जाने वाले समूहों का सदस्य बना लिया गया था उन्हें । सच्ची बात तो यह थी कि उन्हें ऐतराज भी नहीं था । रुचि और बुद्धि को नित नया आयाम जो मिल रहा था।

कहीं अपनी उपलब्धियों की नुमाइश, तो कहीं दैनिक जीवन की छोटी-से-छोटी जानकारी…कहीं कोई नया कवि देशप्रेम के गीत लिख रहा था तो कहीं कोई बुद्धिजीवी देश द्रोह के।…तरह तरह के कुंठित और त्रसित शेर, भेड़िए, सियार सब एक ही मैदान में चरते रहते हैं यहाँ दिन-रात। कहीं किसी ने एक ही पुरस्कार की सैकड़ों खबरें और तस्बीरे छाप रखी थीं, तो कहीं पूरे परिवार के जन्मदिन के कई-कई फोटो और अपडेट भरे पड़े थे, मानो शीशे के आगे खड़ी कोई सुन्दरी पलट-पलटकर पूछ रही हों -‘ कहो जी, कैसी लग रही हूँ मैं ? ‘

फेसबुक की यह आभासी दुनिया, कल्पना में ही सही, भांति-भांति के मुद्दों का मानो अखाड़ा लगने लगी थी । हर व्यक्ति गौरव-मंडित था और पूरी तरह से आत्म विमुग्ध भी। पर अबतक वे सब भी तो उनके अपने और खास बन चुके थे। कोई दीदी कहकर खींचता तो कोई भाभी…किसीके पास दोस्ती का वास्ता था तो किसी के पास जागरुकता का। एकाध तो शादी तक के आमंत्रण भी दे चुके थे। तस्बीर ही इतनी प्यारी थी उनकी। बह रही थीं वह इस अनियंत्रित प्रवाह में और आश्चर्य की बात तो यह थी कि आनंद भी ले रही थीं हर उठती-गिरती लहर का ।

“मेरी आदतें बिगड़ी नहीं हैं । असली बात यह है कि मेरे पिता ने मुझे राजकुमारी की तरह बड़ा किया है, बस।“

किसी बहू के स्टेटस अपडेट पर और उसकी सास की खिसियाहट पर वह मुस्कुरा तक पाएँ, कि किसी ने फिरसे उनकी अभी-अभी बंद की हुई बात-खिड़की को खोल डाला।-अब चार-चार खिड़कियाँ एक साथ खुली हुई थीं। एक तो उनकी वैसे भी हमेशा खुली ही रहती थी जहाँ खेती-बाड़ी होती थी। तरह-तरह के जानवर पाले और खरीदे-बेचे जाते थे। अभी भी उसकी पकी और तैयार फसल ही तो कट रही थीं वह , जब-

“मैं आमरण अनशन करने जा रहा हूँ। क्या आप फलां तारीख को दिल्ली में हो? मेरी जमीन ही नहीं उसके सारे कागज तक भी गायब कर दिए गए हैं । हर सबूत मिटा दिया गया है कि मैं ही जमीन का मालिक हूँ और वह मेरा ही पुश्तैनी खेत है। पांच साल से कचहरी और पुलिस चौकियों के चक्कर लगा-लगाकर थक चुका हूँ। कोई पत्रकार हैं आपकी जानकारी में जो इस खबर को तवज्जू दे ? मेरे परिवार में मां बाप सहित आठ सदस्य हैं और मेरे पास कुछ भी नहीं बचा । और कोई रास्ता नहीं है अब मेरे पास।

किस मुंह से कहूँ मेरा भारत महान। कायरों का देश है यह। यहाँ मेहनती छला जाता है , भूखों मरता है और भृष्ट लुटेरे तिजोरियाँ भरते हैं, राज करते हैं। ”
उनका पारा भी अब कुछ-कुछ चढ़ रहा था …उसके लिए कुछ न कर पाने की क्षुब्धता के साथ-साथ एक बेचैन अपराध बोध पांव पसार रहा था दिन की इस अनोखी शुरुवात में।

“पिछले चार हफ्तों से मेरे मित्र की पांच साल की बेटी गायब है। कृपया इस तसबीर को साझा करें । क्या पता एक माँ के आँसू पुंछ ही जाएं।”

खबर सही थी या गलत, जानने का वक्त नहीं था, जल्दी जल्दी से साझा किया दमयंती देवी ने नन्ही बच्ची के उस चित्र को और अंदर ही अंदर एक गहरे संतोष के अनुभव को भी। शायद इसी बहाने किसीकी मदद हो जाए।

तभी किसी और ने आवाज दे दी उन्हें।

“दीदी, मेरी गर्ल फ्रैंड प्रेगनैंट है और हमारी शादी नहीं हुई। हम पांच वर्ष से साथ रहते हैं। वह एबौर्शन नहीं कराना चाहती और मैं शादी के लिए अभी तैयार नहीं हूँ।…समझाओ इसे, मेरी मदद करो, आप।”

एगोनी आंट खेलने का कोई इरादा नहीं था फिर भी उन्होंने ब्योरेबार लिखना शुरु कर दिया-क्या करतीं आदत से मजबूर थीं।

“अगर आप चाहते हो उसे, तो ईमानदारी से जिम्मेदारी निभाएं अपनी और तुरंत ही शादी कर लें। दीदी कहते हैं, तो अपने भाई से मैं यही उम्मीद करूँगी, बस।”

“आधुनिक विदेश में रहने वाली कम-से-कम एक पढ़ी लिखी आप जैसी महिला से तो इस जबाव की उम्मीद कतई नहीं थी मुझे। हमने कोई गलत काम नहीं किया है। ऐसी छोटी मोटी दुर्घटनाएं तो होती ही रहती हैं। बच्चा तभी आना चाहिए जब उसका स्वागत हो। मैं यह शादी अभी नहीं कर सकता। जिम्मेदारियाँ नहीं उठा सकता । हम अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं।”

” क्यों? ”

” क्योंकि मैं शादीशुदा हूँ। ”

जबाव की तिलमिलाहट गहरी थी और चौंकाने वाली भी।

तभी एक खिड़की और खुल गई।

” क्या आप बौम्बे आती हैं?
…हम नौजवान लड़के सप्लाई करते हैं।”

” छी….” वह कुछ और सोच भी पाएँ…वह पुनः बोली, ” घबराएँ नहीं हमारी सेवाएं पूर्णतः गोपनीय हैं और आप जैसी कई धनाढ्य महिलाएं ये सेवाएं ले चुकी हैं।”

क्या भारत के युवा और संस्कृति दोनों ही बदल रहे है? मजबूर थीं सोचने पर वह पर संस्कृति के अनबूझ इस जंगल की विष्तृणा में भटकते हुए भी सुख ही मिलता था उन्हें । मन ही मन देश और युवा सुधार, दोनों का ही संकल्प ले चुकी थीं वह अब।

तभी एक और बात-खिड़की खुली,

“आप मेरी बेस्ट फ्रैंड हो । मैं आपको बता सकती हूँ । कल मेरे बौयफ्रैंड ने मेरे साथ यू नो ‘वह’ किया …क्या अब मैं प्रैगनेंट हो जाऊंगी ?”

पूछने वाली लड़की अपनी उम्र मात्र सोलह साल बता रही थी।

उसकी बात का जबाव तक सोच पाएँ कि दूसरी खिड़की पर उसी की दूसरी सहेली थी।

“….वाओ इस उम्र में ऐसी दिखती हो आप… आपकी उम्र का राज क्या है, हमें भी बताओ ना दीदी। मैं आपकी उम्र में आप-सी ही दिखना चाहती हूँ।”

“एक सीधा-सच्चा कुंठाहीन जीवन।”

दमयंती देवी की उंगलियाँ एकबार फिर से की बोर्ड पर थिरकीं और अगले पल ही जबाव लड़की तक पहुँच चुका था।

“ओह, आई सी ए प्योरिटन। आई थौट यू आर ए मौडर्न फौरवर्ड लुकिंग लेडी।”

उस आधुनिका की आँख से दमयंती देवी पल भर में ही गिर चुकी थीं।

“क्या आप वाकई में पचास वर्ष की हो या बेवकूफ बना रही हो हम सबको? यह प्रोफाइल फोटो कितनी पुरानी है…बुद्धू ही बना रही हो ना? जानती हूँ। कैमरा है ? …आप इस्तेमाल करती हो…? अभी तुरंत देखना चाहती हूँ मैं आपको। ”

” क्या हम बात कर सकते हैं .? अगर आपकी दी हुई जन्मतिथि सही है तो आप दस साल बड़ी हो मुझसे पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता…हम अभी भी अच्छे दोस्त हो सकते हैं?”

इस बार खुली खिड़की पर एक नौजवान था और कल तक शरीफ दिखता वह मित्र आज एक नए ही रंग में नजर आ रहा था। ” आप बहुत खूबसूरत हो, मुझे अपना मित्र बनाओ ना प्लीज।”

“मैं अफगानिस्तान से हूँ। इंगलैंड आना चाहता हूँ। कोई भी जो मुझसे शादी करके वहां की नागरिकता दिला सके…क्या किसी को जानती हो आप? मदद करो मेरी प्लीज। ”

उफ्फ् कैसे कैसे सपने…कितनी दलदल…कितनी कुंठाएँ…किस किससे निपटें, किस-किसको जबाव दें…सिर से पैर तक परेशान हो चुकी थीं वह। कैसे कैसे लोग आ जाते हैं इन सोशल वेव साइट्स पर भी।

शोर शोर… चारो तरफ से शोर। ऐसा तो नहीं सोचा था जब एकाउंट खोला था। भले लोग ….आम लोग और ढेरों सारी अच्छी सुरुचिपूर्ण बातें…दुख-दर्द से निजात पाने का एक शांत एकांत…एक नई दुनिया और उसकी तकनीकी जानकारी- यही सोचकर एकाउंट बनाया था उन्होंने। घर परिवार के सदस्यों और मित्रों से हजारों मील दूर बैठकर मिनटों में बात हो जाती हैं….नई से नई खबर और तसबीरें बांट ली जाती हैं।

माना, इन आधुनिक तकनीकियों ने सारी दूरियाँ ही मिटा दी थीं, पर खिड़की खोलते ही शीतल हवा के झोके के साथ चील कौवों की कांव-कांव भी तो सुनाई देगी ही , भूल क्यों गई थीं वह। कम्प्यूटर खोला और फिर से बंद कर दिया उन्होंने। लगा सैकड़ों लोग एकसाथ बैठकी में घुस आए थे और कहीं चैन या आराम नहीं।

अगले कदम के बारे में वह सोच ही रही थीं कि टेलीफोन की घंटी बजने लगी। लाइन पर सुहानी थी…सुहानी उनके पड़ोसी की बेटी। अब गार्डेन की फेंस पर भी नहीं, फेसबुक पर ही बात होती है प्रायः पड़ोसियों से भी।

‘आपने चेरी की नई तस्बीरें देखीं आज ही लगाई हैं। चीकू तो बहुत ही प्यारा लग रहा है , आपको निश्चित ही पसंद आएँगी। देखो, मैं तबतक फोन पर हूँ। जानना चाहती हूँ आपको कौनसी सबसे ज्यादा पसंद आईं।‘

आंखें छलक आईं। कीड़े-मकोड़ों की सफाई की जाती है, उनसे डरा नहीं।

फिलहाल एकबार फिरसे अपने फेसबुक एकांउट पर लौग इन करने के लिए कम्प्यूटर खोल लिया था उन्होंने।

…..
हद कर दी इन लोगों ने तो….इसबार तो किसी ने बेहद गंदी फोटो डाल रखी थीं और अगले पल वह माफी भी मांग रहा था…दीदी मेरा एकांउट किसी ने हैक कर दिया है और मैं बेहद शर्मिंदा हूँ। आप तो मुझे ऐसा नहीं समझतीं, ना ?

क्या हम कैमरे पर बात कर सकते हैं….तीसरी खिड़की पर कोई पूछ रहा था जिसे कल ही टाला था उन्होंने ।

‘नहीं। मेरे पतिदेव को यह सब पसंद नहीं।‘
“ मैं आपके बेटे की उम्र का हूँ फिर क्या ऐतराज है आपको?”
“ नहीं, मतलब नहीं ! “
अपनी दृढता और कल्पना पर न सिर्फ वह आश्चर्यचकित, अपितु गर्वित भी थीं अब तो वह।
हत्प्रद वह बस इतना ही नहीं जानती थीं कि पहले पोते पोती चेरी और चीकू को संभालें या फिर देश के इन भावी कर्णधारों को… कम्प्यूटर खोला और एकबार फिर से चुपचाप बंद कर दिया उन्होंने।
उन्हें लगा सैकड़ों लोग एकसाथ बैठक में घुस आए हैं। अब छुपने या आराम करने की कहीं कोई जगह नहीं रह गई उनके पास।
पर आदतें भी तो गुलाम बना लेती हैं इन्सान को। कुछ ही मिनटों बाद….एक लंबी सांस लेकर उन्होंने फिर से कम्प्यूटर खोल ही डाला और सबसे पहले अपना स्टेटस अपडेट करने बैठ गईँ- ‘ मित्रों से बात करने में एतराज नहीं, परन्तु कृपया शालीनता और वक्त का ध्यान रखें। कैमरे पर आकर बात करने की जिद न करें इससे मेरे घर की शांति भंग होती है।…आपकी शुभेच्छु।‘
अच्छा तो अब हम चलते हैं-कहते हुए एकबार फिर उन्होंने बेहद संतोष के साथ कुछ मिनटों के लिए कम्प्यूटर बन्द कर दिया, इसबार, प्लग, स्विच सभी निकाल दिए। अब एक मुस्कुराहट थी होठों पर जो आश्वस्त कर रही थी कि अब कोई परेशान नहीं कर सकता।
असली जिन्दगी इस वर्चुयल दुनिया से फर्क तो है ही। इसे होल्ड या पौज पर नहीं डाला जा सकता।
एक ठंडी सांस बंद होठों से निकल गई – दैनिक दिनचर्या के ये सभी फालतू काम हर प्राणी को निपटाने ही पड़ते है। …सामने टंगे आदमकद शीशे में अपना अक्स देखा तो पाया कि चेहरे पर एक कुटिल परन्तु संतोषजनक मुस्कान थी इसबार।
देखना यह है कि कितने लोग इस अपडेट को पढ़ते और मानते हैं….. खामखाह की नाराजगी….इतना बुरा भी तो नहीं है यह शगल ….वह जानती थी इसे…सौरी जानता था इसे ।
आपके सामने राज खोलने में अब कोई बुराई नहीं। आपका एकाउंट फेसबुक पर तो नहीं है न…बस फिर ठीक है। असल बात तो यह है कि वह दमयंती देवी नहीं, देवता हैं….औरत नहीं आदमी …चौंकिए नहीं, एक बेहद सहृदय, उर्वर कल्पनाशील पर बेहद अकेले शर्मीले, बूढ़े आदमी। जिन्होंने न कभी शादी की न घर परिवार बसाया। जब भी जी घबराता है इस वर्चुयल दुनिया के वर्चुयल परिवार में जा बैठते हैं। सच पूछा जाए तो बुराई भी क्या है आखिर इसमें?

…जान पहचान और आइडेंटिटी का यह खेल ही तो है जिसने रिटायर्ड सी.बी.आई औफिसर दुश्यंत कुमार को दमयंती देवी बनाकर देश-विदेश में इतने मित्र और और एक संभ्रांत उच्च औफिसर की पत्नी की इज्जत व पहचान दे दी है।

अरबों की इस दुनिया में अकेले वे आज इसी की बदौलत तो सैकड़ों के मित्र हैं… कुछ भी सोचो, बुरा कुछ भी नहीं इसमें। बिना किसी नशे के एक नशा है…बस्स। कल तक पूरी तरह से उजाड़ और वीरान पड़ी उनकी जिन्दगी, कितनी रोचक है आज…खेल में पूरा मजा आ रहा है उन्हे भी….एक आदर्श और संयमित जीवन जीने वाले वह, जिन्होंने कभी एक को बेवकूफ नहीं बनाया था अब हजारों को बेवकूफ बना रहे हैं। बुढ़ापे को भूल मानो बचपन के खेल के मैदान में वापस पहुँच गए हैं । जहाँ वही दादागिरी , आत्म प्रदर्शन , मारपीट और छीन-झपटी है ! गुल्ली डंडा खेल रहे हैं वह। वैसे ही चिड़िया की तरह हाथों के डैने फैलाए, उड़े जा रहे हैं, जमाने की हवा अपनी बन्द आँखों, चेहरे पर महसूस करते…..काल्पनिक इंद्रलोक का आनंद लेते।

खुद को ही नहीं दूसरों को भी बहलाते-फुसलाते, कभी मेकअप की इधर से पढ़ी टिप उधर दे देते हैं तो कभी कोई ताजा खबर। नयी से नयी साड़ियों और वेस्टर्न आउटफिट पर बहस करने में उतना ही मजा आता है उन्हें, जितना कि उनके अनुयाइयो को। इक्कीस हजार से ज्यादा फौलोअर्स हैं उनके, जाने कितने जानते हैं दमयंती देवी को। शुभचिंतक हैं, करीबी हैं। भाई बहन और बेटे बेटी ही नहीं अब तो पोते पोती भी हैं उनके यहाँ। एक आवश्यक हिस्सा हैं वे सब मित्र अब उनकी जिन्दगी के। अपनी तरफ से वे भी तो कोई कसर नहीं छोड़ते पिचत्तहर वर्ष की इस उम्र में भी …सतर्क गश्त लगाते चौकीदार की तरह हर पंद्रह, बीस मिनट पर ढूँढ-ढूँढकर स्टेटस अपडेट करने की अनोखी लत पड़ चुकी है उन्हे ! अपने लपेटने के अंदाज को भलीभांति जान और समझ चुके हैं वे। यह दमयंती देवी की पहचान और फोटो भी तो नेट की बदौलत ही मिली है। नेट से ही तो ली है उन्होंने।

‘ धन्य हो कम्प्यूटर देवता और आप जहाँ पर भी हों, जो भी हों, थैंक यू दमयंती देवी।’

अब वह जोर-जोर से व्हिसल कर रहे थे और पूर्णतः संतुष्ट व बेमतलब ही मुस्कुराए जा रहे थे। बन्द पलकों के पीछे जा बैठे कबीर बन चुके थे वह अबतक। गा रहे थेः बुरा जो देखन मैं चला बुरा न दिखिया कोय…

कुछ और नहीं बचा था फिलहाल करने या सोचने को। एकबार फिर कम्प्यूटर बन्द कर दिया उन्होंने। रात के दो बज चुके थे अबतक।…आखिर दो चार घंटे सो लेना भी तो जरूरी है। सोएं नहीं तो लेट तो लें ही ज़रा। लैपटॉप कौन-सा दूर है, बिस्तर में बगल के तकिए पर ही तो रहेगा रातभर। हाल ही में बन्द की बत्ती फिलहाल फिर से खोल ली है उन्होंने और लैपटॉप भी खुला ही छोड़ दिया है, जाने कौन कब आवाज दे दे, क्या पता ?…
…..0….