कहानी समकालीनः पाषाणीः शैल अग्रवाल

पूरे तीन दिन हो चुके पर रह रहकर बर्फ की छींटें और बूदाबांदी लगातार जारी थी।

बरोसी से उठते धुँए ने कोठरी की छत और अकरम की छाती, दोनों ही काली कर दी थीं। आग भी बारबार ही बुझ जाती थी, पर लगातार खांसते अकरम को परवाह नहीं थी इसकी। कैसे भी यह आग जलती रहनी चाहिए।

काकी जीवित रहे, बस यही एक मात्र ध्येय था अब तो उसका।

परन्तु जितने ही ध्यान से अकरम उसे देखता, कोई हरकत न दिखती निश्चेत पड़े काकी के शरीर में। ठंडी राख-सी थी काकी।

और तब कुरेद-कुरेदकर जीवित चिनगारियाँ ढूँढने लग जाता वह उसमें। कभी सुन्न पड़ा बदन गरम गीली तौलिया से पोंछता तो कभी अस्त-व्यस्त कपड़े और बाल ठीक कर देता, परन्तु आँखें खोलना तो दूर, मुस्कुराती तक न शब्बो काकी। करवट तक तो वही बदलता था उसकी दिन में तीन-चार बार। लालटेन की लपलप करती रौशनी में बस एक ही बात साफ-साफ दिखाई और सुनाई देती थी उसे कि सांसें अभी चल रही हैं उसकी। और तब दोनों हाथ खुद-ब-खुद दुआ में उठ जाते शुकराना करते कि अल्लाह की रेहमत ने प्रयाश्चित और काकी की सेवा के लिए एक दिन और तो बख्शा उसे।

माछी-भात बनाया था अकरम ने। स्वाद का तो पता नहीं पर हाथों से मसल कर कुछ चावल के दाने माड़ सहित जैसे-तैसे गटकवा ही दिए थे उसने काकी को भी। मांस-मछली से दूर ही रखता है, जैसे वह रहती थी पहले। छोड़ने का उसका भी मन करता है, परन्तु कमबख्त मुंह लगा हुआ है गोश्त। पेट ही नहीं भरता इसके बिना। यह बात दूसरी है कि कभी कभी तो मछलियों की आँखों में भी उसे वही पीड़ा दिखती है, जो काकी की आंसू डूबी आँखों में रहती है।

कहीं दिमागी संतुलन तो नहीं खो रहा वह यूँ अकेले-अकेले?

होठों पर तिर आई मुस्कान को कसकर पोंछ डाला उसने। परन्तु आंखों के उस पानी में अब बेचैन मछलियों-सी कई यादें तैर आई थीं, कुछ खुद देखी-समझी, कुछ इसी काकी के मुंह से सुनी और जानी। बात पुरानी होकर भी इतनी पुरानी तो नहीं, कि भूल जाए वह! बेदखल करने से पहले काकी का भी अपना ही गांव था यह। यह-घर, बाप भाई-एक भरेपूरे परिवार के साथ रहती थी वह। यहीं खेली-बड़ी और जवान हुई थी वह, इसी गाँव में जो जीते-जीते ही आज उसका मकबरा बन गया है!

सब कुछ देकर भी तो कभी ठीक-ठीक जान नहीं पाई यह कि आखिर उसका अपराध क्या था? भारत की थी वह या फिर पाकिस्तान की है? हिन्दु, मुसलमान के तो पचड़े में ही नहीं पड़ी कभी। बस, नियति के आगे सिर झुकाए, कैसे भी जीती ही तो रही है। जाने कितने और अभागे होंगे इस जैसे, जिनके घर-बार नाते-रिश्तेदारों को एक लाइन खींचकर चीर दिया गया था, आजतक भूना जा रहा है!

पर यह पलभर को भी इन्सानियत से नहीं गिरी, दोनों को ही अपना मानती रही।

गौरा और शबनम दोनों को ही अपने अंदर सहेजे-सम्भाले, बस जीती ही तो रही थी काकी और रहती भी, अगर हम और हमारे जैसे रहने देते।…

सच कहूँ, तो यह कहानी कहाीं की भी हो सकती है, दुनिया के किसी भी कोने की।
जहाँ लोग लड़ रहे हैं, जीने को मर रहे हैं। अपनी ही बेबस छटपटाहट में घुटते-टूटते, बेवजह ही, कभी खुद अपनी, तो कभी दूसरे की क्रूरता का शिकार हो रहे हैं। भूल और भुलाकर कि जिन्दगी खूबसूरत है, जीने के लिए है, विनाश के इस निरंतर के तांडव के लिए नहीं। पत्थर हो चुके हैं हम शायद… हमारी भावनायें, व्यवहार, सब कुछ। न बुझने वाली भूख से लड़ता इन्सान परिस्थितियों और उनकी असह्य जटिलता में फंसा संवेदनाहीन और पत्थर ही तो हो जाता है! वैसे भी, कई बहाने और मकसद होते हैं, पत्थरों को पूजने के भी और मनमाफिक गढ़ने के भी।…देवी-देवता तो कहीं खेल-खिलौने का रूप देने के।

पर हम सब बेजान कठपुतलियों में कब और कैसे पलटे?

औरतों को तो कई बार घर से बाहर तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती। आसपास ही पर्याप्त औजार होते हैं इन्हें काटने और छाटने को । बेहद साधारण और घरेलू …एक बेदखल जिन्दगी जीते-जीते भी तरह तरह के दबाव संज्ञा शून्य कर देते हैं। कोई खबर भी तो नहीं बनती । ना ही कोई विचलित ही होता है, इतने आदी हो चुके है हम इस बर्बर क्रूरता के।…जननी और निर्मात्री भले ही मान लें, परन्तु इतना महत्व ही कब दिया है हमने इन्हें।

कैसे भी जरूरतों को पूरा करती, जिम्मेदारियों को निभाती, शिब्बो काकी भी बस जीती ही तो रही थी …दूसरों के सपने और ख्वाइशों को अपना मानती, पूरा करती। जिन्दगी ने कभी पूरी तरह से अपनाया ही नहीं इसे।

अकरम के आंसू अब काकी के पैर पखार रहे थे, मानो बरसों का वह अपराध बोध धोकर ही मानेंगे।

सामने बहती वह सिंधु नदी भी हिन्दु थी या मुस्लिम, नहीं जानता था वह। सिंधु नदी भी तो हमेशा टूटी-बिखरी शिब्बो काकी-सी ही लगती रही है उसे …अपने ही आंसुओं और कष्ट में पूरी तरह से डूबी, जीवन का कठोर सफर, कैसे भी बस तय करती।

जड़ों से कट-बंटकर जीना आसान तो नहीं, चाहे नदी हो या फिर औरत!

उद्गम से अंत तक की यह यात्रा दोनों के लिए ही बेहद पथरीली और दुर्गम रही है। एक ही जनम में गौरा और शबनम बन जाना आसान नहीं था। यही तो सिंधु नदी की भी कहानी है। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान, दोनों हिस्सों में बंटी, पर अलग हो पाना , मुल्कों के फर्क को समझ पाना, न सिंधु को ही आया और ना ही शबनम कहलाती गौरा ने ही जाना। खूबसूरत चिनाब की वादियों में, इसी सिंधु नदी के जल को पीती, सिंधु नदी के किनारे बड़ी हुई थी शब्बो काकी भी तो। किस्मत अलग कैसे होती फिर इनकी! अस्तित्व का बटवारा ही नहीं, दोनों के ही रास्ते और कई अन्य मायनों में भी समानान्तर ही तो चले। दोनों के ही रास्ते में नंगा पहाड़ आया। भटकी सोच आई, जिसने मजबूर किया इन्हें घरबार छोड़ने को, रास्ता बदल देने को। खुद से और अपनों से बिछड़कर, हालात के आगे पूर्ण समर्पण कर, खुदको पूर्णतः दुःख के सागर में विलीन कर देने को।

दोनों ने ही, फिर भी फूल ही फूल तो खिलाए नफरत के वीराने में।… बस दिया ही दिया ही तो, हम चाहे कैसा भी व्यवहार करें।

अकरम के हाथ फिर खुद ही जुड़ गए, मानो माफी मांग रहा हो मरती और बेबस गौरा और शब्बो से। सिधु नदी से, जिसे मां मानकर पूजती थी काकी। दुख की कातर घड़ी में साथ न निभा पाने के लिए, दुश्मनों के साथ तमंचा लेकर उसके घर तक पहुंच जाने के लिए, बारबार उसका मन किरचता रहा और पश्चाताप के आंसू तपन को सोखने की नाकाम कोशिश करते रहे। पर अरब सागर तो नहीं वह, जिससे सिंधु का दुख देखा नहीं गया तो समेट लिया खुद में, जैसे शाहिद ने गौरा को शब्बो बनाकर पनाह दे दी थी अपने घर में। खुली सड़क पर घूमते खूंखार कुत्तों द्वारा बोटी-बोटी चिथड़े होने से बचा लिया था!

सिंधु नदी जैसे दोनों देशों की धरती को सींजती संवारती बही है, शब्बो काकी ने भी तो दोनों ही कौमों को बहुत कुछ दिया है, बिना किसी भेदभाव या अपना-पराया जाने-माने। जबकि गरीब के पास तो कभी कुछ था ही नहीं, सिवाय बहते नीर-सी अथाह दया और ममता के। बेइन्तहाँ हमारी हवस ने ही भटकाया है इस दुनिया को और अगर अल्लाह की रेहमत रही, तो अंदर की इन्सानियत ही सुलझाएगी इस नफरत को भी।

वक्त ही लेगा अब सारे अहम् फैसले, उस जैसे अदना इंसान के बस में तो वैसे भी कुछ है ही नहीं … यह आवेग भरा बहाव, कहीं जाकर तो थमे पर?

अपनी ही सोच की झुलस से बचने के लिए अधजली बीड़ी वापस सुलगा ली थी अकरम ने, उंगलियाँ जब जलने लगीं तो वापस फेंक भी दी। पर तपन नहीं ही गई – सुना है धरती और नारी दोनों के ही अंतस में एक आग रहती है, जो हर हाल में जिन्दा रखती है दोनों को। पर एक दिन अचानक यह आग यदि बुझ जाए तो, …पर, यहीं तो कहानी है शिब्बो काकी, यानी हमारी पाषाणी की भी।…पाषाणी नहीं गौरा थी जो, फिर शबनम बनी और फिर यूँ पत्थर का बुत… ये घटनायें इतनी भी महत्वहीन नहीं कि धूल डाल पाएँ पूरे वाकये पर। भूल जाएँ! दुनिया के सामने लाएगा वह इसे हर्फ-ब-हर्फ।

झुका सिर अब शर्म और ग्लानि के बोझ को नहीं संभाल पा रहा था और बहते आंसू दुख के उमड़ते ज्वार को।

और तब गीले कागाज पर ही अकरम की बेखौफ कलम ने रिसाले का मजमून रखा ’ पाषाणी’ और लिखने लगा।

दुनिया का सबसे खूबसूरत गांव था यह शब्बो काकी की नज़र में । खुदा की नेयमत से भरपूर और देवालय-सा ही साफ-सुथरा। झील और फलों के बागान, कुहुकते पक्षी, क्या नहीं थे! जाने किसकी नज़र लगी फिर कि कहने को तो धरती पर स्वर्ग, पर इतनी नफरत … हमेशा ही एक आग में धधकता रहता… किसी बात की भी आजादी नहीं, जीने तक की नहीं। ना बुजुर्गों का ध्यान, ना बच्चों का। मां-बहनों की तो बात ही छोड़ो। बन्दूकों का डरावना शोर था चारो तरफ… कभी किसी बहाने तो कभी किसी बहाने। पर उसके लिए तो यह जीवन भी सामान्य ही हो चला था और रहता भी…अगर एकदिन अचानक ही सब कुछ बदल न जाता…प्रकृति, वह पर्वत नदियाँ जिन्हें वह देवी-देवता और खुदा की रेहमत मानती थी, इन्सानों के खून में न रंग जाते!

बचा लकड़ी का गठ्ठर भी झोंक दिया उसने और बुझी आग तेजी से वापस भभक उठी।
डर कर पीछे खिसक गया अकरम ।

संभलना ही होगा।

काश्मीर के लिए दोनो ही मजहब वालों को मिलकर दुआ मांगनी होगी। प्रार्थना करनी होगी कि देवों की इस घाटी में वह दिन फिर कभी ना आए, जब किसी गौरा या शब्बो को यूँ पाषाणी में तब्दील होना पड़े, या फिर जीते-जी अनचाहे कूड़े के ढेर-सी हटा दी जाएँ अपनों के ही बीच से।

हो शायद, ऐसा ही हो एक दिन।

इंसानियत का सिर्फ एक ही मजहब होना चाहिए। और वह है -प्यार।

लिखते वक्त अकरम के चेहरे पर सौम्य मुस्कान थी, परन्तु मुठ्ठियाँ संकल्प में भिंची।

एक अजूबा और हुआ तभी, मिनट मात्र को ही सही, घुप अंधेरे से चांद निकल आया और रौशनी की झीनी लकीर किवाड़ों की चूल से निकलकर उसकी आँखों के आगे फैल गई। उसे ढाढस देती-सी, हिम्मत बढ़ाती-सी।

पर यादों ने तो वे पुरानी घटनाओं की अवसाद भरी तस्बीरें ज्यों-की-त्यो पुनः दोहरानी शुरु कर दी थीं- पूरी गलती उसी की थी। न वह मौलवी को काकी का वह राज बताता, ना ही शाहिद अपनी जान खोता और ना ही काकी इस हाल में होती …पश्चाताप में डूबी आँखें गीली आस्तीन से ही रगड डाली थीं अब उसने।

धांय-धांय…दो ही गोलियों की आवाज सुनी थीं शब्बो काकी ने उस दिन और किसी बड़े अनिष्ट की आशंका से कांपती, बावरी-सी दौड़ी, दरवाजे पर आ खड़ी हुई थी। कंधे पर दुपट्टा नहीं, पैरों में जूती नहीं…फटी-फटी आँखें और बिखरे-बिखरे बालों संग बदहवास-सी, किसी बड़े अनिष्ट की आशंका से डरती-कांपती, अविश्वास में उन्हें देखती ही तो रह गई थी वह।.. जैसे-तैसे बचाकर रखा था उसने अपनी इस छोटी-सी दुनिया को…खुद को और अपने शौहर को इन राजनीतिक और धार्मिक तूफानों से। पर लगता है आज सब भरभाकर बिखरने वाला था और वह भी दोबारा, खुद उसकी अपनी ही भयभीत आँखों के आगे ।

…क्षोभ, क्रोध और भय के साथ घटनाओं के इस आकस्मिक सैलाब में टिके रहना जब असंभव हो चला तो दरवाजे की चौखट से फालिज मारी खड़ी, पल भर को तो गिरते-गिरते ही बची थी । मानो कांच के बुरादे से मुंह भर लिया हो। फिर होश आया तो जाना कि एक बार फिर बचने के सारे रास्ते छीन लिए गए थे। धमाकों की वह अनिष्टकारी आवाज सड़क के उस पार से नहीं, उसके अपने दरवाजे पर ही थी। और घर की छत ही नहीं, होशो-हवास तक ले उड़ी थी उसके। उसका अपना शाहिद घायल पड़ा तड़प रहा था। मदद के लिए चीखना चाहा तो भय और दुःख ने टेटुआ भींच दिया । फिर मदद भी किससे और कैसी मांगती…बन्दूक ताने और काले कपड़े से मुंह छुपाए लड़के अड़ोस-पड़ोस के ही तो थे। पहचान लिया था उसने उन्हें।

लड़के जो कल तक उसके पास पढ़ने आते थे, शब्बो काकी कहते न अघाते थे। पर शाहिद से क्या दुश्मनी थी इनकी? उसी की तरह हालात का का मारा बेचारा शाहिद , अनाथ और अकेला, नेक शाहिद। बेहद सहनशील और समझदार, कोमल मन का मालिक शाहिद। किसी के रगड़े-झगड़े में नहीं । बस अपने काम से काम और दूसरों की मदद के लिए हरदम तैयार। तभी तो विश्वास था उसे शाहिद पर, उस छोटी-सी उम्र से ही। चूनर उढ़ाकर अपने घर में शरण ही नहीं, नई जिन्दगी दी थी उसे। पूजती थी वह शाहिद को, उसकी नेक-नीयत को । फिर उसके साथ ही ऐसा क्यों किया गया? उसी को क्यों चुना इन्होंने? शाहिद ने तो कभी किसी को कोई दुःख नहीं दिया!

कैसे अब वह उसका सहारा और उसके बुझते जीवन दीप का तेल बने इस कठिन और कठोर पल में, शबनम नहीं जानती थी और सच कहे तो परिस्थितियाँ शाहिद के लिए भी कम भयावह नहीं थीं। जहाँ गोलियाँ दागी गई थीं, दोनों जाघें बरसाती नाले-सी उबल रही थीं। वक्त नहीं था , सोचने तक का भी। घायल शाहिद को तुरंत ही उपचार चाहिए था। दोनों जांघों से लगातार खून बह रहा था। बेहद असमर्थ, असहाय और अकेली महसूस कर रही थी शब्बो अब उन दरिंदों के आगे।

सामने सड़क की दूसरी तरफ वही मौलवी साहब खड़े थे, जिन्होंने कभी सबके सामने उसकी डबडबाती और भयभीत हिरनी-सी आँखों को देखकर नया और खूबसूरत-सा यह नया नाम -‘शबनम’ नाम दिया था उसे और प्यार सहित दुआओं भरा हाथ भी फेरा था सिर पर! उसे भी एतराज नहीं था उन परिस्थियों में अपने इस नए नाम से… बस, आंखों के आगे चमकते-कांपते चन्द यादों में लिपटे अनाम और अर्थहीन अश्रुकण, जिन्हें देखने वाले जानते-समझते हुए भी, चुपचाप अनदेखा कर बगल से निकल जाते, सूनेपन में अक्सर बेदखल दखलन्दाजी करने आ जाते ।

जैसे सड़क के किनारे-किनारे खिलते अनाथ नरगिस के फूल रूप और खुशबू बिखेरते रहते हैं. शिब्बो भी जीने लगी थी, हर सुख-दुख में हँसती-मुस्कुराती। हर आँधी-पानी को अपनी पूरी सामर्थ से झेलती और जीतती। अलग-अलग मुल्क और अलग-अलग भाषाओं में इन फूलों के भी तो अलग-अलग नाम होते हैं, पर अपना रूप, गुण तो नहीं बदल देते ये, नाम कुछ भी रख लो, रंग रूप और पहचान तो नहीं बदलती। फूलों पर कांपती शबनम को जब-जब देखती शब्बो, तो आंचल में भरकर सीने से लगा लेती। मानो खुद उसकी अपनी आंखेों के सारे आँसू हों वे, मानो उन दोनों की पहचान ही नहीं , सुख दुख भी साझे थे अब तो।

किशोरावस्था से ही शबनम बनी अबोध गौरा ने खुद को संभलना और बहलना, दोनों ही भलीभांति सीख लिया था। क्या रखा है इन नामों में, चाहे गौरा पुकार लो या फिर शबनम ही कह लो, बाबा और उनका वह सुरक्षित घर तो अब लौटकर उसकी जिन्दजी में नहीं ही आने का- जानती थी शब्बो। पर यूँ ये धरम के दावेदार भी पलट जाएंगे, आँखें चुरायेंगे कठिन वक्त में, बात समझ के बाहर की थी।

हिम्मत और दृढ़ता के साथ उसने अपने हंसमुख और करुणा भरे स्वभाव को नहीं बदलने दिया था! समझा लिया था खुद को कैसे भी, कि वह तो वह ही रहेगी हमेशा। धर्म बदल देने से, पुकारने मात्र से बदलेगी नहीं। फिर खुदको खुद रखना खुद हमारे अपने हाथ में ही तो है , दूसरों के नहीं। राम और रहीम भी तो एक ही ईश्वर के दो नाम हैं, दो पोशाकें मात्र। कभी अलग नहीं माना उसने इन्हें, जैसे उसके बापू और नूरा चाचा ने नहीं माना था। फिर इन तीनों भले मानसों के साथ ही यह नृशंष व्यवहार क्यों? चलो, न मानें भगवान को, पर क्यों शबनम की ठंडक में भी नफरत की लपटें ढूंढ लेते हैं ये…साथ-साथ शतरंज खेलते थे बापू और नूरा चाचा। साथ-साथ मंदिर में माथा भी टेकते थे और साथ-साथ मस्जिद भी जाते थे। शारदा पीठ में नौरात मनानी हो या मजार पर चादर चढ़ानी हो, दोनों ने नियम से मिलकर ही किए थे सारे काम, वह भी नौबत-नगाड़ों के साथ। गुलाबी तुर्रेदार पगड़ी के साथ। दोस्ती इतनी गहरी कि उग्र भीड़ के आगे सीने पर गोली भी तो एक साथ ही खाई थी दोनों ने।

पूरी कौम जानती व समझती थी कि घर के पौहों की देखभाल करने वाले शाहिद ने परिस्थितियों की मांग और जिम्मेदारी मानकर ही वरा था पंडित दीनदयाल की बिना मां की अकेली और अनाथ बेटी को। ऐतराज नहीं था उन्हें इससे भी कि अब वही इसकी देखभाल करेगा। आखिर, पौहों में भी तो वही जान है, जो इस लड़की में है। जी लेगी यह भी-कहा था उस दिन- उनकी नस्ल ही आगे बढाएगी।

खूंखार से खूंखार वक्त में भी कोमल मन का आदमी था उसका शाहिद, कभी शिकायत नहीं की कि वारिस नहीं दे पाई उसे। फिर इन्हें क्यों नहीं दिखा उसका असली रूप? ऐसी क्या गलती दिख गई, जो खुद अपने ही दरवाजे पर भून डाला? बिना शाहिद के तो कुछ भी संभव ही नहीं अब जीवन में, इतनी आदत पड़ चुकी है उसे शाहिद की और शायद यही सच भी था। वही तो था उसकी ढाल और तलवार। अन्य शौहरों से बेहद अलग, हिम्मती और धैर्यवान, उसे प्यार करने वाला, उसका अपना शाहिद । कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं की कभी, ना तो उसके साथ और ना ही उसके रहन-सहन या जीने और सोच के तरीके पर। धुरी पर पहिया सही और सुचारु घूम रहा था उसकी जिन्दगी में, अब वह बिना धुरी के पहिए को कैसे घुमाए?

शब्बो कलपती रही, पर सामने खड़े खूंखारों में से एक न पसीजा।

मन से इज्जत- आदर करता था हर धर्म, हर इन्सान की शाहिद। चूनर उढ़ाना और बात है और तन-मन दोनों से ही जुड़ जाना कुछ और…वरना आज इस तरह से यूँ छटपटा न रही होती गौरा उसके इस लाल बहते दर्द के दरिया में। इस वक्त भी तो आंख नहीं मिला पा रहा था अकरम शब्बो से।

सही-गलत इस फैसले की भयावहता से उसकी रूह तक कांप उठी थी। व्याहता कहकर मिलवाया था शाहिद ने शब्बो को जमात से। वलीमा बगैरह सब हुआ था उनका। उसकी चूनर ओढ़ ली है और अब उसके घर में ही रहेगी। अब वही सारी देखभाल भी करेगा इसकी- ऐसा भी कहा था उसने सब से। आज के आगे वह सिर्फ उसकी, और उसकी है जिम्मेदारी है, बहुत प्यार और आश्वासन के साथ उसकी तरफ देखते हुए ही बताई थी यह बात सभी को शाहिद ने।

किसी को एतराज भी नहीं हुआ था गरीब मुसलमान लकड़हारे के इस एलान से…फिर अचानक आज ऐसा क्या बदला? शायद उसी निर्भीक दुस्साहस की ही सजा दी है, खुद उसकी अपनी जात बिरादरी ने उसे, यूँ चालीस साल बाद। और नकाब पोश वे खूनी दरिंदे उनमें से ही थे या फिर बाहर कहीं और से लाए गये थे, वाकई में जानकर भी नहीं जान पा रही थी बैबस शबनम उस दिन। फिर कोई फरक भी तो नहीं पड़ता था, उसकी विश्वास की चूनर चिथड़े-चिथड़े हो चुकी थी।

शाहिद का जितना गहरा घाव था, शिब्बो के मन में उससे भी गहरा और उसी पर दुबारा चोट की थी जालिमों ने।

खूनी ताण्डव की रात थी वह भी। गिन-गिनकर और ढूंढ-ढूंढकर काटा मारे गये थे लोग, धर्म के आधार पर छांट-छांटकर । तब भी वही समाज था जिसने हर डर से मुक्ति दिलाने का वादा किया था कभी । इसी भरोसे तो चुपचाप हर बात मानकर, पूरे भरोसे के साथ चौदह वर्ष की अबोध गौरा बिना अधिक कुछ सोचे-समझे, एक ही पल में , उस अनाथ और गरीब के घर में डरी कबूतरी-सी आ छुपी थी और उसे ही अपना सबकुछ जान-मान, उसकी कोठरी में ही पूरे तीन दिन निकाल दिए थे भूखे-प्यासे। पलटकर नहीं देखा था पीछे छूटे संसार की तरफ।
ज्यादा फर्क तो नहीं रह गया था पर अब उसमें और शाहिद में। सब कुछ लुट चुका था और एकबार फिर वह अनाथ और बिल्कुल अकेली थी, वह उन खूंखार भेड़ियों के आगे।
एक ही बार रंभाने पर जैसे पौहों का दर्द समझ जाता था, उसके दुख को भी तो पहचानता था शाहिद। बहुत प्यार से और धीरे-धीरे घावों पर मरहम लगाता , खिलाता-पिलाता। संभाले रहा था उसे आजतक। अब आज उसकी बारी थी, पर क्या बचा भी पाएगी वह? है इतनी काबलियत और साहस उसमें!…डटी रह पाएगी इन बन्दूक धारियों के आगे?

आंखों की कोर पर अटके सारे आंसू मानो मौन चीत्कार कर रहे थे उसकी रूह में। माना आभारी थी वह ऊपर वाले की, सुरक्षित पाती थी खुदको शाहिद के साथ। पूरी तरह से जुड़ चुकी थी उसके हर सुख-दुःख से और दो शरीरों के बावजूद एक ही तो थे दोनों। पर उसकी असली कीमत अब समझ में आ रही थी उसे, जब शाहिद का मजबूत हाथ, हाथों से फिसलता जा रहा था।

सामने पड़ा घायल शाहिद खून में लथपथ, मौत से जूझता रहा। … चिथड़े-चिथड़े हुई बांई टांग रह रहकर दर्द से तड़प रही थी … लगातार झटके खा और दे रही थी। शबनम उसे यूँ तड़पते देख खुद उसके दर्द से चिरने लगी । घायल शाहिद का बहता खून मानो खुद उसकी अपनी रगों को निचोड़े दे रहा था। फिर भी उसने होश नहीं खोए। जान तो चुकी ही थी कि परिस्थिति गंभीर हैं और सामने चारो बंदूक धारी मुंह पर काला कपड़ा बांधे अभी भी खड़े हैं। गए नहीं हैं वहां से और घायल शाहिद की जान से खतरा अभी भी टला नहीं है।

पर हार नहीं मानी उसने। जानते हुए भी कि जाति और धर्म-परिवर्तन जैसे सारे शब्द आज भी बेहद खूंखार और उग्र ही हैं , और रहेंगे हमेशा-हमेशा ही । लोग…समाज….उनकी यह सभ्य और विकसित दुनिया…इससे लड़ना और फरियाद करना दोनों ही बातें पत्थर से सिर फोड़ने जैसी ही तो है…जाने कैसे पता चल गया था इन्हें कि शाहिद के घर में रहकर भी उसने अपने कपड़ों की अलमारी में एक छोटा-सा शिवलिंग छुपा रखा था। रोज सुबह नहा-धोकर हाथ जोड़ती थी वह और 11 बार ओम नमः शिवाय भी जपती थी मन-ही-मन सुबह उठते ही । बचपन से ही यही आदत थी। शाहिद को भी कोई एतराज नहीं था उसकी इस आदत से। प्यार करता था उससे । पर इन्हें एतराज था और रहेगा। बड़ा एतराज…इतना बड़ा कि जान लेने आ पहुँचे, खुद उसके अपने दरवाजे पर भून डाला… पर दोनों वक्त नमाज भी तो उसने उसी लगन और श्रद्धा के साथ ही पढ़ी थी। और वह भी उनके साथ. उनके बीच मिल बैठकर।

अकरम के आंसू लगातार बहे जा रहे थे और वह उन्हें पूरी तरह से तरबतर कुरते की आस्तीन से पोंछे भी जा रहा था फिर भी सोच नहीं सुलझ रही थी-जिन्दगी घुमा-फिराकर बस यही एक पाठ क्यों पढ़ाना चाहती है … ना मानो तो जान से हाथ धोओ और मान लो तो खुद को कुचल और भूलकर, मौत से भी बद्तर जिन्दगी गुजारो।

तब भी तो यूँ ही बेरहमी से ही खून की नदियां बही और बहाई गई थीं। जाने कितनों ने बेवजह ही दम तोड़ दिया था, जब हिन्दुस्तान को चीरकर दो टुकड़ों में बांटा गया था। और अब फिरसे वही सब… जी भरकर इस खूबसूरत वादी काश्मीर के साथ ही यह खिलवाड़ क्यों किया जाता रहा है? दिल लड़कर नहीं, प्यार से ही जीते जाते हैं -क्यों नहीं समझ में आ रहा हम हवस के मारों को! गलती उसी की थी, शायद। नहीं ढल पाई दुनिया के सांचे में। नाम और पहचान और सारा अतीत भुलाकर शबनम अवश्य कहलाने लगी थी, पर गौरा मन के अंदर ही धंसी रह गई थी कहीं। पर वह पीछे नहीं हटी थी इस चुनौती भरी जिन्दगी से। आसान नहीं, यूँ एक ही जनम में दोहरे अस्तित्व को जीना।

यादें गड़े कांटे की मवाद सी रिसने रही थीं अब- दीवारें गिराते और जोड़ते, अपने लिए एक आरामदेह घर बनाते उम्र हंस-हंसकर निकाल दी थी दोनों ने। शाकाहारी ब्राह्मण की बेटी के लिए शाहिद ने मांस-मच्छी, सब चुटकियों में ही छोड़ दिया और वह खाती नहीं थी तो क्या, दुपट्टे से नाक-मुँह ढांपकर शाहिद के लिए सब कुछ पकाने लगी थी। पर क्या फायदा हुआ इस सबसे भी , मिनटों में ही सब कुछ ही यूँ तहस-नहस मिट्टी में१ आँसू तक चुभ रहे थे अब तो उसकी रीती-जलती आँखों को। ऐसा क्यों? क्यों बारबार ही ऐसा ही! इसने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा। किसी से कुछ नहीं मांगा। अच्छाई और बुराई दोनों के ही साथ समझौते पर समझौते ही किए, बस। फिर यह सब क्यों?…उसके अपने ही मुल्क में, अपने ही घर में!… सबसे सुरक्षित जगह और अपनी ही ड्योढ़ी पर! क्या इसे अपनी-अपनी किस्मत कहकर मान लेना अपराध नहीं ? क्या यह दर्द यूँ और अकेले-अकेले सहना तक पाप नहीं!

पर, मांगे तो किससे मदद मांगे वह, किसी के साथ कुछ बांट पाना संभव ही नहीं मौजूदा नफरत भरे इस माहौल में?

बेचैन अकरम उठा और काकी के चेहरे को पढ़ता, झटपटाते बेजुबां जानवर की तरह घूमने लगा उसके इर्द-गिर्द।

खामोश आँखों में धंसी चीखों की तरह इसका अतीत भी तो अपनी सारी जटिलता के साथ पलपल चीखता ही रहता होगा इसके अंदर। दहलाती होगी आज भी तो वह भयभीत और अबोध मरती गौरा और अब शाहिद इसे। शाहिद को यूँ तड़पते देखना…उसका आंखों के आगे ही जिन्दगी से दूर फिसलते जाना, टूटती-बिखरती काकी लड़खड़ाई थी और चौखट से सिर भी फोड़ बैठी थी उस वक्त तो। पर माथे से बहते खून को पोंछने तक का होश नहीं था उसे। सामने शाहिद तड़प रहा था और यदि उसकी जान बचानी थी तो उसके बहते खून को रोकना ज्यादा जरूरी था, भलीभांति जान चुकी थी शब्बो।

कमरे में दम घुटने लगा, तो पांच मिनट को खुली हवा में बाहर आ गया अकरम और पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गया। उघड़े दरवाजों से कपड़ों के गठ्ठर-सी सिमटी आखिरी सांस लेती शबनम पर अभी भी उसकी आंखें वैसे ही गड़ी हुई थीं। मन बेचैन था और बादलों से उमड़ते-घुमड़ते सवाल लगातार जवाब पर जवाब मांगे जा रहे थे उससे, उसकी उग्र कौम और उनकी सामाजिक व्यवस्था से।

क्यों बारबार गढ़ा, गूंथा, मिटाया और बनाया जाता रहा है इसे ?

लगातार काश्मीर का यह बटवारा, यह काट-छांट कम दुखद नही किसीके लिए भी । जितना प्रयास करता, जोड़ता, मन की कोई-न कोई तनी गूंथ दुखती ही रहती। कई गांठें पड़ चुकी थीं, जिन्हें सहलाते-सहलाते पीढ़ियाँ निकल जाएँगी। झेलम और चिनाब दोनों के ही पानी में लगातार बस एक लाल रंग घुला ही दिख रहा था अब अकरम को।

रातोरात जो निकल गए, बच गए ।

पर यह इसके और इसके घरवाले के नसीब में नहीं था।

एकबार फिर उसे और शाहिद को निरीह जानवरों की तरह घेर लिया गया था । अपना मान और जानकर जो डटे रहे इस वादी में, उनका क्या हश्र हुआ था न तो गौरा ही भूली है और ना ही शबनम को ही कभी भूलने दे रहे थे ये लोग।

क्यों एक-दूसरे को ही लूटते रहे हैं भाई-भाई ही हमेशा ?

भूल नहीं पा रहा था वह, कैसे बहते आंसुओं की परवाह किए बगैर, शबनम बावरी सी शाहिद को संभालने और राहत देने की कोशिश करती चली गई थी। नफरत और हवस की यह आग इतनी तेज क्यों … झुलसाती, कुचलती-रौंदती , सब भस्म करके ही क्यों आगे बढ़ पाती है!

तब भी तो ट्रक भर-भरकर लाशें दाब दी गई थीं गढ़्ढों में या फिर पेट्रोल छिड़ककर एक साथ ही स्वाहा कर दी गई थीं। हिन्दु, पंडित , मुल्ले सब एक साथ। एकबार फिर रामनामी और नमाजी गोल टोपियाँ दोनों ही पैरों के नीचे रुंद रही थीं, निरपराधों के खून में सनी-लिथड़ी। तब भी तो ईश्वर की मर्जी पर छोड़ दिया था गौरा ने सब । और अब इस शब्बो ने भी, खुद को, अपने शाहिद को । पर शब्बो की फटी आँखें समझ नहीं पाईं…कैसी दुनिया होती जा रही है? यह आदमी जानवर से भी ज्यादा खूँखार और यूँ खुला घूमता!

कोई रोने या याद करने को नहीं लावारिश लाशों के साथ न तब और ना अब।….

शब्बो के आंसू तक बर्फ से ठंडे हो चुके थे। यूँ तो जब मां-बाप से बिछुड़ी थी , तब भी लाशों को ठिकाने लगाने वाला कोई नहीं था। पर आज वह अपने शाहिद के साथ ऐसा नहीं होने देगी।
पलभर को ही एक मंथन था वह भयभरा, जिसने शिथिल किया उसे, परन्तु तुरंत ही खुद को संभाल लिया उसने और मौत से भी बद्तर उस थकान को परे धकेलती शब्बो उठ खड़ी हुई । अब ना तो उन तनी बन्दूकों का डर था उसे और ना ही अपनी और शाहिद की जान का ही।
ईश्वर भी तो उसी की मदद करता है जो प्रयास न छोड़े।

जैसे-तैसे सारा साहस और ताकत जुटाती, चूनर को कई-कई बार लपेटते हुए शाहिद की घायल टांग कसकर बांध दी तब उसने, शायद खून का बहना थोड़ा रुके। शायद उसका शाहिद बच ही जाए…सांसें तो अभी भी चल ही रही थीं और जीने की उम्मीद भी उन सांसों सी ही आ-जा रही थी अब उसकी आँखों में।

एकबार शाहिद ने जी भरकर उसकी तरफ देखा और टूटे-फूटे शब्दों में जाने क्या अस्फुट और शक्तिहीन-सा कुछ कहना भी चाहा। पर निष्फल। आंसूभरी वे आँखें इतनी अशक्त थीं कि खुली तक रख पाना असंभव हो चला था उसके लिए। फिर भी कैसे भी दोनों हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिए उसने, मानो पास बुला रहा हो, मानो विदा लेना चाहता हो, मानो उसकी रक्षा न कर पाने के लिए, बीच मझधार में छोड़कर जाने की अपनी इस मजबूरी और घायल असमर्थता पर बेहद शर्मिंदा हो।…और तब बेबसी में जुड़े उन हाथों को कसकर पकड़े फफक-फफककर रो पड़ी थी अपने शाहिद की शब्बो-‘नहीं, तुम्हें मैं कहीं नहीं जाने दूंगी, शाहिद। मुझसे पहले कैसे जा सकते हो तुम? तुमने तो उम्रभर साथ रहने का का वादा किया था !’…

और तब अल्लाह को मन-ही-मन सौंप दिया था शाहिद ने भी सबकुछ। खुदको भी और अपनी शब्बो को भी , पर दम तोड़ते शाहिद की जलती-बुझती आंखों के आगे पूरी गुजरी जिन्दगी चलचित्र सी चलना बन्द नहीं हुई, जबकि शाहिद की आंसूभीगी धुँधली आँखें अब साफसाफ अपनी शब्बो का चेहरा तक नहीं देख पा रही थीं।

शब्बो…यानी मां-बाप की गौरा , उनके घर के आगे बहती सिंधु नदी सी ही सरल और निश्छल , बातबात पर खिलखिल हंसने वाली किशोरी, जिसने बस अबोध बचपन के चौदह बेफिक्र बसंत ही देखे थे अपने अम्मा बाबा और छोटे भाई भोला के साथ। छोटा सा परिवार, जिसमें वे सभी खुश खुश रहते थे। पर अब कुछ नहीं। यादें, एक वीभत्स राक्षस का मुंह बनी कभी तो सब उगले देतीं और कभी उसकी भयभीत आँखों की परवाह न करते हुए सबकुछ जो उसका था , उसे राहत देता था, पूरा मुँह फाड़े निगलने को तैयार खड़ी थीं।

शाहिद को अपना अंत स्पष्ट दिख रहा था, पर शब्बो कैसे हार मान लेती … दुबारा अनाथ होने के इस भय से मानो और भी तेज आँच की लपटों-सी जल उठी थी वह अंदर-ही-अंदर- ऐसा अनर्थ…ऐसा छल चलता रहा, वह भी उसके साथ! अचानक ही चंडी अवतार ले चुकी थी अब उसके अंदर- ‘कोई बच्चा नहीं, कोई भोला नहीं इनमें, सामने खड़े ये सब राक्षस हैं। ‘

यह महिषासुर मर्दन तो अब उसे करना ही होगा। अच्छी और बुरी बस दो ही जातियाँ रह गई हैं इन्सानों में। और बुराई अच्छाई को पूरी तरह से निगलने को तैयार खड़ी है। कैसे भी अच्छाई को तो बचाना ही होगा, किसी भी शर्त पर । समर्पण ही हमेशा संरक्षण नहीं’- भलीभांति जान चुकी थी वह अपनी जिन्दगी के उस सबसे भयावह और चुनौती भरे पल में । सामने पड़े शाहिद के दर्द से चिरती हर चिलक के साथ-साथ वाकई में साक्षात उग्र चंडी कुलबुलाने लगी थी अब उसके अंदर…खड्ग संभाले, राक्षसों के विनाश को तत्पर और बेचैन। मरने-मारने के लिए पूर्णतः तैयार ।
नीरव रात के उस भयावह अंधेरे को ओढ़े प्रज्जवलित दीपशिखा-सी चमकती दिखी थी तब वह शाहिद को । अपने दर्द से ज्यादा, अनाथ और अकेली शब्बो का दर्द था जो बर्दाश्त के बाहर हो चला था उसके लिए उस अंतिम पल में। पर जान चुका था शाहिद कि जो भी राह में आएगा उसे पूरा भस्म कर देने की अब पूरी शक्ति थी उसकी शब्बो में इस वक्त। और आभारी था वह उसके ऊपर अल्लाह की इस रेहमत के लिए।

दम घोटते उस दर्द को और झेल पाना और आंखें खुली रख पाना जब असंभव हो चला मृतप्राय शाहिद के लिए तो एक और अल्लाह की रेहमत बनी उसकी डबडबाती आंसूभरी आँखें स्वतः ही मुंद भी गईं । पर तड़पती शब्बो पूरी तरह से सचेत और सक्रिय ही रही। कभी उसकी छाती मलती, तो कभी तलुवे। शरीर से गरमाहट भले ही चली गई हो, पर यूँ हार नहीं मानेगी वह। कहीं नहीं जाने देगी वह अपने शाहिद को।

पर तभी अचानक एक और धमाका हुआ मानो सामने खड़ों ने मन पढ़ लिया था उसका।

जो अकरम बचपन से ही उसके सबसे पास था, वह भी तमंचा ताने खड़ा था सामने। साथ में तीन चार और भी थे जिन्हें वह नहीं पहचानती थी, गोली किसने दागी क्या फर्क पड़ता था, निशाने पर तो उसका बरसों से खड़ा विश्वास ही था।

आगे बढ़कर हाथ से तमंचा छीने, गाल पर करारा थप्पड़ मारे, इसके पहले ही किसी ने एक और गोली शाहिद के सीने में दाग दी । शब्बो की फटी आँखों के आगे ही रह-रहकर तड़पता शरीर पूरी तरह से शांत हो गया। और तब, जाने किस उम्मीद, किस बदहवासी में शब्बो ढाल बनकर गिर पड़ी शाहिद के ऊपर।

गोलियाँ अभी भी चल रही थी लड़कों के तमंचों से। दो-तीन छर्रे उसकी पीठ में भी आ लगे और उसे अपाहिज और अचेत करते रीढ़ की हड्डी में जा धंसे। और तब बिना रोए-चीखे, वैसे ही, पहले-सी ही शान्त और अचेत, बेजान गुड़िया-सी लुढ़क गई शब्बो भी शाहिद की बगल में ।
सब शान्त था अब चारो तरफ। वे लड़के भी।

मिनटों बाद ही किसी को होश आया और किसी ने दोबारा ललकारा -खड़े-खड़े मुंह क्या देख रहे हो , ठिकाने भी तो लगाना होगा इन लाशों को।…

और तब मृत शाहिद के साथ मृतप्राय शब्बो को भी सामने बहती नदी में फेंक दिया उन्होंने।

जिन्दा या मुर्दा समझने का वक्त नही था किसी के पास और ना ही बची सांसों को गिनने की जरूरत ही समझी थी उन्होंने । सिवाय अकरम के जो अब अन्दर तक बेचैन हो उठा था….
….
बरसों बीत जाने के बाद भी जब उजाड़ मौसम-सी उसकी जिन्दगी में एक भी फल-फूल नहीं खिला, तो शब्बो ने मोहल्ले के हर बच्चे को अपना लिया था।

उन्ही के लिए सबकुछ समर्पित कर बैठी थी पगली।

अब वे सभी दीन और अनाथ ही उसका परिवार थे। उसकी ममता सबपर और दिनरात एक-सी ही बरसती । बेहद लगन और मेहनत से सींचती और संवारती वह अड़ोस-पड़ोस के हर बच्चे को। अकरम तो सबसे ज्यादा समझदार और सबसे प्यारा लगता था उसे। उसकी कोठरी उसका घर नहीं, अनाथों का घर तो पहले से ही थी , अब उनकी पाठशाला भी बन चुकी थी।

अकरम फटी-फटी आंखों से देखता रहा था, जिन्दा शब्बो को भी लावारिस खून में लथपथ सड़क से उठाकर बेहद बेरहमी के साथ नदी में फिंकते हुए, मानो इन्सान नहीं, कूड़े के ढेर को हटाकर, साफ-सफाई की जा रही हो । अचानक सीने में एक कसक-सी उठी, पर साथियों के डर से शबनम की कोई मदद नहीं कर पाया अकरम। घायल छोड़कर मुंह फेर लेना यही इनाम था शायद उसके पास शब्बो की नेकी का… आत्मा बारबार कायर और बेरहम कह-कहकर धिक्कारती थी, पर जब अपनी ही जान पर बन आए तो आत्मा की आवाज को मारना ही पड़ता है, यह भी तो भलीभांति जान ही चुका था अकरम।
….

लड़कों ने काकी और शाहिद को मिल-जुलकर कब उठाया और सामने बहती नदी में फेंक दिया और कब और कैसे वह वापस अकरम के साथ अपनी उसी सुनसान कोठरी में लौट भी आई , कुछ याद नहीं रहा उसे। पर आज अगला-पिछला एक-एक दृश्य याद आता जा रहा था, लाख कोशिशों के बावजूद भी कुछ भूल ही नहीं पा रहा था वह।

रात के अंधेरे में दुबारा जाकर ढूँढा था उसने शब्बो काकी को। और मिल भी गई थी वह उसे तुरंत ही अंधमुंदी आखों से इंतजार करती, रह-रहकर मुंह से झागों के फब्बारे उलीचती। आधे मील दूर ही लहरें, वहीं किनारे पर पटक गई थीं उसे। खून रिस-रिस कर बह रहा था और टूटी सांसों की खड़खड़ दूरतक साफ सुनाई दे रही थी। अच्छा हुआ किसीने देखा नहीं रात के उस सियाह में, वरना जिन्दा ही दफन कर देते उसे भी वे उसी समंदर में ।

फिर तो शबनम की सेवा में दिनरात एक कर दिए थे अकरम ने। बचने की कोई उम्मीद नहीं थी और सबकी नजर में पागल और बेवकूफ तक दिखने लगा था वह, जो यूँ एक अधमरी लाश की सेवा में लगा रहता था। महीने भर में घाव तो सारे भर गए पर अपना नाम पता और पहचान, कुछ भी याद नहीं था शब्बो काकी को। वह तो यह भी नहीं जान पाई कि अकरम अब उसे काकी नहीं, अम्मी कहकर बुलाने लगा था। दिनरात वहीं उसके पास ही रहता था। खाने-पीने आदि उसकी हर शारीरिक जरूरत का नमाजी तल्लीनता के साथ पूरा ख्याल रखता था।

शब्बो के गुजरे खुशहाल दिन और शाहिद को तो नहीं वापस ला सकता था वह, पर थोड़ी तसल्ली तो दे ही सकता था ।

प्रयाश्चित का शायद अब यही एक तरीका बचा था उसके पास। …फिर वह भूल भी कैसे सकता था कि उसी की दुआओं से तो बच गया था वह, वरना, अन्य साथियों की तरह वह भी तो सेना की पकड़ में आ ही सकता था?… फिर था भी क्या उसका अपना! अगर शब्बो काकी न होती उस मोहल्ले में तो कौन उसका और उस जैसों का ध्यान रखता, बड़ा करता उन्हें? खाना-पीना देता, नहलाता-धुलाता ! तख्ती लेकर उन्हें लिखना-पढ़ना सिखलाता… अंधी-बूढ़ी नानी के बस में तो वैसे भी कुछ नहीं था।

ग्लानि और दुख में डूबा अकरम, बैठा-बैठा कभी शब्बो के बालों में तेल लगाता, तो कभी हथेली और तलुवों पर हिना से बेल-बूटे काढ़ता, पर तब भी जब शबनम न हँसती और ना ही मुस्कुराती, तो बेटे की तरह बेहद उदास भी हो जाता।… उसके बस में कुछ नहीं था, फिर भी रह-रहकर कभी कबूतर के पंख से उसके तलवे गुदगुदाता तो कभी कान में कसकर कू करता , पर बेजान शरीर में कोई हलचल न होती ।

शब्बो की पत्थर सी आंखें जाने क्या और कहाँ, एकटक एक ही जगह को देखती रहतीं।

जब और बर्दाश्त नहीं कर पाता, तो अकरम जी भरकर रोता-सिसकता, फरियाद करता -‘ एकबार, बस एकबार माफ कर दो अम्मा मुझे, भटक गया था मैं।’- कह-कहकर सिर धुनता। पर जैसे कई रिश्ते बेहद कठोर होते हैं, उम्रभर जकड़े रहते हैं फिर भी दूरी बनी रहती हैं, वैसे ही कई दर्द भी तो लाइलाज होते हैं। शब्दों में नहीं बांधा जा सकता इन्हे।

अपने और पराए का फर्क …सह और जानकर भी, कभी मान नहीं पाई थी शब्बो, इतना प्यार किया था उनसे। फिर उसी के साथ ऐसा व्यवहार किया, इतने दुख दिए?…आत्मा की धिक्कार ने उसे अब चौबीसों घंटे की सलीब पर टांग रखा था। सामने ठंडे फर्श पर बैठा वह दिनरात उसे घूरता रहता है, जाने कब अम्मा को उसकी जरूरत पड़ जाए? पर दुख की उस अन्तिम नदी में डुबकी लगाकर तो मानो शब्बो हर दुख से मुक्ति पा चुकी थी। अब न उसकी न कोई चाह रह गई थी और ना ही कोई जरूरत ही। इतनी बड़ी और फलती-फूलती इस दुनिया में ना तो कुछ देने को ही बचा था अब उन दोनों के बीच और ना ही कुछ लेने को ही। कम-से-कम इस जिन्दगी में तो नहीं ही। यह भी भलीभांति जान ही चुका था वह । फिर भी उसकी कोशिश जारी थी। शायद अल्लाह सुन ही ले…मरने के बाद अपने पराए का कोई मतलब नहीं रह जाता, पर जब जीते जी ही, बिना खाक पड़े ही?

निरर्थक यह पश्चाताप कितना दुख देता है, रोज ही भुगत रहा था अकरम।

कहते हैं नारी या माटी, दोनों को ही मन चाहे जैसे गढ़ लो, कितनी गीली और सुकुमार थी उसकी शब्बो काकी भी, फिर यूँ पाषाणवत् कैसे हो गई? कहीं उसकी बेववफाई से ही तो नहीं तिरका काकी का कोमल मन?

चौबीसों घंटे सोचते रहने पर भी, समझकर भी, नहीं समझ पाता अकरम। एक आस की लौ थी जो बुझ नहीं रही थी उसके मन से। घंटों बैठा घूरता…क्या सोच रही होगी, क्या बीत रही होगी इस पर?- फिर भी कुछ पता ही न चल पाता।

आखिर यूँ ही तो पाषाण नहीं बन जाता कोई। जानी कितनी ठोकरें …कितना रौंदती है यह दुनिया, तब जाकर पत्थर-कठोर होती हैं दोनों, धरती और नारी? …और उन सूनी अकेली रातों में उसके आँसू सोच-सोचकर थमने का नाम ही न लेते। कभी-कभी तो रात की अंधेरी परछांइयों के साथ मिली उन सिसकियों से वीराना तक दहलने लग जाता है। पर अम्मा तक उसकी कोई आवाज, कोई फरियाद नहीं पहुँच पाती। मानो कहीं कुछ बचा ही नहीं था… न तो कुछ जानने को, ना समझने और ना ही समझाने को ही। फिर शब्दों में, इन रिश्तों में रखा भी क्या?
क्या अर्थ इस पछतावे का भी, जब नफरत की दीवार इतनी ऊंची हो चुकी है कि दूसरे तो दूसरे, अपनों का भी दुख-दर्द दिखाई न दे… पुकार सुनाई न दे।…अपने ही षडयंत्र करने लग जाएँ?…शब्बो को तो वैसे भी अब कुछ याद नहीं । सुख-दुख, रिश्ते-नाते सबसे परे जा चुकी थी वह। और उसके कोमल हृदय के लिए यही बेहतर भी था, शायद। अकरम और शबनम दोनों के लिए ही बहुत देर हो चुकी थी, शायद।…

चिड़िया-सी लेटे-लेटे ही मुंह खोल देती है शब्बो। जो कुछ अकरम मुंह में डाले, जैसे-तैसे गटक भी लेती है। फिर तुरंत ही देखते-देखते वापस सो भी जाती है। … या शायद, बस सोती-सी चौबीसो घंटे जगी ही पड़ी रहती है।

चलती सांसें और उन चलती सांसों की जरूरत ही तो रह गई है अब उसकी बची-खुची जिन्दगी। और वही चन्द बची सांसें ही तो अब उन दोनों के बीच की शेष कड़ी भी हैं। सांसों की उस चलती धौंकनी के सहारे ही तो जान पाता है अकरम कि जिन्दा है शब्बो काकी, फिर भी आस नहीं टूटती उसकी। ….शायद ठीक हो ही जाए! एक दिन अचानक ही उठे और उसे बेटा कहकर पुकार ही ले पाषाणी!…

सच कहूँ तो यह कहानी कहाीं की भी हो सकती है , दुनिया के किसी भी कोने की, जहाँ लोग लड़ रहे हैं जीने को। मर रहे हैं बेवजह ही, अपनी ही बेबस छटपटाहट में। कभी खुद अपनी, तो कभी दूसरे की क्रूरता के शिकार हो रहे हैं, भूलकर कि जिन्दगी खूबसूरत है और जीने के लिए है, विनाश के इस निरंतर के तांडव को नहीं।

परिस्थितियों और उनकी असह्य जटिलता, न बुझने वाली भूख से लड़ता इन्सान शीघ्र ही संवेदनाहीन और पत्थर का हो जाता है। और औरतों को तो कई बार घर से बाहर तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती। बेहद साधारण और घरेलू …एक बेदखल जिन्दगी जीते-जीते भी तरह तरह के दबाव हैं इन्हें संज्ञा शून्य कर देने को। पर उनसे कोई खबर नहीं बनती और ना ही इन घटनाओं से कोई विचलित ही होता है सुन या पढ़कर। इतने आदी हो चुके है हम इनके प्रति बर्बरता के।…

काश्मीर में उसका भी एक गांव था, जहाँ उम्र भर रही थी वह, पर कभी जान नहीं पाई कि उसका अपराध क्या था, कि वह भारत की थी या फिर पाकिस्तान की ?…बस कैसे भी जिन्दा ही तो थी वह आज पाषाणी बनी, गौरा और शबनम दोनों को ही अपने अंदर संजोए-संभाले हुए। जी भरकर जी पाए इतना तो जिन्दगी ने कभी मौका ही नहीं दिया। बस जीती रही थी वह, कैसे भी जरूरतों को पूरा करती, जिम्मेदारियाँ निभाती, दूसरों के सपने और ख्वाइशों को ही अपना मानती और जानती। खुद जिन्दगी ने अपनाया ही नहीं उसे।

सुना है धरती और नारी दोनों के अंतस में आग रहती है, जो हर हाल में जिन्दा रखती है इन्हे। पर एकदिन अचानक ही यह आग बुझ जाए तो, …पर यहीं तो कहानी है हमारी पाषाणी की भी… जो पाषाणी नहीं गौरा थी कभी, फिर शबनम नाम मिला उसे और फिर… पर यह बात इतनी भी तो पुरानी नहीं कि हम इसे भूल जाएँ।

उसका गांव उसकी नज़र में दुनिया का सबसे खूबसूरत गांव था…कहने को तो धरती पर स्वर्ग, पर हमेशा ही एक आग में धधकता… जहाँ पर किसी भी बात की आजादी नहीं, बस बन्दूकों का असंतुष्ट शोर ही था चारो तरफ… कभी किसी बहाने तो कभी किसी बहाने।

पर उसके लिए तो वह जीवन भी सामान्य ही था, क्योंकि वह गांव ही सबकुछ था उसका और रहता भी…अगर एकदिन अचानक ही सब बदल न जाता।…

धांय-धांय…दो गोलियों की ही आवाज सुनी थीं उसने और किसी बड़े अनिष्ट की आशंका से कांपती, बावरी-सी दौड़ी बाहर दरवाजे पर आ खड़ी हुई थी वह। कंधे पर दुपट्टा नहीं, पैरों में जूती नहीं…फटी-फटी आँखें और बिखरे-बिखरे बालों संग , बदहवास, किसी बड़े अनिष्ट की आशंका से डरती-कांपती-सी ।

अभीतक तो जैसे-तैसे बचाकर रखा था उसने अपनी छोटी-सी दुनिया को…खुद को और अपने शौहर को इन राजनीतिक और धार्मिक तूफानों से, पर लगता है आज सब भरभाकर बिखरने वाला था… दोबारा। और वह भी उसकी भयभीत आँखों के आगे।

क्षोभ, क्रोध और भय के साथ घटनाओं के इस आकस्मिक सैलाब में टिके रहना जब असंभव हो चला तो दरवाजे की चौखट से फालिज मारी-सी खड़ी पल भर को तो हक्की-बक्की-सी देखती ही रह गई थी वह, मानो कांच के बुरादे से मुंह भर गया हो। एकबार फिर बचने के सारे रास्ते छीन लिए गए थे उससे। धमाकों की वह अनिष्टकारी आवाज सड़क के उस पार से नहीं, उसके अपने दरवाजे पर थी इसबार और खुद उसकी अपने घर की छत ही नहीं, होशो-हवास तक ले उड़ी थी । मदद के लिए चीखना चाहा तो भय और दुःख ने टेटुआ भींच दिया। फिर मदद भी किससे और कैसी…बन्दूक ताने और काले कपड़े से मुंह छुपाए वे लड़के अड़ोस-पड़ोस के ही तो थे, शायद यही सच था…लड़के कल तक जो उससे पढ़ने आते थे, उसे शब्बो काकी कहते नहीं अघाते थे।

उसी की तरह हालात का का मारा था शाहिद भी , अनाथ और अकेला पर बेहद सहनशील और समझदार, एक कोमल मन का मालिक। किसी के रगड़े-झगड़े में नहीं । बस अपने काम से काम। पर दूसरों की मदद को हरदम तैयार। विश्वास रहा है उसे शाहिद पर हमेशा उस छोटी-सी उम्र से ही। फिर उसके साथ ही ऐसा क्यों… शाहिद ने तो कभी किसी को निराश नहीं किया । किससे मदद मांगे, कैसे अब वह उसका सहारा, बुझते जीवन दीप का तेल बने इस कठिन और कठोर पल में…परिस्थितियाँ वाकई में भयावह थीं। वक्त नहीं था उसके पास । घायल शाहिद को तुरंत उपचार चाहिए था। बेहद असमर्थ, असहाय और अकेली महसूस कर रही थी शब्बो उन दरिंदों के आगे। बिना शाहिद के तो कुछ भी संभव ही नहीं अब उसके जीवन में, इतनी आदत पड़ चुकी थी उसे शाहिद की। वही तो था उसकी ढाल और तलवार। और शौहरों से अलग, हिम्मती और धैर्यवान । कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं की कभी उसके रहन-सहन या जीने और सोच के तरीके पर। मन से इज्जत- आदर करता था हर धर्म, हर इन्सान की। चूनर उढ़ाना और बात है और तन-मन दोनों से ही जुड़ जाना कुछ और…वरना आज इस तरह से यूँ न छटपटा रही होती वह उसके इस लाल बहते दर्द के दरिया में।

सबके सामने अपनी व्याहता कहकर मिलवाया था शाहिद ने उसे जमात से। वलीमा बगैरह सब हुआ था। उसकी चूनर ओढ़ ली है और अब उसके घर में ही रहेगी , ऐसा भी कहा था सबसे। और अब वही देखभाल भी करेगा उसकी, यह भी। आज के आगे वह सिर्फ उसकी और उसी की जिम्मेदारी है, बहुत प्यार और आश्वासन के साथ उसकी तरफ देखते हुए बताया था शाहिद ने सभी को बारबार।

किसी को कोई एतराज भी नहीं हुआ था तब गरीब मुसलमान लकड़हारे के इस एलान से।

शायद उसी दुस्साहस की यह सजा दी है आज, खुद उसकी अपनी जात बिरादरी ने उसे यूँ चालीस साल बाद और नकाब पोश वे खूनी दरिंदे उनमें से ही थे या फिर बाहर कहीं और से आए थे, वाकई में नहीं जान पा रही थी वह।

पर तबतो मौलवी साहब ने सबके सामने उसकी डबडबाती आँखों को देखकर एक नया खूबसूरत-सा नाम दिया था उसे-‘शबनम’। और प्यार से हाथ भी फेरा था उसके सिर पर !

शब्बो को भी कोई एतराज नहीं था उन परिस्थियों में इस नए नाम से…फूलों पर कांपती शबनम को जब-जब देखती, तो आंचल में भरकर सीने से लगाने लगजाती। मानो उसने खुद अपनी आंखेों के सारे आँसू पोंछ डाले हो, मानो उन दोनों की पहचान ही नहीं , सुख दुख भी साझे हों चुके थे अब… सबकी आंखों के आगे चमकते-कांपते रहते फिर भी अनाम और अर्थहीन तो थे वे अश्रुकण, तभी तो देखने वाला सब जान-समझकर भी चुपचाप अनदेखा करता-सा बगल से निकल जाता है। संभलना और बहलना तो खुद ही पड़ता है।

फिर , क्या रखा है इन नामों में, चाहे उसे गौरा पुकार लो या फिर शबनम ही कह लो!

समझा ही लिया था उसने खुद को कैसे भी। जान चुकी थी कि वह तो वह ही रहेगी हमेशा, पुकारने मात्र से तो बदल नहीं जाएगी। फिर खुदको खुद रखना खुद हमारे अपने हाथ में है , दूसरों के तो नहीं। और इस तरह से बिल्कुल सड़क के किनारे-किनारे खिलते इन खूबसूरत नरगिस के पूलों की तरह ही वह भी जीती रही थी, हर दुख में भी हँसती-मुस्कुराती। हर आँधी-पानी को अपनी पूरी सामर्थ से झेलती। दूसरे मुल्क और दूसरी भाषाओं में इनके भी तो जाने क्या-क्या और-और नाम हैं, बाबा बताया करते थे उसे बचपन में, पर इनका रंग रूप और पहचान तो नहीं बदली। राम और रहीम भी तो एक ही ईश्वर के दो नाम , दो पोशाकें मात्र हैं।

उसने उन्हें अलग कभी नहीं माना, जैसे उसके बापू और नूरा चाचा ने कभी नहीं माना।

साथ-साथ शतरंज खेलते थे वे, साथ-साथ मंदिर में माथा टेकते थे और साथ-साथ मस्जिद भी जाया करते थे। शारदा पीठ में नौरात मनानी हो या मजार पर चादर चढ़ानी हो, दोनों ने नियम से मिलकर ही किए थे सारे काम। दोस्ती इतनी गहरी कि उग्र भीड़ के आगे साथ-साथ ही सीने पर गोली भी खाई थी उस दिन।

सब जानते समझते थे कि घर के पौहों की देखभाल करने वाले शाहिद को उसने अपनी परिस्थितियों की मांग और जरूरत मानकर ही वर लिया था तब। अब वही उसकी देखभाल करेगा। ऐतराज नहीं था उसे इससे भी। पौहों में भी तो वही जान है आखिर, जो उसमें है। इस खूंखार वक्त में बड़े कोमल मन का आदमी है शाहिद, जानती थी गौरा यह भी।

दीवारें गिराते और जोड़ते, अपने लिए एक आरामदेह घर बनाते पर बरसों गुजर गए थे दोनों के … शाकाहारी ब्राह्मण की बेटी के लिए शाहिद ने मांस-मच्छी, सब छोड़ दिया था। और खाती नहीं थी तो क्या दुपट्टे से नाक-मुँह ढांपकर शाहिद के लिए सबकुछ बनाने लगी थी शबनम भी। पर क्या फायदा हुआ , मिनटों में ही सब यूँ तहस-नहस मिट्टी में …बेबसी में आँसू तक चुभ रहे थे अब तो उसकी रीती-जलती आँखों में।

ऐसा क्यों? क्यों हुआ दोबारा ऐसा उसके साथ! उसने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा। किसी से कुछ नहीं मांगा। अच्छाई और बुराई दोनों के ही साथ समझौते पर समझौते ही किए हैं बस। फिर यह सब क्यों…वह भी उसके अपने मुल्क में जहाँ वह सुरक्षित रहेंगे …यही समझाया था उसके शाहिद ने उसे , इसी जगह पर खड़े होकर ऐसी ही एक खूनी तांडव करती रात में चालीस साल पहले। हर डर से मुक्ति दिलाने का वादा भी किया था । तभी तो, चुपचाप उसकी हर बात मानकर, उसपर पूरा भरोसा करके चौदह वर्ष की उस अबोध उम्र में भी बिना कुछ अधिक सोचे-समझे एक पल में ही, उस अनाथ और गरीब के घर में एक डरी कबूतरी-सी आ छुपी थी वह और उसे ही अपना सबकुछ जान-मान, उसकी कोठरी में ही पूरे तीन दिन निकाल दिए थे गौरा ने। याद आने पर भी पलटकर नहीं देखा था मां-बाप या पीछे छूटे संसार की तरफ। ज्यादा फर्क तो नहीं रह गया था अब उसमें और शाहिद में। उसीके समान उसका भी तो सब लुट चुका था और वह भी तो अनाथ ही थी ।

एक ही बार रंभाने पर जैसे पौहों का दर्द समझ जाता था शाहिद और बहुत प्यार से और धीरे-धीरे उनके घावों पर मरहम लगाता था, खिलाता-पिलाता था, वैसे ही उसे भी तो संभालता रहा था उम्र भर उसका शाहिद । पर क्या आज वह उसे बचा पाएगी…है इतनी काबलियत और साहस उसमें…डटी रह पाएगी इन बन्दूक धारियों के आगे।

माना उस वक्त बस आभारी थी वह उसकी इस दया की, पर अब सुरक्षित पाती थी खुदको वह उसके साथ। आज चालीस साल बाद पूरी तरह से जुड़ चुकी थी उसके हर सुख-दुःख से। दो शरीरों के बावजूद एक ही तो थे वे। उसकी असली कीमत तो अब समझ में आ रही थी , जब उसका मजबूत हाथ, उसके हाथों से फिसलता जा रहा था ।

सामने पड़ा घायल शाहिद खून में लथपथ, मौत से जूझ रहा था। … चिथड़े-चिथड़े हुई बांई टांग रहरहकर दर्द से तड़प रही थी … लगातार रहरहकर झटके खा और दे रही थी।

शबनम उसे यूँ तड़पते देख खुद उसके दर्द से चिरने लगी। घायल शाहिद का बहता खून मानो खुद उसकी अपनी रगों को निचोड़ रहा था। फिर भी उसने होश नहीं खोए। जान तो चुकी थी कि परिस्थिति गंभीर हैं और सामने चारो बंदूक धारी मुंह पर काला कपड़ा बांधे अभी भी खड़े हैं। गए नहीं हैं वहां से और घायल शाहिद की जान से खतरा अभी भी टला नहीं है । पर हार नहीं मानी उसने जानते हुए भी कि जाति और धर्म-परिवर्तन जैसे सारे शब्द आज भी बेहद खूंखार और उग्र हैं , और रहेंगे हमेशा । लोग…समाज….उनकी यह सभ्य और विकसित दुनिया…इससे लड़ना और फरियाद करना दोनों ही बातें पत्थर से सिर फोड़ने जैसी ही तो है…जाने कैसे पता चल गया था कि शाहिद के घर में रहकर भी उसने अपने कपड़ों की अलमारी में एक छोटा-सा शिवलिंग छुपा रखा था। रोज सुबह नहा-धोकर हाथ जोड़ती थी वह और 11 बार ओम नमः शिवाय भी जपती थी मन-ही-मन प्रातःकाल में। बचपन से ही यही आदत जो रही थी उसकी।

शाहिद को भी कोई एतराज नहीं था उसकी इस आदत से। प्यार करता था वह उससे , पर ये नहीं। इन्हें एतराज था और रहेगा। बड़ा एतराज…इतना बड़ा कि जान लेने आ पहुँचे थे उसके दरवाजे पर… पर दोनों वक्त नमाज भी तो उसने उसी लगन और श्रद्धा के साथ ही पढ़ी थी हमेशा।

जिन्दगी घुमा-फिराकर बस यही एक पाठ क्यों पढ़ाना चाहती है … ना मानो तो जान से हाथ धोओ और मान लो तो खुद को कुचल-भूलकर, मौत से भी बद्तर जिन्दगी गुजारो।

गलती उसी की थी। नहीं ढल पाई वह दुनिया के सांचे में। नाम और पहचान और सारा अतीत भुलाकर शबनम अवश्य कहलाने लगी थी, पर गौरा मन के अंदर ही धंसी रह गई थी, कहीं। पीछे नहीं हटी थी पर वह इस चुनौती भरी जिन्दगी से भी कभी। आसान नहीं होता यूँ दोहरे अस्तित्व को जी पाना।

यादें गड़े कांटे की मवाद सी रिसने लगी थीं अब।

पर, उसका अपना नासूर हैं ये। किसी को दिखाना या किसी के साथ बांट पाना न तो आसान ही था उसके लिए और ना संभव ही ।…

बापू की खामोश आँखों में धंसी चीखों की तरह, अपनी सारी जटिलता के साथ चीखता ही रहता था अतीत और वर्तमान पलपल उसके अंदर। दहला देती है आज भी उसे वह भयभीत और अबोध गौरा । और अब यूँ शाहिद को तड़पते देखना…उसका आंखों के आगे ही जिन्दगी से दूर फिसलते चले जाना, टूटती, शबनम लड़खड़ाई और चौखट से सिर फोड़ बैठी। पर माथे से बहते खून को पोंछने का वक्त नहीं था। सामने शाहिद तड़प रहा था और यदि उसकी जान बचानी थी तो उसके बहते खून को रोकना ज्यादा जरूरी था। जानती थी वह तब भी तो यूँ ही बेरहमी से खून की नदियां बही और बहाई गई थीं दोनों ही तरफ से और जाने कितनों ने बेवजह ही दम तोड़ दिया था, जब हिन्दुस्तान को चीरकर दो टुकड़ों में बांटा गया था। और अब फिरसे वही सब… जी भरकर इस खूबसूरत वादी काश्मीर के साथ खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है? दिल लड़कर तो नहीं, प्यार से जीते जाते हैं -क्यों नहीं समझ में आता इन हवस के मारों को!

बारबार गढ़ा, गूंथा, मिटाया और बनाया जा रहा था उसे। लगातार काश्मीर का यह बटवारा, यह काट-छांट कम दुखद नही रही उसके लिए भी । जितना प्रयास करती, जोड़ती मन की वह तनी गूंथ दुखती ही रह जाती। कई गांठें पड़ चुकी थीं, जिन्हें सहलाते-सहलाते पीढ़ियाँ निकल जाएँगी। झेलम और चिनाब दोनों के ही पानी में लगातार बस एक लाल रंग घुला दिखता था उसे।

रातोरात जो निकल गए , बच गए थे तब भी । पर यह उसकी और उसके घरवालों के नसीब में नहीं था। एकबार फिर उसे और शाहिद को निरीह जानवरों की तरह घेर लिया गया था । तब भी तो अपना मान और जानकर जो डटे रहे थे, उनका क्या हश्र हुआ था न तो गौरा ही भूली है और ना ही शबनम को ही कभी भूलने दे रहे ये लोग।

क्यों एक-दूसरे को ही लूटते रहे हैं भाई-भाई ही हमेशा से ? नफरत और हवस की यह आग इतनी तेज क्यों हमेशा … झुलसाती, कुचलती-रौंदती , सब भस्म करके ही क्यों आगे बढ़ पाती है यह!

बहते आंसुओं की परवाह किए बगैर, शबनम बावरी सी शाहिद को संभालने और राहत देने की कोशिश करती जा रही थी।
हमेशा की तरह किसी सवाल का कोई जवाब नहीं था आज फिर उसके पास।
ट्रक भर-भरकर लाशें दाब दी गई थीं गढ़्ढों में या फिर पेट्रोल छिड़ककर एक साथ ही स्वाहा कर दी गई थीं। हिन्दु,
पंडित , मुल्ले सब एक साथ। एकबार फिर रामनामी और नमाजी गोल टोपियाँ दोनों ही पैरों के नीचे रुंद रही थीं, निरपराधों के खून में सनी ।

उस समय भी तो कुछ अलग कर पाना या पहचानना संभव नहीं था किसी के लिए ! ईश्वर की मर्जी पर सब छोड़ दिया उसने, खुद को भी और शाहिद को भी ।

वक्त ही न किसी के पास प्यार और भाईचारे की बातें जानने और समझने को…कैसी दुनिया होती जा रही है…आदमी जानवर से भी ज्यादा खूँखार और खुला घूमता रहता है।

कोई जानने पहचाननने वाला नहीं, शिनाख्त को नहीं…रोने या याद करने को नहीं इन लावारिश लाशों के साथ….उसके आंसू बर्फ से ठंडे थे अब । जब मां-बाप से बिछुड़ी थी , तब भी उन लाशों को ठिकाने लगाने वाला कोई नहीं था। पर आज वह अपने शाहिद के साथ ऐसा नहीं होने देगी।

पलभर को एक मंथन था भयभरा उसके हृदय में, जिसने पूरी तरह से शिथिल कर दिया था उसे, परन्तु तुरंत ही उसने खुद को संभाल लिया और मौत से भी बद्तर शिथिल थकान को परे धकेलती पाषाणी उठ खड़ी हुई।
अब ना तो उन तनी बन्दूकों का डर था उसे और ना ही अपनी और शाहिद की जान का।

ईश्वर भी तो उसीकी मदद करता है जो प्रयास न छोड़े, जैसे-तैसे सारा साहस और ताकत जुटाती वह उठी और अपनी चुनरी को कई-कई बार लपेटते हुए शाहिद की घायल टांग कसकर बांध दी , शायद खून का बहना थोड़ा रुके। शायद उसका शाहिद बच ही जाए…सांसें तो अभी भी चल ही रही थीं और जीने की उम्मीद भी उन सांसों सी ही आ-जा रही थी अब उसकी आँखों में।

और तब एकबार तो शाहिद ने जी भरकर उसकी तरफ देखा और टूटे-फूटे शब्दों में जाने क्या अस्फुट और शक्तिहीन-सा कुछ कहना भी चाहा। पर सब निष्फल। आंसूभरी वे आँखें इतनी अशक्त थीं कि खुली तक रख पाना असंभव हो चला था उसके लिए, फिर भी कैसे भी दोनों हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिए उसने, मानो पास बुला रहा हो, मानो विदा लेना चाहता हो, मानो उसकी रक्षा न कर पाने के लिए, बीच मझधार में छोड़कर जाने की अपनी इस मजबूरी और घायल असमर्थता पर बेहद शर्मिंदा हो वह।…और तब बेबसी में जुड़े उन हाथों को कसकर पकड़कर फफक-फफककर रो पड़ी थी शब्बो।
-नहीं, तुम्हें मैं कहीं नहीं जाने दूंगी, शाहिद। मुझसे पहले कैसे जा सकते हो तुम? तुमने तो उम्रभर साथ रहने का का वादा किया था मुझसे!…

सामने बहती वह सिंधु नदी हिन्दु थी या मुस्लिम, -इसका तो पता नहीं था शाहिद को, पर वह सिंधु नदी भी आज उसे अपनी टूटी-बिखरी गौरा-सी ही जान पड़ी …अपने ही आंसुओं और कष्ट में डूबी। आगे बढ़कर अब उसे जीवन का वह अनजान व कठिन सफर अकेले ही तो तय करना पड़ेगा , जान चुका था वह ।
एक ही जनम में गौरा और शबनम भी जैसे हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों के बीच बहती यह नदी सिंधु… इसी सिंधु नदी के किनारे ही तो ताउम्र रही है उसकी शब्बो , इन्ही खूबसूरत चिनाब की वादियों में फिर किस्मत कैसे न जुड़ती इनकी। दोनों के रास्ते और भी कई मायनों में समानान्तर थे । एक बड़ी वजह यह भी थी, कि दोनों के ही रास्ते में नंगा पहाड़ आया, जिसने मजबूर कर दिया इन्हें रास्ता बदलने को, घरबार छोड़कर कहीं और चल देने को, खुद से और अपनों से यूँ बेवजह ही बिछुड़ने को। हालात के आगे आत्म-समर्पण करके खुदको यूँ पूर्णतः विलीन कर देने को।
उद्गम से अंत तक की यह यात्रा दोनों के लिए बेहद पथरीली और दुर्गम थी -शाहिद जानता था इनके दुख को। पर क्यों किसी और ने इनके इस अनाम दुःख को नहीं जाना, ना ही इनके निर्लिप्त त्याग को ही सराहा!

भला हो उस अरब सागर का जिससे सिंधु का दुख देखा नहीं गया था और खुद में समेट लिया अभागिन को , जैसे कभी उसने गौरा को अपनी शब्बो मानकर पनाह दे दी थी और और खुली सड़क पर घूमते उन खूंखार कुत्तों द्वारा बोटी-बोटी चिथड़े होने से बचा लिया था। पर अब एकबार फिर अल्लाह के भरोसे अकेली ही तो है उसकी शब्बो !
दोनों ने ही तो पलपल अपनों से बिछुडती और नित नई जटिलताओं में उलझती-सुलझती जिन्दगी ही जी हैं। सिंधु नदी जैसे दोनों देशों की धरती को सींजती संवारती बही उसकी शब्बो भी ने भी तो दोनों ही समाज को बहुत कुछ दिया है। अपनी सामर्थ से कई-कई गुना बढ़कर दिया है। जबकि पास में, वश में तो कुछ भी नहीं रहा है इनके। घटनाओं ने ही भटकाया इन्हें और घटनाओं ने ही सुलझाया भी। और अब आगे , ये घटनाओं ही सारे अहम् फैसले लेंगी… यह आवेग भराा बहाव जीवन का थमने क्यों नहीं देता !…शाहिद की आंसूभीगी धुँधली आँखें अब साफसाफ अपनी शब्बो का चेहरा तक नहीं देख पा रही थीं।

और तब अल्लाह को मन-ही-मन सौंप दिया उसने सबकुछ। खुदको भी और अपनी शब्बो को भी , पर दम तोड़ते शाहिद की जलती-बुझती आंखों के आगे पूरी गुजरी जिन्दगी चलचित्र सी चलना बन्द नहीं हुई थी अभी।

शबनम…यानी मां-बाप की गौरा , उनके घर के आगे बहती सिंधु नदी सी ही सरल और निश्छल , बातबात पर खिलखिल हंसने वाली किशोरी, जिसने बस अबोध बचपन के चौदह बेफिक्र बसंत ही देखे थे अपने अम्मा बाबा और छोटे भाई भोला के साथ। छोटा सा परिवार था उसका भी कभी, जिसमें वे सभी खुश खुश रहते थे। पर अब कुछ नहीं। यादें, एक वीभत्स राक्षस का मुंह बनी कभी तो सब उगले दे रही थीं और कभी उसकी भयभीत आँखों की परवाह न करते हुए सबकुछ जो उसका था , उसे राहत देता था, पूरा मुँह फाड़े निगलने को तैयार खड़ी थीं।

शाहिद को अपना अंत स्पष्ट दिख रहा था, पर शब्बो कैसे हार मान लेती … दुबारा अनाथ होने के इस भय से मानो और भी तेज आँच की लपटों-सी जल उठी थी वह। अंदर-ही-अंदर ऐसा अनर्थ…ऐसा छल चलता रहा, वह भी उसके साथ… अचानक ही चंडी अवतार ले चुकी थी खुद उसके अपने अंदर।

कोई बच्चा नहीं, कोई भोला नहीं यहाँ ।

यह महिषासुर मर्दन तो अब उसे करना ही होगा। अच्छी और बुरी बस दो ही जातियाँ रह गई हैं इन्सानों में। और बुराई अच्छाई को पूरी तरह से निगलने को तैयार खड़ी है। कैसे भी अच्छाई को तो बचाना ही होगा अब, किसी भी शर्त पर । समर्पण ही तो संरक्षण नहीं- भलीभांति जान चुकी थी वह अपनी जिन्दगी के उस सबसे भयावह और चुनौती भरे पल में । सामने पड़े शाहिद के दर्द से चिरती हर चिलक के साथ-साथ वाकई में साक्षात उग्र चंडी कुलबुलाने लगती उसके अंदर…खड्ग संभाले, राक्षसों के विनाश को तत्पर और बेचैन। आक्रमण के लिए पूर्णतः तैयार ।

नीरव रात के उस भयावह अंधेरे को ओढ़े प्रज्जवलित दीपशिखा-सी चमकती दिखी तब वह शाहिद को ।

अपने दर्द से ज्यादा, अनाथ और अकेली शब्बो का दर्द था जो बर्दाश्त के बाहर हो चला था उसके लिए अब अपने उस अंतिम पल में। पर जान चुका था शाहिद कि जो भी राह में आएगा उसे पूरा भस्म कर देने की पूरी सामर्थ थी उसकी शब्बो में और आभारी था वह उसके ऊपर अल्लाह की इस रेहमत के लिए।

दम घोटते उस दर्द को और झेल पाना और आंखें खुली रख पाना जब असंभव हो चला मृतप्राय शाहिद के लिए तो एक और अल्लाह की रेहमत बनकर उसकी डबडबाती आंसूभरी आँखें स्वतः ही मुंद गईं । पर तड़पती शब्बो पूरी तरह से सचेत और सक्रिय ही रही। कभी उसकी छाती मलती, तो कभी तलुवे। शरीर से गरमाहट भले ही चली गई हो, पर यूँ हार नहीं मानेगी वह, कहीं नहीं जाने देगी वह अपने शाहिद को। पर तभी अचानक एक और धमाका हुआ मानो सामने खड़ों ने मन पढ़ लिया था उसका।

जो अकरम बचपन से ही उसके सबसे पास था वह भी तमंचा ताने खड़ा था सामने। साथ में तीन चार और भी थे जिन्हें वह नहीं पहचानती थी, गोली किसने दागी क्या फर्क पड़ता था, निशाने पर तो उसका बरसों से खड़ा मानवता पर विश्वास ही था।

आगे बढ़कर हाथ से तमंचा छीने, गाल पर करारा थप्पड़ मारे, इसके पहले ही किसी ने एक और गोली शाहिद के सीने में दाग दी । शब्बो की फटी आँखों के आगे ही रह-रहकर तड़पता शरीर पूरी तरह से शांत हो गया। और तब, जाने किस उम्मीद, किस बदहवासी में शब्बो ढाल बनकर गिर पड़ी अपने शाहिद के ऊपर।

गोलियाँ अभी भी चल रही थी लड़कों के तमंचों से। दो-तीन छर्रे उसकी पीठ में भी आ लगे और उसे अपाहिज और अचेत करते रीढ़ की हड्डी में जा धंसे। और तब बिना रोए-चीखे, वैसे ही, पहले-सी ही शान्त और अचेत, बेजान गुड़िया-सी लुढ़क गई शब्बो भी शाहिद की बगल में ।
सब शान्त था अब चारो तरफ। वे लड़के भी।
मिनटों बाद ही किसी को होश आया और किसी ने फिर ललकारा -खड़े-खड़े मुंह क्या देख रहे हो , ठिकाने भी तो लगाना होगा इन लाशों को।…
और तब मृत शाहिद के साथ मृतप्राय शब्बो को भी सामने बहती नदी में फेंक दिया उन्होंने।

जिन्दा या मुर्दा समझने का वक्त नही था किसी के पास और ना ही बची सांसों को गिनने की ही जरूरत समझी थी उन्होंने ।
सिवाय अकरम के जो अब अन्दर तक बेचैन हो चला था….
….
बरसों बीत जाने के बाद भी उसकी उजाड़ मौसम सी जिन्दगी में जब एक भी फल-फूल नहीं खिला था, तो शब्बो ने मोहल्ले के हर बच्चे को अपना बना लिया था । उन्ही के लिए अपना सबकुछ समर्पित कर बैठी थी, पगली। अब वे सभी दीन और अनाथ ही उसका परिवार थे। उसकी ममता सबपर और दिनरात एकसी बरसती । बेहद लगन और मेहनत से सींचती और संवारती रहती वह अड़ोस-पड़ोस के हर बच्चे को। अकरम तो सबसे समझदार और सबसे प्यारा लगता था उसे। उसकी कोठरी उसका घर नहीं अनाथों का घर तो पहले से ही थी , अब उनकी पाठशाला भी बन चुकी थी।

अकरम फटी-फटी आंखों से देख रहा था, उसी शब्बो को यूँ लावारिस खून में लथपथ सड़क से उठाकर बेहद बेरहमी के साथ नदी में फिंकते हुए, मानो इन्सान नहीं, कूड़े के ढेर को हटाकर, साफ-सफाई की जा रही हो वहाँ पर।

अचानक सीने में एक कसक-सी उठी, पर साथियों के डर से शबनम की कोई मदद नहीं कर पाया ।

यूँ घायल छोड़कर मुंह फेर लेना यही इनाम था शायद उसके पास उसकी हर नेकी का…अकरम की आत्मा बारबार कायर और बेरहम कह-कहकर धिक्कारती रही उसे, पर जब अपनी ही जान पर बन आए तो आत्मा की आवाज को तो मारना ही पड़ता है यह भी भलीभांति जान चुका था अकरम।
….
कब लड़कों ने उसे और शाहिद को मिलजुलकर उठाया और सामने बहती नदी में फेंक दिया और कब और कैसे वह वापस अकरम के साथ अपनी उसी सुनसान कोठरी में वापस लौट आई , शब्बो को कुछ याद नहीं। पर अकरम को एक-एक दृश्य याद है। लाख कोशिशों के बावजूद भूल ही नहीं पाता वह कुछ भी ।

अकेले ही रात के अंधेरे में दुबारा जाकर ढूँढा था उसने शब्बो काकी को। और मिल भी गई थी वह उसे तुरंत ही अंधमुंदी आखों से इंतजार करती, रहरहकर मुंह से झागों के फब्बारे उलीचती। आधे मील दूर ही लहरें किनारे पर पटक गई थीं । खून रिस-रिस कर बह रहा था और टूटी सांसों की खड़खड़ दूरतक साफ सुनाई दे रही थी। अच्छा हुआ किसीने देखा नहीं लाते ले जाते रात के उस सियाह अंधेरे में, वरना उसे भी जिन्दा ही दफन कर देते उसके साथ-साथ उसी समंदर में ।

फिर तो दिनरात एक कर दिए थे शबनम की सेवा में। बचने की कोई उम्मीद नहीं थी और सबकी नजर में पागल और बेवकूफ तक दिखने लगा था अकरम, जो यूँ एक अधमरी लाश की सेवा में लगा रहता था दिनरात।

महीने भर में घाव तो भर गए पर अपना नाम पता पहचान कुछ भी याद नहीं आया शब्बो को। वह तो यह भी नहीं जानती थी कि अकरम अब उसे अम्मी कहकर बुलाने लगा था। दिनरात वहीं उसके पास ही रहता था। खाने-पीने आदि उसकी हर शारीरिक जरूरत का नमाजी तल्लीनता के साथ पूरा ध्यान रखता था।

शब्बो के गुजरे खुशहाल दिन और शाहिद को तो नहीं वापस ला सकता था वह, पर थोड़ी तसल्ली तो दे ही सकता था।
प्रायश्चित का शायद यही एक तरीका बचा था अब उसके पास। …फिर भूल भी कैसे सकता था वह कि उसी की दुआओं से तो बच गया था वह, वरना, अन्य साथियों की तरह वह भी तो सेना की पकड़ में आ ही सकता था… फिर था भी क्या उसका अपना! अगर यह शब्बो काकी न होती उस मोहल्ले में तो कौन उसका ध्यान रखता, बड़ा करता ?खाना-पीना देता, नहलाता-धुलाता! तख्ती लेकर लिखना-पढ़ना सिखाता… अंधी-बूढ़ी नानी के बस में तो वैसे भी कुछ नहीं था।

ग्लानि और दुख में डूबा अकरम, बैठा-बैठा कभी शब्बो के बालों में तेल लगाता, तो कभी हथेली और तलुवों पर हिना से बेल-बूटे काढ़ता, पर तब भी जब शबनम न तो हँसती और ना ही मुस्कुराती, तो बेटे की तरह बेहद उदास भी हो जाता।
रह-रहकर कभी कबूतर के पंख से उसके तलवे गुदगुदाने लग जाता तो कभी कान में कसकर कू करता , पर बेजान शरीर में फिर भी कोई हलचल न होती । शब्बो की पत्थर सी आंखें जाने क्या और कहाँ एकटक, एक ही जगह को देखती रहतीं दिन-रात।

अकरम जब और बर्दाश्त नहीं कर पाता, तो जी भरकर रोता और सिसकता, फरियाद करता -‘ एकबार, बस एकबार माफ कर दो अम्मा मुझे, भटक गया था मैं।’- कह-कहकर सिर तक धुनता। पर जैसे कई रिश्ते बेहद कठोर होते हैं , उम्रभर जकड़े रहते हैं फिर भी दूरी बनी रहती हैं, वैसे ही कई दर्द भी तो लाइलाज ही होते हैं। शब्दों में नहीं बांधा जा सकता इन्हे।

अपने और पराए का फर्क …सह और जानकर भी कभी मान नहीं पाई थी शब्बो, इतना प्यार करती थी उन सबसे। फिर उसी के साथ उन्होंने ऐसा क्यों किया…आत्मा की धिक्कार ने उसे अब चौबीसों घंटे सलीब पर टांग रखा था। सामने ठंडे फर्श पर बैठा वह दिनरात उसे घूरता रहता, जाने कब अम्मा को उसकी जरूरत पड़ जाए?

पर, दुख की उस अन्तिम नदी में डुबकी लगाकर तो मानो वह हर दुख से मुक्ति पा चुकी थी अब। उसकी न कोई चाह रह गई थी और ना ही कोई जरूरत।

मन-ही-मन तो अकरम भी जान चुका था कि इतनी बड़ी और फलती-फूलती इस दुनिया में ना तो कुछ देने को ही बचा था अब उन दोनों के बीच और ना ही कुछ लेने को ही। कम-से-कम इस जिन्दगी में तो नहीं ही। फिर भी उसकी कोशिश जारी रही। शायद अल्लाह सुन ही ले…

मरने के बाद अपने पराए का कोई मतलब नहीं रह जाता, पर जब जीते जी ही, बिना खाक पड़े ही, ऐसा हो तो कितना दुख देता है, रोज ही भुगत रहा था अकरम अब।

नारी या माटी, दोनों को ही मन चाहे जैसे गढ़ लो, कितनी गीली और सुकुमार थी उसकी शब्बो काकी भी कभी, फिर यूँ पाषाणवत् कैसे हो गई? कहीं उसकी बेववफाई से ही तो नहीं तिरका काकी का कोमल मन…चौबीसों घंटे सोचते रहने पर भी, समझकर भी न समझ पाता अकरम। एक आस की लौ थी जो बुझ नहीं रही थी मन से। और वह यूँ ही घंटों बैठा उसे घूरता ही रह जाता…क्या सोच रही होगी, क्या बीत रही होगी इसपर, फिर भी उसे कुछ पता ही न चल पाता।

आखिर यूँ ही तो पाषाण नहीं बन जाता कोई। जानी कितनी ठोकरें …कितना रौंदती है यह दुनिया, तब जाकर पत्थर-कठोर होती हैं ये दोनों, धरती और नारी …और उन सूनी अकेली रातों में उसके आँसू सोच-सोचकर थमने का नाम ही न लेते। कभी-कभी तो रात की अंधेरी परछांइयों के साथ मिली उन सिसकियों से वीराना तक दहलने लग जाता, पर शब्बो काकी तक उसकी कोई आवाज, कोई फरियाद न पहुँचती। मानो कहीं कुछ बचा ही नहीं था… न तो कुछ जानने को और ना समझने को और ना ही कुछ समझाने को ही।

फिर शब्दों में, इन रिश्तों में रखा भी क्या था? क्या अर्थ इस पछतावे का भी, जब नफरत की दीवार इतनी ऊंची हो चुकी हो कि दूसरे तो दूसरे, अपनों का भी दुख-दर्द दिखाई न दे… पुकार सुनाई ही न दे।…अपने ही षडयंत्र करने लग जाएँ…शब्बो को तो वैसे भी अब कुछ याद नहीं । सुख-दुख, रिश्ते-नाते सबसे परे जा चुकी थी वह। और उसके लिए यही बेहतर भी था, शायद।
अकरम और शबनम दोनों के लिए ही बहुत देर हो चुकी थी, शायद।…

चिड़िया-सी लेटे-लेटे ही मुंह खोल देती थी। जो कुछ अकरम मुंह में डाले, जैसे-तैसे तुरंत ही गटक भी लेती थी। फिर तुरंत ही देखते-देखते वापस सो भी जाती … या शायद बस सोती-सी चौबीसो घंटे जगी ही पड़ी रहती थी।

चलती सांसें और उन चलती सांसों की जरूरत ही तो रह गई थी अब उसकी बची हुई जिन्दगी , और वही चन्द बची सांसें अब तो उन दोनों के बीच की बची हुई कड़ी भी थीं । आखिर, उन सांसों की चलती धौंकनी के सहारे ही तो अकरम जान पाता था कि जिन्दा है पाषाणी माँ अभी।….

शैल अग्रवाल

बरमिंघम
वेस्ट मिडलैंड्स, य़ू.के.
shailagrawal@hotmail.com

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