कविता आज और अभीः नवंबर/दिसंबर 19

ये शोर करता है कोई
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कितना और बोले
कोई तो बताए
सुनाई देती नहीं
कोई तो समझाये
काबिल है कोई
देखता नहीं कोई
खो गया है कोई
ढूंढे तो कोई
फिर मत कहना कोई
ये शोर करता है कोई

मोहित शर्मा


हमें लिखना होगा
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हमें लिखना होंगा जीवन की असफलताओं के बारे में
ताकि फिर उड़ सके हम इतिहास के नभ में
हमें फूंकना होंगा टूटे हुए सपनो में नयी उर्जा
ताकि मृत जीवन की अभिव्यक्ति को दे सके
कुछ और नयी साँसे !
विजय कुमार सप्पत्ति


” कैसे दूं सबूत ”
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सोचता हूं
नहीं होगा इससे अधिक भयानक दिन
बिखर गए सारे सपने,
अभी भी बोता है प्रेम देश की माटी में
याद है कहानी जो सुनी थी
बचपन में,
घुसे थे कैसे सरहदों में
परदादी लाई थी छुपाकर कुछ जरूरी चीजें
अब्बा के पिताजी थे कोख में
अब्बा तो यहीं की हैं पैदाइश,
बार बार दोहराता है वो यही
क्यूं छीना जा रहा है हक माटी का,
सिली जा रहीं हैं जुबानें,
पथराती जा रहीं हैं आंखें,
किसको दूं सबूत
माटी को, हवाओं या फिर उन सरहदों को
जिनके बीच में सिमट गया सब कुछ
लग रहे है सवालिया निशान,
खारिज़ कर दिए गए हैं इंसानियत जैसे शब्द
गढ़ लिए गए हैं सारे उसूल अपने मुताबिक,
चूल्हे के चारों ओर
खाली आंखों के साथ चस्पा किए मौन
बैठे हैं सभी,
कब छोड़ेगे ये घर, पूछता है बच्चा
और पिघल जाती है आंखों में जमी बर्फ़,
वह देखता है
चेहरे बच्चों के,
देखता है महिलाओं को
सोचता है कि दोहराई तो नहीं जा रही
हैं कहानियां सरहदों की,
और पसर जाता है दर्द
शायद आ गए हैं करीब
वे दिन
आ रहीं हैं करीब फिर सरहदें
आंखें बिखर जाती हैं घर के विस्तार में
गूंजती हैं कानों में बूटों की आवाजें
दरवाजे की दराजों से झांकते हैं बुजुर्ग और बच्चे
हो जाते हैं चेहरे सफ़ेद
ताकता है बुजुर्ग गुमसुम सा
चमकती है अखबारी हेड लाइन
‘ जारी है जोरों पर डिटेंशन कैंपों में निर्माण कार्य ‘
और उभर आती है
एक गूंगी, अशक्त भीड़
सवाल अब भी खड़े हैं तनकर
क्या दूं सबूत, क्या यह बोलूं कि मैं भी हूं देशभक्त
और इतना होगा काफ़ी,
क्या यह बोलूं, कि
मुझमें भी है इस माटी की महक
किस कोने को धरती के बोलूं अब अपना,
जबकि छूट रहा हो अपना ही
गुमसुम सा बढ़ता है आगे
रख देता है बच्चे की खाली हथेलियों में
बीमार शाम,
समाचार पत्र की कटिंग जिसमें घूर रही है पंक्ति
अब भी,
क्योंकि अब कुछ शेष भी तो नहीं बचा है
सिवाय इसके देने को बच्चों को
हो सकता है कुछ सालों बाद
ये कटिंग ही बन जाए सबूत
और समेट सके अगली पीढ़ी माटी की महक
न सिमटना पड़े सरहदों से डिटेंशन कैंपों के बीच,
न पड़े बिखरना
चुप्पियों में सहमा है परिवार
सहमी है मानवता और सारे शब्द
आ रहे नज़र दम तोड़ते हुए
डूब जाता है तभी
रोशनी का शेष कतरा भी।

@ पंकज मिश्र ” अटल ”
रोशन गंज, शाहजहांपुर, उ० प्र०, भारत- 242001

एक जिन्दगी
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एक ज़िन्दगी
और कितने सारे ख्वाब
बस एक रात की सुबह का भी पता नहीं ….
कितनी किताबे पढना है बाकी
कितने सिनेमा देखना है बाकी
कितने जगहों पर जाना है बाकी
हक़ीकत में एक पूरी ज़िन्दगी जीना है बाकी !
एक ज़िन्दगी
और कितने सारे ख्वाब
बस एक रात की सुबह का भी पता नहीं ….
विजय कुमार सप्पत्ति


भूत जो अब घट गया है*
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ज्ञान उपनिषद का देते ,
ऋषि-मुनि गूढ़ और गंभीर
विज्ञान का प्रयोग चलता
स्क्रीन पर फोटोन की लकीर

कान्ह को माखन खिलाया,
बेबी फूड के साथ है
भूत जो अब घट गया है
जिन्दा यहाँ, यथार्थ है
उंगलियाँ टोह लेती
माला, कभी मोबाइल पर
हाथ शिलालेख पर,
कुछ ढूँढते हैं फाईल पर
फास्ट फूड में याद चलती है,
जहाँ पर पक रही थी खीर

स्थूल जीवित,
सुक्ष्म मृत दो प्रकृति के हाथ हैं
मर कर मरा है कौन?
सब जीवन्त, सब कुछ साथ हैं
है मुगलिया दरबार
गहरे दिल के अंधे कूप में
अंग्रेज अब भी सामने
अंग्रेजियत के रूप में
आजाद भारत पर पड़ी छाया,
गिरी दासत्व की जंजीर

पल-छिन के धागों में रही,
सहस्त्र वर्षों की लड़ी
डल झील पर कश्यप ऋषि के
भ्रमण में बाधा पड़ी
तपस्या में विघ्न कर जाते
रहे हैं बम-धमाके
बिखरते, मोहक छटा में
खौलते लहू के सिक्के
स्वर्ग धरती का है किन्तु हाय!
हिंसा में घिरा कश्मीर

मैत्री, गार्गेयी
नये अनुसंधान कर दिखला रही
काँटो की माला दामन में
फिर भी मुस्कुरा रही
है अहिल्या निर्दोष, सीता का करूण अध्याय
कैसा नियति का व्यंग्य, फूलन मांगती जब न्याय
आगे बढ़ी, मौजूद दुश्शासन वहाँ पर खींचता है चीर

*आस्ट्रेलिया के आदिवासियों की मान्यता है कि भूतकाल हमेशा वर्तमान के साथ रहता है। इस हिसाब से कश्मीर में आज भी कश्यप ऋषि भ्रमण कर रहे हैं और आतंकी बम धमाके उनकी तपस्या में विघ्न डालते हैं।

-हरिहर झा

मेलबौर्न, आस्ट्रेलिया

बीत गई दिवाली पर
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बीत गई दिवाली पर
थके ना बाती, बुझे ना दिया
काश्मीर से कन्याकुमारी तक
नेह से भरा रहे सबका हिया
उजाले के आगे अँधेरे की
होती कोई औकात नहीं
सुलझ न सके धैर्य और प्यार से
ऐसी कभी कहीं कोई गांठ नहीं
सफल होती है हर परीक्षा
छूटता जब विश्वास नहीं
मंथरा का षडयंत्र हो या फिर
राम को मिला जो बनवास
अनैतिक प्रहार थे बस
अंतिम जीत या हार नहीं
आगे-पीछे पूरे होंते प्रण सभी के
हारती जब आस नहीं
अमन चैन की बात हो या फिर
रामलला के मंदिर का
होना है जो निर्माण…

शैल अग्रवाल

हम सूरज बन दहकेगे
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चटक चांदनी के आंगन में,सुख की दुनिया रच लेंगे
किरणों के झूले में साथी बचपन अपना जी लेंगे
भूल धरा की आपाधापी खुशियां अपनी ढूंढेंगे
राह भले हो निपट अंधेरी,हम सूरज बन दहकेगे
कठिन कंटकित जीवन पथ पर, हंसते हंसते चल देंगे
तुम मेरी देहरी पर केवल एक दीया बन कर देखो
हम आंगन,शत-शत दीपों का विमल उजास भरेंगे,
दीप जले या मन के आंसू,दुख की गाथा अपनी है
नभ के मोती चल लहरों पर सहज संजोती धरती है
नदिया की चंचल धारा में कितने तूफान छले गए
दूर किनारे बैठी रजनी अकथ कहानी कहती है
शीतल चंद्र किरण कहती है, शीतलता ही जीवन दर्शन
कर्मठता की आग प्रबल हो,मन को सरल बना ही लेंगे

-पद्मा मिश्रा जमशेदपुर