माह विशेषः गोरख पांडे, अदम गोडवी, शैल अग्रवाल, कवि कुलवंत सिंह, विजय कुमार सप्पत्ति

राजा बोला रात है
राणी बोली रात है
मंत्री बोला रात है
संत्री बोला रात है
यह सुबह सुबह कि बात है
-गोरख पांडे

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे

तालिबे-शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे

एक जन सेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छह चमचे रहें माइक रहे माला रहे
अदम गोंडवी

पूजा की, प्रसाद खाया और घर लौट आए
अब मंदिर मस्जिद गुरद्वारे और गिरजाघर
सब सूने हैं, कोई नहीं वहाँ,न भगवान ना ही पुजारी
सिवाय धर्म के जो अंधा बहरा और अत्याचारी है
पाखंडियों की भीड़ में लठ्ठधारी है
शैल अग्रवाल

कृषक पेट है सबका भरता
खुद भूखा रह जाता है,
आत्मदाह इस दिवस न करना
वर्ष तुझे नव भाता है ।

कोख में पलती नव कली को
जन्म नही ले पाना है,
विगत वर्ष यां आने वाला
बिटिया को दुख पाना है ।

नारी को अधिकार नही हैं
वर्ष हजारों नव आये,
आज मना लें खुशियों का दिन
नवल वर्ष फिर कब आये !

दहेज का दानव आग लगा
बहुओं को तड़पाता है,
पैसों में तुल जाता बेटा
कीमत अपनी पाता है ।

मजदूरी कर पेट भरे जो
संध्या रोटी पाता है,
दिन भर डट कर काम करे वह
तब ही रोटी खाता है ।

बीतें वर्षों लेकर डिग्री
सालों सर्विस खोजी है,
फाके को उपवास बताता
युवक ढ़ूंढ़ता रोजी है ।

धरती, पानी, हवा सभी को
दूषित पल पल करता है,
ग्लोबल वार्मिंग से हमको क्या
कल किसने कब देखा है ।

राग अलापो प्रभु पूजा का
देश भ्रष्ट है, होने दो,
देश को नेता लूट के खाएं
’पब्लिक’ रोती, रोने दो ।

महंगाई की मार पड़ी है
कौन उठाये आवाजें,
व्यापारी हैं खूब सयाने
जेबें सबकी तौल रहे ।

पुलिस करे नेता की रक्षा
हम खायें औ तुम खाओ,
चोर, डकैती, लूटमार की
रपट लिखाने मत आओ ।

न्याय व्यवस्था बहुत निराली
साल बीसियों लग जाते,
’केस’ धनिक औ नेताओं के
निपट न जीवन भर पाते ।

अपराध देह व्यापार बना
नगर नगर में होता है,
ज़बरन गरीब कन्याओं को
इसमें ठूंसा जाता है ।

खाने में हर जगह मिलावट
नकल दवा भी बिकती है,
फिर कहते भारत की जनता
कैंसर से क्यों मरती है ।

भारत अपना देश निराला
गड़बड़ ही गड़बड़ झाला,
हर ओर दाल में है काला
भ्रष्ट हुए हैं सारे आला ।

– कवि कुलवंत सिंह

अक्सर शहर के जंगलों में ;
मुझे जानवर नज़र आतें है !
इंसान की शक्ल में ,
घूमते हुए ;
शिकार को ढूंढते हुए ;
और झपटते हुए..
फिर नोचते हुए..
और खाते हुए !

और फिर
एक और शिकार के तलाश में ,
भटकते हुए..!

और क्या कहूँ ,
जो जंगल के जानवर है ;
वो परेशान है !
हैरान है !!
इंसान की भूख को देखकर !!!

मुझसे कह रहे थे..
तुम इंसानों से तो हम जानवर अच्छे !!!

विजय कुमार सप्पत्ति