दोहेः बीनू भटनागर

क्रोध

क्रोधी मनवा से डरो ,मन को रखना शाँत,
टल जाये जब क्रोध तो, मनवा रहे न क्लाँत।

क्रोध फटे ज्वाला मुखी, ग़लत काम हों क्रोध ,
दब जाये धरती हिले, क्रोध का कर विरोध।

क्रोध करे से ना बने, बिगड़े हैं जो काम,
क्रोध जब हि तुम छोड़ दो, बने काम अविराम।

पात्र पिघल जाये वही, जामे हो तेज़ाब
क्रोध शरीर बसाइये ,काया रहे न आब।

क्रोध करे से ना कभी,काम बनेगा यार,
धीरज मधु संवाद हो, न हो वार पे वार।

अंतर्द्वन्द

दोराहे पर खड़े रहे, बीत गई ये रैन,
रस्ता कोई तय करूँ,तब आवेगा चैन।

जीनेकी इस राह मे,आयगे कई मोड़,
कौन राह पर चल पडूं, किसे देउ मैं छोड़।

मन में अंतर्द्वन्द चले, दिखे न कोई राह,
मनवा ईश उतार ले,फिर न उठेगी आह।

मन सोचेगा तब सही, होगा जब एकाग्र,
सही कर सके फैसला ,होवे वही कुशाग्र।

ये करलूँ या वो करूँ, कितने होय विकल्प,
जो करना है वो करो, बनाय लो संकल्प।

अवसाद

ईर्ष्या द्वेश कलेश से, होता है अवसाद,
ये संवेग सही नहीं, रखना इतना याद।

मनवा रोगी होय तो, तन भी रोग लगाय,
मन के रोग नकारना,जीना कठिन बनाय।

मन-रोगी पागल नहीं, बिलकुल ग़लत विचार,
सही चिकित्सा मिल गई,रोगन होय निवार।

दुख तो आवत जात हैं, दिन बीते फिर रात,
होवत जब अवसाद है, रात मगर ना जात।

योग

अच्छी सेहत के लिये, करिये प्रतिदिन योग,
योग गुरू मिल सके तो, सेहत का सुख भोग।

योग गुरू से सीखिये, आसन प्रतिदिन एक,
सूर्य प्रणाम रोंज़ करें ,योगिक मुद्रा अनेक।

योग ध्यानअनमोल है, सीखिये प्रणायाम,
श्वाँस क्रियायें कीजिये, हर सुबह और शाम।

-बीनू भटनागर