हास्य-व्यंग्यः यह कोई स्वप्न नहीं था-प्रभुदयाल श्रीवास्तव

वह कोई स्वप्न नहीं था

जब आत्महितकारी दल ने एक अविश्वास प्रस्ताव के बल पर नई सरकार बनाने की घोषणा की, तो पूरे देश में अप्रत्याशित सनसनी फैल गई। हर व्यक्ति की जिह्वा पर एक ही प्रश्न था – क्या मनोनीत प्रधान मंत्री, घोटालाप्रसाद देश में वर्षों से फैली जड़ता से जनता को मुक्त करा पाएंगे? क्या वे सचमुच देश को ऐसा प्रजातंत्र दे पाएंगे जिसमें सरकार वे काम करेगी जिनसे जनता का वास्तविक हित होगा? क्या कागजों पर लिखी नीतियों पर सचमुच अमल होगा? क्या जनता वस्तुतः जनार्धन बन जाएगी?

पिछले कुछ वर्षों में घोटालप्रसाद जी ने देश के प्रशासन में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने का वायदा किया था। वह वायदा वे भूले नहीं । पदग्रहण करने की शपथ लेते ही उन्होंने अपनी नई नीति की घोषणा की। उन्होंने स्वीकारा कि भ्रष्टाचार देश के जन-जीवन में घुन की तरह इस सीमा तक फैल गया है कि उसने समस्त सामाजिक जीवन को खोखला कर डाला है। उन्होंने यह भी माना कि भ्रष्टाचार के घुन से मुक्ति पाए बिना देश की प्रगति संभव नहीं। घोटालाप्रसादजी इस वस्तुस्थित से पूर्णतः परिचित थे कि जिस अभियान को लेकर वे चले हैं, वह कोई सरल कार्य नहीं था। उन्होंने इस प्रकार के सभी पूर्व अभियानों को चलाने वालों और उन अभियानों की नियति का विस्तृत अध्ययन किया था। ताजा इतिहास ऐसे अनगिनत नेताओं की करुणागाथा से भरा हुआ था, जो बड़े उत्साह से चले तो थे भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए, परन्तु स्वयं उसकी चपेट में आकर स्वयं नष्ट हो गए थे। ऐसे नेताओं की कहानियां न केवल असफल अभियानों की गाथाएं सुनाती थीं, अपितु जनसाधारण के स्मृतिपटल पर हास्यात्मक उपाख्यानों का पर्याय बन कर रह गई थीं। घोटालाप्रसाद अपना नाम ऐसे असफल नेताओं की सूची में लिखवाने को कदापि तैयार नहीं थे। उन्होंने इस समस्या पर लम्बे समय तक विचार करने और अनेक योग्य व्यवस्थापकों से परामर्श करने के बाद एक क्रान्तिकारी योजना बनाई थी। उस योजना के अनुसार भ्रष्टाचार उन्मूलन का एकमात्र उपाय था: उसका परदाफाश करना। अपने सनसनीखेज भाषण में घोटालाप्रसाद ने जनता को ललकारा कि वे विचार करें कि भ्रष्टाचार हमारे समाज में क्यों पनप रहा है। आखिर समाज में भ्रष्टाचार है क्यों? अपने ही प्रश्न का स्वयं ही उत्तर देते हुए उन्होंने कहा: “भ्रष्टाचार के विराट वृक्ष की जड़ें सरकारी जटिल नियमों की ओट में पोषण पाती हैं। ये नियम महत्वाकांक्षी व्यक्तियों की प्रगति में कदम-कदम पर बाधा डालते हैं। ऐसे व्यक्ति जहां भी नजर उठाते हैं, उन्हें नियमों की ऊंची दीवारें दिखाई देती हैं। वे स्वयं को नियमों की भूलभुलैया में गुमराह हुआ पाते हैं। जाल में फंसी मछली की तरह वे नियमों के बन्धन से छुटकारा पाने के लिए व्याकुल हो जाते हैं। वे पाते हैं कि वे जो कुछ भी करना चाहते हैं, वह किसी-न-किसी सरकारी नियम के विरुद्ध है। ऐसी परिस्थिति में जकड़ा हुआ एक इंसान क्या करे? बेबस, लाचार लोग तब उन भ्रष्ट अधिकारियों का मुंह निहारते हैं, जो उन्हें नियमों के चक्रव्युह से बाहर निकलने में सहायता करे। इसके लिए लोग सरकारी अधिकारियों को मुंह-मांगी कीमत देने को विवश हो जाते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि जो नियम अच्छी व्यवस्था के लिए बनाए गए थे, वे ही नियम जनता के शोषण का माध्यम बन गए हैं। और यह तो अधिकांश लोग अपने अनुभव से जानते हैं कि जब कोई एक बार इन अधिकारियों के चंगुल में आ जाता है, वह उनकी पकड़ से बाहर नहीं जा सकता, भले ही वह कितना भी चिल्लाए या छटपटाए।

इस समय सरकारी नियम जौंक की तरह जनता का खून चूसने का माध्यम बन गए हैं। हे देशवासियो, आज मैं शपथ लेता हूं कि जब तक आपके गलों में बंधे इन असहनीय नियमों से आपको मुक्ति नहीं दिला दूंगा, तब तक मैं चैन की सांस नहीं लूंगा। मेरी सरकार केवल एक नीति अपनाएगी – किसी भी व्यक्ति के पीछे जितनी आवाज, उसके उतने ही अधिकार।”

वह भाषण नीति का घोषणा-पत्र था। उसमें व्याख्या के लिए स्थान नहीं था। परन्तु लोगों को उसकी अधिक देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी; वह शीघ्र ही प्रकट हो गई। नई नीति कि अनुसार, उदाहरण के रूप में, यदि कोई आवेदक अपने आवेदन-पत्र के साथ नगरपालिका के खजाने में एक लाख रुपए जमा कराने की घोषणा करे, और उसकी वह राशि अन्य प्रत्याशियों द्वारा सुझाई गई राशि से अधिक हो, तो उसे उस नगरपालिका के क्षेत्र के सभी विद्यालयों में पुस्तकें बेचने का एकाघिकार प्राप्त हो जाएगा। इसी तरह यदि किसी गांव का सरपंच दो सौ मतदाताओं के हस्ताक्षर सहित आवेदन-पत्र भेजे, तो उसके गांव से सड़क निकालने की योजना पर पूरी गंभीरता से विचार किया जाएगा। और यदि आवेदन-पत्र के साथ पांच लाख रुपया भी क्षेत्रीय विकास आयोग को भेजी जाए, तो सड़क-निर्माण के विरुद्ध समस्त याचिकाएं रद्द कर दी जाएंगी।

सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार नियमों को शिथिल करने की एक नई प्रक्रिया तुरन्त लागू की जाने वाली थी। इस क्रान्तिकारी नीति को स्पष्ट करने के लिए नमूने के रूप में अनेक उदाहरण दिए गए थे, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

पांच लाख रुपए गैस निगम को भेंट करने वाले व्यक्ति को अपने चुने हुए क्षेत्र में गैस वितरण करने का अधिकार उसी प्रकार प्राप्त होगा, जैसे दस लाख रुपए की भेंट पैट्रोल स्टेशन खोलने की अनुमति प्राप्त करा सकेगी।

बीस लाख रुपए से कोई भी व्यक्ति अपनी पसन्द के स्थान पर कोई भी लघु उद्योग चालू करने का अधिकारी होगा। पचास लाख रुपए की राशि मध्य वर्ग के उद्योग और एक करोड़ रुपए की राशि भारी उद्योग शुरू करने के लिए पर्याप्त होगी।

विदेशी व्यापार का द्वार मात्र दो करोड़ रुपए से खोला जा सकेगा, जो अर्पित की गई धनराशि के समानुपात में बढ़कर किसी भी विदेशी बाजार में भारत का प्रतिनिधित्व करने का एकाधिकार प्राप्त कराने की क्षमता रखेगा।

घोटालाप्रसाद की नई खुली नीति व्यवसाय में सुविधाएं दिलाने या जनकल्याण के कार्यों आदि तक ही सीमीत नहीं थी, अपितु उसका दखल राजनैतिक गतिविधियों में भी होना था। उदाहरण के रूप में जहां एक हजार मतदाताओं के हस्ताक्षर के आधार पर कोई भी व्यक्ति एक छोटे नगर की किसी भी पार्टी के आंतरिक चुनावों में अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर सकता था, वहां राष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रतिनिधि बैठाने के लिए बीस हजार हस्ताक्षर आवश्यक थे। यहां तक कि पचास हजार हस्ताक्षरों द्वारा किसी भी पार्टी के किसी भी सदस्य को दोबारा चुनाव लड़ने के लिए चुनौती दी जा सकती थी।

स्पष्टतः घोटालाप्रसादीय योजना बड़ी क्रान्तिकारी थी जिसका प्रभाव जन-जीवन के हर पक्ष पर पड़ना था। समाज के अति निर्बल और असंगठित वर्ग से लेकर शक्तिवान और सुसंगठित लोगों तक, कोई भी उस योजना के प्रभाव से बच नहीं सकता था। योजना पर व्यापक रूप से चर्चाएं हुईं। जनता की मांग के कारण रेडियो और दूरदर्शन पर पूर्व-घोषित कार्यक्रम रद्द करके घोटालाप्रसादीय योजना पर विस्तृत वाद-विवाद प्रसारित किए गए। समाचार पत्रों के लिए तो मानो और कोई विषय सूझ ही नहीं पड़ता हो, हर कहीं घोटालाप्रसाद और उनकी नियमों से छुटकारी दिलाने की योजनाएं छा गई थीं। सुर्खियां, विश्लेषण, विवेचन और सम्पादकीय। चन्द गिने-चुने मतवालों को छोड़कर सभी सम्पादकों ने घोटालाप्रसादीय योजना की तारीफ के पुल बांध दिए थे। यद्यपि नए प्रधानमंत्री की तारीफ के आधार पर जीवन-वृत्ति में वृद्धि या उन्नति से सम्बन्धित कोई धारा योजना के अंतर्गत नहीं थी, परन्तु कोई भी सम्पादक राष्ट्रनेता की दिव्यदृष्टि के वर्णन की होड़ में पीछे नहीं रहना दीख पड़ता था। कुछ धुरन्दरों ने लिखा कि वह योजना प्रशासन प्रणाली में ऐसी क्रान्ति लाएगी जो वर्षों की अव्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकेगी। अधिकांश सम्पादकीयों के अनुसार देश में एक ऐसा नया प्रभात आने वाला था जिसकी किरणें असंख्य लोगों को नियमों के घने कोहरे से मुक्ति दिला सकेंगी।

राष्ट्र को अपनी मूलभूत योजना प्रस्तुत करने के बाद जब घोटालाप्रसाद अपने कार्यालय में पहुंचे, तो उनकी मेज पर प्रमुख समाचारपत्रों और दूरदर्शन पर हुए कार्यक्रमों में उनकी योजना पर की गई टीका-टिप्पणी की एक विस्तृत रिपोर्ट रखी थी, जिसे पढ़कर वे आत्मविभोर हो उठे। एक अनोखा सुख था वह, जो वर्णनातीत था। उस आनन्द-सरिता में गोते खाता उनका मन अतीत की गहराइयों में डूबे किशोरावस्था के क्षणों में जा पहुंचा। धीरे-धीरे यादें ताजी होने लगीं। उनमें से सबसे पहली स्मृति थी हाई स्कूल परीक्षा की समाप्ति पर हुए अपने पिता से वार्तालाप की। किस तरह वे दुबकते-झिझकते अपने पिता के पास पहुंचे थे सहायता मांगने के लिए। किस तरह उन्होंने अपने पिता को बताया था कि यदि वे अंगरेजी में अंक बढ़वा दें, तो उनके पुत्र का एक वर्ष खराब होने से बच सकता था। उनके सामने अपने पिता का गुस्से से तमतमाता चेहरा आ खड़ा हुआ जिस पर अभी भी पढ़ा जा सकता था – क्या मजाल इस छोकरे की जो प्रधानाचार्य बनारसीदास से अनैतिक कार्य में सहयोग की मांग करे। आखिर बनारसीदास एक धार्मिक व्यक्ति थे। उनकी निष्पक्षता और ईमानदारी की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। वे किस तरह पूरे जीवन में अर्जित अपना यश एक नादान लड़के के कहने में आकर नष्ट कर सकते थे, भले ही वह स्वयं अपना ही पुत्र क्यों न हो। लेकिन घोटालाप्रसाद भी कच्ची गोली नहीं खेले थे। खूब गिड़गिड़ाए। खूब आंसू बहाए। और जब सारे रोने-धोने का कोई असर होता दिखाई नहीं दिया, तो एक नया हथियार उन्होंने फेंका: “केवल इस बार काम करा दीजिए। भविष्य में खूब मेहनत करूंगा और आपको कभी भी शिकायत को मौका न आने दूंगा।”

बेचारे बनारसीदास एक विचित्र दुविधा में पड़ गए थे। एक ओर थे उनके जीवन-सिद्धान्त, और दूसरी ओर था रोता-तड़पता, सहायता मांगता उनका पुत्र। जब बच्चा गलती मानकर उसका निराकरण करने का वचन दे रहा हो, तो उसकी सहायता करना भी तो एक पिता का कर्तव्य हो जाता है। एक विषय में अपने पुत्र के अंक बढ़वा देना बनारसीदास के लिए कोई असाध्य कार्य नहीं था। दुखी मन से ही सही, परन्तु जो वचन उन्होंने अपने पुत्र को दिया, उसे पूरा कर ही दिया। अपने इस कृत्य पर उन्हें गर्व तो नहीं था, परन्तु उसे सन्तान-प्रेमवश स्वीकार अवश्य कर लिया। लेकिन परीक्षा-परिणाम ने जो रहस्य खोला, वह उनके लिए असहनीय हो गया। उनका पुत्र सभी विषयों में अउत्तीण रहा था, सिवाए अंगरेजी के। उन्होंने अपना माथा पीट लिया: “बेटे, तुमने मेरे माथे पर कालिख पोत दी है। मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहा अब।”

यादें थीं कि घुमड़-घुमड़कर प्रकट होती जा रही थीं। हाईस्कूल परीक्षा में दोबारा बैठे, पूरी तैयारी के साथ। एक बार गलती हुई, सो हुई। दोबारा नहीं। इस बार लगाम पिता के हाथ में नहीं, पुत्र के हाथ में थी। परीक्षा होने से पहले ही पूरी जानकारी इकट्ठा थी – किस विषय की कापियां जांच के लिए किस अध्यापक को पास भेजी जाने वाली हैं। परीक्षाएं समाप्त होते ही उन सबसे एक-एक करके सम्पर्क किया गया। पिता का हवाला दिया गया और प्रत्येक अध्यापक से कहा गया कि अन्य सभी परचे तो ठीक हैं, केवल आपके विषय में कमी हो गई है। “वैसे तो पिताजी स्वयं आने वाले थे, लेकिन मैंने ही उनसे कहा कि आपका तो नाम ही काफी है; इतनी-सी छोटी बात के लिए वे आते अच्छे भी तो नहीं लगते।”

स्वभावतः परीक्षा-परिणाम मनोवांछित ही रहा। विश्वविद्यालय की स्नातक परीक्षा का समय आते-आते उस कार्य प्रणाली में काफी सुधार कर लिए गए थे। परीक्षा आरम्भ होने के ठीक पन्द्रह मिनट बाद घोटालाप्रसाद पानी पीने के लिए आज्ञा मांगकर कक्ष से बाहर जाते, जहां एक स्नात्कोत्तर छात्र मित्र उनकी प्रतीक्षा में तैनात होता जिसे एक छोटा-सा परचा पकड़ाकर घोटालाप्रसाद परीक्षा-कक्ष में लौट जाते। पूरे एक घंटे बाद फिर प्यास लगने का नाटक करके जब प्याऊ पर पहुंचते, तो उनका मित्र वहां प्रतीक्षारत मिलता। कागजों की प्राप्ति और फिर जुटकर लिखाई। सभी कुछ कितना सहज था।

कानून की परीक्षा के समय तो कार्य-प्रणाली पूरी तरह परिमार्जित हो गई थी, जिसके अंतर्गत खाली कापियां पहले से ही जुटाकर घर पर रख ली गई थीं। वहीं मित्रों ने बैठकर प्रश्नों के उत्तर तैयार किए और पहुंचा दिए घोटालाप्रसाद के पास परीक्षा कक्ष में। वह शायद पहले विद्यार्थी थे जो अपने हाथ से एक भी शब्द लिखे बिना ही कानून के स्नातक बन गए थे।

शिक्षा जगत से बाहर निकल कर जब वकालती जीवन के अखाड़े में उतरे, तो घोटालाप्रसाद का मन उमंगों से भरा हुआ था। एक अजीब-सी खुमारी थी। सारे संसार जीतने के सपने थे। सभी को न्याय दिलाने की तड़प थी। जीवन के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने की महत्वाकांक्षाएं थीं। मात्र एक ही कमी थी – मुवक्किल। किसी ने उनका नाम तक नहीं सुना था। सवेरे से लेकर शाम तक दफ्तर में बैठते, लेकिन कोई भूल से भी उन्हें अपना मुकदमा लड़ने के लिए आमंत्रित न करता। जो इक्का-दुक्का मामले उनके पास किसी तरह आते भी, वे इतने दुर्बल होते कि उन जैसा नौसीखिया तो क्या, शायद कोई महान्यायवादी भी उन्हें न जीत पाता। ऐसे हरेक मुकदमे में मिली हार उन्हें अपने व्यक्तित्व की कमजोरी का एहसास दिलाती दीखती, जिसकी पीड़ा से उनकी आत्मा बेचैन हो उठती। मश्वरा लेकर अपना मामला किसी दूसरे वकील के हाथ अपना मामला सौंपने वाला हर मुवक्किल उनका परित्याग करता अनुभव होता। आर्थिक कठिनाइयां बढ़ने के साथ ही मन में आत्मग्लानि का भाव पनपने लगा था। कटुता महत्वाकांक्षाओं का स्थान लेती जा रही थी। जीवन एक असहनीय बोझ बन गया था।

यह मात्र संयोग ही था कि छात्रावस्था के एक मित्र कोलम्बो योजना के अंतर्गत जन-कल्याण अधिकारियों की कार्यक्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से लन्डन में हुए एक प्रशिक्षण शिविर से भारत लौटे थे। वह जब घोटालाप्रसाद से मिलने आए, तो तटकर-मुक्त दुकान से खरीदी स्काँच व्हिस्की की एक बोतल भी साथ ले आए। घोटालाप्रसाद ने बोतल रख तो ली, परन्तु बड़े असमंजस में पड़ गए। करें, तो क्या बोतल का! पीते-पिलाते तो थे नहीं। फिर ऐसी चीज को घर में रखने में अनेक प्रकार की कठिनाइयां हो सकती थीं। ईश्वर न करे, यदि प्रधानाचार्य बनारसीदास देख लें, तो तूफान ही खड़ा कर दें। ऐसी बला से मुक्ति पाने का सबसे सरल उपाय यह था कि उस बोतल को किसी उपयुक्त व्यक्ति को भेंट कर दिया जाए। उन दिनों उनके नगर में डकारनाथ आवास अधिकारी के रूप में नियुक्त थे। बड़ा दबदबा था उनका। उनके बारे में वकीलों के क्षेत्रों में अनेक अफवाहें उड़ा करती थीं, जिनकी सचाई की पुष्टि कभी किसी व्यक्ति ने पेश नहीं की थी। अलबत्ता दो बातें सभी मानते थे। पहली तो यह कि डकारनाथ ऐसे बैठकबाज व्यक्ति थे जो ऐरे-गैरे-न्त्थूखैरों को फटकने भी नहीं देते थे, और दूसरी यह कि जो उनके दरबार में एक बार स्वीकृति पा जाता, उसके समस्त संकट दूर हो जाते थे।

बोतल पाने का डकारनाथ से अधिक उपयुक्त अधिकारी और कौन हो सकता था, परन्तु समस्या यह थी कि उन्हें बोतल भेंट करना तो दूर घोटालाप्रसाद को उनसे नजर मिलाने तक का साहस नहीं था। न जाने क्या कह दें! कितना अपमान कर दें!
अनेक दिनों तक हृदय मंथन चला। अनेक योजनाएं डकारमाथजी से मिलने वाली डपट की संभावनाओं की सचाई के प्रकाश में ओझल हो गईं। आखिर एक दिन बहुत साहस करके वे डकारनाथ के कार्यालय में जा पहुंचे। अपनी फटफटिया को खड़ा कर ही रहे थे, कि अपने मौहल्ले में रहनेवाला एक व्यक्ति, जोड़ूदास दिखाई पड़ा। हालत कितनी भी खस्ता हो, आखिर थे तो वकील साहब! जोड़ूदास जैसे किसी व्यक्ति को मुंह लगाना उनकी शान के विरुद्ध था। लेकिन उस दिन न जाने क्यों उसकी ओर देखकर बोले: “भाई,जोड़ूदास आप यहां क्या कर रहे हैं?”

“वकील साहब, मैं तो यहां काम करता हूं। साहब का चपरासी हूं।”

“डकारनाथजी के यहां ?”

“जी, हां।”
“अच्छा ! लो बताओ! मैं भी कितना नादान हूं! बगल में चुहिया और शहर में ढिंढोरा! तुम्हारे साहब से मिलना था।”

“लीजिए यह कौन-सी बड़ी बात है। अभी मिलवा देता हूं।”

घोटालाप्रसाद को अपने सौभाग्य पर विश्वास नहीं हुआ। “नहीं, आज नहीं। फिर कभी। — भाई मेरे, इतने निकट रहते हो। कभी दीखते ही नहीं। कभी घर आओ। तब बताउंगा।”

जोड़ूदास को सवेरे ही अपने द्वार पर उपस्थित पाकर उनकी बाछें खिल गईं। “भाई, कोई विशेष काम नहीं था। बस होली के मौके पर यह नजराना तुम्हारे साहब को पहुंचाना था।” घोटालाप्रसाद ने उपहार दिए जाने वाले कागज में करीने से लिपटी व्हिस्की की बोतल पकड़ा दी। साथ में था पचास रुपए का नोट। “यह है तुम्हारा इनाम।”

“वकील साहब, इसकी क्या जरूरत थी ! मौहल्लेदार होकर क्या मैं इतना भी काम नहीं कर सकता!” जोड़ूदास ने बोतल थामकर खींसे निकाले।

“वह तो ठीक है, लेकिन इनाम तो जायज है।” घोटालाप्रसाद ने नोट उसकी जेब में ठूंस दिया।

घोटालाप्रसाद को आज तक याद है; लगभग एक महीने बाद बुलावा आ गया था। “हमारे बेटे का जन्मदिन है आगामी रविवार को। कुछ मित्रों को बुलाया है। आप भी आइए।”

घोटालाप्रसाद ने तुरन्त उन मित्रों से सम्पर्क किया जो या तो स्वयं विदेशों में रह चुके थे या जिनका सम्पर्क प्रवासी मित्रों या सम्बन्धियों से था। न जाने किस प्रकार स्काँच व्हिस्की की छह बोतलें जुटाईं और उनका पुलन्दा बनाकर जा पहुंचे जन्मदिन के आयोजन में। वहां पहुंचे, तो आंखें खुली रह गईं। एक छोटे बच्चे के जन्मदिन पर इतने बड़े आयोजन की उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। कोठी के सामनेवाले लाँन में एक बड़ा शामियाना लगा था जो मेहमानों से खचाखच भरा हुआ था।
शामियाने के शीर्षभाग में एक बड़ी मेज पर एक बड़ी केक सजी हुई थी। मेज के निकट मित्रों और हितैषियों द्वरा दिए गए उपहारों का एक पहाड़ खड़ा था। वह सब कल्पनातीत था। घोटालाप्रसाद को सब कुछ बड़ा अटपटा लगा। झिझक के मारे वह एक कोने में जाकर खड़े हो गए। तभी डकारनाथ बड़ी आत्मीयता से आकर बोले: “अरे! वकील साहब, वहां अकेले क्यों खड़े हैं। इसे अपना ही घर समझिए। पार्टी का आनन्द लीजिए।” उस आत्मीयता की गरमी में उनकी सारी झिझक लोप हो गई। वह मेहमानों से ऐसे मिलने लगे, जैसे उन्हें वर्षों से जानते हों। जल्द ही वह घड़ी आ पहुंची जिसका सभी, विशेषतः बच्चे, बड़ी अधीरता से प्रतीक्षा कर रहे थे। श्रीमती नाथ के आग्रह पर सभी लोग केकवाली मेज के चारों ओर जाकर खड़े हो गए। किलकारियां मारते, अपने मित्रों से घिरे, डकारनाथ के दस वर्षीय पुत्र ने जब केक काटा, तो सारा शामियाना ‘हैपी बर्थडे टू यू’ की जादुई तरंग में बह गया। घोटालाप्रसाद बच्चों की निश्छलता में इतने डूबे कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि पूरे शामियाने में उनके अतिरिक्त और कोई वयस्क नहीं बचा था। तभी जोड़ूदास हाजिर हुआ। “वकील साहब, आपको साहब ने कोठी के अन्दर आने को कहा है।”

वह दुबकते-सुकड़ते जोड़ूदास के पीछे यूं चले जैसे कोई आज्ञाकारी सेवक अपना कर्तव्य निभा रहा हो। बैठक में एक दूसरी ही दुनिया थी। नगर के बड़े-बड़े अधिकारी वहां जमा हो गए लगते थे। पुलीस के उप-अधीक्षक बिना वर्दी के एक बढ़िया सूट में विराजमान थे। जिलाधीश महोदय थे। जिला समाज कल्याण अधिकारी वहां शोभा बढ़ा रहे थे। विकास अधिकारी सपत्नीक पधारे थे। गायिका मिस सरगम चहचहा रही थीं। खान-पान पूरे जोरों पर था। यद्यपि सेवा के लिए परिवेषकों का प्रबन्ध था, परन्तु डकारनाथ स्वयं अतिथियों की अगवानी कर रहे थे। घोटालाप्रसाद को चाय का प्याला पकड़े देखकर हैरानी से बोले: “चाय! कुछ और लीजिए – व्हिस्की या वौडका।”

“जी, मैं तो पीता नहीं।”

“वाह, वकील साहब!” डकारनाथ ने ठटाका लगाया। “खुद पीते नहीं, पर दूसरों को खूब पिलाते हैं।”

“जी, ऐसा ही समझ लीजिए।” घोटालाप्रसाद के गाल तमतमा गए थे; मानो चोरी करते हुए पकड़े गए हों। बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो गई थी। मेहमान अटपटा अनुभव करे, तो मेजबान की भी तो इज्जत घटती है। डकारनाथ स्थिति को संभावने में बड़े कुशल थे। उन्होंने तुरन्त विषय बदला। “आप हमारे महकमे में वकालत क्यों नहीं करते?”

“जी।” घोटालाप्रसाद सटपटाए। “कभी अवसर ही नहीं मिला।”

“यह कमी तो अब दूर करनी ही पड़ेगी।” डकारनाथ ने कहा। “हमारे एक मित्र हैं। उनके एक मकान में एक बुढ़िया पिछले तीस साल से बैठी है। दो सौ रुपए महीने में घर संभाला हुआ है। न घर खाली करती है, न किराया बढ़ाती है। — अब तक तो उन्होंने कुछ नहीं कहा, परन्तु अब उनका बेटा जवान हो गया है; उसके रहने का प्रबन्ध करना आवश्यक हो गया है। —-यदि कहें, तो उनसे कहूं कि आपसे सम्पर्क कर लें।”
सत्तर वर्ष की एक विधवा से मकान खाली कराना कोई सरल काम नहीं था। फिर भी घोटालाप्रसाद ने मामला न केवल लिया बल्कि उस पर खूब मेहनत भी की। पेशी के समय उन्होंने एक ऐसे युवक की कुण्ठामय करुण गाथा कचहरी के सम्मुख रखी जो अपना घर होते हुए भी अपना घरबार बसाने के बदले माता-पिता के साथ रहने को विवश था। काश! उस बूढ़ी स्त्री से मकान खाली करा कर उसे स्वयं अपने घर में जाकर रहने की उसकी तीव्र इच्छा, जो उसका मानवीय अधिकार था, पूरी करने में अदालत उसकी सहायता करे।

यह पूर्ण अधिकाकार से नहीं कहा जा सकता कि जीत उनकी बेजवाब कानूनी बहस के फलस्वरूप मिली थी या डकारनाथ को अपने मित्र और उसके पुत्र को मानसिक कष्ट से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से परदे के पीछे से पहुंचाई सहायता का प्रभाव था। यह तो सर्वथा सत्य था कि अदालत ने फैसला घोटालाप्रसाद के मुवक्किल के पक्ष में सुनाया था। पिछले बीस वर्षों में जो बड़े-बड़े धुरन्दर नहीं कर पाए थे – बाकायदा तय हुए किराए को बिना किसी अन्तराल के देने वाले किराएदार को, वह भी ऐसा जिसका कोई देखनेवाला न हो और जो उस मकान से बाहर कर दिए जाने पर बेघर हो जाए, घोटालाप्रसाद सड़क पर निकाल फिंकवाने में सफल हो गए थे। उस जीत से सारे शहर में तहलका मच गया। उनकी ख्याति दूर-दूर तक जा पहुंची। आवास के विकट मामलों के लिए एक ही वकील है – घोटालाप्रसाद। कैसी भी दयनीय परिस्थियां हों, कितने भी लम्बे काल से किराएदार मकान में रह रहा हो – घोटालाप्रसाद को अपना वकील बनाइए और किराएदार का सामान सड़क पर फिंकवाकर वहां बढ़ी हुई दरों पर नया किराएदार बिठाइए या पूरी इमारत को गिराकर उसके स्थान पर शानदार फ्लैट बनवाइए। आपको कोई रोकने-टोकनेवाला नहीं था।

वकालत से राजनीति की दुनिया में प्रवेश दिलाने में डकारनाथ का परोक्ष रूप से हाथ रहा था। हुआ यह कि पिछले संसदीय चुनाव के समय तत्कालीन पदस्थ सांसद कल्याणसिंह का पलड़ा बड़ा हल्का दिखाई दे रहा था। उनके चुनाव अभियान को चेतना देने के उद्देश्य से एक सभा बुलाई गई थी। लोग अनेक प्रकार की कठिनाइयों का बखान कर रहे थे। वहां उपस्थित एक भी पार्टी-कार्यकर्ता न तो कोई व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत कर रहा था, और न ही कोई आशाजनक समाचार दे पा रहा था। निराशा के अंधकार में डूबी उस सभा के सामने डकारनाथ मानो आशा की एक किरण लेकर उतरे, जब उन्होंने एकाएक खड़े होकर सभा को सम्बोधित किया: “मित्रों, मैंने इस सभा में आने का निश्चय केवल इस कारण किया है कि मुझे इस पार्टी – आत्महित दल के भविष्य में पूरा विश्वास है। इस दल के पास सब कुछ है। अच्छे लोग हैं। अच्छी नीतियां हैं। उन नीतियों को जनता के सामने रखने के लिए आवश्यक धन और अन्य साधन हैं।” एक क्षण के अंतराल के बाद उन्होंने अपना गला खंखारा। अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने कहा। “बस एक कमी है – एक अच्छे अभियान संयोजक की। आप एक अच्छा संयोजक चुन लीजिए, पार्टी को सफलता अवश्य मिलेगी। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं, न केवल इस सीट के लिए बल्कि इस बात के लिए भी कि चुनावों के बाद आपकी पार्टी विरोधी दल से उठकर सरकार बनाने में भी समर्थ हो सके।”

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बहुत से लोग खड़े होकर बोलने लगे। पहले तो किसी की समझ में यह नहीं आया, कि हो क्या रहा है। परन्तु जब डकारनाथ के बार-बार आग्रह करने पर सभा में थोड़ी व्यवस्था आई, तो अनेक लोग एक साथ कहने लगे, “हम आपको अपना अभियान संयोजक नियुक्त करने को तैयार हैं।”

डकारनाथ ने उन्हें रोका। “मित्रों, आप मुझे इस पद के योग्य समझते हैं, यह आपकी सहृदयता है। इसके लिए मैं आप सबका आभारी हूं। लेकिन आप जानते हैं कि मैं एक सरकारी कर्मचारी हूं। — मैं राजनीति में सक्रिय भाग नहीं ले सकता। परन्तु एक काम मैं अवश्य कर सकता हूं। मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति का नाम सुझा सकता हूं, जो आपके चुनाव अभियान को सफल बनाने की क्षमता रखता है।”

सभा एक ही मांग से गूंज उठी। “कृपया सुझाइए।”

अपना नाम अपने क्षेत्र के संसदीय चुनाव में पार्टी के अभियान संयोजक के पद के सुझाव पर घोटालाप्रसाद जितने आश्चर्यचकित हुए थे, उतने ही उस सभा में बैठे अन्य सब लोग भी। डकारनाथ ने उन्हें चुनाव-अभियान का भार उठाने योग्य समझा था, तो वह अवश्य ही उसके योग्य होंगे। इसमें शंका का प्रश्न उठ ही नहीं सकता था। घोटालाप्रसाद को सर्वसम्मति से अभियान-संयोजक का पद सौंप दिया गया। अपने भाग्य को सहारते, सभी के प्रति कृतज्ञता, विशेष रूप से डकारनाथजी के प्रति आजन्म ऋणि रहने की शपथ लेते, वह जुट गए अपने नए पद पर। शीघ्र ही उस संसदीय चुनाव क्षेत्र के लिए आत्महित दल की नई रणनीति उभरकर आई। इसके अनुसार दो-तीन बातों पर विशेष ध्यान दिया गया। प्रथम तो यह कि क्योंकि जाति से कल्याणसिंह ठाकुर थे, इसलिए इस बात पर अधिक से अधिक जोर दिया जाए कि उस चुनाव क्षेत्र के सभी ठाकुरों का कर्तव्य है कि वे अपनी जाति के उम्मीदवार को ही अपना मत दें। दूसरी यह कि जिन क्षेत्रों में अभी तक महाविद्यालय नहीं हैं, वहां पार्टी वचन दे कि वहां पार्टी महाविद्यालय स्थापित कराएगी। जब कुछ लोगों ने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया कि विरोधी दल की किसी पार्टी के लिए वह कर पाना संभव नहीं है, तो घोटालाप्रसाद ने उन्हें याद दिलाया कि उनकी पार्टी हमेशा विरोधी दल का भाग तो नहीं बनी रहेगी। और जब सत्ता हाथ में होगी, तो तब नई परिस्थिति होगी। नई परिस्थिति में हम नई नीति बना लेंगे। तीसरी यह कि चुनावों के दौरान दलितों, निर्धन वर्ग के कुछ चुने हुए लोगों को यथा संभव, सीधी आर्थिक सहायता दी जाए और उसका भरपूर प्रचार किया जाए।

घोटालाप्रसाद इस तथ्य से पूरी तरह परिचित थे कि कुछ वार्ड ऐसे थे, जहां सत्ताधारी दल का प्रभाव अधिक था। उन्होंने तमाम चुनाव अधिकारियों की सूची तैयार की और उनमें से आत्महितकारी दल की नीतियों से सहानुभूति रखनेवालों को छांटा। तब स्थानीय चुनाव आयुक्त के कार्यालय में कार्यरत कुछ मित्रों की सहायता से उन अधिकारियों की नियुक्ति सत्ताधारी पार्टी से सहानुभूतिवाले वार्डों में कराई। इन अधिकारियों के कर्तव्यों में निरक्षरों, नेत्रहिनों आदि मतदाताओं की सहायता करना भी था। अधिकारियों की यह सहायता कल्याणसिंह को विजय दिलाने में बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई।

इसे संयोग कहिए या नियति, कि चुनावों में विजय पाने के कुछ समय बाद ही कल्याणसिंह अचानक दिल का दौरा पड़ने पर चल बसे। घोटालाप्रसाद ने उपचुनावों में आत्महितकारी दल की ओर से खड़े होकर न केवल आक्समिक समस्या का निराकरण कर दिया, बल्कि शीघ्र ही संसद में अपने दल की स्थिति मजबूत कर दी। संसद में अपनी पार्टी का बहुमत बनाने के लिए उन्होंने क्या कुछ नहीं किया! देश के कोने-कोने में गए। अपने दल के सांसदों का मनोबल बढ़ाया। इसके साथ ही दूसरी पार्टियों के असंतुष्ट सांसदों से मेल-जोल भी बढ़ाया और उन्हें अपने दल में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया। इन प्रयत्नों में खुली चैकबुक नीति सर्वोपरि थी। यदि अफवाहों पर विश्वास करें, तो जब भी दूसरी पार्टी में असंतोष की रत्ती भर भी भनक पड़ती, घोटालाप्रसाद चैकबुक लेकर पहुंच जाते थे; परन्तु शायद वह उनके साथ अन्याय हो। अवश्य ही उनकी सफलता के पीछे उनका परिश्रम और निष्ठा महत्वपूर्ण रही होगी। अंततः जब अविश्वास प्रस्ताव को समय आया, तो सब कुछ तैयार था। सत्ताधारी दल के ही लगभग एक चौथाई सांसदों ने अपने ही दल के विरुद्ध मत देकर अपनी ही पार्टी का तख्ता पलट दिया। जनता ने जिन लोगों को सत्ता सोंपी थी, उन्होंने सत्ता घोटालाप्रसाद के हाथ सोंप दी। वह एक अकल्पनीय साजिश थी या नियति, कौन जाने?

एक क्षण के लिए उन्हें लगा कि अविश्वास प्रस्ताव में उनकी विजय मात्र एक स्वप्न थी। परन्तु तभी वरिष्ठ अधिकारियों का दल कर्तव्यपरायणतापूर्वक उनके सामने आ खड़ा हुआ। उनकी मेज पर ताजा समस्याओं की एक मिसल रखी थी, जिससे स्पष्ट था कि वह कोई स्वप्न नहीं, एक वास्तविकता थी। देश भी उस वास्तविकता को जितनी जल्द समझ ले, उतना ही उसके हित में होगा। देश के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा जा रहा था।