मुद्दाः भारतीय समाचार जगत और आतंकवाद-राघवेन्द्र सिंह


लगभग दो दशक पहले आतंकी गतिविधियों का केन्द्र कश्मीर तक ही सीमित था। लेकिन धीर-धीरे उसने सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपनी गिरफ्त में ले लिया। देश के होटल, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, विद्यालय तथा धार्मिक परिसर सहित सभी क्षेत्र उसकी परिधि में आ गये हैं। वर्तमान में हमारा देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व इसकी हिंसक गतिविधियों की चपेट में आ गया है। वह घटना ही नहीं अपितु एक सिद्धान्त के रूप में स्थापित हो चुका है। आतंकी इसे अपनी प्रयोगशाला बनाना चाहते हे।

आतंक के सूत्रधार यह भलीभाँति जानते है कि भारत की वोट बैंक की राजनीति के चलते धर्मनिपेक्षता तथा मानवधिकार के सन्दर्भ में जितना भ्रम उत्पन्न होगा उतना ही उन्हें लाभ मिलेगा। कश्मीर के बढ़ते झगड़े इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। आतंकी बिना देश में आंतरिक समर्थन के कुछ भी नहीं कर सकते हैं। वे समय-समय पर अपनी गतिविधियों तथा कार्यवाहियों को मीडिया के द्वारा उछालने का प्रयत्न भी करते हैं। उनका उद्देश्य अपने समानधर्मियों को उकसाकर तथा बहकाकर अपनी तरफ आकर्षित करना होता है। आतंकी क्या यह सब अपने आर्थिक लाभ के लिये करते है? या किसी खास उद्देश्य के लिये? क्या उद्देश्य की प्राप्ति के बाद उनकी हिंसक कार्यवाहियां बन्द हो जायेगी? विचारणीय प्रश्न है। जब तक इस विषय की खुली विवेचना नहीं की जाती, तब तक इसका हल खोजने में कठिनाई होगी। आतंकवाद के सिद्धान्त, उसके स्रोत, उनकी आर्थिक एवं बौद्धिक ऊर्जा तथा उनकी अपील जैसे पहलुओं पर मीडिया सही विवेचना करने से बचती रहेगी तो विषय की सही जानकारी समाज को प्राप्त होने में कठिनाई होगी। पिछले बीस वर्षों में देश के विभिन्न आंचलो में सैकड़ों आतंकी हिंसक घटनायें हुई हैं। समाचार पत्रों सहित अन्य माध्यमों ने क्या दृष्टिकोण अपनाया शोध का विषय है। वर्तमान में इलेक्ट्रानिक मीडिया जिसके सिर्फ भारत में लगभग 125 माध्यम है। गलाकाट प्रतिस्पर्धा तथा टी0आर0पी0 बढ़ाने के उद्देश्य से वे अपने मूल कत्र्तव्यों से विमुख हो जाते है। आतंकी घटनाओं, उनके साक्षात्कार, आतंकियों के भेजे संदेशों का प्रसारण सनसनीखेज तरीकों से कर वे अन्जाने में जिहादी आतंकियों के अस्त्र के रूप में इस्तेमाल हो जाते है। जिसके माध्यम से उनका स्वधर्मी तथा काल्पनिक समाज में स्थापित होने का प्रयास होता हैं वर्तमान मे मीडिया के चहुमुखी विकास का लाभ वे बड़ी चतुराई से अपने मिशन में लोगों को आकर्षित करने के लिये करते हैं।

यह बात सत्य है अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी भाषी समाचार पत्र जन भावनाओं तथा वास्तविकता से अधिक नजदीक रहते हैं। भारतीय अंग्रेजी समाचार पत्र लगभग हर विषय पर अपनी वैश्विक सोच रखते हैं, आतंकवाद भी जिससे अछूता नहीं है। इसलिए उस पर अति विवेकशील दृष्टिकोण अपनाने का आरोप लगता रहता है। अतः हिन्दी तथा अंग्रेजी माध्यमों में प्रतिस्पर्धात्मक विवाद बना रहता है। भले ही आतंकवाद जैसे विषय पर अंग्रेजी भाषा माध्यम वैश्विक सोच रखता हो परन्तु देश के अन्दर हुई आतंकी वारदातों पर हिन्दी तथा अंग्रेजी समाचार पत्र दोनों की काफी हद तक एक राय रही है। दोनों ने ही आतंकवाद पर अंतरर्राष्ट्रीय सहयोग को आवश्यक माना, दोनों ने ही उक्त विषय पर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के आरोपों को गलत बताया, दोनों ने पोटा जैसे कानून को सिरे से खारिज नहीं किया, दोनों ने ही मुम्बई के आंतकी हमले को आंतरिक राजनीति से जोड़ने के प्रयास को कोई स्थान नहीं दिया तथा दोनों ने ही आतंकी संगठनों की गतिविधियों को उजागर करने का काम किया। हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों प्रकार के समाचार माध्यमों ने आतंकवाद का सही चित्र समाज के सामने रखा। दोनों भाषायी माध्यमों के बीच देश की आतंकवादी घटनाओं पर लगभग समानता दिखी।

चर्चा में प्रायः समाज हिन्दी तथा अंग्रेजी समाचार माध्यम पर अपना ध्यान केन्द्रित रखता है। अन्जाने में उससे उर्दू समाचार पत्र छूट जाते है। यह बात सत्य है उसका पाठक वर्ग काफी कम है, परन्तु है जरूर। उर्दू समाचार पत्र समाज में एक खास वर्ग में पढ़ा जाता है। शायद ही कोई अन्य वर्ग का व्यक्ति उस पर ध्यान भी देता हो। इसलिए उक्त भाषायी समाचार पत्र स्वेच्छाचारी बन गये है। जिससे सम्पूर्ण समाचार जगत की निष्पक्षता सन्देह के घेरे में आ जाना स्वाभाविक है। समाचार के माध्यम तथा उसकी विश्वसनियता लोकतंत्र का मेरूदण्ड होती है। उसकी संदिग्धता राष्ट्र के उक्त स्वरूप को विकृति कर देती है। अतः उक्त माध्यम ईमानदर तथा निष्पक्ष होना ही चाहिए। आतंकवाद के साथ-साथ मीडिया का मुख्य कार्य उसके मूल में जाकर उनके सिद्धान्तों को उजागर करना, राज्य तथा उसकी विभिन्न एजेंसियों की भूमिका एवं पुलिस की जांच प्रक्रिया को समाचारों के माध्यम से समाज में पहुँचाना हैं जिससे उनकी भूमिका जिम्मेदारीपूर्ण के साथ-साथ संवेदनशील भी हो जाती है। मीडिया की एक छोटी से चूक उसकी विश्वसनीयता को राख में मिला सकती है। हमारे एक मुस्लिम मित्र के अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय का नेतृत्व मदरसों में शिक्षित उन मजहवी मौलवियों के हाथों में रह गया है। जिसकी मानसिकता इन उर्दू समाचार पत्रों के माध्यम से तैयार होती हैं उर्दू समाचार पत्र सिर्फ आतंकी घटना ही नहीं मुस्लिम समाज के किसी व्यक्ति पर आरोप भी लगता हैं तो उसका रूख हमेशा एक पक्षीय सा होता है। उस घटना के आधार पर वे ऐसा माहौल बानाने का प्रयास करते हे, मानो देश में उनके समाज के लोगों का उत्पीड़न ही हो रहा हो। यदि हम हाल की कुछ आतंकी घटनाओं का विश्लेषण करें, चाहे वह मुम्बई का आतंकी हमला हो या अब्दुल रहमान अन्तुले के बयान का प्रकरण, बटाला हाउस मुठभेड़ की घटना हो या अन्य कोई। उनका झुकाव एक पक्षीय सा ही रहता है। उर्दू समाचार पत्रों ने कभी तो मुम्बई के आतंकी हमले का रूख दूसरी तरफ मोड़ने का प्रयास किया, तो कभी बटाला हाउस मुठभेड़ तथा उसमें शहीद मोहन चन्द्र शर्मा की शाहदत पर प्रश्न चिन्ह लगाये, कभी अब्दुल रहमान अन्तुले के बयान पर अपनी सहमति दर्ज कर अपने पाठक वर्ग को भ्रमित करने का प्रयास किया।

उर्दू समाचारों पत्रों का आपना एक पाठक वर्ग है, जो राष्ट्रभक्त भी है। देश में उर्दू सहित अनेक समाचार श्रोतों के माध्यम से उन्हे विभिन्न तरीकों से जानकारी उपलब्ध होती हे। उन्हें अपनी ज्ञान की कसौटी पर कस वास्तविकता की जानकारी प्राप्त हो जाती है। इसलिए उर्दू समाचार पत्रों द्वारा प्राप्त हुई जानकारी का उनके जेहन पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। इसी कारण वे समचार पत्र अपनी विश्वसनियता खोते चले जा रह है। तथा हासिये पर हैं।

अभी कुछ वर्ष पूर्व बटाला हाउस मुठभेड़ की जाँच के लिये आजमगढ़ से करीब दो हजार मुसलमानों की उलेमा परिषद द्वारा दिल्ली में एक रैली आयोजित की गई, जिसमें उक्त मुठभेड़ को शक के दायरे में ला शहीद एम0सी0 शर्मा को मरणोपरान्त दिये गये अशोक चक्र को वापस लेने की मांग रखी गई। हालाँकि उक्त दो हजार मुसलमानों के अलावा एक भी स्थानीय मुसलमान ने उसमें भाग नहीं लिया। उक्त घटना मुसलमानों की जागरूकता एवं स्पष्ट सोच को दर्शाता है। परन्तु उर्दू समाचार पत्रों ने विभिन्न तरीकों से उक्त मुठभेड़ को विवादित करने का पूरा प्रयास किया। 26/11 की घटना का अधिकांश उर्दू समाचार पत्रों ने इस्लाम को बदनाम करने की साजिश तथा अमेरिकी खुफिया एजेन्सी सी0आई0ए0 तथा इजराइल खुफिया एजेंसी मौसाद का षड़यन्त्र बताया जिसे भी अधिकांश इस्लामी समाज ने हवा में उड़ा दिया। मुम्बई तथा मालेगाँव घटना में भी अधिकांश उर्दू समाचार पत्रों मे जबरन सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया। जिसे भी उनके पाठक वर्ग ने गम्भीरता से नहीं लिया। कुछ उर्दू समाचार पत्रों ने तो अजमल आमिर कसाब की स्वीकारोक्ति पर भी अविश्वास कर डाला। अधिकांश उर्दू समाचार पत्र प्रायः आतंकवाद को रोकने के लिये कठोर कानून का विरोध करते हैं उनकी दलील होती है, इसका दुरूपयोग अल्पसंख्यकों के विरूद्ध होगा।

कोई समाचार माध्यम चाहे किसी भी भाषा को हो धटनाओं तथा उसकी सही वस्तुस्थिति को समाज में पहुँचाना उसका प्रथम कत्र्तव्य होता है। समय-समय पर चर्चा होती है। किस प्रकार मीडिया को आतंकियों के हाथों से इस्तेमाल होने से बचाया जाये क्या इसे सेंसरशिप के दायरे में लाया जाये या नहीं चिन्तन तथा शोध का विषय है। समाचार पत्रों के अलग-अलग विचार होना स्वाभाविक है। किसी एक भाषायी समाचार पत्रों के द्वारा खास विचारधारा या मजहब का प्रतिनिधित्व करना लोकतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता दोनों के लिये नुकसानदायक है। आज देश को महती आवश्यकता हैं आतंकवाद जैसे घृणित एवं राष्ट्रविरोधी विषय पर ईमानदारी से अध्ययन तथा सम्बन्धित विषय एवं घटनाओं के सत्य को समाज में पहुँचाने की तथा जागरूक करने की जिससे राष्ट्र की राष्ट्रीयता एवं साम्प्रदायिक सद्भाव कायम रह सके।

समाचार जगत चाहे अपनी वैचारिक शक्ति से राष्ट्र को एक अभेद दुर्ग बना दे या समाज में विघटन का ऐसा वातावरण तैयार करें जिसमें साँस लेना भी कठिन हो जाये।

राघवेन्द्र यादव
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