चांद परियाँ और तितलीः प्रभुदयाल श्रीवास्तव

चलो बनायें रेल
सारे मित्रो और सखाओ ,
चलो बनायें रेल |
रेल बनाकर साथ चले तो ,
बढ़ जाएगा मेल |
मुन्ना बन जाएगा इंजन ,
रिया गार्ड का डिब्बा |
डिब्बा बनकर जुड़ जाएंगे,
रमजानी के अब्बा |
आगे बढ़कर सिखलायेंगे,
हमें रेल का खेल|
शयन यान बनकर जुड़ जाएँ ,
नीना ,मीना, झब्बू| ,|
ए .सी ,वन, टू, थ्री बन जाएँ ,
शीला,नीता, तब्बू |
स्टेशन -स्टेशन होगी ,
भारी रेलम पेल |
चेक करेंगे टिकिट रेल में,
मोटे छन्नू भाई |
बिना टिकिट वालों की भैया ,
समझो शामत आई |
पुलिस रेल की उन्हें पकड़कर ,
भिजवा देगी जेल |

बिल्लीजी नाराज हैं

एक कटोरा
भरा दूध का ,
बिल्ली अभी
छोड़कर आई |
बोली उसको
नहीं पियूंगी,
उसमें बिलकुल
नहीं मलाई |

कल का दूध
बहुत फीका था ,
शक्कर बिलकुल
नहीं पड़ी थी |
घर की मुखिया
दादी मां से,
इस कारण वह
खूब लड़ी थी |

दूध ,मलाई
वाला होगा ,
खूब पड़ी होगी
जब शक्कर|
और मनाएंगी
जब दादी,
दूध पियूंगी तब
उनके घर |

क्यों न रस्ता मुझे सुझातीं

सुबह -सुबह से चें -चें चूँ -चूँ,
खपरेलों पर शोर मचाती।
मुर्गों की तो याद नहीं है,
गौरैया ही मुझे जगाती।

चहंग -चंहंग छप्पर पर करती,
शोर मचाती थी आँगन में।
उसकी चपल चंचला चितवन,
अब तक बसी हुई जेहन में।
उठजा लल्ला ,उठजा पुतरा,
कह कह कर वह मुझे जगाती|

आँगन के दरवाजे से ही,
भीतर आती कूद -कूद कर।
ढूंढ -ढूंढ कर चुनके दाने,
मुंह में भरती झपट -झपट कर।
कभी मटकती कभी लपकती,
कत्थक जैसा नाच दिखाती।

आँखों में तुम बसी अभी तक,
पता नहीं कब वापस आओ।
मोबाइल पर बात करो या,
लेंड लाइन पर फोन लगाओ।
किसी कबूतर के हाथों से,
चिट्ठी भी तो नहीं भिजातीं ।

तुम्हीं बताओ अब गौरैया,
कैसे तुम वापस आओगी।
छत ,मुंडेर ,खपरैलों पर तुम,
फिर मीठे गाने गाओगी।
चुपके से कानों में आकर,
क्यों न रस्ता मुझे सुझातीं |

हँसी- हँसी बस ,मस्ती -मस्ती

मुन्ना हँसता, मुन्नी हँसती,
रोज लगाते खूब ठहाके।
लगता खुशियों के सरवर में,
अभी आये हैं नहा नहाके।

उनको हंसते देख पिताजी,
माताजी मुस्काने लगते।
दादा दादी भी मस्ती के
जल में नाव चलाने लगते।
गुंड कंसहड़ी थाल जताते।
खुशियाँ ढम- ढम -ढोल बजाके।

पीछे रहती क्यों दीवारें,
छप्पर छत कैसे चुप रहते।
होती घर में उछल कूद तो,
मन ही मन में वे भी हँसते।
दरवाजे भी धूम मचाते।
अपने परदे हिला- हिला के।


प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12 शिवम् सुंदरम नगर छिंदवाड़ा म प्र