
सफेद झूठ
रवीना बिस्तर पर निढाल पड़ी थी, तबियत कुछ खराब सी लग रही थी। चार कमरे के घर मे अकेली रहती थी, मेड और कुक काम करके चले जाते थे। छोटा सा कस्बा था, सिर्फ एक उसके भाई थोड़ी दूर पर रहते थे।
दो बेटे दिल्ली और पुणे में परिवार सहित रहते थे। रवीना के भाई ने सब बच्चो को फ़ोन कर के बुलाया, आ जाओ, तुमलोगो से मिलना चाहती है, तबियत ज्यादा खराब है, ऐसा न हो तुम्हारे पहले यमराज को मौका मिल जाये।
दो दिनों के अंदर परिवार सहित बेटे आ गए।
बड़ा बेटा भी कहने लगा, “अब अकेले नही छोड़ेंगे, चलो हमारे साथ, आपकी बहुत चिंता होती है।”
छोटे के भी कुछ ऐसे ही विचार थे।
धीरे धीरे रवीना ने कहा, “नही मैं कहीं नही जाऊंगी, इसी घर मे दुल्हन बनकर आयी, अब भी यहां इनके होने का आभास होता है।”
सबलोग दुखी थे, माँ ठीक नही है, पता नही क्या होगा।
किसी तरह रात बीती। सुबह सबलोग आराम से उठे।
बहू ने जाकर देखा, “टेबल में नाश्ते में पांच छह बढ़िया डिशेज तैयार है। मामा भी आये है। कुक तो नहीं आयी, देर से आती है। टेबल सजा है, माँ प्लेट लगा रही है, एकदम फिट स्मार्ट नजर आ रही हैं, दही बड़े, उरद दाल कचौड़ी, बेसन के लड्डू, हलवा, छोले सब कैसरोल से झांक रहे है।”
जल्दी से सबको आवाज़ दी। बेटे ने आश्चर्य से पूछा, “ये सब किसने बनाया।”
मामा ने जवाब दिया, “बेटा, कभी कभी सब काम छोड़कर आ जाया करो, तुमलोग आते नही तो दीदी ने मुझसे कहा इसी तरह बुलाया जाए।”
माँ ने आंखों से आंसू पोछते हुए कहा, उम्र तो सच मे हो ही रही है, मेरे जाने की खबर सुनकर आओगे, तब मैं देख नही पाऊंगी, इसलिए झूठ बोलकर अपनी इच्छा पूरी कर ली।

सत्य की छाया
विश्वविद्यालय में बहस चल रही थी
“क्या कभी झूठ भी धर्म बन सकता है?”
सभी छात्र अपने-अपने तर्क दे रहे थे।
कोई कह रहा था “झूठ झूठ है, चाहे किसी भी मकसद से बोला जाए।”
तो कोई कह रहा था “अगर किसी की जान बचानी हो, तो झूठ बोलना अपराध नहीं है।”
कक्षा में चुप बैठे प्रोफेसर अरोड़ा अचानक बोल उठे
“महाभारत का ‘नरो वा कुंजरो वा’ प्रसंग जानते हो ?”
छात्र चौंककर उनकी ओर देखने लगे।
प्रोफेसर अरोड़ा ने धीमे स्वर में कहा
“युधिष्ठिर ने अश्वत्थामा के मरने की बात कही थी लेकिन पूरा सच नहीं बोला क्योंकि आचार्य द्रोण अपराजय थे। यदि वे जीवित रहते तो अधर्म की विजय होती। धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने ‘आधा सच’ बोला… जो झूठ भी था और सत्य भी।”
कक्षा में सन्नाटा छा गया।
प्रोफेसर अरोड़ा ने आगे कहा
“बच्चों! यही है सफ़ेद झूठ। यह परिस्थिति पर निर्भर करता है कभी यह सहारा बनकर जीवन बचाता है, तो कभी छल बनकर किसी को भ्रमित करता है यानी झूठ हमेशा काला नहीं होता, कभी-कभी वह धर्म का रंग भी ओढ़ लेता है।”
तभी एक छात्रा ने पूछा
“सर, तो क्या हम भी अपने जीवन में नरो वा कुंजरो वा जैसा कोई आधा सच बोल सकते हैं?”
प्रोफेसर अरोड़ा ने गहरी साँस लेकर कहा
“बोल सकते हो… लेकिन याद रखना, हर झूठ का बोझ उठाने की शक्ति हर किसी के पास नहीं होती।”
अंजू खरबंदा
207 द्वितीय तल
भाई परमानन्द कॉलोनी
दिल्ली 110009
फोन : 9582404164

आजकल के बच्चे
अदिति को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। मम्मीजी यानी उसकी सास ये क्या कह रही हैं ?
आज सुबह अदिति ने देखा उसके एक महीने का बेटा आरव जोर-जोर से सांस ले रहा है । दूध पिलाना चाहा तो उसने उल्टियां शुरू कर दीं । उल्टी में बलगम देखकर अदिति घबरा गई । उसने आरव को अपनी सास को दिखाया –
“मम्मी जी देखिए न , आरव की तबियत खराब हो रही है इसकी सांस कैसे चल रही है ।”
“बहु इसको तो ठंड लग गई है ।
जल्दी से डॉक्टर के यहां लेकर जाओ। डॉक्टर मल्होत्रा अच्छे बाल रोग विशेषज्ञ है। उन्हीं का अपॉन्टमेंट ले लो।”
“मम्मीजी, ये अभी सिर्फ एक महीने की नन्हीं सी जान है । मेरे ख्याल में इसे एलोपैथिक दवाएं देना ठीक नहीं है। मैं तो इसे होमियोपैथी डॉक्टर को दिखाना चाहती हूं। पास ही एक बहुत बढ़िया होमियोपैथी डॉक्टर हैं, बहुत नाम है उनका । वर्माजी के पोते को निमोनिया हुआ था उसका इलाज भी उन्होंने किया था ।”
” नहीं नहीं, आरव को डॉक्टर मल्होत्रा को ही दिखाना है।”
“मम्मी जी मेरी बात तो सुनिए , हमारे साथ वाले गुप्ता जी भी अपने बच्चों को इन्हीं होम्योपैथिक डॉक्टर को दिखाते हैं । बहुत अच्छा इलाज है उनका । मैं नहीं चाहती कि मेरे बच्चे को अभी से ऐलोपेथिक दवाइयों की आदत पड़ जाए ।”
“यानी तुम ये कहना चाहती हो कि बच्चा बस तुम्हारा ही है, हमारा कुछ नहीं लगता? हमें इसकी चिंता नहीं है?”
“मम्मी मै तो बस…”
“बस बहुत हो गई तुम्हारी बहस , तुम नहीं मानती तो मनीष दिखा लायेगा। लेकिन इलाज सिर्फ डॉक्टर मल्होत्रा का ही होगा।”
मनीष ने भी अपनी मां कों समझाने की बहुत कोशिश की मगर वे अपनी बात पर अड़ी रहीं।
हारकर मनीष और अदिति आरव को डॉक्टर मल्होत्रा के पास ले गये । जब वे वापस घर आए तो देखा मनीष के मामा नवजात बच्चे को देखने आए हुए हैं।
जब अदिति आरव को दवा देने लगी तो मामाजी बोल पड़े । “बेटा इतने छोटे बच्चे को ये स्ट्रांग दवाइयां दे रही हो, इससे बेहतर था कि इसे किसी अच्छे होम्योपैथिक डॉक्टर को दिखा लेते ।”
इससे पहले अदिति कोई जवाब देती, उसकी सास बोल पड़ी, “क्या करे भैया, मैने तो बहुत कहा कि इतने छोटे बच्चे को होम्योपैथिक डॉक्टर को दिखाओ । मगर आजकल के बच्चे किसी की सुनते ही कहां हैं।”
अदिति और मनीष अवाक से उनका मुंह ताक रहे थे ।
शोभना श्याम
गाजियाबाद
Founder and General Secretory
Udeesha- social, cultural and literary Organization

डिप्लोमेसी
“हेल्लो.”
“हेल्लो, प्रिंसिपल मेम मैं …”
“जी-जी सर. आप हैं. यह नंबर मेरे पास सेव नहीं था.”, आवाज़ पहचानते ही स्वर बदल गया.
“हाँ! यह नंबर मेरी वाइफ का है. एक्चुअली, मेरी वाइफ… और मैं भी, चाहते हैं कि इस बार भी हमारा बच्चा क्लास टॉप कर ले.”
“जी! लेकिन यह पॉसिबल नहीं सर.” स्वर फिर बदला.
“क्यों? आपको पता है कि ट्रस्टी की बात नहीं मानने का अंजाम…”
बात काटते हुए, “सर, यह स्कूल है, जिसे मैं बहुत मेहनत कर आगे बढ़ा रही हूँ. यहाँ के बच्चों को आगे चल कर ज़िम्मेदार नागरिक बनना है. ट्रस्ट ने मुझ पर ट्रस्ट किया है, तो मुझे मेरा काम फ्री-हैंड करने दीजिए.” स्वर और भी बदला.
“मतलब?”
“मतलब सर, मैं आपको व्हाट्सएप्प कर रही हूँ.”
व्हाट्सएप्प मेसेज टाइप करते हुए प्रिंसिपल सामने बैठे हुए व्यक्तियों से बोली, “प्रिंसिपल के भी कुछ प्रिंसिपल्स होने चाहिए. मुझे स्कूल में अच्छी पढ़ाई और अच्छे बच्चे चाहियें और इसमें मैं कोई कोम्प्रोमाईज़ नहीं करती. मेरे स्कूल में किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता. ट्रस्टी सर को मैं मेरा रेज़िग्नेशन भेज रही हूँ.”
मेसेज का उत्तर तुरन्त आ गया.
प्रिंसिपल मुस्कुरा कर पेरेंट्स से बोली, “रेज़िग्नेशन एक्सेप्ट नहीं किया. और, आ गए रास्ते पर.”
हालाँकि, मेसेज में लिखा था, ‘सर! आपका बेटा इस बार क्लास ही नहीं बल्कि स्कूल टॉप करेगा. यह नंबर सेव नहीं था, इसलिए गलती से स्पीकर पर ले लिया और सामने सेकेंडरी में इस बार के सिटी-टॉपर के पेरेंट्स बैठे थे, अपने यहाँ एडमिशन के लिए.’
और, मेसेज का उत्तर था, ‘गुड. थैंक यू. यह एडमिशन तो पक्का हो गया और आपका एक्स्ट्रा इन्क्रीमेंट भी.’
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डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी
शिक्षा: विद्या वाचस्पति (Ph.D.)
सम्प्रति: सह आचार्य (कम्प्यूटर विज्ञान)
साहित्यिक लेखन विधा: कविता, लघुकथा, बाल कथा, कहानी
16 पुस्तकें प्रकाशित, 10 संपादित पुस्तकें
37+ शोध पत्र प्रकाशित
50+ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त
फ़ोन: 9928544749
ईमेल: chandresh.chhatlani@gmail.com
डाक का पता: 3 प 46, प्रभात नगर, सेक्टर-5, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान) – 313 002
यू आर एल: https://sites.google.com/view/chandresh-c/about
ब्लॉग: http://laghukathaduniya.blogspot.in/

धरम का भरम
‘तुमने हमारी किताब पढ़ी?’
‘नहीं।’
‘गोली खाओ, हरामी कहीं के।’
सिर्फ शब्द नहीं, धाँय-धाँय भयभीत आँखों के आगे तुरंत ही बहशी की गोली चली और बिना मुड़े ही वह आगे बढ़ गया।
‘तुमने हमारी किताब पढ़ी?’
‘नहीं।’
‘च्…च्…च् आओ हमारे साथ आओ, हम तुम्हें जीना सिखाएँगे, सेवा करना सिखाएंगे।’
और धूर्त सभी को गड़ेरिए की तरह हाँक ले गया।
‘तुमने हमारी किताब पढ़ी?’
‘नहीं।’
‘फुरसत मिले तो पढ़ना, इसमें जिन्दगी का दर्शन है, संस्कृति का निचोड़ है। जब तुम जंगल में घूम रहे थे, हम लिख-पढ़ रहे थे। सबसे सुसंस्कृत और प्राचीन है हमारी किताबें।’
ख़ुद में डूबा घमंडी बिना उसकी तरफ़ देखे समाधि लगा गया।
पर धरम जो अभीतक ख़ुश था अपने भ्रम में अब डर से थर-थर काँप रहा था।
‘क्या ज़रूरत भी है अब इन्हें मेरी या भगवान की?’…
अभी तक तो उसने यही जाना था कि उसका जन्म इनसानों के उत्थान के लिए हुआ था, सबसे बड़ा हितैषी है वह इनका। पर ये इनसान तो उसकी आड़ में इनसानियत ही भूलते जा रहे हैं!
शैल अग्रवाल
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
shailagrawala@gmail.com