धनुषकोडी

आस्था, विश्वास एवं आध्यात्म की त्रिवेणी।
सुबह सुबह जागकर आस पास के वातावरण को, प्राकृतिक दृश्यों को देखने का आनंद ही कुछ और होता है,, होटल की खिड़कियों से झांकते सूर्य को देखना, उसके ठीक पीछे नारियल पेड़ों की लंबी श्रृंखला, हल्की लालिमा लिए नभ का स्वागत, चहकती चिड़ियों का शोर आज की भोर तो कुछ ज्यादा ही सुहावनी थी,,,आज बचपन का सपना जो साकार होने जा रहा था,वो बात जो मैंने दस वर्ष की उम्र में अपनी भूगोल अध्यापिका के पढ़ाने पर मन में संजो ली थी कि एक दिन मैं उस जगह जरूर जाऊंगी,,,वह जगह है –*धनुषकोडी*भारत भूमि का अंतिम भाग, तीन ओर से सागर से घिरा हुआ हिंद महासागर,अरब महासागर और बंगाल की खाड़ी।
जिस दृश्य बिंब को याद कर हमेशा ये पंक्तियां याद आती थी-
सागर चरण पखारे, गंगा,शीश चढ़ावे नीर,
मेरे भारत की माटी है चंदन और अबीर।
आज हम लोग धनुषकोडी और रामेरपदम, पंचमुखी हनुमान मंदिर, लक्ष्मण मंदिर,कलाम हाऊस,कलाम मेमोरियल, और अन्य दर्शनीय स्थलों को देखने जाने वाले थे।
उत्सुकता, उत्कंठा से भरी सुबह थी और दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर हम तैयार हो गये थे। चाय पीकर भाईसाहब ने घुमाने के लिए होटल के ड्राइवर से बात की,उसने साढ़े नौ बजे आने की बात कही,, नाश्ते की टेबल पर हमने निश्चय किया कि हम गंभीर नाश्ता कर लेंगे और दिन भर घूमेंगे,शाम को सीधे होटल में डिनर, सबने सहमति जताई। हंसी भी आ रही थी कि चार पांच दिनों से हम सब केवल खाने पीने, घूमने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं कर रहे थे। जीवन की व्यस्तता में कभी इतनी फुर्सत नहीं मिली थी कि कभी अपने लिए भी समय निकालकर देखें,, बच्चों ने हमें यह सुअवसर प्रदान किया था,, हृदय से अशेष आशीर्वाद।
आज सिर्फ दोसा, इडली और सेवईं तथा कुछ कुछ फल लिये थे, तब तक मैनेजर ने गाड़ी आने की सूचना दी। प्रफुल्लित मन से हमारी चिर प्रतीक्षित यात्रा प्रारम्भ हुई,,छोटे छोटे रास्तों, बाजारों से गुजरते हुए, लगभग आधे घंटे बाद, हमारे ड्राइवर दास ने हमें सबसे पहले रामेरपदम् मंदिर के दर्शन कराए , जिसके पीछे मान्यता थी कि यहीं से भगवान राम लंका तक पहुंच पाने के मार्ग का अवलोकन करते थे और युद्ध की आगामी योजनाएं बनाते थे,पूरी सेना के साथ, यहां से चारों ओर विस्तृत फैले भूखंड से सागर थोड़ी ही दूरी पर था, हमने वहां बने एक छोटे से मंदिर में श्री राम के चरण चिह्नो को प्रणाम किया,, और चारों ओर फैली हरित भूमि को देखते हुए कुछ तस्वीरें भी लीं, वातावरण में फैली गर्मी और उमस के बावजूद वहां बहती हुई ठंडी हवाएं हमें शीतलता का अहसास करा रही थीं, हम बहुत देर तक बैठे रहे। वापस लौटते हुए सीढ़ियों के पास एक दुकान से हमने नारियल पानी पिया और आगे की यात्रा पर निकल पड़े।
अगला पड़ाव था धनुषकोडी।
एक संकरे रास्ते पर गुजरते हुए दोनों ओर लहराते सागर की अठखेलियों को देख देख रोमांच हो रहा था,, और जैसे जैसे हमारी गाड़ी आगे बढ़ रही थी यह अहसास प्रबल हो रहा था कि हम भारत के अंतिम छोर पर आ पहुंचे हैं।
मैंने लहरों को उछलते गिरते, श्वेत फेनिल जल राशि में बदलते हुए देखा,,न जाने सागर से कितने जन्मों का रिश्ता था,,मेरी भावनाएं मुझे सृजन के लिए प्रेरित कर रही थी,, एक कविता जन्म ले रही थी,, शायद इन भावनाओं को रात में लिपिबद्ध कर सकूं,, कुछ छोटे छोटे वीडियो बनाएं,ढेर सारी तस्वीरें लीं। आज मैं वही दस वर्षीया बालिका थी, उत्साहित, उत्सुक, जिज्ञासु। लौटने की इच्छा न होने पर भी लौटना था क्योंकि शाम छः बजे से यहां सब कुछ बंद हो जाता है, सरकारी नियम था,,
लौटते हुए हमने धनुषकोडी के पुराने रेलवे स्टेशन को भी देखा था,जो अब नष्ट भ्रष्ट हो गया था,1964 में आई भयंकर सुनामी ने यहां पटरियों पर खड़ी यात्रियों से भरी ट्रेन को निगल लिया था,।यह स्टेशन अब वीरान था, चारों ओर फैले खंडहरों में विनाश की निशानियां देखी जा सकती थीं,अथेरा होने पर यहां कोई रूक नहीं सकता, भयभीत करने वाली रहस्यमय आवाज़ें आती है, ऐसा सहयात्रियों और हमारे ड्राइवर ने बताया था, इसलिए इसे*भूतों की नगरी घोषित कर दिया गया है।
हमारी चिर प्रतीक्षित यात्रा जीवन की अविस्मरणीय यात्रा बन गई।
[2]
नेपाल का हृदय है.पोखरा

आज पूर्णिया से हमें अपनी चिर प्रतीक्षित नेपाल यात्रा पर निकलना था, भारतीय सीमा को पार कर नेपाल की ओर,सड़क मार्ग से कार द्वारा हम लोगों ने जोगबनी के लिए प्रस्थान किया, जोगबनी भारत नेपाल सीमा में भारतीय सीमा है और उस पार विराटनगर है,, हम एक टैक्सी द्वारा एयरपोर्ट पहुंचे, विराटनगर नेपाल का सुंदर महानगर है, और सुविधा संपन्न भी,, प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह शहर बेहद अपना सा लगा,, भारतीय सीमा से अत्यधिक नजदीक होने के कारण यहां अधिकांश भारतीयों का आना जाना लगा रहता है,,छोटा सा एयरपोर्ट बहुत सुंदर हरियाली से घिरा हुआ,, अधिकांश चेहरे भारतीय थे, भोजपुरी, हिंदी, मैथिली नेपाली बोलते हुए लोग,, कहीं भी परायेपन का अहसास नहीं हुआ, एयरपोर्ट के बाहर आकर हमने तस्वीरें लीं, और जांच प्रक्रिया में पंक्ति बद्ध हो गये
प्रारंभिक जांच के बाद बुद्ध एयरलाइंस से काठमांडू पहुंचे,अगली फ्लाइट पोखरा के लिए थी,जो कनेक्टेड थी,हमलोग वहीं से दूसरी फ्लाइट लेकर बुद्ध एयरलाइंस से पुनः पोखरा के लिए उड़ चले,,
प्रारंभिक जांच के बाद बुद्ध एयरलाइंस से काठमांडू पहुंचे,अगली फ्लाइट पोखरा के लिए थी,जो कनेक्टेड थी,हमलोग वहीं से दूसरी फ्लाइट लेकर बुद्ध एयरलाइंस से पुनः पोखरा के लिए उड़ चले,,
पोखरा –पोखरा को नेपाल का हृदय कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी,, ऊंची ऊंची पहाड़ियों से घिरा एक खूबसूरत शहर, प्लेन की खिड़कियों से उसका सौन्दर्य देख कर आंखे तृप्त हो रही थी,,भारत से दूर,, नेपाल की सीमा में , ऊंचे पहाड़ों के बीच,,हमारी पहली हवाई यात्रा थी,,सब कुछ शांत एवं मोहक था,,पर अचानक हमारे प्लेन में तीन चार बार हलचल हुई,, जहाज ऊपर नीचे हुआ,,,,यात्री चिल्लाने लगे,हम भी बेहद डर गये थे,,ऐसी घटना का पहला अनुभव था ,,बेटे ने बताया,कि ऐसा हवा के दबाव के कारण होता है कभी कभी,, उसके पास यूरोपीय हवाई यात्रा का अनुभव था, कुछ अच्छा लगा सुनकर,, करीब दस मिनट बाद हम सकुशल पोखरा की धरती पर उतरे,, वहां पर हमें होटल की गाड़ी लेने के लिए आई थी, जिससे हम लोग ऊंचे पहाड़ों की ओर बने रास्ते पर घूमते हुए होटल**हिमालयन फ्रंट**पहुंचे,, गंतव्य पर पहुंच कर बहुत अच्छा लगा, आरामदेह सोफे पर बैठ कर हम विश्राम करने लगे और बेटा शशांक होटल की औपचारिकताएं पूरी कर रहा था,, हमें ठंडा शरबत मिला, नेपाल की मेहमाननवाजी का पहला अनुभव था, बहुत अच्छा लगा,, गर्मी थी, और कहीं कहीं बादल भी उमड़ घुमड़ रहे थे,,हम लोग उस दिन कमरे में थोड़ आराम किए, स्नान कर और होटल द्वारा प्रायोजित नाश्त करके फिर कैब से शहर घूमने निकले,, मां विंध्यवासिनी देवी का मंदिर समीप था, वहां जाकर दर्शन करने के बाद तस्वीरें खींची, आस्था और विश्वास का सुंदर समन्वय दिखा वहां पर,हर आने वाली महिला चाहे वह किसी भी उम्र की हो, युवा और आधुनिक हो, सभी ने सिंदूर का बड़ा सा टीका लगा रखा था,गले में फूलों की माला भी किसी किसी ने पहनी थी,, बड़ी सी वेदी पर सैकड़ों दीपक जल रहे थे, शिव पार्वती का मंदिर सावन में विशेष रूप से सजाया गया था,, बहुत सुखद अनुभूति हुई,, लौटते समय हमारा कैब ड्राइवर कृष्ण कोइराला हमें शाकाहारी भोजन के लिए*मोती महल**ले गया,, दोपहर हो गई थी,, और गर्मी भी बढ़ रही थी, हम होटल वापस आ गए,, और स्विमिंग पूल के पास बैठ कर विश्राम किया,
पहाड़ों का मौसम बदलते देर नहीं लगती, धीरे धीरे आकाश में बादल छा गए और ठंडी हवाएं चलने लगीं,,लगा ही नहीं कि थोड़ी देर पहले जो सूरज तप रहा था,अब बादलों में कहां विलीन हो गया,,हम देर तक वहां बैठे और शाम की चाय पीकर ही कमरे में वापस लौटे,,, थकान हो रही थी अतः चाय से राहत मिली,,,,रात के नौ बजे होटल में डिनर का समय था,हम नियत समय पर भोजन के लिए पहुंचे,, शाकाहारी भोजन की तलाश भी कठिन होती है जब देशी विदेशी, नेपाली भोजनों में मांसाहार की भरमार हो,,हमने सादा भोजन ढूंढ लिया,रोटी सब्जी,आलू परांठा, सलाद,सूप और दही,,,
अब नींद से आंखें भारी हो रही थी,
(2)
सुबह जब आंख खुली तो भोर हो रही थी,चार बजे थे,रात में नींद बहुत सुकून और शांति भरी आई थी और मैं नियमानुसार चार बजे जग गई थी,
नित्यकर्म से निवृत्त होकर, कमरे में उपलब्ध चाय की इलेक्ट्रिक केटली से चाय बना कर खिड़की के पास आकर बैठ गई, मिश्रा जी भी जग गये थे,, और शशांक भी अपने कमरे से आ गया था,हम तीनों चाय का आनंद ले ही रहे थे कि अचानक बाहर नजर पड़ी और जैसे एक चमत्कार सा हो गया हो, पहाड़ों का अद्भुत सौंदर्य जादू का बोध करा रहा था, ऊंचे ऊंचे पहाड़ों के पीछे से झांकती अन्नपूर्णा हिल्स की बर्फीली चोटियां सूरज की हल्की लालिमा से जगमगा रही थीं,रात में हुई हल्की बारिश के बादलों का कहीं पता नहीं था,, बिल्कुल साफ स्वच्छ,नीले आसमान में अंकित रत्न की तरह वे चोटियां सुशोभित हो रहीं थीं, आंखें उन्हें लगातार देखती हुई भी जैसे तृप्त नहीं हो रही थीं,, शायद सीता राम के प्रथम दर्शन को गोस्वामी जी ने इन्हीं क्षणों से प्रभावित होकर लिखा होगा**गिरा अनयन,नमन बिनु बानी**जिह्वा जो वर्णन करना चाहती है पर उसकी आंखें नहीं, और आंखें जो देखती है, उनके पास जिह्वा नहीं है,, कुछ ऐसी ही स्थिति हमारी थी उस समय,, जल्दी जल्दी मोबाइल से हमने ढेर सारी तस्वीरें ली थीं, और उन यादगार पलों को संजो लिया था,, मैंने तो तुरंत एक लाइव वीडियो भी बनाया था, धीरे धीरे सूरज ऊपर चढ़ता जा रहा था और क्रमशः पहाड़ियों का रंग लाल,पीला,नीला हरा,अनेक रंगों में बदल रहा था, जैसे सूरज के सात रंग मिलकर एक प्रिज्म बना रहे हों,, बहुत सुंदर,मोहक दृश्य था,, नीचे डाइनिंग हॉल में भी हमनें उस दृश्य को देखा, वहां विदेशी मेहमान भी उस दृश्य को कैमरे में कैद कर रहे थे,,,
होटल के कर्मचारियों ने बताया कि बरसात के दिनों में ऐसा बहुत कम होता है जब अन्नपूर्णा हिल्स के दर्शन हो, आज सचमुच भाग्यशाली दिन है,बीच की ऊंची लंबी चोटी को वहां की नेपाली भाषा में*माचा पोचीरे*कहते हैं,, जिसका अर्थ है मछली की पूंछ**उसकी ऊपरी नुकीली आकृति मछली की पूंछ की तरह ही थी,, अन्नपूर्णा हिल्स एवरेस्ट से मात्र एक हजार मीटर ही कम है,,, हल्की सी, धुंधली छवि एवरेस्ट की भी सुदूर क्षितिज पर अंकित थी,,,
आज नाश्ते में छोले,भटूरे, आरेंज जूस,फल लिए थे हमने,बेटे ने नूडल्स और मफिन्स भी खाए थे,,नौ बजे हमें शहर घुमाने के लिए कार आ गई थी,आज हमें मुक्ति नाथ धाम जाना था, भगवान शिव का जागृत मंदिर,, ऊंचे शिखरों पर स्थापित भगवान शिव की विशाल प्रतिमा दूर से ही दिखाई देती थी,,हम तैयार होकर नीचे आ गये थे,,(#क्रमश:)
फेवा लेक और ताल वाराही मंदिर
नीचे कैब ड्राइवर माचा हमारी प्रतीक्षा में थे,, उन्होंने बताया कि आज हम सबसे पहले फेवा लेक चलेंगे, मुक्तिनाथ के लिए बहुत सुबह निकलना ठीक रहेगा,,हम सब खुशी और उत्साह से भरे हुए अपने गंतव्य की ओर चल पड़े,फेवा लेक पोखरा का सबसे बड़ा आकर्षण है पर्यटकों के लिए।

ताल वाराही मंदिर हिंदू धर्म की देवी दुर्गा को समर्पित है। यह ख़ास मंदिर पोखरा झील में एक छोटे द्वीप पर स्थित है,,ताल बाराही मंदिर नेपाली-हिंदू आध्यात्मिकता का एक बड़ा स्रोत है, 18 वीं शताब्दी में बना ये हिंदू मंदिर चारो तरफ से झीलों से घिरा हुआ है, जो देखने में बहुत ही आकर्षक लगता है,
मां वाराही का मंदिर बहुत पुराना और आस्था का प्रतीक है, यहां नारियल फोड़ने की मशीन लगी थी,जो नारियल को एक समान आकार में तोड़ देती थी,, मैंने पहली बार ऐसी मशीन देखी थी,यह भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा था,, निचले दरवाजे वाले प्राचीन मंदिर में मां वाराही की छोटी सी मूर्ति विराजमान थी,, चारों ओर धूप,लोबान और अगरबत्तियों की खुशबू फैली हुई थी,हम मां के सम्मुख नतमस्तक थे, भक्ति और आस्था कोई बनावट की वस्तुएं नहीं होती,जब हृदय मां की विशाल प्रतिमा के सम्मुख झुकता है तो सब कुछ जैसे तिरोहित हो जाता है,हमारा अस्तित्व, अहंकार, चेतना,, एक अव्यक्त वात्सल्य प्रवाहित हो रहा था उस मातृ मूर्ति से,, हमारी नाव का नाविक जल्दी चलने की जिद कर रहा था उसे और भी यात्रियों को लेना था,हम लोग पुनः लाइफ जैकेट पहन कर वापिस हो लिए,,
इस पार पहुंच कर, प्रसिद्ध मनोकामना मंदिर जाने की योजना बनी, लेकिन जब वहां पहुंचे तो वह बंद था, रिपेयरिंग का काम चल रहा था, वहां भी रोप वे से जाना था और मैं मन ही मन डरी हुई थी,,यह सुनकर राहत की सांस ली,, मुझे खुद पर हंसी भी आई थी,अब हमारा अगला गंतव्य था बौद्ध पैगोडा शांति स्तूपा जो काफी ऊंचाई पर बना हुआ था ,, हमारी गाड़ी कुछ दूर तक घुमावदार रास्तों पर चलती हुई एक जगह रुक गई थी क्योंकि आगे हमें पैदल ही जाना था,, ऊंचे नीचे पत्थरों से बनी सीढ़ियों पर पांव जमाकर चलना था,,हम लोग चल पड़े,, सबसे आगे मिश्रा जी, शशांक और भाईसाहब थे,, पीछे पीछे मै भी शामिल हो गयी इस यात्रा में,, बहुत कठिन चढ़ाई थी,, सीढ़ियों के दोनों ओर छोटी छोटी चाय,काफी, कोल्डड्रिंक और आइसक्रीम की दुकानें थीं, कुछ बच्चों के खिलौनों और नेपाली टोपियों की भी दुकानें थीं,, भाईसाहब ने एक टोपी खरीद कर पहन ली थी,, और बिल्कुल नेपाली ही लग रहे थे,, लेकिन उन्हें थकान हो गई थी, वे हार्ट सर्जरी से गुजर चुके थे, कोई रिस्क लेना ठीक नहीं था,,वे वहीं रुक कर फोटो ग्राफी करने लगे और हम आगे बढ़ गये,,,कई जगह तो सीढियां भी टूटी थी और पत्थरों पर चलना पड़ा,,सिर के ऊपर सूरज तप रहा था, गर्मी ज्यादा थी,, शशांक और मिश्रा जी आगे निकल गए थे, मैं धीरे धीरे चल रही थी, धड़कने बढ़ रही थीं, पांव कांप रहे थे, पर आगे बढ़ना ही था,, एक सहृदय नेपाली सहयात्री महिला ने मुझे भी अपनी बड़ी सी छतरी के नीचे जगह दी , और मेरे साथ साथ चलने लगीं,, मैं बहुत थक गई थी, एक एक क़दम बढ़ाती लगातार चलती रही, लगभग तीन सौ से ऊपर सीढियां थीं,, किनारे लगी पत्थरों की चौकियों पर रूक कर विश्राम किया और चलती रही,,जब ऊपर पहुंची तो शशांक ने तालियां बजाकर मेरा स्वागत किया, उसके साथ साथ कुछ विदेशी युवा भी तालियां बजा रहे थे,, मुझे लगा कि जैसे मैंने कोई कठिन परीक्षा पास कर ली है,,राहत, शांति और खुशी मिली थी उस क्षण,, सामने सफेद चमचमाता हुआ बौद्ध स्तूप था, शानदार ऊंचा पैगोडा,, अजीब शांति थी वहां पर,,हमने तस्वीरें लीं और वापस लौट चलें,,)
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मुक्तिनाथ, मुक्तिधाम मंदिर
आज हमें मुक्तिनाथ जाना था,, ड्राइवर माचा बहुत पहले ही आ गये थे,,हम सब सुबह जल्दी उठकर, तैयार हुए और नाश्ता के लिए होटल के डाइनिंग हॉल में आ गए,,,आज भीड़ ज्यादा थी, सभी को कही न कही निकलना था, शशांक, उसके डैडी और भाईसाहब ने मोमोज लिए, फिर एपल जूस, और पूरी सब्जी,, मैंने ब्रेड सैंडविच और पूरी ली,जूस के साथ, फिर गर्म मसाला चाय पीकर हम अपनी अगली यात्रा के लिए निकल पड़े,,,,
माचा हमें बहुत सी जानकारियां देते हुए चल रहे थे,, मुक्तिनाथ धाम बहुत सुंदर और ऊंचाई पर स्थित है,
संकरे, घुमावदार रास्तों पर पर चलती हुई हमारी कार लगभग दो ढाई घंटों में मुक्तिनाथ के नीचे वाली सड़क पर पहुंची,,पुराना रास्ता अभी बंद था, और सरकारी तौर पर मरम्मत कार्य हो रहा था,हम लोग दूसरे रास्ते से चढ़ने लगे,,माचा ने गाड़ी वहीं एक किनारे लगा दी और हमें रास्ता बताने के लिए थोड़ी दूर तक साथ आया,,,सुबह का समय था,, ठंडी हवाएं चल रही थी,,नयी उर्जा और उत्साह के साथ हमने चढ़ना शुरू किया,, सड़क के दोनों ओर लगी रेलिंग से बहुत मदद मिल रही थी, चौड़ी सीढियां थीं,हम आराम से चलते गये,, धीरे धीरे सभी आगे निकल गए, मैं अपनी ही गति से चल रही थी, ऊपर देखने से ऊंचाइयों का बोध भय पैदा कर रहा था , अतः ऊं नमः शिवाय का जाप करते हुए आस पास के हरे भरे वातावरण को निहारते हुए चलती रही,, परंतु इस चढ़ाई का तो कोई अंत ही नजर नहीं आ रहा था,,मन में गूंज रहा था*चरैवेति चरैवेति,, चलते रहो,,जब तक कि पांव न थक जाएं,यही तो जीवन है,,अब धूप भी तेज होती जा रही थी, जैसे जैसे ऊपर पहुंच रहे थे हम,, सूरज की किरणें और भी तीखी और चुभन पैदा कर रही थीं , अंततः लगभग चालीस मिनट चलने के बाद नव निर्मित सीडियां दिखाई दीं,, जहां रास्ते पर पानी और कीचड़ भरी ज़मीन थी, मशीनों से रास्ते बनाए जा रहे थे,हम किनारे वाले रास्ते से आगे बढ़े,,अब भगवान शिव की मूर्ति भी दिखाई दे रही थी,नील वर्ण, बड़ी आंखें, जैसे कृपा भरी दृष्टि से समस्त विश्व को निहार रहे हों,,बगल में त्रिशूल,, वाह अद्भुत छवि,,, प्रणाम महादेव,,
भगवान शिव की विशालकाय मूर्ति पहाड़ के ऊपर स्थापित थी, और दूर से ही दिखाई देती थी,,, उन्हीं को देखते हुए,हर हर महादेव*का जयकारा लगाते सभी सहयात्री उत्साहित होकर आगे बढ़ने लगे,, मिश्रा जी, शशांक, सभी पहले से पहुंचे थे,,, सामने ही मंदिर था और उसके गलियारे में चारों ओर बने परिक्रमा पथ पर एक सौ आठ शिवलिंग बने थे,हमने जूते उतारे और मंदिर में प्रवेश किया, दर्शन कर वहीं बरामदे में बैठकर विश्राम किया और शिव स्तुति का पाठ करने लगे,,सामने अन्नपूर्णा और उसकी सहयोगी पहाड़ियों का सुंदर दृश्य मोहित कर रहा था,, हमने तस्वीरें खींची,,अब ऊपर वाले शिव मूर्ति तक जाना था, लेकिन संगमरमर से बने फर्श पर जैसे आग बरस रही थी, पांव बुरी तरह जल रहें थे,, भगवान आशुतोष को प्रणाम करने के लिए सीढ़ियों से जाना था, मैं जल्दी उतर आई,पर ये सभी वहां परिक्रमा कर लौटे,, पांव में कड़ धूप का अहसास लेकर ,,हम देर तक गलियारे में बैठे रहे, यहां पर ठंडी हवाएं आ रही थी, अच्छा लगा,
एक बात बहुत अच्छी लगी कि यहां सभी अच्छी हिंदी तो बोल ही रहे थे, एक दूसरे के सहयोगी भी थे,यूपी, बिहार और सुदूर असम, कोलकाता से भी आए बहुत से लोग मिले,, शायद ईश्वर के दरबार में एक अपूर्व आत्मीयता भरे रिश्ते बन जाते हैं, क्योंकि सभी तो उसकी संतानें हैं,, भगवान शिव को पुनः प्रणाम कर हम नीचे उतरने लगे,,हमारा अगला गंतव्य था किसी अच्छे से शाकाहारी होटल में लंच लेना,**जहां ले जाने के लिए माचा अपनी गाड़ी के साथ प्रतीक्षा कर रहे थे हमारी,,, यहां पर शुद्ध शाकाहारी भोजन के लिए हमें कुछ परेशानी हो रही थी,,हर जगह मांसाहारी भोजन देशी विदेशी तर्ज पर,,बार,पब,की भरमार थी,,शायद पश्चिमी देशों से आने वाले अतिथियों के कारण यह नेपाल के व्यवसाय का एक अंग बन गया था,,,जो अपरिहार्य था ,,
हम अपनी तलाश में सफल हुए और मोती महल**में जाकर गर्म रोटी,चावल, मटर पनीर की सब्जी, तड़का दाल,सलाद और पापड़**बहुत अच्छी जगह लगी हमें,हम अपने होटल की की ओर चल पड़े,,,
आज पोखरा में अंतिम दिन
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होटल लौट कर शाम हो गई थी ,,हम सब थक गए थे,रात का डिनर कमरे में मंगा लिया था,आलू परांठा,फ्रूट सलाद,दही रायता,,,, कुछ देर आराम करने के बाद टैरेस पर चले गए रात का दृश्य देखने,, जैसे चारों तरफ सितारे जगमगा रहे थे, ऊपर आकाश में चमकते तारे और पहाड़ों पर जूगनुओ सी चमकती रंगीन रोशनी की कतारें,, ये सारे दृश्य हम अपनी यादों में भर लेना चाहते थे, प्रकृति का मोहक रूप,, तारों का सौंदर्य, वातावरण की शीतलता,,,सब कुछ,
अद्भुत दृश्य,हमने कुछ तस्वीरें भी खींची,, और टहलते हुए पूरे परिवेश को आत्मसात करते रहे,,,
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पोखरा की सुनहरी सुभोर का सादर नमन आप सभी को ,सुबह के साढ़े सात बजे हम सभी अपना सामान व्यवस्थित कर तैयार हो कर लिपट से नीचे डाइनिंग हॉल में आ गए,, नाश्ता लग रहा था, गर्म नाश्ता करके हम लोग भी पोखरा छोड़ने की कल्पना से भावुक थे,, होटल का कर्मचारी हमारा सामान कार में रख चुका था, शशांक होटल की औपचारिकताएं पूरी कर रहा था,, सबने हमें नमस्ते कहा, फिर आइएगा*के स्नेहिल स्पर्श के साथ हम हिमालयन फ्रंट*से विदा लेकर एयरपोर्ट पहुंचे,, लगभग ढाई बजे बुद्ध एयरलाइंस का विमान आ चुका था,,हम भी निकल पड़े भगवान शिव की पावन धरती काठमांडू की ओर,, ऊपर से पोखरा का सौंदर्य, बादलों की अठखेलियां, और पर्वत श्रृंखलाओं को निहारना बहुत अच्छा लगा,, यह अविस्मरणीय यात्रा स्मृतियों में कहीं गहरी अंकित हो गई है।

पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
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