
पाँच लघुकथा

अलका प्रमोद
लखनऊ
लघुकथा-१
“समान अधिकार”
नारी मुक्ति मंच का वार्षिक आयोजन चल रहा था। इस अवसर पर नाटक, संगीत परिचर्चा और काव्य सम्मेलन के विभिन्न सत्र रखे गये थे। स्वाभाविक है कि प्रस्तुति की विधा कोई भी हो पर विषय सभी के नारी विमर्श पर केन्द्रित थे। बड़ी-बड़ी बातें हो रही थीं, नारी के अधिकारों नर और नारी के समान होने की आदि आदि। सभी सदस्यों में उत्साह था, ऊर्जा थी। निया भी ऋतिका के साथ आयोजन में भाग लेने आयी थी।
आयोजन में ऋतिका की मुख्य भूमिका थी। उसे परिचर्चा में भाग लेना था जिसका विषय था ‘नर और नारी के समान अधिकार। ऋतिका ने ओजपूर्ण वाणी में बोलना प्रारम्भ किया,
“नर और नारी एक समान”
हक दोनों का ही सम्मान
नहीं है नारी कम जब नर से
मिले न क्यों अधिकार समान।
अंत में उसने जोश से कहा “नारी शक्ति जिंदाबाद।”
निया भी उसके भाषण से प्रभावित हुए बिना न रह पायी। लौटते में ऋतिका ने कहा, “निया रुको जरा बैंक में पैसे जमा करवा दूँ।”
दोनों बैंक गयीं। काउन्टर पर लम्बी पंक्ति थी। ऋतिका सीधे आगे पहुँच गयी। कुछ लोगों ने आपत्ति की तो उसने आँखें तरेरते हुए कहा, “आपको पता नहीं हम महिलाओं को लाइन में प्राथमिकता दी जाती है हमारी लाइन अलग होती है।”
***
लघुकथा-२
“यह तो टीचर है”
जिया, दिन पर दिन हुठी होती जा रही थी। उस दिन फिर जिया स्कूल जाने के समय रोने लगे, बस क ही रट थी “मुझे स्कूल नहीं जाना।”
जिया को पता नहीं क्या होता जा रहा था कि नित्य ही स्कूल जाने के नाम पर बहाने बनाती, रोती, मचल जाती। विभा ने उसे तरह-तरह के प्रलोभन दिये, प्यार से समझाया नहीं मानी तो डाँटा, कमरे में बंद करने का दंड भी दिया पर जिया की, क ही रट थी “मुझे स्कूल नहीं जाना।”
हार कर विभा ने इस बार पैरेंट टीचर मीटिंग में स्कूल में उसकी टीचर से जिया कहा, “आजकल ये स्कूल आना ही नहीं चाहती आप जरा इसे समझाइये ।” टीचर ने आवासन दिया कि वह उसे समझा दें।
सच में टीचर ने अपना वादा निभाया, अब जिया ने चुपचाप स्कूल जाना शुरू कर दिया। वह बात दूसरी है कि वह बिल्कुल चुप रहने लगे थी उसका बचपना मानो खोया था, हँसना हँसना तो मानो वह भूल ही यी थीं। विभा को लग कि अभी उसे स्कूल जबरदस्ती भेजे जाने के कारा वहु नाराज है, पर धीरे-धीरे सब ठीक हो जा। कम से कम स्कूल तो जाती है।
क दिन विभा टीवी पर मूवी देख रही थी। जिया पास में खेल रही थी। अचानक वह चिल्लायी, “मम्मा ये तो टीचर जैसा है।”
विभा ने कहा, “नहीं बेटे ये टीचर नहीं है, यह तो दा आदमी है, टीचर तो अच्छे होते हैं।” जिया जोर-जोर से रोने लगे, “नहीं- – ये टीचर है, ये टीचर है, वो भी तो यही करते हैं।” विभा अवाक थी क्यों कि टीवी पर बलात्कार का दृश्य आ रहा था।
***
लघुकथा-३
“स्वयं में विश्वास “
मोहित के बॉस पहली बार घर आये थे। मोहित ने अपने बड़े भाई रोहित को भी उनसे मिलवाने बाहर बुलाया। अपनी वैसाखी ले कर खट्-खट् करता रोहित कमरे में आया। मोहित ने अपने बाॅस का परिचय करवाते हुए बताया, ‘‘भैया इनसे मिलिए मेरी कम्पनी के डायरेक्टर मिस्टर शलभ खन्ना हैं।’’
तभी कहीं से मोहित की कोई कॉल आ गयी और वह क्षमा मांग कर कमरे से बाहर चला गया। कुछ बात करने के उद्देश्य से मोहित के बॉस शलभ खन्ना ने पूछा, ‘‘आप क्या करते हैं?’’
रोहित ने कुछ क्षुब्ध वाणी में कहा, ‘‘देख तो रहे हैं मेरा एक ही पैर है मैं क्या कर सकता हूँ।’’
‘‘नहीं मेरा मतलब है कि घर से ही कोई व्यापार आदि करते हों अपना खर्च उठाने के लिए।’’
रोहित को शलभ का इस प्रकार पूछना अच्छा नहीं लगा। ‘‘मेरे निजी खर्च के लिए मुझे सरकारी पेंशन मिल जाती है। वैसे शायद आपको पता नहीं कि व्यापार के लिए धन चाहिए।’’
शलभ भी बहस के मूड में था उसने कहा, ‘‘आजकल तो सरकार ने अनेक ऋण योजनाएँ चला रखी हैं।’’
‘‘आप शायद भूल रहे हैं कि वह धन लौटाना भी पड़ेगा’’ रोहित अपनी वाणी की कटुता छिपा नहीं पाया। पर शलभ भी पता नहीं किस मिट्टी का बना था उसकी कटुता को नजरअंदाज कर बोला, ‘‘अरे आप को जो व्यापार में लाभ होगा उससे लौटा दीजिएगा।’’
अब रोहित की सहनशक्ति जवाब दे रही थी उसने बात बदलने के लिए आवाज लगायी, ‘‘मुझे प्यास लगी है कोई पानी उठा कर दे दो।’’
संभवतः अंदर किसी ने सुना नहीं तब उसने शलभ को लक्ष्य करके कहा, ‘‘जब ईश्वर ने ही मेरे साथ अन्याय किया है तो किसी से क्या शिकायत।’’ उसकी वाणी आत्मदया से ओत-प्रोत थी।
शलभ ने हँस कर कहा, ‘‘अरे इतनी सी बात के लिए ईश्वर से क्या शिकायत, स्वयं में विश्वास रखिए। मैं आपको पानी दे देता हूँ।’’
शलभ ने मन ही मन सोचा, ‘जाके पाँव न फटे बिवाई वो क्या जाने पीर पराई।’
शलभ उठा और मेज पर रखा पानी का गिलास रोहित को पकड़ाया। रोहित ने देखा कि शलभ ने अपनी दोनों कोहनियों से गिलास पकड़ रखा था क्योंकि उसके हाथ आगे से कटे हुए थे जो अभी तक पूरी आस्तीन की शर्ट में दिखायी नहीं पड़ रहे थे।
लघुकथा-४
“पशु-प्रेमी”
थोड़े दिन पूर्व एक मादा कुक्कुर ने दीपक जी के घर के फाटक पर बच्चे जन दिये। अब तो जो भी फाटक के पास आता वह अपने पिल्लों की सुरक्षा के दृष्टिगत उसको काटने दौड़ती।
उस मादा कुक्कुर का ऐसा आतंक हो गया कि कोई भी दीपक जी के घर आने से डरने लगा। दीपक जी ने पहले उसे भगाने का प्रयास किया पर जब सफल नहीं हुए तो नगर निगम में शिकायत की पर उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। वैसे दीपक जी को वह पहचानती थी और कुछ नहीं कहती। दीपक जी भी उससे दूर ही रहते पर हद ही हो गयी जब उनके घर काम करने वाली सहायिकाओं ने भी उसके भय से आना छोड़ दिया। उनका घर कुत्ते वाले घर के नाम से मोहल्ले में प्रसिद्ध हो गया। दीपक जी ने उसे लाठी ले कर भगाना चाहा तो उसने उनके पैर में काट लिया और उनको सुई लगवानी पड़ी ।
तंग आ कर दीपक जी ने सोच लिया कि उनको कुछ करना ही होगा। वह एक पत्थर उठा कर आये और उस कुक्कुर को फेंक कर मारा। यद्यपि उनका इरादा केवल उसे भगाने का था पर दुर्योग से चोट कुछ अधिक लग गयी और उसके प्राण पखेरु हो गये।
बस फिर क्या किसी पशुप्रेमी ने उनके विरुद्ध निरीह पशु की हत्या की शिकायत दर्ज करवायी दी। दीपक राय जी आज पुलिस थाने में बैठे हैं।
दरोगा जी ने उनको निष्ठुर, अपराधी के कठघरे में खड़ा कर दिया और उनकी निष्ठुरता पर क्या-क्या नहीं सुनाया, उन पर उस निरीह पशु की हत्या का केस दर्ज हो गया। दीपक जी ने जो यातना सही और उनकी मनोदशा की, कोई सुनवाई नहीं थी किसी का उससे उनको कोई सरोकार न था।
दीपक जी थाने में कार्यवाही की प्रतीक्षा कर रहे थे तभी दरोगा जी का खाना आ गया। दरोगा जी को भूख लगी थी अतः वह तुरंत डिब्बा खोल कर मुर्गे की टांग स्वाद ले-ले कर खाने लगे।
लघुकथा-५

पाँच लघुकथा

मृदुला श्रीवास्तव
शिमला
लघुकथा-१
नेवी-ब्लू-निशान
उस दिन वह भी रिज पर पहुँच गई, उसकी ब्लू-खूबसूरती देखने।
शिमला के रिज मैदान पर वे दोनों काली-नेवी-ब्लू-ड्रेस में एक-साथ फोटो खिंचवाते उसे बेहद भा रहे थे। देखा, पत्नी थी कि अपनी आंख के नीचे नेवी-ब्लू के से नील के निशान छुपा रही थी।
दो दिन पहले अपनी इसी सहेली से फोन पर बात हुई थी, सो कुछ देखने समझने को वह कुछ और आगे बढ़ी थी।
जानती थी कि कल शाम चाय में चीनी थोड़ी सी ज़्यादा पड़ने पर उसके गाल पर ज़्यादा कुछ तो नहीं, बस दफ्तर से आने पर पतिदेव ने गुस्से से कि बेहद प्यार से, नहीं मालूम, एक प्यारा-सा, आधा-किलो का, चार-चाबी वाला ताला, दो फुट दूरी से उसे पकड़ाया नहीं था, बस मुँह पर हल्के से दे मारा था।
सौरी-वॉरी? क्या बात कर दी? पति, और वो भी सौरी?
अगले दिन तीन बजे फोन घनघनाया था पतिदेव का, दफ्तर से–‘नेवी ब्लू ड्रेस जो तुम्हारे लिए लाया था…पाँच बजे तक पहन कर आ जाना….घूमने जाना है रिज पर। मेरे सब दोस्त अपनी पत्नियों के साथ महीने में एक बार ऐसे ही रिज पर इकट्ठे होते हैं। अबकी बार मैं भी शामिल हो रहा हूँ इस ग्रुप में। सभी दोस्त फिर अपनी पत्नी के साथ हर महीने इस ग्रुप की एक ही रंग की ड्रेस वाली फोटो डालते हैं।’
पत्नी बोली -‘ अच्छा…तो…। पर वो जो मेरे चेहरे पर नेवी-ब्लू-निशान है उसको….?’
‘कोई नहीं, उसको तो मेकअप से कवरअप कर दो…अब ज़्यादा तो-वो-तो मत करो। चुपचाप नेवी-ब्लू ड्रेस पहन कर आ जाना, पाँच बजे रिज पर। निशान भी ड्रेस से मैच कर जाएगा। मैं भी आज नेवी-ब्लू ड्रेस पहनकर आया हूँ। समझी? फिर आजकल एक ही रंग के कपड़ों में फ़ोटो खिचवाना….ये एक फैशन भी है। अब फैशन हम लोग नहीं बढ़ाएंगे, तो ये कपड़ो की कंपनियां…।’
पति-पत्नी एक जैसे रंग की ड्रेस पहन कर फोटो खिंचवा रहे थे।
वो और पास पहुंची। पति दांत पीस कर कान में कह रहा था—’अरी बांझन की औलाद, साली कुत्ती… पास क्यों नहीं आती? जानती नहीं, मुझे ये फोटो फेकबुक पर डालनी है।’
पत्नी अब पति से चिपक कर फोटो खिंचवा रही थी।
और नेवी-ब्लू-निशान …? नहीं पता, क्या सोच मुस्कुरा रहा था।
मुस्कुराहट में दर्द? पर ये ज़रूरी नहीं कि फ़ेकबूक की हर तस्वीर में दर्द खोजा ही जाए।
***
लघुकथा-२
‘दो बटा तीन’
उसने आटे के कनस्तर में झांका।
कनस्तर कुछ ज़्यादा ही टनाटन बज रहा था। आटा निकाला। कुल दो रोटी का था।
उसने एक छोटे से कटोरे में ही उसे गूंथ लिया।
चूल्हा जलाया। तवा गरम हुआ, पर उसने अभी तक रोटी बेली ही नहीं थी। सोच रही थी। जने तीन है और आटा दो रोटी का, दो बच्चे और खुद, एक-एक रोटी भी खाएँ तो तीन रोटी तो चाहिए ही। अपनी छोड़ भी दो, दो रोटी तब भी चाहिए।
बढ़ता बदन बेटे का और लंबी होती लड़की। बेटे ने आज यूँ भी दो रोटी खाने की जिद पकड़ी हुई है। जानती है बेटे का पेट दो रोटी से कम में नहीं भरता । भरना भी नहीं चाहिए। आखिर लड़का है। बेटी एक रोटी से भी संतुष्ट हो जाती है। लड़की है। होना ही चाहिए और फिर लड़कियां जितना कम खाएं, ठीक ही रहता है। खैर।
यही सब सोचते-सोचते उसने देखा लड़का चूल्हे के पास ही चौकड़ी जमा आटे को निहारने में लगा है। ‘ बहुत जोर से भूख लगी है मां और हाँ, आज पूरी दो रोटी खाऊंगा, मैंने पहले बता दिया….रोज़-रोज़ आधी-आधी रोटी देती है। आज पूरी दो रोटी खाऊंगा और फिर तू ही तो कहती है बढ़ते लड़कों को कम-से-कम दो रोटी खानी ही चाहिए। अभी तो 8 का हूँ। 12 का होने पर मेरे लिए कम-से-कम चार रोटी बनाया करियो।’
‘….मां मैं भी आई। मेरे लिए बस एक रोटी रख लेना। वैसे भूख तो तीन की है, पर तू ही कहती है। रोटी थोड़ी कम खाया कर नहीं तो ब्याहना मुश्किल हो जाएगा’–कह कर बेटी खिलखिलाई।
‘हाँ,बेटा देती हूँ….लल्ला! तू जा ज़रा बाहर देख बारिश तो नहीं आ रही।’
दो बटा तीन का आइडिया उसके मन में अब तक आ चुका था। लड़का चूल्हे के पास से हटने को तैयार न था। मानो उसके हिस्से का आटा कोई और न खा ले। सो चिल्लाया बहन पर—‘दीदी! ज़रा कपड़े उठा लो। कहीं भीग न जाए।’
उसने फिर लड़के को उठाना चाहा। सो बोली—‘बेटा! ज़रा नमकदानी तो उठाना ऊपर से।’ बेटा फिर नहीं खिसका। बोला—‘दीदी तू लंबी है। नमकदानी तो देना, ज़रा मां को।’
गरीबी अपने हिसाब से सब तरकीब जो ढूंढ लेती है। सो एक तेज़ झूठी छींक और घुटने तक बिखरे बालों में छिपा चेहरा, नीचे को झुकता हुआ। बचते-बचाते अपने घुटने के नीचे दो लोई की तीन लोई उसने अब कर दी थी। दोनों से थोड़ा-थोड़ा आटा निकाल कर। लोई तीन हो चुकी थीं पर धोती में चिपक कर कुछ कम भी हो गई थी। उसने आखिरकार गरमागरम तीन रोटी बना ली। दो रोटी बेटे को प्याज़ नमक के साथ और एक बेटी को चीनी के साथ खिला उसने उन्हें सुला दिया था।
खुद भी लेटने को हुई। देखा, बेटा अभी तक हिल रहा है। ‘सोया नही बेटा?’– उसने पूछा। ‘हां मां, बहुत दिनों के बाद रोटी खाई न। इसलिए उसकी महक मुझे सोने ही नही दे रही।…वैसे भी पता नहीं क्यों भूख अभी भी लग रही है। ऐसा लग रहा है कि जैसे मैंने बस एक ही रोटी खाई है।’ क्या कह्ती वह अपने लल्ला से?
बालों को सहलाते उसने बेटे को सुला दिया। देखा। बेटी भी जाग रही है। उसने उसे भी चूमा । ‘सो जा बेटा। कल ठीक से खाना दूंगी।’ अधखायी बेटी से वह बुदबुदाई तो बेटी भी सो चली।
पर वह? वह आधी रात तक भी जाग रही थी। भगवान को धन्यवाद भी दे रही थी। तूने मेरे बच्चों को आधी ही सही पर रोटी तो दी। कुछ लोगों को तो ये भी नसीब नहीं होती पर एक चिंता उसे अभी भी सता रही थी। उसने रोटी की लोई को तो दो बटा तीन कर दिया पर अपनी गरीबी को कैसे दो बटा तीन होने से रोके? इसका उसे अभ्यास न था। सोचते-सोचते सोने ही चली तो पास पड़े मटके ने चुटकी ली। ‘मैं हूँ न मेरी मां। चिंता क्यों करती है? बस मेरा ठंडा-ठंडा पानी पी। पेट पर दो मुक्के मार और सो जा।’ वह मुस्कुरायी। उठी। पानी पिया। पेट पर दो मुक्के मारे और सो गई गहरी नींद में। गरीबों की नींद वैसे भी कम ही टूटती है रात में। नींद न आने की समस्या तो अमीरों की है।
***
लघुकथा-३
‘फिट’
‘अरे ! आप सब को पता है इस लड़के को मिर्गी के फिट पड़ते हैं?’
व्यंजनों से भरी गोल मेज़ कांफ्रेस सरीखी, उस किटी पार्टी में देश की समस्याओं पर खोखले विचार-विमर्श करती, आँगन में गार्बेज कलेक्शन वाले उस लड़के की ओर इशारा कर गप्प लगाने के अंदाज़ में मिसेज जुनेजा बोली तो वहाँ बैठी कीमती साड़ियों में लिपटी सब महिलाएं “ओह! अच्छा” कहकर तेज़-तेज़ हँसने लगी।
उनकी बातें सुन रहे उस लड़के को अचानक गुस्सा आ गया। सो बोला–
‘मुझे मिर्गी के फिट पड़ते हैं तो आपसे किसने कहा कि चौबारे पर बैठ कर इस बात का ढिंढोरा पीटो? एक गरीब की भी कोई प्राइवेसी होती है कि नहीं? कोई मदद तो की नहीं जाती। चली है शोर मचाने।’
‘ओए लड़के! चुप कर बहुत बोलता है। कूड़ा उठा और भाग यहाँ से।’
‘क्यों जाऊँ? मेरी बात चल रही है तो मैं क्यों नहीं बोल सकता? …मेरे फिट की छोड़ो, क्या आपको नहीं लगता कि आप जैसी महिलाएं इस समाज के लिए खुद एक फिट की तरह हैं।…अब देखिए न, मिसेज जुनेजा! आपकी बेटी ने तो भाग कर शादी की थी। ये बात तो आपने किसी को नहीं बताई और ये डॉ शांति, इनके तो पति से, ये कल ही पिटी हैं। किसी को बताया इन्होंने? नहीं।…और आप मृणाल आंटी आप का बेटा तो नकल करता परीक्षा हॉल से बाहर कर दिया गया था, पिछले ही महीने। आपने बताया इन सब को? नहीं…और बताऊँ?…चलो छोड़ो। यूनियन का लीडर हूँ। एक-एक की खबर रखता हूँ। चाहूँ तो सबको बता सकता हूँ।…बड़ी आई मेरे फिट का गाना गाने वाली। पहले अपने-अपने दिमागों को तो फिट कर लो, बाद में किसी गरीब की बीमारी का मज़ाक उड़ाना।’–कहते हुए लड़के ने वहीं आंगन में गुस्से में सारा कूड़ा वापिस पलट दिया और फिर बोला—’हो गया मामला फिट? अब करो, बदबू में पार्टी। अब मिर्गी के फिट मुझे नहीं, तुम सबको पड़ेंगे।’
डॉ शांति जो अपने पति की कुछ देर पहले बड़ी तारीफ़े कर रहीं थी, कल रात हुई अपनी पिटाई की बात सबको पता लगने से वहीं सदमा खाकर बेहोश हो गईं।
‘अरे! इनको क्या हुआ?’–कोई पूछ रही थी।
‘कुछ नहीं, इनको फिट पड़ा है।’ अगली धीरे से कह कर चुप हो गई थी।
डॉ शांति को भी फिट पड़ते हैं, ये छद्म सूचना अब पूरी कॉलोनी में हवा की तरह फैल चुकी थी। छह महीने से डॉ शांति अब किसी किटी-पार्टी में शिरकत करती नहीं दिखी हैं। भगवान जाने क्यों?
***
लघुकथा-४
‘संस्कार’
उसने उस भिखारी को भीख मांगने की बजाय उसको खरीद कर दिए गए खिलोनों को बेच कर अपनी कमाई करने की सलाह दी थी। यह बात दीगर थी कि भूखे ने उसके दिए खिलोनों को एक तरफ खिसका दिया और बोला-‘मुझे रोटी चाहिए।’
‘इससे तुम्हारा आधार मजबूत होगा, समझने की कोशिश करो मेरे दोस्त।’
‘मुझे भूख लगी है और तुम्हें मेरा आधार मजबूत करने की पड़ी है….क्या एक अकेला मैं ही रह गया हूँ इस देश में, जिसका आधार कमजोर है?
‘तो और नहीं तो क्या?’
तुम्हारा आधार बड़ा मज़बूत है क्या जो तुम अपनी बीवी को शराब पीकर पीटते हो? तुम्हारे घर के पिछवाड़े ही मेरा ढारा है…..मूर्ख हो तुम, आधार मेरा नहीं, तुम्हारे इस देश का और तुम्हारा कमजोर है बाबू।’
‘मेरा देश? क्यों तुम्हारा देश नहीं है क्या ये?’
‘मेरा? मेरा कैसे होगा, जब मुझे एक रोटी तक भी मयस्सर नहीं होती है इस देश में?’
‘तो इसमें देश का दोष? दोष तो तुम जैसो का है, जो काम भी नहीं करना चाहते और रोटी भी मांगते हो।’
‘मुझे कुछ खाने को दे रहे हो कि नहीं? नहीं देना तो आगे निकलो, बाबू यहां से।….मुझे रोटी चाहिए, अभी और इसी समय। मुझमें इतना सब्र नहीं कि अपना आधार मज़बूत होने तक भूखा रहूँ। पहले रोटी बाद में आधार। समझे?’
उसने अपने टिफिन से खाना निकाल उसे दे दिया था, यह सोचते हुए कि अब तो इसका पेट भर गया है। अब कल से यह इन खिलौनो को बेच कर चार पैसे ज़रूर कमाएगा।
अगले दिन उसने देखा। भिखारी खिलौने बेचने की बजाय फिर से भीख मांग रहा था और किसी से कह रहा था-‘मैंने तीन दिन से खाना नहीं खाया साब, कुछ दे दो।’
उसका मन हुआ उसके पास पसरे
खिलौने उठा कर किसी और पात्र व्यक्ति को दे दे, पर फिर यह सोचकर कि इंटे पास में रहेगी तो चलो कभी न कभी तो इसका आधार मजबूत होगा ही, उसने उन खिलौनों को वहीं छोड़ दिया।
अब वह अभी थका नहीं था। एक बार फिर अपना झोला लटकाए, कुछ और खिलौने खरीदने सामने वाली खिलौनों की दुकान की ओर चल पड़ा था, किसी और भूखे का आधार मज़बूत करने के लिए शायद।
***
लघुकथा-५
मंहगी मृत्यु
“अस्पताल के बाहर लिखा था सीजेरियन से लेकर वेंटिलेटर तक सब कुछ हमारी जिम्मेदारी है।”
कितनी प्रार्थनाओं और तरकीबों को अपनाने के बाद आखिर उसकी इसी बेटी ने सिजेरियन ही सही पर जन्म ले लिया था।
बहुत महंगा पड़ा था इस बेटी को पैदा करना। फिर जबसे बेटी पैदा हुई वो 35 साल से न जाने किन किन बीमारियों को लेकर इस अस्पताल के चक्कर लगाती रही।
आज उसी अस्पताल में उसकी बेटी एक बार फिर आईसीयू में वेंटिलेटर पर अंतिम सांसे गिन रही है।
डॉक्टर ने उसके पति को अब तक का 11 लाख का बिल पकड़ा दिया है।
जन्म तो महंगा समझ आया पर मृत्यु भी इतनी महंगी होगी कभी सोचा न था।
मृत्यु तो बेहद सरल चीज है। आएगी और शांति से ले जाएगी। कैसे ले जाएगी शांति से। मृत्यु की भी अपनी कीमत होती है वैल्यू होती है। इतना आसान होता है क्या, मृत्यु से सस्ते में निपट जाना। काश! वो जानती होती। उसने तो सुना था। मृत्यु एक बेहद शांत स्थिति है,इसलिए मरने से पहले के काम भी बेहद सलीके से, सम्माननीय ढंग से, साफ सुथरे तरीके से होने चाहिए। बाद का किसने देखा है?
बेटी एक अनंत निंद्रा की ओर बढ़ रही है।
वह सोच रही है उसकी छोटी विवाहित बेटी के घर जब बच्चे का जन्म होगा तो उसे पहले से ही उसकी मृत्यु के समय होने वाले खर्चे को जुटाकर रखने को कहेगी। वो चाहे बुरा माने या बुरा।हद है।
जन्म और मृत्यु” अब महंगे हो गए हैं…सीजेरियन के बिना कोई आता नहीं.. और वेंटीलेटर के बिना कोई जाता नहीं..।
आजकल हर प्राइवेट अस्पताल का लक्ष्य भी यही है, सिजेरियन से दुनिया के घर में लाओ और वेंटिलेटर से मृत्यु के कुएं में भेजो।
‘मम्मीजी! आप की मृत्यु के लिए वेंटिलेटर के लिए कितने तक रख लूं? पापा के लिए तो 15 लाख रख लिया है। आपके ही अकाउंट में FD कर दी है।’ छोटी बेटी अपनी सास से पूछ रही थी।
बेटी ने अंतिम सांसे उसी वेंटिलेटर पर ही ली थी। एक दिन पूछ भी रही थी उससे- ‘मम्मी आजकल हर तीसरा आदमी क्योंकर वेंटिलेटर पर ही मरता रहा है कभी सोचा है आपने?’
‘हमारी टेक्नोलॉजी एडवांस हो गई है मेरी बच्ची’
‘टेक्नोलॉजी नहीं हमारे डॉक्टर और उनकी जेबें एडवांस हो गई है मेरी माते।….समझा करो मां! जैसे हर तीसरा बच्चा आज सिजेरियन पैदा हो रहा है। वैसे ही हर तीसरा आदमी वेंटिलेटर पर मर रहा है….सिजेरियन से वेंटिलेटर तक की यह यात्रा सचमुच है बड़ी अद्भुत और गोपनीय भी… इसे या तो मरीज समझ सकता है या फिर ये प्राइवेट अस्पताल और इसके डॉक्टर।
बेटी की डेड बॉडी का स्टेचर घिसटता
चला जा रहा था। वो बस देखती रह गई।

पाँच लघुकथा

मंजु श्रीवास्तव’मन’
वर्जीनिया , अमेरिका
लघुकथा-१
स्वतंत्रता
“रेनू देखो तुम्हारे बेटे ने हमारा तोता उड़ा दिया। ” अंजू बड़े गुस्से में बोली।
“ऑन्टी ,बबलू की बहुत पिटाई करो इसने मेरा मिट्ठू उड़ा दिया”रोते हुए अंजू का बेटा नितिन बोला।
रेनू ने बबलू की ओर देखा,वह बिलकुल निर्भीक खड़ा था जैसे उसने कोई गलती करी ही न हो ।रेनू को थोड़ी शर्मिंदगी लगी ।उसने बबलू को लगभग डांटते हुए पूंछा “यह कैसी शरारत है बबलू ,तुमने तोता क्यों उड़ाया ?”
अंजू बोली -“देखो साॅरी भी नहीं बोल रहा ,कैसा ढीठ बना खड़ा है ।”
अब बबलू बोला “मम्मी तोते का मन भी तो खुले आकाश में उड़ने का करता होगा। वैसे भी मास्टर जी कहते है स्वतंत्र्ता सबका मूलभूत अधिकार है,इसीलिये मैंने उसे स्वतंत्र कर दिया । कोई गलती की क्या मैंने ?”
रेनू और अंजू के पास उसकी इस बाल-सुलभ शरारत पर सजा सुनाने के लिये कोई कारण नहीं था।
***
लघुकथा-२
एबॉर्शन
कुर्सी पे बैठ कर एक टक छत को निहारती दीपशिखा से शुभ्रा बोली ‘क्या सोचा है दीपू ,बहुत दिन चढ़ जायेंगे तो डॉक्टर एबॉर्शन भी नहीं करेंगी ।जल्दी निर्णय ले ।”
दीपशिखा बोली ‘बड़ा अन्तर्द्वन्द चल रहा है मन में शुभी ।वह इंसान जिसे मैंने दिल की गहराइयों से पिछले पांच साल से प्यार किया ,वह अचानक बिना बताए किसी और से शादी कैसे कर सकता है ?जिंदगी भर साथ निभाने की कसमें खाई थी ।यह अजन्मा बच्चा जिसमें उसका भी रक्त है क्या उसी की तरह धोखेबाज होगा या मेरे रक्त से पोषित मेरा बच्चा मेरी तरह संवेदनशील होगा ,हमेशा मेरा ध्यान रखेगा ?पता नहीं क्यों मुझे इस अजन्मे बच्चे से बहुत लगाव हो गया है शुभी ।मैं इसकी हत्या के पाप के दंश के साथ नहीं जी सकती ।”
शुभा बोली -“मेरी मान चुपचाप एबार्शन करा और जिंदगी में आगे बढ़ ।क्या यह बर्दाश्त कर पायेगी कि लोग तेरे बच्चे को नाजायज़ कहें?”
कुछ सोच कर दीपशिखा बोली -“मैंने सोच लिया ,मैं किसी और देश में बस जाऊंगी और वहाँ सबको और अपने बच्चे को यही बताऊंगी कि मेरे पति की मृत्यु हो गई, वैसे भी वह मेरे लिये मरे समान ही है । अपने बच्चे को इतना प्यार दूँगी कि उसे कभी पिता की कमी महसूस ना हो।एबार्शन तो जिम्मेदारी से भागने का कायरों का तरीका है ।मैं कायर नहीं हूँ ।”
***
लघुकथा-३
कैसे कैसे लोग
मीना अपने घर से बाहर निकली तो देखा सामने वनिता के घर से सड़क पर पानी बह कर आ रहा था। उसके घंटी बजाने पर वनिता बाहर निकली। मीना बोली -“वनिता जी आपका बगीचे वाला नल खुला है ,कितना पानी बरबाद हो रहा है “।
“अरे थोड़ा पानी बह जायेगा तो कौन सी बाढ़ आ जायेगी ।सड़क की धुलाई हो जा रही है “कह कर वनिता हंसने लगी ।
वनिता की हंसी से खीझ कर मीना बोली -” गर्मी के कारण ऐसे ही पानी की किल्लत है,लोग एक एक बूंद पीने के पानी के लिये तरस रहे हैं और वैसे भी हमें प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना चाहिये “।
मीना की बात सुन कर वनिता गुस्से से बोली -“पैसा खर्च करके दो कनेक्शन हमने लिये हैं ।वॉटर टैक्स भी देते हैं फिर पानी बचायें या बरबाद करें हमारी मर्जी ,आपके पेट में क्यों दर्द हो रहा है ? नल खराब हो गया है ,अब प्लम्बर बुलाओ तो दो सौ रुपये तो वो आने के ही ले लेगा ,काम करने के अलग से ,अब ये पैसा सरकार देगी क्या ?” यह कह कर भड़ाक से दरवाजा बंद कर लिया ।
कैसे कैसे लोग होते हैं ,सोचती हुई मीना घर वापस आ गई ।
***
लघुकथा-४
लघुकथा -कुर्ता
आज कई दिनों बाद अच्छी सी धूप निकली तो वसु सब काम छोड़ छत पर आ गई।इधर उधर देख ही रही थी कि उसके अपने गेट के बाहर एक अर्धनग्न विक्षिप्त नव यौवना पर उसकी निगाह पड़ी ।वह कुछ बुदबुदा रही थी ।वसु को लगा शायद वह भूखी होगी ।तुरंत दो पीस ब्रेड और एक पुराना कुर्ता लेकर वह गेट पर उसके पास गई और बोली -“लो खा लो, पर पहले यह कुर्ता पहनो।”
साँवला रंग, मासूम सी आँखें किंतु मांसल देहयष्टि की स्वामिनी खिलखिलाकर हँस पड़ी और बोली -“मुझे नहीं पहनना ।”
वसु ने कहा “क्यों? कितना बुरा लग रहा है, तुम अधनंगी बैठी हो ।
अपने में ही मगन वह बोली -“तुम कह रही हो पहनो,पर वो सामने वाला बाबू और दूसरा बाबू भी कहता है उतारो।बढिया बढिया चीज़ खाने को देता है और कहता है बिना कुर्ता के मैं बहो…त सुंदर लगती हूँ,तुमको क्यों नहीं लगती? ”
उसकी निश्छल हंसी में वसु मानवता को तार तार होते देख रही थी, सोच रही थी क्या शरीर की भूख इतनी अदम्य होती है कि मासूमियत, विक्षिप्तता को भी नहीं बख़्शती ?
***
लघुकथा-५
तिरंगा
चौराहे पर लाल सिगनल होने के कारण गाड़ियों के साथ साथ पैदल जाती नीरा भी खड़ी हो गई थी ।एक छोटा सा लड़का हाथ में झंडे लिये दौडता हुआ आया और गाड़ियों में बैठे लोगों को जाकर बेचने लगा फिर वह नीरा के पास आ गया ।यह सोचकर कि कम से कम भीख तो नहीं मांग रहा ,मेहनत कर रहा है ,नीरा ने भी दो झंडे ले लिये ।
अभी भी सिगनल लाल देखकर उसने बगल में कार में बैठे एक युवक से कहा “साहब आप भी लेलो ,मुझे माँ के लिये दवा लेनी है।“ तभी उस युवक ने उसके हाथ से झंडे छीन कर आगे फेंक दिये और गाली देता हुआ बोला “चल भाग ,ऐसे ही हमदर्दी बटोरते हैं चोर।मैं तिरंगा फहराने जा रहा हूँ, खरीद कर क्या करूँगा ?”
लड़का भागकर जमीन से झंडे उठाने लगा ।सिगनल हरा हो चुका था, एक पुलिस वाला जो वही चौराहे पर खड़ा था आया और एक जोरदार चाँटा बच्चे को लगाकर बोला “ मरना है क्या बे ?”बच्चा गाल सहलाते हुआ बोला “साहब झंडा ज़मीन पर नहीं गिरना चाहिये ,और पैर के नीचे तो बिल्कुल नहीं आना चाहिए।“ पुलिस वाले के पैर के नीचे एक झंडा था ।
नीरा सोचने लगी क्या तिरंगा फहराने का हक होना चाहिये ऐसे सरकारी मुलाजिम को या रईसजादा युवक को,जिन्हे तिरंगा के सम्मान से कोई सरोकार ही नहीं ?