
आँखेः
१.एक निजी समझ – कोई जोड़ नहीं असलियत से। वही देखें जो मन चाहे। …
२.
जीव और संसार के बीच का पुल

मनः
१.
पंक्षी नहीं , पर गलत होगा कहना कि उड़ता नहीं। असलियत तो यह है कि उड़ना आता ही नहीं इसे; स्वप्न के पंखों को भी तो आखिर साहस का आकाश चाहिए। ….
२.
प्रिय अप्रिय यादें, टूटे छूटे अहसास और अन्तहीन खट्टी-मीठी बातों का कबाड़खाना। जो खो चुका, खोएगा या फिर खोना निश्चित है, उसे ही सहेजने और संभालने की जिद से भरा ।…

प्रकृति
१.
सरदी, गरमी, सूखा, बरखा, पतझ़ड़ फिर बसन्त और बहार , प्रकृति साथ , संग जीती , संदेश देती , थिर कुछ नहीं, परिवर्तन शील है जीवन और संसार । धैर्य ही सबसे बड़ा सहारा। पर यही तो नहीं कहीं। उसी को लूटते-खसूटते जो गोदी में लिए बैठी , भरणी और धरणी।….
२.
तन और मन की पहली व अंतिम विश्राम स्थली…

भूख
१
कहीं नियमित आदत तो कहीं जीने की जद्दोजहद…कहीं तृप्ति तो कहीं पीड़ा।
२
एक आँच, एक प्यास तन की और मन की…

रिश्तेः
१.
कच्चे घागे, जो खूंटे से बांध देते हैं, कभी प्यारवश तो कभी कर्तव्यवश। और फिर इनसान इस बन्धन में बंधा खुशी-खुशी जिन्दगी गुजार सकता हैं इनके साथ।
२
संभाले न संभले ये पर संभालने की जिद में इनसान नटी-सा नाचता आगे-पीछे…
प्रकृति
१
सरदी, गरमी, सूखा, बरखा, पतझ़ड़ फिर बसन्त और बहार , साथ जीती पर संदेश देती , थिर कुछ नहीं, परिवर्तन शील है जीवन और यह संसार । धैर्य ही सबसे बड़ा सहारा। पर यही तो नहीं । समझते ही नहीं, उसी को लूटते-खसूटते जो गोदी में लिए बैठी , भरणी और धरणी हमारी।….
२.
कोमल से कोमल, उग्र से उग्र…माँ की तरह ही प्यार तो करती पर सजा देने का भी पूरा हक रखती….

प्यारः
१
अमृत और विष का नशीला कौकटेल जिसकी आदत मां की गोद से ही पड़ जाती है….
२.
मन के अंधेरों में दबा नन्हा बीज – जो रोशनी में आते ही, फलते-फूलते ही, नजर पड़ते ही टूटेगा; रूपरंग और स्वाद के लिए तो कभी बस यूँ ही कौतूहल या फिर ईर्षावश् ही। …

मृत्यु
१.
कोई नहीं जानता क्या रहस्य है और इसके आगे क्या है? पर खोज और जिज्ञासा निरंतर जारी, जबकि मुर्दे कुच कहते ही नहीं।…
२,
किसीके लिए मुक्ति तो किसीके लिए असह्य विछोह…

शैल अग्रवाल
shailagrawal@hotmail.com
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