मंथनः खुद की तलाश में- शैल अग्रवाल

जब हवाई जहाज और हेलीकौप्टर नहीं थे, पांच सितारा होटल से भी अधिक सुविधाजनक ये जलयान नहीं थे, तब भी पर्यटन और यायावरी होती थीं, हर देश और हर धर्म में । धर्म का उल्लेख इसलिए हुआ कि पुराने समय में यात्राओं का और धर्म-स्थलों का गहरा नाता था। अधिकांशतः यात्राएँ धर्म के प्रचार प्रसार के लिए ही होती थीं …चाहे वे क्रिश्चियन क्रूसेडर हों या बौद्ध भिक्षु। चाहे वह दान्ते का इनफर्नो हो या चौसर की कैंटरबरी टेल्स। अरेवियन नाइट हों या कालिदास का मेघदूत …तत्कालीन समय और संस्कृति के दर्पण ही तो हैं काल्पनिक जामा पहने ये स्थानीय जगहों के वर्णन। यदि उन दिनों जोखिम अधिक थे तो वे यात्री भी साधारण नहीं थे। अपनी ही आग से तपकर खरे सोने-से ये अन्वेषक थे जिन्हें नई दुनिया की तलाश थी, विचारक और प्रचारक थे जिनके लिए अपनी बात दूर देशों तक पहुँचना जिन्दगी से भी अधिक मुख्य था। चक्रवर्ती सम्राट और योद्धा थे, जो कण-कण को जीतने का सपना देखते थे।
आज भी तो निकल ही पड़ते हैं हम इन दुर्गम और जटिल यात्राओं पर…ज्ञान तलाशते, शांति तलाशते, जीवन का अर्थ, नए किनारे, नया देश खोजते। यह तलाश और यह भटकन तो सृष्टि की शुरुवात से है चाहे वह वास्कोडिगामा हो, कोलम्बस हो या फिर कल्पना लोक में विचरता एक कवि, लेखक या आम सैलानी। बिल्कुल यान पर उड़ते, जान की बाजी लगाते अंतरिक्ष यात्री की तरह ही उस पल में तो बेहद रोमांचक होती हैं ये दैनिक और साधारण से साधारण यात्राएँ भी।
सौभाग्य और संयोग ही था कि बचपन से जिसकी अदम्य चाह थी, उस अयोध्या नगरी जाने का मौका मिला और आश्चर्य चकित करती, मन में सर्वाधिक तीव्र इच्छा उस जगह को ही देखने की ही जगी, जहां राम ने सदियों पहले जल -समाधि ली थी। प्रखर धूप में सरयू किनारे घाट पर खड़े होकर मन में पहले जो उद्वेलन फिर जो शांति महसूस हुई वह अवर्णनीय है। कहते हैं हर ज्वालामुखी के तले में ठंडे जल के सोते होते हैं। हाल ही में, दो वर्ष बाद अयोध्या वासी एक मित्र ने बतलाया कि मैंने सही पहचाना। इस स्थल को आज भी उर्जा का नाभि-केन्द्र ही माना जाता है और उन्होंने कवि भारत भूषण जी की यह पंक्तियां सुनाकर आंखों के आगे वातावरण पुनः ज्यों-का-त्यों सजीव और चित्रमय कर दियाः

पश्चिम में ढलका सूर्य उठा, वंशज सरयू की रेती से,
रीता रीता हारा हारा, हारा हारा रीता
निशब्‍द धरा, निशब्‍द व्‍योम,
निशब्‍द अधर पर रोम रोम था टेर रहा सीता सीता
तूं कहां खो गई वैदेही, वैदेही तूं खो गई कहां,
मुरझाए राजीव नयन बोले, बोले राजीव नयन बोले
देवत्‍व हुआ अब पूर्णकाम, नीली माटी निष्‍काम हुई,
किस लिए रहें अब ये शरीर, ये शरीर किस लिए रहे,
धरती को मैं किस लिए सहूं, धरती मुझकों किस लिए सहे
मांग भिखारी लोक मांग, कुछ और मांग अंतिम बेला,
कल राम मिले न मिले तुझकों, कुछ और मांग अंतिम बेला,
आंसुओं से नहला बूढी मर्यादाए, कल राम मिले न मिले तुझकों
कुछ और मांग अंतिम बेला
अंदर बस गूंजा भर था, छप से पांव पडे सरयू में
कमलों में लिपट गई सरयू, सरयू लिपटी कमलों में ….
कोलंबस की तरह जीना आसान नहीं है तो हैरी पौटर बन पाना भी तो आसान नहीं।
चांद की धरती पर वह पहला कदम हममें से किसको याद नहीं होगा पर सफर अभी खतम कहाँ? आगे मंगल और शनि जैसे कई-कई और लक्ष हैं अभी तो ढूंढने को, देखने को। बहाना चाहिए बस पंछी दरिया और पवन के झोंके से उन्मुक्त इस मन को जो पिंजरे में और पिंजरे को संग लेकर भी उड़ना चाहता है, उड़ना जानता है। निर्बाध गति से बहने के, दूर तक फैल जाने के अवसर ढूँढता है । बंदिशें , मुश्किलें , सरहदें तोड़ते इस मानव ने सुदूर देशों में विषम से विषम परिस्थिति में सिर्फ घोंसले ही नहीं बनाए, इतिहास तक रच डाला है। दुर्गम से दुर्गम जगहों पर लहराती पताकाएँ गवाह हैं इसकी। नए की खोज, नए से सामंजस्य और सुविधानुसार अपनाना…यही तो उपलब्धि है, विकास यात्रा है गुफाओं से निकलकर आलीशान घरों में सिंहासन पर बैठे माटी के पुतले की। सोचिए अगर जिज्ञासा और कल्पना के पंख नहीं होते तो क्या पहुँच पाते हम उस मुकाम पर जहाँ आज खड़े हैं। पर, मंजिलें तो बहाना मात्र हैं जिज्ञासु मन की। एक ख्वाइश पूरी होती नहीं कि दूसरी जन्म ले लेती है और यही इसकी शायद सबसे बड़ी ताकत भी है और बेचारगी भी। असलियत तो यह है कि यह ख्वाइशों की जंजीरें कभी भारी नहीं लगतीं। सच्चाई यही है कि अभी ऐसे समंदर ही नहीं बने जो इस अदम्य आस और प्यास को बुझा पाएँ।
नई-नई जगहों की खोज…समुद्र की अतल गहराइयों से चांद तक…धरती को तो छोड़ो, पूरे ही सौर मंडल में यह अन्वेषक और सैलानी मानव यात्राएँ कर चुका है, कर रहा है, परन्तु अभी भी कई-कई बृह्मांड हैं जहाँ इसे पहुंचना है, जहाँ तक इसकी पहुँच नहीं हुई हैं, तभी तो शेक्सपियर का एक पात्र कहता है कि होरेशियो तुम्हारे यह चांद-तारे…इनसे गमकता संसार ही सबकुछ नहीं। इससे आगे और अलावा भी बहुत कुछ हैं, जिसकी तुम्हें अभी खबर ही नहीं। उपरोक्त यह वाक्य तब भी उतना ही सही था जितना कि आज है। रहस्यमय हमारी यह दुनिया और ब़ह्मांड…इसकी संरचना आज भी उतनी ही अनजानी और जटिल है, जितनी कि तब थी, हमारी सारी तरक्की और वैज्ञानिक खोजों के बाद भी। परन्तु खोजी और कौतुकमय मानव ने न तो कल हार मानी थी और ना ही कल मानेगा। चाहे इन यात्राओं का इतिहास कितना ही खतरनाक और खर्चीला क्यों न हो!
इन यात्राओं में जहाँ कई-कई सुख और उपलब्धियाँ हैं, आज भी दुश्वारियाँ और कष्टमय निराशा भी हैं। अनचाहे विलंब से लेकर पूर्ण अवरुद्ध, कभी-कभी तो अंग-भंग या जान तक से हाथ धोना पड़ जाता है, बात चाहे एक साधारण रेल या बस यात्रा की हो या फिर अंतरिक्ष उड़ान की। मार्ग में आनेवाली कठिनाइयाँ तक तरह-तरह के दुःस्वप्न दिखला सकती हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि यात्रा पूरी होने से पहले ही शरीर थककर साथ छोड़ देता है और यात्रा अधूरी ही रह जाती है। परन्तु मानव सभ्यता और संस्कृति का इतिहास इन हताश् निराश यात्राओं से नहीं लिखा गया, सारी परेशानियों के बावजूद वह नए गृह-उपगृहों पर झंडे गाड़ रहा है। जो रुकजाए वह यात्री ही कैसा? ऐसी ही एक जोखिमभरी यात्रा है कैलाश मानसरोवर की। इस दुरूह यात्रा में प्रति वर्ष ही कुछ प्राणों की आहुति तो अवश्य ही लगती है, प्रायः उतनी ऊंचाई पर आक्सीजन की कमी की वजह से। फिर भी यात्राएँ होती रहती हैं और होती रहेंगीं।
सोचें अगर कोलम्बस अपनी जोखिमभरी यात्रा पर न निकला होता, तो क्या हमें अपने पड़ोसियों का पता चल पाता…आदान प्रदान, यह व्यापार हो पाता किसी का भी इतनी त्वरित गति और सहजता से और दुनिया अपने इस विकास के इस मार्ग पर चलने की सोच तक पाती! पहले की ली गई इन छोटी -बड़ी जोखिमों का ही नतीजा है कि आज आदमी सिडनी या टोकियो में सुबह का नाश्ता करके लंदन में रात का खाना खा सकता है। जहाँ भारत में अभी तक अधिकांश यात्राएँ तीर्थ-स्थलों से जुड़ी हुई हैं , या फिर गरमी की बाहुल्यता में पहाणों की सैर तक ही सीमित हैं। यूरोप में भ्रमण एक बड़ा व्यापार है। औसत से औसत आदमी भी साल में एक दो बार तो घूमने जाता ही है।
भारत में गोवा , मनाली आदि लोकप्रिय पर्यटन स्थल की तरह विकसित हो रहे हैं और नवविवाहितों के मुख्य पर्यटन स्थल बन चुके हैं। यहाँ के एयरपोर्ट पर लाल चूड़ों से भरी कलाइयों वैसे ही दूर से दिखाई देती हैं जैसे कि पहाड़ों की चोटियों पर लहलहाते देवदार के पेड़… यह बात दूसरी है कि दुल्हनें अब लजाती शरमाती, रेशमी साड़ियों में नहीं, प्रायः जीन्स में हंसती-खिलखिलाती दिखाई पडती हैं।
भारत-भ्रमण ही नहीं, खुद को भाग्यशाली मानती हूँ कि जल-थल और हवाई वाहनों के माध्यम से पचास से अधिक देशों के भ्रमण का मौका दिया है जिन्दगी ने । यात्राओं का एक बड़ा सुख जहाँ विभिन्न और भांति-भांति के अजनबियों से मिलना उनके परम्परागत भोजन और कपड़ों का आनेद लेना है, उनकी हस्तकला और पारम्परिक चीजों को खरीदना और उनका संग्रह भी मेरे लिए एक बड़ा आकर्षण रहा है। सिर्फ उपहार ही नहीं जो साथ लेकर आते हैं हम इन यात्राओं से , स्मृतियों का एक खजाना भी जुड़ता चला जाता है, मोहक.तस्बीरों के रूप में, अनमोल यादों के रूप में।
इन यात्राओं के दौरान कुछ देश ऐसे भी देखे, जो उतने खूबसूरत नहीं थे, फिरभी उनकी यादें आज भी पीछा नहीं छोड़तीं। बेचैन करती हैं। कहीं-कहीं तो सामाजिक और वैचारिक भिन्नता इतनी अधिक दिखी, आज के समाज और जिन्दगी से इतनी भिन्न लगी ये जगहें, कि वास्तविक ही नहीं महसूस हो पाईं… मानो पांच सौ साल पीछे चले गए हम इनमें घूमते-फिरते। ऐसा महसूस होता था जैसे किसी कहानी या इतिहास में विचरण कर रहे हों। इन देशों के बारे में कभी फुरसत से विस्तार में लिखूँगी यदि जिन्दगी ने मौका दिया तो…
अधिकांशतः ये रोमांचक यात्राएं आज भी स्मृति पर चित्रवत् ही अंकित हैं। हजारों यादें रेत के कणों-सी सुधि की धूप में झिलमिल करती रहती हैं। कुछ हीरे सी चमकती, तो कुछ नुनखरी और रेतीली भी, यादों की फटी बिबाइयों से आज भी रिसती और दुखती हुई ।
चूंकि उम्र का अधिकांश भाग यूरोप में ही बीता है और यूरोप निसंदेह संपन्न, विविध और खूबसूरत है, यात्राओं का अनुभव ज्यादातर सुखद ही रहा है मेरे लिए। परन्तु पूरी पृथ्वी सदा ही तो शस्य श्यामला नहीं रह सकती, कितना ही सावन के अंधे को हरा-ही-हरा क्यों न सूझे! मेरे अनुभव भी अपवाद नहीं।

याद आती है ट्यूनिशिया की वह यात्रा जहाँ अचानक ही रंग में भंग हो गया था और हमारी बनाना बोट उलट गई थी। सब डूबते-डूबते बचे थे। या फिर फ्रैंकफर्ट में वह पल भी कम डरावना नहीं था जब जहाज 4 घंटे लेट हो गया था और सभी भारतीय पासपोर्ट धारियों की जहाज के अंदर ही गिनती की गई थी। पूरा नाजियों का इतिहास याद करके मन कांप उठा था उस पल। वह तो बाद में ही पता चल पाया था कि ऐसा बस सिर्फ इसलिए हुआ कि भारत से आए कोई मंत्री जी और उनकी पार्टी जहाज में वापस लौटने के बजाय अभी भी एयरपोर्ट पर सनग्लासेज ही खरीद रही थी और एक साथ 11 व्यक्तियों को छोड़कर जहाज नहीं उड़ सकता था।
आज के इस संदेहपूर्ण और आक्रामक वातावरण में अक्सर ही यात्रियों को घंटों के लम्बे और अनचाहे विलंब का सामना करना पड़ता है, कभी किसी छूटी चेतावनी की वजह से तो कभी किसी यात्री की बेवकूफी या लापरवाही की वजह से। कई बार वजह काफी ठोस और असल भी होती है जैसा कि पिछले हफ्ते भारत से लौटते वक्त की उड़ान के दौरान हुआ। अचानक ही एक यात्री की तबियत खराब हो गई और इलाज के लिए उसे जहाज से उतारना पड़ा था । उसका सामान पहचानते व उतारते-उतारते उड़ान दो घंटे के विलंब के बाद ही उड़ पाई थी।
कभी-कभी तो बिना किसी पूर्व सूचना के भी आजकल उड़ान निरस्त कर दी जाती है , विशेषतः देश के अंदर की उड़ानें …हवाई अड्डे पर पहुंचकर यह कितना निराशा जनक होगा, इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। यही नहीं एक एयरपोर्ट की जगह यह आपको तीन-तीन एयरपोर्ट भी घुमा सकती हैं और जहाज के अंदर भारतीय रेलयात्रा जैसा पूरा आनंद लेता हैं यात्री भूलकर कि वह जहाज में इसलिए बैठा था क्योंकि उसके पास वक्त कम था या फिर वह गन्तव्य पर शीघ्रातिशघ्र पहुँचना चाहता है। एकबार आपने टिकट ले ली तो फिर आपके वश में कुछ नहीं, सिवाय कोसने और दुखी होने के। कुछ ऐसा ही अभी हाल में वाराणसी से भुवनेश्वर जाते हुए हमें बर्दाश्त करना पड़ा था… फर्क नहीं पड़ता तब कि आपकी टिकट कितनी सस्ती या मंहगी है या आपके पास कितना नियंत्रित समय है।
यूँ तो प्राचीन और अर्वाचीन के बीच का समंजस्य ही मानव सभ्यता की विकास यात्रा है, परन्तु कई जगहों पर नए और पुराने के बीच में जबर्दस्त खींचातानी और एक स्पष्ट विरोधाभास भी दिखा। कुछ ऐसे भी देश थे जहाँ पर्यटकों की भरपूर लुटाई की व्यवस्था रहती है, चोर उचक्कों के द्वारा नहीं, खुद वहाँ के प्रशासकों द्वारा ही।
रम्य और रमणीय रहें ये यात्राएँ इसके लिए पर्यटकों की सुख-सुविधा का भरसक ध्यान रखना ही होगा सिर्फ उनके जेब के अंदर रखे माल की गिनती ही नहीं। खाए, अघाए देशों को भूल जाएँ तो अभी भी भूख और गरीबी…उनसे उत्पन्न समस्याएँ विचलित करने को पर्याप्त रूप से फैली पड़ी हैं चारो तरफ। कई-कई अमीर देशों में भी भूख व गरीबी आराम से पांचतारा होटलों के साथ-साथ ही उनके अगल-बगल में ही पनपती देखी जा सकती है। कितना कुरूप और वीभत्स है यह हमारी विकसित सभ्यता का चेहरा… और तब चारो तरफ फैली यह मौकापरस्ती व धोखाधड़ी भलाई में पूर्ण विश्वास करने से रोकने लग जाती है एक आम पर्यटक को। सब बनावटी लगने लगता है। भीख मांगते हाथ भी कई बार चोर उचक्कों में तब्दील हो जाते हैं। खबरों में सुनना और देखना दूसरी बात है परन्तु प्रत्यक्ष में देखा और अनुभव किया सबक आदमी कभी नहीं भूलता- ऐसा ही व्यक्तिगत अनुभवों का निष्कर्ष रहा है। ये यात्राएँ स्वर्ग दिखाने के साथ-साथ, न सिर्फ उजागर करती हैं कई छद्म परिस्थितियों को अपितु उनसे सावधान करने की भी कोशिश करती हैं…नित नया कुछ दिखाती और सिखाती हैं ये हमें।…
दुर्गम, अपरिचित और अबूझ से खेलना, गुत्थियाँ सुलझाना , हर यात्रा का भी अभिन्न हिस्सा है और मानव के स्वभाव का भी। यह रास्ते की थकान और उड़ान, अपरिचित और अबूझ की पहली पहचान ही तो है जो खींचती है, थकने नहीं देती। लगातार प्रेरित करती रहती है, बारबार उठ खड़े होने को, फिर-फिरके चल पड़ने को। शायद एक नशा या लत है यह घुमक्कड़ी भी। यात्रा के इस रोमांच को जिसने भी एकबार चख लिया, दूर रह पाना उसके लिए संभव ही नहीं। धनाढ्य, पाश्चात्य देशों में मान्यता है कि स्फूर्ति और उर्जा बनाए रखने के लिए वर्ष में कम-से-कम दो बार पर्यटन पर संभव हो तो हरेक को अवश्य जाना चाहिए। इससे न सिर्फ जीवन की एक रसता टूटती है, इन्सान तन और मन दोनों से ही नया हो जाता है और उँघने की बजाय अपने काम को दुगनी उर्जा से कर पाता है।
मां बाप के संग बचपन में घूमे उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों और विद्यार्थी जीवन में गर्मी की छुट्टियों में पहाड़ों की सैर ( मुख्यतः नैनीताल) को भूल जाऊं, ब्रिटेन के समुद्री किनारे, पहाणों और हरे भरे बाग-बगीचे और सरसों के खेत जिनके बीच रोज ही घूमे हैं, उन्हें ही क्यों, हर प्रिय नदी झरने के किनारे, रोमांचक जंगल और समुद्र की लहरें, सभी को भूल जाऊँ तो पहली यादगार यायावरी हुई स्कैंडिनेवियन देशों की जिसमें कई अनजान देश ( स्वीडेन, डेनमार्क, नौर्वे और फिनलैंड घूमे थे हम, उनके बीच में रहे भी थे। इसी यात्रा के दौरान जर्मनी के ब्लैक फौरेस्ट से भी गुजरना हुआ था जो अपने आप में एक यादगार और रोमांचक अनुभव था। इंगलैंड में तो रह ही रहे हैं,यूरोप और यूरोपियन संस्कृति का भी थोड़ा बहुत अनुभव हुआ , उसे थोड़ा बहुत जाना और समझा। जहाँ मेरे लिए कई चीजें नई थीं, यूरोपियन भी कभी हमारे खूबसूरत भारतीय परिधानों की तरफ आकर्षित होते तो कभी नाक की लौंग पर। जब संगम फिल्म देखी थी तो विश्वास नहीं हुआ था कि वाकई में इन्हें हम भारतीय इतने अच्छे लगते हैं, बस इनकी नफरत की कहानियाँ ही सुनी थीं पर यूरोप घूमते विशेषकर स्वीडेन डेनमार्क और पैरिस में कई बार सुनने को मिला कि साडी कितनी सुंदर है, बाल कितने सुंदर है बिल्कुल मरमेड की तरह । और यह नाक की कील धूप में चमकती है तो बहुत ही सुंदर लगती है। क्या ऊपर से चिपकाई है , हम भी ट्राइ कर सकते हैं क्या…वगैरह वगैरह। तब सत्तर के शुरुवाती और मध्य के वर्षों में शायद इतने भारतीय नहीं दिखते थे इन्हें और दिखते भी थे तो कम ही, जिन्हें अपनी भारतीय संस्कृति की खूबसूरती पर पूरा विश्वास था और पूरे आत्म विश्वास के साथ इन्हें समझा सकते थे कि भारत सिर्फ भूखे-नंगों का ही देश नहीं है।
कुछ परिवारों से मिलना-जुलना भी हुआ इस यात्रा के दौरान । भारत से बाहर मिलने पर हर भारतीय परिवार के बिछुड़े सदस्य-सा लगता, जिनसे मिलकर एक अजीब संतुष्टि मिलती। अक्सर रात में नाइट क्लब और स्थानीय सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने का मन बनता। एक ऐसा भी क्लब था जहाँ पांच साल से छोटे बच्चे के साथ जाने की अनुमति नहीं थी और तब ऐसे में हमें स्थानीय और विश्वशनीय परिवार में बेटी की निजी बेबी-सिटिंग करवानी पड़ी, जो कि उस मंहगे नाइट क्लब की टिकट जितनी ही मंहगी थी पर सार्वजनिक क्रश में बेटी को छोड़ना पतिदेव को मंजूर नहीं था और बिना बेटी की सुरक्षा के प्रति पूर्णतः संतुष्ट हुए शो देख ही नहीं सकते थे हम। इन देशों के लोग भी उतने ही सहृदयता से बच्चों की देखभाल करते है जितने की हम-आप। लौटे तो खिलौनों से लदी-फंदी बेटी ने हंसकर ही स्वागत किया था हमारा। शुरु में थोड़ा बहुत सहमी थी पर बाद में उनके हमउम्र बच्चों के साथ खुश-खुश खेलती रही थी। बच्चों की छटी इंद्रिय हम बड़ों से अधिक तीव्र होती है।
छोटे से कैंप और दो साल की बेटी को लेकर अकेले ही तो चल पड़े थे हम दोनों इस रोमांचक पर्यटन पर । घूमते-घूमते जहाँ भी मन रमता, वहीं रुक जाते थे। देखते-देखते तम्बू गड़ते ही, मिनटों में रैनबसेरा तैयार हो जाता हमारा। शयनकक्ष और चौके के साथ दो भाग थे इसमें। जबतक सोने के बिस्तर आदि व्यवस्थित होते उसी तम्बू के आगे के हिस्से में जो मिनटों में चौके और बैठकी की शकल ले लेता था , झटपट कुछ हलका-फुलका गरम भारतीय मसालेदार खाना तैयार हो जाता जो दोपहर के बाहर के यूरोपियन खाने से कहीं अधिक स्वादिष्ट जान पड़ता हमारी पक्की भारतीय स्वाद ग्रंथियों को। पंद्रह उन बेफिक्र दिनों की करीब करीब हर शाम की ही यही ड्रिल थी, सिवाय चारो देशों की राजधानियों के जहाँ दो-दो रात रुके थे हम और जहाँ सौभाग्यवश हमें भारतीय रेस्तोरैंत भी मिल गए थे वहाँ पर वरना शाकाहारियों का गुजारा तो पनीर टमाटर और खीरे की सैंडविच और फल आदि खाकर ही होता था उन दिनों। ये यूरोप में बेहद आरामदेह और हर तरह की सुख-सुविधाओं से भरपूर पर्यटकों के लिए बने तम्बुओं के शहर हैं, जहाँ बजार भी हैं और क्लब भी। वाशेटेरिया नहाने और कपड़े धोने व सुखाने की हर सुविधा के साथ । बच्चों के लिए पार्क भी । इनकी तर्ज पर भारत में भी बन रहे हैं शिविर शहर पर्यटक स्थलों पर। परन्तु भारत में ये शिविर बेहद मंहगे हैं और सिर्फ अमीर ही इनका आनंद ले सकते हैं। जबकि यूरोप में ये शिविर उत्साही पर्यटकों के लिए हैं और हर रेंज के हैं ताकि अमीर-गरीब सभी इनका आनंद ले सकें। वह पहली यूरोप यात्रा की यादें आज भी रोमांचित करती हैं । तबसे अबतक लगातार ही घूमने जाते रहे हैं पर वे पहली दो यात्राएं जो पांचतारा होटल नहीं , तम्बुओं में एक पर्यटक सी घूमकर थोड़े रफ अन्दाज में की थीं । यह वे दिन थे जब यूरोप के कुछ देश जैसे बेलजियम फ्रांस आदि में लोग अंग्रेजी बोलने से कतराते थे और फ्रेंच न आने की वजह से हमें कई बार अभिनय करके इच्छित वस्तु और मार्ग के लिए पूछना पड़ता था। हद तो तब हुई थी जब ब्रसेल्स में पिस्सी बौय देखने जाना था और रास्ता भटके, थके पतिदेव उसी मुद्रा को करके वहाँ पहुँचने का रास्ता पूछने लगे थे। मैंने तो असमंजस और शरम से आँखें बन्द कर ली थीं, पर वह वयोवृद्ध सज्जन तुरंत ही समझ गया था और बहुत प्यार से प्रसिद्ध लैंडमार्क के रास्ते का मानचित्र खींचकर इन्हें दे दिया था, जिसके सहारे हम आराम से पहुँच भी गए थे। आज भी तो चित्र-सी ही स्पष्ट हैं वे मुस्कुराती-खिलखिलाती यादें ।
इन पाश्चात्य देशों से अभी भी पर्यटन और इसके विकास को लेकर बहुत कुछ सीखा व जाना जा सकता है। इनका सुनियोजित संचालन, साइन पोस्टिंग आदि कुछ ऐसी चीजें हैं जिनका हम भी पर्यटकों की सुविधा के लिए अनुकरण कर सकते हैं।
भारत में पर्यटन के नाम पर सिर्फ तीर्थ यात्राएं ही थीं अभीतक, जो कि हमारे ज्ञानी पूर्वजों ने बहुत सोच-समझकर चारो दिशाओं और दुर्गम प्राकृतिक क्षेत्रों में नियोजित की थीं ताकि धर्म के बहाने ही पूरा भारत भ्रमण किया जा सके । परन्तु आज विश्वग्राम के चलते स्थान-स्थान पर मनोरंजक पर्यटक स्थल बन चुके हैं , जहाँ आप धार्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक और मनोरंजक यात्राएं भी कर सकते हैं। भारत के विभिन्न प्रांतों के भोजन और वेश भूषा आदि का आनंद ले सकते हैं। शहरी जिनके लिए ग्रामीण जन-जीवन एक अजूबा-सा है , चाहें तो उसका भी भरपूर आनंद ले सकते हैं। हाल ही की कच्छ की यात्रा और रान महोत्सव के शिविर में रहना एक ऐसा ही अनुभव था। यूँ तो शादी के बाद तीन दिन पहलगाम में भी तम्बू में रहे थे जो कि नदी के किनारे बहुत ही रम्य स्थान में थे और हर आधुनिक सुविधा से सज्ज थे। श्रीनगर में शिकारों में रहना भी अपने आप में एक सुखद अनुभव था। खिलन मर्ग और गुलमर्ग की कौटेज …वाकई अभी भी बहुत कुछ है कश्मीर में जो स्विटजरलैंड सा ही सुंदर है भारत में। कश्मीरी कपड़ों में सिर्फ फोटो ही नहीं खिंचवाई थी एक कश्मीरी परिवार जिससे पहलगांव क्लब में मुलाकात हुई थी उनके यहाँ भी उनके आमंत्रण पर एक ब्रिज की शाम और रात गुजारी थी हमने। मौरिशश के पांचसितारा होटल में भी एक दिन भारतीय रहन-सहन का आयोजन किया गया था। यूरोपियन के लिए मौरिशियन-भारतीय परिवार में एक दिन खाना-पीना और वक्त गुजारना निश्चय ही एक अच्छा अनुभव रहा होगा। हमने वहाँ अपना वह दिन वहीं समुद्र के किनारे होटल में ही गुजारा था। आधुनिक सुख-सुविधाओं के सभी साधन उपलब्ध हैं-बूढ़े-बच्चे, जवान सभी के लिए इन पर्यटक स्थलों पर और आप जब चाहो तभी किसी देश और प्रांत के भोजन का आनंद उठा सकते हो । कुछ भी दुनिया के किसी भी देश और कोने का खरीद सकते हो। और हो भी क्यों ना, पहले जहाँ सिर्फ साधु सन्यासी और ज्ञानी-ध्यानी जान की जोखिम उठाकर यात्राएँ करते थे, अब सभी करते हैं, कर सकते हैं अपनी रुचि और सामर्थ अनुसार। इंद्रलोक सी सुविधाओं से भरपूर नित नए पर्यटन के प्रचार और आमंत्रणों की वजह से माया लोक में खोए बच्चे से डूब जाते हैं हम इन यात्राओं में। क्या खोज रहे हैं और कहाँ जाना है जाने बगैर ही निकल पड़ते हैं अपनी बैटरी रिचार्ज करने। ऐसी ही कुछ यात्राओं की सुखद यादों को संजोया है हमने इस किताब में । निश्चिय ही खुली सड़क पर दौड़ते हुए चीते का सामने आ जाना जितना रोमांचित करता है, भय देता है, सफारी पार्क में वह अनुभूति नहीं मिल सकती। जैसाकि हमारे साथ रानीखेत से कसौली जाते वक्त हुआ था। पर मजे की बात यह थी कि हम चीते से डर रहे थे और चीता हमसे। कार की हेडलाइट पड़़ते ही वह यह जा और वह जा, लोमड़ी-सा ही तो भाग गया था वह ।…
दुनिया भर के वैविध्य और वैभव के बावजूद भी पहला प्यार सदैव भारत ही रहा है, तभी तो स्मृतियाँ प्रायः वहीं जाकर रम जाती है;कहीं भी कितना भी घूम और रच लें बिना भारत की धरती के, वहाँ के हालचाल लिए मानो सब अधूरा-सा ही रह जाता है। सौभाग्य ही था कि पिछले वर्ष यानी 2017-18 में चार महीनों में जल्दी-जल्दी दो बार भारत जाने के अवसर मिले और एक पर्यटक की तरह भी घूमे हम …गोवा, मुंबई, भुवनेश्वर, कोणार्क और जगन्नाथ पुरी…फहरिस्त विविध और रोचक है। पांचाल प्रदेश फरुक्खाबाद में दुर्वासा ऋषि का आश्रम देखा जो अब एक सफल गोशाला भी है। बनारस में नौका बिहार करते समय रात के अंधेरे में काशी को गोदी में समेटे गंगा मां के दर्शन का एकबार फिर सौभाग्य मिला और एक बार फिर मन में वही भावों का आलोड़न था । एक तऱफ जहाँ घाट की रंग-बिरंगी रोशनी की परछाँइयाँ मन में अभूतपूर्व शांति और उल्लास भर रही थीं, वहीं दूसरी तरफ जलती चिताओं की लपटें उदास विरक्ति…वही कौन था…कैसा था…तरह तरह के सवाल और जवाब और वही असह्य गंध थी।

कई मंदिर भी देखे- पुरी का, लिंगराज का। परन्तु पुरी के पास रघुराजपुर गांव में घूमना अपने आप में एक अभूतपूर्व अनुभव रहा। कागज और सिल्क पर पेन्टिंग के अलावा स्थानीय कलाकार ताड़ के पत्तों पर अपनी लेखुनी से अद्भुत आकृतियाँ उकेर रहै थे और फिर उन्हें काली स्याही में भरकर खूबसूरत कलाकृतियों का रूप दे दिया जाता था। हमने भी उनकी लेखुनी के साथ ताड़ के एक पत्ते पर अपना हाथ अजमाया और फिर जब उसने एक कलाकार की तरह हमारा अभिनंदन किया और हमें एक तस्बीर तुरंत ही कागज पर खींचकर सौगात में दी तो हमारा मन भी एक बार तो बच्चे-सा ही किलक उठा था। हमने भी तुरंत ही वह लेखुनी और एक पेन्टिंग व कुछ छोटी मोटी दूसरी कलाकृतियाँ खरीदकर अपनी कृतज्ञता जताई और धरोहर की तरह उन्हें समेटकर बेहद पुलकित मन से उन समर्पित कलाकारों से विदा ली।
कोणार्क जाना तो मानो मन में पलता एक सपना था जाने कितने वर्षों बाद साकार हुआ। रोमांच वैसा ही था जो रामेश्वर के पुल से खड़े होकर श्री लंका को देखने पर महसूस हुआ था और संतोष भी वही था जो कन्याकुमारी में विवेकानंद टापू पर खड़े होकर मिला था। हम इतिहास को जी रहे थे उन पलों में। वहाँ जाकर जो खुशी हुई वह अपने आप में एक उपलब्धि जैसी थी। कोणार्क भव्य है और अतीत के सारे गौरव को आज भी वैसे ही अक्षुण्ण रखे हुए है। पत्थर पर कटाई और कशीदाकारी के जितने रोचक और सूक्ष्म नमूने हमें भारत में मिलते हैं, पूरे विश्व में आज भी बेजोड़ हैं, वह भी सभ्यता के आदिकाल से । खजुराहो, कोणार्क , मीनाक्षी मन्दिर और रनकपुर आदि कई ऐसी जगहें थीं जिन्होंने अपनी बारीकी और भव्यता से पूर्णतः अचंभित किया है और केदारनाथ , अमरनाथ आदि जिन्होंने अपनी दुरुहता और रहस्यमय वातावरण से।
कोणार्क और पुरी के बीच स्थित ऱेत की आकृतियों का वह संग्रहालय भी शायद ही कभी भूल पाऊँ, अद्भुत कलाकृतियाँ थीं वह भी पत्थर या काष्ठ पर नहीं, भुरभुरी रेत पर बनी।
पुरी में सागर किनारे वह मोती बेचने वाला भी भुलाए नहीं भूलता , जिसने तीन दिन तक रोज इंतजार किया क्योंकि बुखार के रहते वहाँ वापस नहीं लौट पाई थी और उससे मैंने वादा किया था कि आऊंगी अवश्य, उसकी कुछ मालाएँ अवश्य ही लूंगी। फिर जब आई और बाद में अंधेरे में अकेली बैठी लहरों को देख रही थी तो दूर बैठा वह भी मेरी चौकीदारी करता रहा था। फिर अंत में होटल के अंदर पहुंचाकर ही गया था। ऐसा क्यों? सामने ही तो होटल था- पूछने पर बोला- दीदी आपको अकेला छोड़कर भला मैं कैसे जाता! अपरिचितों से इतना स्नेह और इतनी परवाह…मन अनजाने ही भीग-भीग गया। शायद दीदी शब्द का ही वह जादू था।
परिजनों और मित्रों से मिलने-जुलने के साथ-साथ भारत के विभिन्न प्रान्तों के भ्रमण में कई अविस्मरणीय पल आए। परन्तु वह आत्म संतोष और आत्मीयता का अनुभव जो भारत में होता है कहीं और संभव ही नहीं।
मुंबई और गोवा दोनों ही जगह पहले भी तीन-चार बार जा चुकी हूँ परन्तु हाल ही में और पहली बार गोवा और मुंबई भारत से मिलने नहीं , एक पर्यटक की तरह पहुंची थी; वैसे ही जैसे ग्रीस या स्पेन या फिर अन्य किसी यूरोपियन देश घूमने जाते रहे हैं हम और इमारतों को , प्रकृति को देखकर लौट आते हैं। न किसी अपने से मिलने का इंतजार और ना ही किसी को अपना ही। अच्छा तो लग रहा था परन्तु अनियंत्रित नेह जल में भीगे मन में न तो बेवजह तितलियाँ ही फड़फड़ा रही थीं और ना ही जहाज के जमीन छूते ही रोंगटे ही पुलक-पुलककर उस बेताबी से खड़े हो रहे थे! फिर भी भारत तो भारत…जाने क्या था उस हवा में, उन चेहरों में, उस चिरपरिचित भाषा की ध्वनिओ में कि उतना वीतराग रह पाना संभव ही नहीं हुआ…हजार डरावनी कहानियों और चेतावनियों के बाद भी नहीं।
जब कोई अपना नहीं होता तो सब अपने हो जाते हैं बिल्कुल उस निर्गुण भगवान की तरह ही, जो दिखे या न दिखे कण-कण में व्याप्त है…विशेषतः ऐसी जगहों पर और परिस्थितियों में जिनसे भावात्मक लगाव हो या जिन्हें हम अपना मानते हों। एकबार फिर भारत की धरती पर पैर रखते ही मन फिर उसी अपनत्व से निहार रहा था कण-कण को। विकास , सफलता-असफलता के बारे में गुनन-मनन कर रहा था… सब कुछ ही पलट पलट के निरख-परख रहा था।
नई नई उठती इमारतों और सड़कों की दशा बता रही थी कि विकास है तो पर आम आदमी की क्या स्थिति है आज के भारत में …यह जानना भी जरूरी हो चला था मेरे लिए… कितनी भागीदारी है उसकी इस ऩए भारत की खुशियाली में और अंतर्राष्ट्रीय निखरती छवि में? क्या विकास का अर्थ सिर्फ व्यापार और संचय है …नेतृत्व और ताकत है? कमजोर और निर्बलों के सपने और आंसुओं की इनमें कोई सुनवाई, कोई पहचान नहीं!
जिज्ञासा और जानकारी का पहला स्त्रोत वह टैक्सी ड्राइवर ही बना जो होटल की तरफ से इंगलैंड से आए सैलानियों को लेने आया था परन्तु वेषभूषा और भाषा में ही नहीं मन से भी पूर्णतः भारतीयों को पाकर आश्वस्त था और काफी हद तक खुल भी चुका था। अब हर छोटे से सवाल के भी बौरेबार विस्तृत जवाब थे उसके पास।
‘ झुंड के झुंड आते हैं जी ये विदेशी…विशेषतः सरदियों में। सस्ती शराब और ड्रग्स के लालच में। पैसा आ रहा है तो यहाँ भी सबकी आँखें बन्द ही हैं।‘
‘ तो क्या गोवा का आम नागरिक खुश नहीं, इस पर्यटन से?’
‘है भी और नहीं भी। ‘
‘ पैसा तो आ रहा है पर आम आदमी के लिए सबकुछ मंहगा होता जा रहा है। इतने पर्यटकों के घर और होटल बन रहे हैं कि जमीनों के दाम आसमान छूने लगे हैं। हम जैसे तो घर बनाने की सोच ही नहीं सकते अब यहाँ। जो पुर्तगाल जा सकता है , जाना चाहता है। वहाँ से तो फिर पूरा यूरोप खुला है उसके लिए। मेरी बेटी इंगलैंड में है। पढने में तेज थी तो आई. टी. सेक्टर में अच्छी जौब लगगई वहाँ पर। बुलाती है। जाऊंगा भी, पर पहले थोड़े पैसे जमा कर लूँ। ‘
यह सपनों के भारत का नया विवरण और रूप था मेरे लिए। यह कैसा विकासोन्मुख भारत है जहाँ आम आदमी को चैन नहीं और वह वहाँ बसने के नहीं बाहर निकलने के सपने देखता है।
हर आंख में एक सपना दिखा पर अतृप्त और आधा-अधूरा …डूबते को तिनके का सहारा जैसी ही आस थी वह।
आज जब कहीं किसीसे कुछ छुपा नहीं, हर आदमी वही वैभव और ऐशो आराम चाहता है जो विकसित देशों में है। स्वदेश और परदेश एक परिकथा एक आदर्शवादी शब्द बनता जा रहा है। अब तो जहाँ रोटी रोजी, वही स्वदेश …बात समझ में आ रही थी।
मुंबई जिसे माया नगरी भी कहते हैं-ने भी इसी बात की पुष्टि की। एक तरफ ताज महल जैसे पांच तारा होटलों का वैभव था, अथाह खाने पीने का सुख और व्यंजन थे चारो तरफ तो दूसरी तरफ ऐसे भी दिखे जो उन्ही मंहगे रेस्तोरैंत की झूठी प्लेटों से बचाने लायक बचा-बचाकर रख रहे थे, बहुत दीन अनाथ हैं कई, आराम से ले लेते हैं यह सब कह और सहहकर।
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बिहार और ईस्टर्न यू.पी. से आए टैक्सी ड्राइवरों की भरमार है मुंबई में। महाराष्ट्र में यह दूसरे प्रांतों से आए प्रवासी असंतोष का कारण भी हुए हैं। ये टैक्सी ड्राइवर अपने ही देश में उन्ही प्रवास की समस्याओं से जूझते दिखे जिनसे एक आम प्रवासी विदेश में जूझता है। टूटने और जड़ों से उखड़ने का दर्द और फिर वापस जड़ें जमाने की वही जुझारू जद्दो-जहद थी वहाँ भी।
‘ तेइस साल से टैक्सी चला रहा हूँ पर अभी तक परिवार को नहीं बुला पाया हूँ। मैं ही चला जाता हूँ। साल में दो बार। ठंडा गरम जो भी मिला पेट भर लिया। यह भी कोई जीना है। बहुत कठिन समय देखा है मैंने दीदी।‘
( जाने कब वह मैडम से दीदी शब्द पर आ गया था , खुद मुझे भी पता नहीं चल पाया।)
‘वहीं खेती बाड़ी क्यों नहीं की? ‘
‘ कुछ नहीं बचता उसमें। कोई सुविधा नहीं, पानी बिजली किसी भी चीज की। जो थोड़ा बहुत बचता है पटवारी, अफसर वगैरह की चिरौरी में निकल जाता है। ऐसे में घर गांव छोड़कर बाहर निकलना ही पड़ता है हम जैसों को। ‘
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‘सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से कि खुशबू आ नहीं सकती कागज के फूलों से।‘ वह दूसरा टैक्सी ड्राइवर शायराना और दार्शनिक मिजाज़ का था।‘ तरक्की होगी जिनके लिए होगी। नोटबंदी ने हम जैसों को तो मार ही दिया है, मैडम। जो काले धंधे करते थे बड़े चोर थे उनके पास आज भी सौ तरीके हैं काले को सफेद करने के। घुन की तरह पिसे तो बस छोटे और बिचौलिए । सारी घुमाई-फिराई मौज-मस्ती काले धन से ही तो होती थी, जो अब बहुत कम हो गई है क्योंकि पैसा ही नहीं है लोगों के पास फेंकने को। आप बाहर वालों की आंख में देश तरक्की कर रहा होगा पर हमारे जैसे तो कल भी आधा पेट ही खाते थे और आज भी वैसे ही सोते हैं। ‘
अब वह चुपचुप टैक्सी दौड़ा रहा था। बीच-बीच में यह मुकेश अम्बानी का घर है और यह लता मंगेशकर का। सलमान खान और शाहरूख खान भी यहीं रहते हैं, आदि कहकर एकाध इमारत की तरफ इशारा करके कुछ बता देता और यात्रा को रोचक रखते हुए संवाद जारी रखता। शायद ऐसे ही लड़ता था वह अपनी भूख, नींद और थकान से।
रात के एक बज चुके थे, सात बजे से वह हमारे साथ था। पांच मिनट में आया कहकर गया और अपने लिए गरम खाना ले आया। पर हमारे उतरते ही नई सवारी बैठ चुकी थी टैक्सी में। पता नहीं खाने का वक्त कब मिलता होगा उसे।
जी.डी.पी. में वृद्धि, विदेशों में भारत की बढ़ती साख मन को गौरव से भर देती है पर अभी भी बहुत कुछ है जो मन में कसकता है…आम भारतवासी का जीवन कब खुशहाल होगा! सोचने पर मजबूर हूँ काश् हमारे नेता भी अपने-अपने हेलिकौप्टरों से उतरकर इन आम आदमियों के बीच भी घूमते, उनका दुखदर्द समझने की कोशिश करते, तो शायद अहसास होता कि अभी भी अपने इस देश में कहाँ कहाँ पर और कैसे कैसे व कितनी विकास की जरूरत है! मदद कहाँ और कितनी देश के अंदर भी मिलनी चाहिए। कहते हैं चैरिटी बिगिन्स एट होम… क्या रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बेसिक जरूरतों के बिना भी देश का विकास संभव है… चन्द भरे पेटों को भूल जाएँ तो जबतक आलीशान इमारतों के अंधेरे सायों में झुग्गी-झोपड़ियाँ है …आधे-अधूरे सपनों की कब्रें और आहें हैं, देश में खुशियाली, एक दूर का भटका हुआ सपना ही है…माना विदेशों में भारत की इज्जत बढ़ी है पर देश तभी खुशहाल कहलाएगा जब सर्वांगणीय विकास होगा। आम आदमी खुश होगा और भारत से बाहर नहीं भारत में ही वह सब पा जाएगा जिसकी चाह उसे भटकाती रहती है।
अजंता और एलोरा न जा पाने का दुख रहा क्योंकि एलिफेंटा गुफाओं की घुमाई ने प्यास और बढ़ा दी थी परन्तु तीन दिन अस्वस्थ होने की वजह से बेकार हो चुके थे और वक्त की गुल्लक से हमारी घुमाई के चन्द खोए दिन कम थे अब। यूँ तो चीन, मेक्सिको, जिबराल्टा और नेपाल के अलावा और भी कई जगह तरह तरह की गुफाएं, भित्ति चित्र और नैसर्गिक खनिज फौर्मेशन देखें हैं पर मन बचपन से ही अजंता एलोरा में ही अटका हुआ है। भगवान ने चाहा तो जल्द ही, वह भी…

शैल अग्रवाल

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