बाल कहानीः मित्र चांदवासी -शैल अग्रवाल


अँधेरा घिरना शुरु ही हुआ था कि फक् चांद निकल आया और पूरा कमरा रोशनी से भर गया।

शिवि सोने की कोशिश कर ही रही थी और अभी आधी सोई व आधी जगी-सी ही थी कि अचानक महसूस हुआ कि खिड़की पर कोई है, जो लगातार उसे ही देख रहा है।

‘कौन हो सकता है पर यद, वह भी रात में इस वक्त?’

शिवि बेचैन हो उठी पर पास जाकर देखने की हिम्मत नहीं थी उसमें और वापस सो भी तो नहीं पा रही थी वह। उठ बैठी तुरंत ही और आँखें मलकर दोबारा देखा तो बस एक चिड़िया सी फरफराहट सुनाई दी उसे और वह कपास के फूल जैसी भूरे रंग की आकृति थोड़ी हिली डुली भी। पर फिर तुरंत ही सीधी तनकर वापस बैठ भी गई, मानो कहना चाहती हो, ‘नहीं नहीं, तुम गलत नहीं देख रही हो, मैं वाकई में हूँ यहां पर और तुमसे ही मिलने आई भी हूँ।‘

आश्चर्य तो उसे तब और भी ज्यादा हुआ, जब उसने देखा कि बस एक बड़ी-सी आँख ही थी उसके पूरे भूरे और गोल-मटोल चेहरे पर, वह भी बिल्कुल चेहरे के बीचो-बीच टकी-सी। हमारी तरह से दो नहीं बस एक ही आँख इतने बड़े चेहरे पर बिल्कुल शिव जी की तीसरी आँख की तरह। और कुछ नहीं, न मुंह, न नाक , न कान, मानो मात्र देखकर ही उसके सब काम हो जाते थे।

बस नुकीले फर का एक गुत्छा-सा ही तो था वह पूरा जीव।

पर एक आश्चर्य और हुआ तभी।

जैसे ही उसकी आँख उस विचित्र जीव से मिली एक रौशनी की लकीर कौंधी और उस पर बैठकर उड़ता-सा वह मिनटों में ही बिस्तर के बगल में रखी मेज पर आ बैठा। वहीं जहाँ अभी-अभी मम्मी उसके द्वारा आधा पिया दूध का गिलास रखकर गई थीं, कड़ी हिदायत के साथ कि पूरा पीना ही है।

‘कहीं इसी दूध के लालच में तो नहीं घुस आया है यह?’

‘नहीं, नहीं तुम्हारी तरह खाना-पीना नहीं खाते हम। बस विचार-तरंगों पर ही जीवित रहते हैं। ‘

अब शिवि वाकई में हैरान थी और थोड़ी डरी हुई भी ।

‘खिड़की तो बन्द थी और कांच में छेद भी नहीं था , फिर यह चिड़िया या फूल, ओह, चाहे जो भी समझो, अंदर कैसे आया?’

बिना होठों के ही वह अब मुस्करा रहा था अपनी एक उसी बड़ी आँख को खुशी में गोल-गोल घुमा रहा था। आँख भी इतना खिलखिलाकर हंस सकती है , नया अनुभव था यह भी नन्ही शिवि के लिए।

‘हम विचार-तरंगों पर यात्रा करते हैं। यही हमारी प्राण-वायु है। हमारी उर्जा है। फिर हमारे लिए खुला बन्द कुछ भी नहीं। जिसने याद किया दिल से, हम हाजिर। पर डरो मत तुम हमसे। मित्र हूँ तुम्हारा मैं और तुम्हारे याद करने पर, हमारे बारे में लगातार सोचते रहने से चन्द्र लोक से आया हूँ तुमसे मिलने। मित्रों का बहुत महत्व है हमारे यहाँ। स्नेह ही सबकुछ है वहाँ। जिस दिन यह नष्ट हुआ मन से, हम नष्ट हो जाते हैं खुद ही। फिर कोई नेह से भरा नया रूप लेकर जी भी पड़ते हैं , अगर किसी ने बहुत शिद्दत से याद किया तो? तुम सांइंस के क्लास में बारबार अध्यापिका से पूछ रही थीं न कि यह जो नया यान चंद्रमा के उस हिस्से में गया है मैम, जहाँ अभी तक कोई नहीं गया, तो वहाँ उन्हें क्या मिला?’

‘क्या मिला?‘

शिवि अब कौतूहलवश उठकर खड़ी हो चुकी थी और उसे अपने इस नए फरी गोलमटोल एक आँख वाले दोस्त से डर भी नहीं लग रहा था।

‘मिलता क्या? बस हम। और कुछ है भी तो नहीं वहाँ पर। पर वह तो हमें घास-पूस या भूरे रंग की निर्जीव चट्टान पर उगी सूखी घास समझकर छोड़ आए थे। हमारी तरफ ठीक से देखा तक नहीं । वैसे भी देखते भी क्या ? हममे तो देखने लायक तो कुछ है ही नहीं। पर महसूस करने को बहुत कुछ ।‘

‘जैसे?‘

जब उसने पूछा तो उसने अपनी औक्टोपस जैसी हिलती-डुलती बांहें फैला दीं, मानो शिवि से हाथ मिलाना चाहता हो, या फिर उसके थोड़ा और नजदीक आना चाहता हो।

बांहें क्या, बस नुकीले फर ही तो थे जो लम्बे होकर उसके हाथ तक आ पहुँचे थे। पर उनका वह नजदीकी अहसास बेहद कोमल और नाजुक था, बिल्कुल फूलों की पंखुड़ी जैसा-ही और पूरा प्यार और अपने-पन से भरा हुआ भी।

शिवि ने भी तब अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया। और उसे लगा कि चांदवासी दोस्त अब उसका अच्छा दोस्त बन चुका था, बिल्कुल मम्मी-पापा की तरह ही बेहद प्यार और सुकून से भरा हुआ।

उसकी आँख अब फिर एकबार गोल-गोल घूम रही थी, मानो अपने बारे में सबकुछ बताने को बेहद उत्तेजित था वह।

‘जैसी सामने वाले की भावना होती है, वैसा ही हमारा शरीर हो जाता है। अपनों के साथ प्यार भरा और दुश्मनों के साथ औजार-सा ही मारक भी। यह सब भी हमारे अंदर की सुरक्षा-प्रणाली ही है, बस और कुछ नहीं। ‘

शिवि ने देखा कि एक भी आवाज नहीं निकल रही थी फिर भी उनके बीच लगातार वार्तालाप हो रहा था , बिल्कुल वैसे ही जैसे सपने में बात करते हैं।

‘पर यह कैसे संभव है?’

उसका बस इतना सोचना ही था कि फरी फ्रैंड में से कभी हरी, तो कभी नीली , पीली और लाल रौशनी निकलने लगी और वह हवा में अब घूम-घूमकर नृत्य करने लगा था। मानो वह शिवि का मन बहलाना चाहता हो, रोचकता भरी दोस्ती का आश्वासन देना चाहता हो। अब तो साथ में दैवीय संगीत भी बज रहा था, ऐसा मधुर संगीत जैसा शिवि ने पहले कभी नहीं सुना था।

बहुत अच्छा लगा तब उसे अपना दोस्त और उसका यह मैत्री भरा व्यवहार।

मित्र फिर बोला उससे- ‘मैंने कहा न, हम भाव-तरंगों पर तैरते हैं। जब भी तुम हमारे बारे में सोचोगी या याद करोगी तो मैं आ जाऊँगा तुम्हारे पास। फिर हमारा कोई विशेष रूप या आकार भी तो नहीं होता। जैसा और जो चाहोगी वही बन सकता हूँ मैं।’

‘चिड़िया, गुड़िया, फूल, तितली बादल कुछ भी?’

मुस्कुराती शिवि पूछे बगैर न रह सकी।

‘ हाँ कुछ भी। पर चलता हूँ अब दोस्त। तुम्हारी सुबह होने वाली है और तुम्हें स्कूल भी तो जाना है। अगली बार तक के लिए विदा लेता हूँ अब मैं तुमसे और तुम्हारी धरती से। याद रखना कि तुम दोनों ही बहुत प्यारे हो, तुम और तुम्हारी यह धरती। क्या नहीं है तुम्हारे पास भांति-भांति के जीव, पशु-पक्षी, फूल पर्वत, नदियाँ सब कुछ ही तो है तुम्हारे पास…कितने स्वाद, कितने रूपरंग हैं? तुमतक पहुँचने में तो अभी हमें सदियाँ लग जाएंगी। ध्यान रखो अपना और अपनी इस धरती का पूरे जी जान से। अन्य गृहों की दौड़ में कुछ भी नहीं रखा। वहाँ पहुंच भी गए तो यहाँ जैसे स्वर्गीय आनंद नहीं मिलेंगे वहाँ पर और ना ही यहाँ जैसा यह तरह-तरह के अनुभवों से भरा जीवन ही। अपनी चीजों को संभालना और उनकी कद्र करना सीखो।‘

कहता वह उठा और अपने रेशे-रेशे से उसे प्यार करता, अलविदा कहता, खिड़की से बाहर चला गया उसी रौशनी की लकीर पर सवार और वैसे ही बन्द खिड़की से ही दोबारा, बिना उसमें छेद किए या कांच को तोडे, जैसे धूप आती-जाती है सुबह उसके कांच से छन-छनकर।

नुकीले फर जो नाचते हुए थोड़ी देर पहले कमरे में गिरे भी थे और जिसमें से एक उठाकर उसने अपनी उंगली पर लपेट भी लिया था उसकी याद की निशानी मानकर, सारे-के-सारे वापस तेजी से उड़े और उसीमें जा समाए।

अब कहीं कोई नामो-निशान नहीं था उसका, कि वाकई में चांदवासी मित्र थोड़ी देर पहले उससे मिलने भी आया था।

कौन विश्वास करेगा उसका सुबह-सुबह जब वह मम्मी-पापा को, अपनी सहेलियों को सारी यह कहानी? किटू तो निश्चय ही पूरा पागल ही समझेगा उसे?
समझने दो।…

उसे पूरा विश्वास था कि चांदवासी दोस्त जरूर मिलने आएगा दोबारा उससे। जल्दी ही, वापस उन्ही विचार-तरंगों पर सवार, जो जुड़ चुकी हैं उससे, बिल्कुल वायरलेस इंटरनेट की तरह ।

सच ही तो सोच रही थी शिवि, जाकर भी नहीं गया था उसका प्यारा चांदवासी दोस्त।

गूंजता ही रहता है सदा उसकी यादों में, उसकी बातों में।

फिर लौट क्यों जाने दिया शिवि ने उसे ?

क्योंकि मित्रता की यही मांग थी उस वक्त, देर-सबेर तो लौटकर आना ही था वापस शिवि के पास उसे!….

शैल अग्रवाल
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
shailagrawala@gmail.com

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