
सच्ची मित्रता
बीसवी सदी की बात है तब बहुत कम हिंदुस्तानी लोग सूरीनाम में डच पढ़ने के लिए स्कूल जा पाते थे | बहुत कम लोग ही अपनी मेहनत से माध्यमिक विद्यालय तक शिक्षा ले पाते थे | ऐसे ही एक सज्जन था जो माध्यमिक शिक्षा का डिप्लोमा लेने के बाद भी बिजली कारखाना में एक मज़दूर का काम कर रहा था | एक दिन वह बिजली के तार ज़मीन में बिछाने के लिए सब्बल से ज़मीन खोद रहा था तभी वहाँ से एक संपन्न व्यक्ति अपनी कार ले वहाँ से निकला, उसने सब्बल चलाने वाले व्यक्ति को पहचान लिया |दोनों व्यक्ति कुछ वर्ष पहले तक सहपाठी थे | कार वाला व्यक्ति अपनी पढ़ाई के लिए हॉलैंड चला गया था और अब वह सूरीनाम में एक उच्च सरकारी अधिकारी था |
जब उच्च अधिकारी व्यक्ति ने अपने दोस्त को सब्बल चलाते देखा तो उसे अच्छा नहीं लगा | वे कार से उतरे और अपने मित्र के समीप पहुँचे| सब्बल चलाने वाले मित्र, जिसका नाम आर्यमित्र था , उसने उन्हें देखा और पहचान लिया | दोनों मित्र काफी समय के बाद एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश हुए | उच्चाधिकारी मित्र ने अपने सब्बल चलनेवाले मित्र को कहा -कल तुम मेरे दफ़्तर आना , मैं तुम्हें एक अच्छी नौकरी दूँगा |
अगले दिन आर्यमित्र अपने दोस्त के दफ़्तर पहुचे | उच्चाधिकारी दोस्त ने उन्हें नौकरी पर रख लिया और काम दिया कि आर्यमित्र को हर गाँव के स्कूल में जाकर लोगों को फिल्म दिखानी होगी | आर्यमित्र अपने इस काम से बहुत खुश थे | सूरीनाम की जनता उन्हें पहचानने लगी थी | गाँव शहर में उनका बड़ा नाम होने लगा था | क्या आप जानना चाहते वह कार वाले उच्चाधिकारी कौन थे ? वह जाने पहचाने सनातन धर्म के सभापति डॉ. क्रिस नंनन पांडे जी थे जो उस समय शिक्षा मंत्रालय के मंत्री थे |
इसे कहते हैं सच्ची मित्रता | मित्रता में न कोई बड़ा होता है न कोई छोटा | मित्रता का अर्थ एक दूसरे की मदद करना ही होता है |
लैलावती लालाराम –हरद्वारसिंह
सूरीनाम , साउथ – अमेरिका

माली की मुस्कान
हम अक्सर जीवन में ऐसे लोगों को देखते हैं जो अपने काम से थक चुके हैं, ऊब चुके हैं या केवल मजबूरी में नौकरी कर रहे हैं लेकिन कभी-कभार कोई ऐसा मनुष्य मिल जाता है जिसकी कार्य-निष्ठा, लगन और सहज प्रसन्नता हमें अंदर तक प्रभावित कर जाती है। मेरे लिए वह व्यक्ति मेरी कॉलोनी के पार्क का माली है।
कई महीनों से मैं उसे देख रही हूँ— कभी पौधों की कटिंग करते हुए, कभी क्यारी की मिट्टी को संभालते हुए, कभी एक पौधे को सावधानी से दूसरी जगह शिफ्ट करते हुए। उसके हर कार्य में मुझे एक अनोखी लय, एक आत्मीयता, एक प्रेम दिखाई देता है। वह सिर्फ पौधे नहीं लगाता— वह उनसे बतियाता है; जैसे हर पौधा उसका अपना बच्चा हो- आत्मिक तृप्ति का अहसास, संतुष्टि माली के चेहरे को हमेशा मुस्कान से घेरे रहती है।
सबसे अद्भुत बात यह है कि मैंने उसे कभी शिकायत करते, थकान जताते या झुँझलाते नहीं देखा। सुबह की धूप हो या शाम की ठंड, वह हमेशा मुस्कराते हुए काम करता है— मानो काम बोझ न होकर कोई तप हो, कोई ध्यान हो।
माली को प्यार से, लगन से, पौधों को सहेजते देख मुझे एहसास हुआ— काम वही हल्का लगता है जिसे व्यक्ति पूरे मन से स्वीकारता है। मैंने समझा कि यदि हम अपने काम को अपने शौक के हिसाब से चुनें, तो जीवन की आधी उलझनें अपने आप सुलझ जाएँ।
माली जो करता है, उससे उसे प्रेम है और प्रेम से किया गया कार्य कभी थकाता नहीं— बल्कि ऊर्जा देता है।
उसके चेहरे पर चमकती संतुष्टि, उसकी आँखों में गहराई से बसने वाली तृप्ति और उसके कर्मों में झलकती निष्ठा मुझे हमेशा प्रेरित करती हैं। ऐसा लगता है जैसे वह केवल पार्क नहीं सजाता, वह अपने भीतर की भुलाई हुई शांति को भी सींच रहा होता है।
आज की दुनिया में जहाँ लोग तनाव, थकान और असंतोष की शिकायत करते नहीं थकते, वहाँ यह साधारण-सा माली काम करके नहीं, बल्कि काम से प्रेम करके जीवन को सुंदर बना रहा है।
उसकी मुस्कान मुझे बताती है— काम की असली खूबसूरती प्रकृति में नहीं, उसे करने वाले के मन में होती है। उसके हाथों से मिट्टी जब पौधों की जड़ों को मिलती है, तो महसूस होता है कि पौधे को जीवन दान मिल गया।
काम तभी पूजा बनता है जब उसमें दबी हुई शिकायतें नहीं बल्कि बहता हुआ आनंद हो। उस माली ने मुझे एक बड़ा जीवन पाठ दिया— जिस काम को हम प्रेम से अपनाते हैं, वह हमें थकाता नहीं— निखारता है और जो काम आत्मा को शांति दे, वही वास्तव में जीवन का सही चुनाव है। काम से संबंध की ऊष्मा ही मन को पोषित करती है।
नीलमणि, मेरठ

असली शिक्षा
यह उस समय की बात है जब मैंने संस्कृत में पीजी करने के लिए कॉलेज में एडमिशन लिया था। हमारी कक्षाएँ रोज होती थी । एक दिन हमें पता चला की संस्कृत के महान विद्वान डॉक्टर उमाशंकर ऋषि सर हमें पढ़ाने आने वाले हैं। हम सभी छात्र छात्राएँ सर को देखने और सर से पढ़ने के लिए बहुत उत्सुक और लालायित थे। सर के आने से पहले हम सभी अपनी सीट पर चुपचाप से बैठ गए।
अपनी आदत अनुसार बोर्ड पर जाकर मैंने ब्लैकबोर्ड को साफ किया।दिन, दिनांक विषय और जो पढ़ाया जाने वाला है उस पाठ का नाम लिखकर मैं चुपचाप अपने सीट पर आकर बैठ गई।सर जैसे ही आए हम सभी खड़े हो गए और उनका अभिवादन किया।सर भी अपनी चेयर पर बैठकर हमें देखने लगे। तभी उन्होंने ब्लैक बोर्ड की तरफ देखा और कहा कि, “यह किसने लिखा है? ”
सब हम एक पल को डर गए और मुझे देखने लगे। मैं भी डर गई कि क्या मुझे डाॅंट पड़ने वाली है लेकिन मुझे लगा कि मैंने ऐसा कोई गलत काम तो किया नहीं है । तभी सर ने फिर से पूछा, “यह किसने लिखा है? ”
मैं तुरंत खड़ी हो गई। “सर !यह मैंने लिखा है । ”
“आपने लिखा है? ”
” जी सर! ”
“क्या आप वीमेंस कॉलेज से पढकर आई है? “यह सुनकर हम सभी को ऐसा लगा जैसे काटो तो खून नहीं। मेरे दोस्तों को छोड़ कर किसी को नहीं मालूम था कि मैंने वहाँ से ग्रैजुएशन किया है फिर सर को कैसे पता चल गया। मैं भी आज इनसे पहली बार मिल रही हूँ।
मैंने पूछ भी दिया।
” जी सर पर आपने कैसे जाना? “सर मुस्कुरा दिए।
“यह जो आपने ब्लैकबोर्ड पर लिखा है उसी से मैं जान गया कि आप वहीं से पढ़ कर आई हैं क्योंकि उस कॉलेज में अनुशासन और नियमपालन के साथ शिक्षा प्रदान की जाती है।यह इस बात को दिखा रहा है कि अपने वहाँ की हर बात को अच्छे से ग्रहण किया है। आपने पढ़ाई कहाँ से की है, अगर आपको यह बतानी पड़ जाए तो यह बहुत शर्म की बात है ।
आपका व्यक्तित्व ,व्यवहार और आपकी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि लोगों को आपको देखकर ही पता चल जाए कि आपने शिक्षा कहाँ से ग्रहण की है जैसा कि मुझे आज पता चल गया। यह बात आप लोग हमेशा याद रखिएगा शिक्षा का असली मूल्य यही है।”
आज भी मैं जब सर की बातों को याद करती हूंँ तो मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है। अपने बच्चों को भी ऐसे ही शिक्षा देना चाहती हूंँ कि लोग देखकर ही कहें कि हाँ यह उस जगह से पढ़ कर आए हैं ना कि उन्हें बताना पड़े।
डॉ मधु कश्यप
वाराणसी

वो शिक्षक, जो जिंदगी बदल गए
“कल क्यों नहीं आईं?” आंटी ने बिना भूमिका के ही पूछ लिया।
“बारिश हो रही थी ना इसलिए”मैंने कहा।
” कल बारिश,आज खुद की तबियत,कल सास-ससुर या बेटे की तबियत फिर कुछ ओर ऐसे ही एक हफ्ता बीत जाएगा तो जो शिड्यूल्ड बना है बड़ी मुश्किल से अपनी सेहत और खुद के साथ समय बिताने का वो बिगड़ जाएगा या बंद ही हो जाएगा ” कहते हुए आंटी गुस्से में वॉकिंग करने लगी वो भी मेरे से तेज़।
मुझे उन्हें पकड़ने के लिए लगभग भागना ही पड़ा,हाथ में हाथ देकर वचन दिया कि अब ऐसा कुछ भी नहीं होगा चाहे कितना भी घर में काम क्यों ना हो।
वो आंटी जो मेरी शिक्षक बनकर आए थे सच में उन्होंने मेरी जिंदगी ही बदल दी… अब वॉकिंग, एक्सरसाइज और योगा से जो बदन में स्फूर्ति और ताज़गी बनी रहती है जिससे पूरा दिन एनर्जेटिक महसूस होता है और काम से थकावट भी नहीं होती। शिक्षक दिवस पर वो आंटी को मेरा प्रणाम।
भाविनी केतन उपाध्याय