पुस्तक समीक्षाः दालान में टंगी लालटेन-संगीता श्रीवास्तव

दालान में टंगी लालटेन
कविता संग्रह
लेखक प्रो सुरेन्द्र प्रताप
समीक्षक डॉ संगीता श्रीवास्तव
वाराणसी।

प्रो सुरेन्द्र प्रताप जी की सद्य प्रकाशित कृति ‘दालान में टंगी लालटेन’ , उनका दूसरा काव्य संग्रह है । उनका अनुभव-संसार विविधताओं से परिपूर्ण है।
*दालान में टंगी लालटेन* सिर्फ प्रकाश ही नहीं दे रही बल्कि कवि के मन को मथ भी रही है। लालटेन की मद्धिम रौशनी में वह तीनों काल खंडों में गोते लगा रहा है। कभी अतीत का स्मृतियां अपनी परछाई ले कर आ जाती हैं,तो कभी वर्तमान की घटित घटनाओं से मन को चोट पहुंचती है और कभी तो वह भविष्य में वर्तमान का सपना देखने लगता है,कभी बेबसी और खींज भी जाता है।
प्रो सुरेन्द्र प्रताप जी विराट फलक के साहित्यिक आलोचक और श्रेष्ठ गंभीर कवि हैं। उनके कविता संग्रह की कविताएं
औपनिवेशिक काल से होते गांव की सादगी, संस्कृति,रीति रिवाजों से होती प्रांतों, क्षेत्रों , परिवार, मित्रगण, आधुनिकता की होड़ में लगे शहरों से आगे विश्व के विस्तृत फलक फिर मानवीय मूल्यों से ऊपर और ऊपर आध्यात्मिकता की सीढ़ी चढ़ती हैं। वे संपूर्ण सृष्टि के संवेदना- संसार को अपनी कविताओं में शब्द देते हुए उनकी पीड़ाओं बेचैनियों, हालातों, परिस्थितियों, घटनाओं , धर्म-कर्म, भाषा, आंदोलन , पर्यावरण,जीव जंतुओं, राजनीतिक दांव पेंच, क्रांति, सामाजिक आंदोलनों को उकेरते हैं।
उनकी कविताएं जीवंतता और यथार्थ से रूबरू कराती हैं। पाठक इन्हें पढ़ कर कवि के विराट व्यक्तित्व का अंदाजा लगा सकते हैं। उनकी कविताएं उनकी दूर दृष्टि का प्रतीक हैं। वे सकारात्मक सोच के स्वामी हैं इस हेतु हर कविता का अपना विशेष महत्व और विशेष उद्देश्य है। वे कर्म काण्ड पर भरोसा नहीं करते , वे मानवीय संवेदना और मूल्यों को सर्वोपरि मानते हैं। उनके जीवन में प्रत्यक्ष घटी घटनाओं ने शब्दों को माध्यम बनाकर कविता का रूप ले लिया है। विश्व की दशा, दिशा और दुर्दशा का वास्तविक स्वरूप कविताओं में मुखरित होता है।
उनकी रचनाएं भोगा हुआ सत्य है । उन्होंने ग्रामीण और शहरी दोनों ही जीवन का यथार्थ चित्रण अपनी रचनाओं में किया है। गांव की संस्कृति, सभ्यता , परंपरा , इतिहास और उसके जीवन मूल्यों से वे आरंभ से ही प्रभावित रहे हैं। इसलिए उनका मन गांव की ओर अधिक खींचता है। गांव की संस्कृति और सभ्यता को शहर धीरे धीरे अपनी अंधेरी गुहा में धकेलता जा रहा है। गांव की सादगी, सहजता और भोलेपन को शहर ने लूट लिया है। इस गहरे दर्द और गहरी चिंता को कवि सुदृढ़ शब्दों में पिरोता है । इस दर्द को कवि कैसे जीता है-
‘धुंध में डूबा गांव’ कविता की पंक्तियां देखिए —
जाति से झर कर आते गीत
अब सुनाई नहीं देते भोर में
नहीं खनकती चूड़ियां
नहीं बजती पायल
नहीं दिखते खूबसूरत पैरों के निशान
एक हाय
होती है छाई
नहीं देता दिखाई
धुंध में डूबा गांव।।

कवि सिर्फ साहित्यकार ही नहीं है बल्कि वह सामाजिक सेवी और कार्यकर्ता भी हैं। सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय सहभागिता भी की है । भाषा के लिए लड़ाइयां भी लड़ी है और नए समाज के निर्माण में सक्रिय भूमिका भी अदा की है। इसके साथ ही वह अपने अतीत में बार-बार झांकता है और वहां से जीवंत मूल्यों को खींच के लाने की कोशिश भी करता हैं।
*काया* ‘ कविता में बानगी देखिए —
हम हैं कि परेशान
लेकर धरोहर
पुरखों की
—–
हम उस आदिम गंध
की तलाश में
रेहन हो रहे —-
घूमती है जहां
निरंतर ब्रह्मांड में
अमर आत्माएं
देखता हूं सिवान में
घड़रोजों की चौकड़ी
हवा में झरते
भर्तृहरि के गीत
कत्त‌ई हैरान नहीं
की कोई शहर मर रहा
परेशान हूं कि
मेरी काया में समाहित
शब्द मर रहे।।

कवि अपने बीते हुए सुंदर लम्हों को सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं , पर एक पीर सी है दबी सी कहीं । *खत* कविता में देखिए —
क्या करें इन ढेर सारे खतों को
कितना सहेजू खुद से
राख कर दूं
या सांसों में भर लूं । ——-
घर की हर खिड़की से
झांकती थी मां
बंद है खिड़कियां अब
किसे बुलाऊं दहशत भरे दिन में।

कवि तत्कालीन समय में जिनके विचारों से प्रभावित रहे उनको भी शब्दों में उकेरते हैं। जैसे लोहिया जी,चेग्वारा, गांधी, अंबेडकर जी अन्य । वे सामाजिक बदलावों से बहुत अधिक चिंतित हैं और भावी पीढ़ी का क्या भविष्य होगा इसे लेकर अत्यधिक गंभीर तो हैं ही परेशान भी हैं, आज के दौर में उन्हें कोई ऐसा विश्वास पात्र नहीं मिलता जिसे अपनी पारंपरिक थाती सौप कर वह मुक्त हो सके।
ऐसा ना होने पर ये पीड़ा उनके हृदय को चीरती है।
*सांझ* कविता में वे लिखते हैं –
कितने दिन काटे
चेग्वारा, गांधी, लोहिया, अंबेडकर को लेकर
सजे-संवरे सपनों को छोड़ आऊं
किसके भरोसे
देखता हूं एक सनसनी सांझ
मेरे सीने को चीरती जाती है।

कवि समाज की बुनियाद स्त्री को नहीं भूलता, क्योंकि वह जानता है कि औरत के बिना संसार चलायमान नहीं हो सकता। औरत, घर और समाज की रीढ़ की हड्डी है।
औरत का अस्तित्व कितना महत्वपूर्ण है कि वह सारी मुश्किलों को अपने आंचल में समेटे लेती है। उसके साहस और आत्मविश्वास की दाद देनी पड़ेगी। लड़कियां,दिनचर्या आदि ग्रामीण जीवन की विशुद्ध कविताएं हैं।
इसे *देवानजी** कविता में लिखते हैं –
देश-दुनिया के
दुखों, खुशियों, विपदाओं को गुडीगुडी के धुएं में उड़ाती मुस्कुराती होती देवान जी।।

*मां* मार्मिक कविता है —
इसकी अंतिम पंक्तियां दें रही हूं
मां के न होने पर हम तीन ही थे घर में
हर रोज एक नया फूल खिलता क्यारियों में उन्हीं
फूलों को सहेजने पर आती है मां की याद
दरवाजा खुला है
कि कोई भी आए जब भी।।
*फटी भीत की करुणा* स्त्री की पीड़ा से उठती हैं और फिर न‌ई दुनिया के महाकाव्य तक जाती आशावादी कविता है। सुंदर बिंब रचना भी है–

बाहर किसी विलाप
की आवाज आ रही
मेरे पास किताबों में
किसी स्त्री का अंतर्नाद
बर्तनों की खनक
बटलोहिए में पकते भात की तरह
पकती है सांसें
फटी भीत की भीतरी तहों में करुणा दबी पड़ी रिसती।।

एक कविता *बाबा की होगी* *सरकार* गांव का बदलता माहौल और आधुनिकता का घटाटोपी जीवन के द्वंद का बखूबी चित्रण करती है। कैसा उसका रहन सहन, सामाजिक ताना-बाना था । उसके हालात कैसे रहते थे और भविष्य में बाबा की सरकार में उसका जीवन कैसा होगा ?
धीरे-धीरे गांव
भयानक शक्ल में तब्दील हो रहा है
सिर्फ नीब के पेड़ और
पुराने कुएं , कोल्हूओं को छोड़ हर गली पगडंडी
गुम हो रही है
मचान पर बैठा आदमी
दूसरे का खेत काट रहा
अपने खेत का सुग्गा
दूसरे के खेत में हांकता
सुग्गा दाना चुग़ता।।

कवि राजनैतिक दौर में छात्र जीवन काल से ही समाजवादी आंदोलन में सक्रिय भागीदार रहे और सन् 1967 में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन में गिरफ्तारी भी दी जेल भी गए। इस दौर में घटित स्थितियों , संवेदनाओं, विविधताओं , बेबसी और मनोभावों को उद्घाटित करते हैं। मोर्चा,जन आवेग, कुर्बानी, बाबा की होगी सरकार, माह्नवीशरण के न होने पर, आदि क‌ई अन्य रचनाएं ऐसी ही हैं।
*मोर्चे* कविता में उनका आवेग और आक्रोश देखते ही बनता है- शामिल बाजे में बजूं
क्या करूं
कहां जाऊं
दिल्ली
या मुंबई
तन कर खड़ा हो जाऊं
सड़क के बीचों बीच
चीखूं- चिल्लाऊं
कि आ जाओ मोर्चे पे
गाड़ दिया है खूंटा।।

एक अन्य रचना है जो कवि मन की बेचैनी दर्शाती है जो तत्कालीन समय में अपने सामाजिक परिवेश, हालात, देश को बचाने की आतुर है । उसका उत्तरदायित्व और कर्त्तव्य बोध की अडिग था। कितनी बेचैनी थी । किसी भी देशकाल व परिस्थिति में हार न मानने की जीजिविषा थी ।
*’माह्नवीशरण के न होने से ‘ –* कुछ पंक्तियां —
एक कुर्ता पायजामा चप्पल के सिवाय
तुमने कभी कुछ नहीं चाहा था मुफलिसी फटेहाली हर दिन की तंगहाली में
समाजवाद का परचम फहराने दिन-दिन भर शहर का चक्कर काटते
हर कार्यकर्ता के घर की सांकल खटखटाते
हर जुलूस को उठाते
हर सभा-धरना कार्यक्रम को जागते हुए
जेल जाते रहे
एक हाय, दिल के शोले की तरह लगाकर
कहां अदृश्य हो गए तुम।।

काली और विरान होते जंगल, वन, पर्यावरण और जीव जंतुओं के प्रति चिंतित है, परेशान है। कवि की बेचैन आत्मा ढूंढ रही है सुकून, मुक्ति की लालसा है । यह सही है कि दुनिया को बदलने में तो असमर्थ हैं तो स्वयं ही बदलना चाहता है।
*फ़िदा हूं* कविता में —

हे महादेव मुझे शक्ति दो
कि शब्दों को प्यार में बदल सकूं
ना बदल सकूं दुनिया को
तो खुद को बदल लूं।।।

*अपील* कविता देखिए। छोटी है पर घाव भीतर तक करती है। पृथ्वी को बचाए रखने की तमन्ना —
कविताओं
भेदना लक्ष्य
मत लौटना किताबों में पुस्तकालय में
कवि के घर
पहुंचना दुनिया के
आखिरी छोर पर
जहां बची हैं उम्मीदें
बची है गरिमा
कविताओं
बचा के रखना
अर्जित संवेदनाएं
आखिर तक
जब तक पृथ्वी रहे।।

इस संग्रह की रचनाओं में बहुत से ऐसे शब्द मिलेंगे जो ग्रामीण अंचल के विलुप्त होते शब्द हैं पर कवि उन शब्दों को बचाने का प्रयास करते हैं। ये शब्द अब कहीं-कहीं और कभी-कभी ही प्रयोग में दिखाई देते हैं।
जैसे भरसाय, खपड़ा, फुल्लियों ढिबरी,बखरी,नीबकौड़ी,खपसता,खेताऊ,डहडहाती,बरधा,बटलोहिए, पाथती , रोपती, सुग्गा आदि। कविताओं में इन शब्दों का संवेदनाओं और मनोभावों के साथ सुंदर ताल-मेल हुआ है।
कवि काशी में बरसों से रह रहा और नित-नित बदलते परिदृश्य से नावाफिफ नहीं है, फिर भी काशी ही उनका कर्म क्षेत्र है। काशी की दशा और दिशा को दर्शाती क‌ई रचनाएं हैं जो मानव मस्तिष्क में अनेकानेक सवालात खड़े करती हैं – मैली काशी, मुक्ति, दृष्टि, काशी, कबीर चौरा का तिलिस्म, ज्ञानगंज, शहर ।
वर्तमान में पुरातन और सनातन काशी अपना अस्तित्व खोती जा रही है। समय के साथ परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। “सदी के आखिर में’ काशी कैसी होगी? इसका भी चित्र उकेरा है — कुछ पंक्तियां —
एक अंधी दौड़ में शामिल
शहर, शहर का भूगोल
नहीं रखता मायने
शहर कल कहां होगा
क्या पता
एक सुबह बदल जाएगा शहर बदल जाएगी भाषा
आदमी की संवेदना, सोच धारणाएं
गायब हो जाएगी पथरीली
रपटीली अंधेरी सांवली गलियां रंग जाएगा शहर
किसी एक रंग में
बदल जाएगा शहर
सदी के आखिर से पहले।।

काशी की उर्वरा शक्ति हैं गंगा।
वे मां गंगा को स्मरण करना नहीं भूलते पर उन्हें चिंता है कि आज किस हाल में गंगा पहुंच गई है।
‘गंगा’ कविता में भी लिखते हैं —-
धन्य है यह सीढ़ियां
सीढ़ियां जाती है धोने
आदमी की पीड़ा
इन्हीं सीढियों में सिमटा है
विश्व ज्ञान
इन्हीं पत्थरों में घिस रहा है
सर्व-धर्म , सम भाव
इन्हीं सीढियों से उद्बुद्ध है हजारों स्वर लहरियां
विश्व के कोने-कोने
गंगा जल पी पी रचे गए
महान ग्रंथ महाकाव्य
ज्ञान रस पीकर मुक्त हुए
लाखों करोड़ों ।।
मुझे ऐसा लगता है कि कविताएं आज के आधुनिक परिवेश में अतीत के सच के साथ साथ वर्तमान का सच , गंगा की दुर्दशा और सामाजिक परिवेश, सोच और मानसिकता भी चित्रित करती है। यह यथार्थ है कि आज दुनिया दिखावा व आडंबर परस्त हो ग‌ई है। कविता इसी भाव पर कटाक्ष भी करती है
वे आगे लिखते हैं —-
देखो गंगा वरुणा को
देखो एक नदी को मरते हुए अपनी पाप छाया से मुक्त होते बदरंग और कुरूप होते
अस्सी की तरह।।
क‌ई रचनाएं ऐसी भी हैं जो समाज की धार्मिक विडंबनाओं और ढकोसलों पर व्यंग करती हैं क्यों कि धर्म चरित्र और मानसिकता से जुड़ा है। धर्म कर्म से जुड़ा है। कर्म , मानवता से संबंध रखता है। यदि व्यक्ति मानवता का पोषक नहीं तो धर्म-कर्म सब व्यर्थ है।
कविता — *मूर्तियां* में देखिए
मंदिरों में कैद
मूर्तियां
कब बाहर आएंगी
सहस्त्र शताब्दियों से
बंद है
कहां है उनका मुकुट
खड़ाऊं
कहां है आसान
कहां है वो मंत्र
श्लोक
पंडित पुजारी
कब बोलेंगी मूर्तियां।
इसी तरह की अन्य क‌ई कविताएं भी हैं।
कवि अपने समय में राजनीति में भी दखल रखते थे और समाजवादी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते रहें हैं। समाजवादी विचारधारा भी उनकी कविताओं में मुखरित हुई है।
कवि ‘ समाजवाद’ नामक कविता में लिखते हैं —
मेरे पास एक शब्द है प्यार
किसे सौंप दूं
मेरे पास एक फूल है
गीत है
मेरे पास एक कलम है
क्या लिखूं
कौन सा गीत
प्यार का गीत
बहार का गीत
या क्रांति गीत
क्या लिखूं —-
मेरे पास एक शब्द है
समाजवाद
दौड़ जाए
यह शब्द तुम्हारी रगों में
दूर तक
धड़कने लगे ब्रह्मांड में।।

अंत में एक शब्द है *शब्द*।
शब्द ब्रह्म है और शब्द शून्य भी है। इस *शब्द* शब्द पर उनकी अनेक उत्कृष्ट रचनाएं हैं जो शब्द को अनेकानेक रुपों में , अनेक अर्थों में व्याख्यायित करती हैं। शब्द तो अमृत कलश बन गया और कलम उसकी धार ।
संग्रह की सारी कविताएं किसी न किसी रूप में पाठकों के मन को अंदर तक झकझोरती हैं, संवेदित करतीं हैं, चाहे अतीत की स्मृति के रूप में, चाहे ग्रामीण जीवन की पीड़ा हो, चाहे वर्तमान में तीव्रता से बदलते परिवेश और मनोभावों के रूप में, चाहे उज्जवल भविष्य की कामना के रूप में। कवि हर दृष्टि से अपनी संस्कृति,सभ्यता और मानवीय मूल्यों को बचाने का प्रयास अपनी रचनाओं के माध्यम से करते हैं।

इतने उत्कृष्ट काव्य संग्रह के लिए कवि को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

डॉ संगीता श्रीवास्तव
संस्थापिका सचिव
महापंडित राहुल सांकृत्यायन शोध एवं अध्ययन केंद्र संस्था
वाराणसी, उत्तर प्रदेश,भारत

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