पावस रागः पद्मा मिश्रा


पावस राग
बादलों के संग क्यों उड़ने लगा है मन
बादलों के संग क्यों उड़ने लगा है मन
कल्पना के जाल क्यों बुनने लगा है मन
इन्द्रधनुषी स्वप्न के संग रात भर ,
बीन के तारों सदृस बजने लगा हैं मन ?
हरित वर्णा हो गई है सांवरी धरती ,
बादलों के प्यार ने क्या चातुरी कर दी ?
रिम्झिमी बरसात की बूंदें निरंतर ,
नव प्रणय की भावभीनी अंजुरी भरतीं .
श्रावणी सन्देश लेकर यह घटा ,चमकी
नयन में मानो विरह की ज्वाल सी धधकी ,
यह हवा लाई है क्या संदेश प्रियतम का /
आ गई है याद मानो मिलन के क्षण की .।


जब बरसे बादल
जाने कैसी बूंदे बरसी ,मेरे आँगन में,
भींग गया तन मन जीवन सब
भींगे सावन में.
कजरारे मेघों ने कैसा जादू कर डाला,
रिमझिम बूंदों ने, जीवन का,
हर पल रंग डाला .
शाम सुहानी आती है,सन्देश नया लेकर,
सपने सजते हैं पलकों पर,
ले इन्द्रधनुष के पर,
शीतल हवा सुना जाती है,
बात किसी पल की,
नन्हीं बूंदें दोहरा जातीं, बातें जो कल की.
जावा कुसुम के पात खिल गए,
कलियाँ मुस्काईं,
लहराया अशोक ,चमेली, –
जाने क्यों शरमाई।
बूंदों के सरगम मे झूमती धरा
भीगी धरती के आंचल में.मौन हो गया सब।

बूंद एक बरसी है जीवन की
भींगा नभ,भींगा मन
धरती का अंतर्मन
अंकुर बन फूटी हैं उम्मीदें जन जन की
बूंद एक बरसी है जीवन की,
आतप ने सोख लिया मौसम का जीवन रस
तप्त हुए ,पात सभी, डालियां भी मुरझाईं
मुरझाए फूलों की आंखें भर आईं हैं
यही एक आशा विश्वास लिए जागी है
कलियां जो रातों को सोई नहीं,,
सपनों की नींद, कहीं दूर के नगर में,
वैरागी भंवरे की प्रीत की
बूंद एक बरसी है जीवन की,
आए हैं मेघदूत, उमड़ रहे नभ में
भरी मांग नदिया की,मन के जल दर्पण में
हुलसित मन -आगन में
सुधियो के पाखी की,पोर पोर डूबी है पाखे
आस जगी पाहुन के आने की
बूंद एक बरसी है जीवन की,

नदी बह रही है,
जैसे गतिमय प्रवाह जीवन का।
लहरों सा क्रम,उठना और गिरना।
डूबना है या नदी के पार जाना है,
बैठ तट पर सोचती,
आंखो का सपना।
सबने अपने दांव खेले,
जीत है किसकी?
साथ सबका भ्रम है केवल,
साथ नहीं कोई भी।
आ फंसेगीं मछलियां किस जाल में,
यह भला है जानता कौन?
नदी बह रही है,और उम्मीदें भी।

जीवन-जल
बादल पानी फ़ूल बहारें, रिमझिम बरसातें,
धरती ने बांटी हैं जग में अनुपम सौगातें,
मौसम ने जब से रंग बदले, कर ली मनमानी,
तार तार हो गयी धरा की वो चूनर धानी.
ताल ताल की सोंन चिरैया,बिन जल बौराई,
बूंद बूंद को प्यासी नदिया ,अश्रु बहा लाई.
ऊँचे महलों ने छीनी है,जीवन की धारा,
हरियाली के अंकुर छीने ,अमृत रस सारा.
जंगल कटे,कटी नदिया के तट की वो माटी,
माटी में मिल गयी धरा के सपनों की थाती.
कलियाँ मुरझाईं, पलाश के पल्लव सूख गए,
कंक्रीटों के जंगल बढ़ते, बादल रूठ गए.
अमराई में जैसे कोयल गाना भूल गयी ,
मंजरियाँ सूखीं रसाल की,खिलनाभूल गईं.
दादुर ,मोर,पपीहे की धुन सपनों की बातें,
अब तो प्यासी धरती है और पथरीली रातें.
पावस झूठा, सावन रूठा, पर अँखियाँ बरसी,
धरतीके बेटों ने रंग दी कैसी यह धरती.
ये धरती माता है जिनकी ,वो कैसे भूल गए?,
निर्वसना माँ के दामन में बांटे शूल नए.
सिसक रही कोने में सिमटी मानव की करुणा,
वापस कर दो मेरी धरती, जो थी चिर तरुणा.
उस ममता को उन्ही रोते बीत गए बरसों,
जिसने बांटा अमृत रस, ममता का धन तुमको.
बंद करो यह धुंआ विषैला अब तो दम घुटता है
प्यास बढ़ी, पानी बिन जैसे यह जीवन लुटता है.
अगर प्रकृति की बात न मानी, मानव पछतायेंगे,
जीवन -जल की बूंद बूंद को प्राण तरस जायेंगे.

पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

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