
उलझे हुए धागे
“अरे रधिया, तू अब तक धागे सुलझा रही है? सुबह से देख रही हूँ… मशीन चली ही नहीं!”
“मशीन तभी चलेगी, चाची… जब ये धागे अलग-अलग होंगे। सब एक-दूसरे में फंसे हैं।”
“धागे ही तो हैं, काट दे कुछ को… नया लपेट ले। इतना माथापच्ची क्यों कर रही?”
“हर रंग का एक मतलब है, चाची… ये नीला पापा की पैंट से बचा था… ये सफेद मां की साड़ी से… और ये लाल? ये तो मेरी पहली फ्रॉक का है। काट दूँ क्या?”
“तो क्या हर टुकड़ा सम्हाल कर रखेगी? पुराने धागे नई सिलाई में उलझन देते हैं, रधिया।”
“मैं उलझन से डरती नहीं… जो उलझे हैं, वही सिखाते हैं जोड़ना।”
“कभी-कभी जोड़ने की कोशिश ही हमें और उलझा देती है।”
“या फिर सिखा देती है कि धैर्य क्या होता है। देखो ना, ये गांठ खुल गई…”
“चलो… कम से कम मशीन अब चलेगी?”
“अब चलेगी भी… और बोलेगी भी। हर टांका मेरी एक कहानी है, चाची… उलझे हुए धागों से बुनी हुई।”

“हंसी का पोस्टर”
बस अड्डे की टूटी बेंच पर बैठी रधिया की आँखें सूख चुकी थीं। अब रोने से भी कुछ नहीं बदलने वाला था। परचे हाथ में थे—रंग-बिरंगे, चमकते हुए, हर एक पर वही चेहरा मुस्कुरा रहा था, जो हर चुनाव से पहले गाँव में मीठी बोली में वादों की झड़ी लगा जाता था।
“घर-घर शौचालय,” “हर हाथ को काम,” “बेटी बचाओ, पढ़ाओ”—जैसे नारे अब उसे चिढ़ाने लगे थे। दसवीं पास रधिया की बेटी, सरस्वती, पिछले साल इंटर में पूरे जिले में टॉप आई थी। अख़बार में फोटो भी छपी थी। नेता जी खुद माला लेकर घर आए थे, सेल्फी खिंचवाई थी।
फिर वही नेता—आज सरस्वती की छात्रवृत्ति फाइल फाड़कर कह रहे थे, “रिकॉर्ड गायब है, बाद में आइए।”
पिछली बार भी रधिया यही सुनकर लौटी थी। इस बार बस कुछ बदला था—सरस्वती की आँखों की चमक बुझ चुकी थी।
“बिटिया अब खेतों में काम करेगी,” रधिया ने मन में तय किया। स्कूल की दीवार पर चिपका सरस्वती का पोस्टर अब भी हँस रहा था—सिर पर नेता जी का हाथ, नीचे ‘नारी-गौरव सम्मान योजना’ का चमचमाता लोगो।
पास ही बकरी चरा रहा घसीटे चच्चा ने मुस्कराकर कहा, “अब तो बहुते आगे बढ़ गई है सरस्वती… कागज पर।”
रधिया कुछ नहीं बोली। बस पोस्टर की तरफ देखा—वो हँसी अब झूठी लग रही थी|
कुछ दूर पर सरस्वती मिट्टी में गड्ढा खोद रही थी—कह रही थी, “अम्मा, अब पढ़ाई नहीं करनी।”
रधिया ने परचे फाड़कर हवा में उड़ा दिए, और नेता जी की हँसी आसमान में तैर गई—बिना ज़मीन के।
अंत में पोस्टर दीवार पर रह गया।
सरस्वती खेत में |
सपने कहीं नहीं |

डिलीट का बटन
आकाश ने मोबाइल की स्क्रीन पर उंगलियाँ फेरीं। चैटबॉक्स खुला था — नीला गोला, “टाइपिंग…” और फिर चुप्पी।
कभी ये चैट उसकी दुनिया थी। वही प्रिया, वही इमोजी, वही “क्या खाया?” से लेकर “सो जा पगले” तक की बातें। लेकिन अब? अब हर जवाब में एक थकान थी। एक औपचारिकता।
कॉल की घंटियाँ बजतीं और काट दी जातीं। रिप्लाई “सीन” बनकर रह जाता। और आज… आज उस चैट में आखिरी मैसेज था —
“हम आगे नहीं बढ़ सकते। मत पूछो क्यों। बस मान लो।”
आकाश ने उंगलियाँ कांपते हुए उस चैट पर होल्ड किया। स्क्रीन पर कुछ विकल्प उभरे:
आर्काइव,म्यूट, डिलीट,
उसने गहरी साँस ली। फिर आँखें बंद करके “डिलीट” दबा दिया।
लेकिन डिलीट करके भी कुछ हल्का नहीं हुआ। उल्टे अब एक खाली जगह और चुभ रही थी — वहाँ जहाँ कभी शब्द थे, एहसास थे, प्रिया थी।
मोबाइल की स्क्रीन काली हो गई। पर उसके भीतर एक पुरानी स्मृति की स्क्रीन अब भी जल रही थी — जिसे न “डिलीट” किया जा सकता था, न ही “म्यूट”।

अधूरी अलमारी
शीला ने आज सुबह-सुबह अलमारी खोली। कपड़ों के ढेर के बीच कई खांचे खाली पड़े थे—जिनमें उसकी पसंद के कपड़े कभी जगह नहीं बना पाए। शादी के बाद से उसमें जो भी जुड़ता गया, सब दूसरों की पसंद का था। सास की करबाचौथ पर दी गईं ‘सितारों वाली साड़ी’ पति की शादी की सालगिरह पर लाई गईं ‘बूँटों वाली साड़ी‘ | मोहल्ले वालों की, रिश्तेदारों की, इनकी, उनकी दी गईं अनगिनत सड़ियाँ |
नौकरी के लिए खरीदा हुआ उसका एकमात्र सूट, अलमारी के बिल्कुल कोने में दबा पड़ा था। महीनों की धूल में दबा, जैसे किसी अधूरे वादे की याद।
उसने एक-एक कर सारे रेशमी लिबास बाहर निकाले और थैले में भर दिए। सूट को झाड़कर सामने टाँग दिया।
आईने में नज़र पड़ी। हल्की मुस्कान आई, फिर होंठ कस गए।
धीरे से बुदबुदाई—
“अलमारी पूरी करने का वक़्त अब दूसरों को नहीं दूँगी।”

पोस्टकार्ड
शहर के कोने पर बने ‘स्नेहनिकेतन वृद्धाश्रम’ में आज चहल-पहल कुछ ज़्यादा थी। नये साल की शुरुआत थी — बाहर से लोग उपहार और खाना लेकर आए थे। बुज़ुर्गों के चेहरे पर थोड़ी रौनक थी, सिवाय एक के — श्रीधर बाबू, 82 वर्षीय पूर्व डाकिया, जिन्हें किसी ने वर्षों से याद नहीं किया था।
वो हमेशा दरवाज़े की ओर पीठ किए बैठते। कहते, “अब कौन चिट्ठी लिखता है! लोग जब बूढ़े हो जाते हैं, तो याद भी पुरानी हो जाती है।”
संध्या में आश्रम की देखरेख करने वाली नर्स मीरा उनके पास आई। हाथ में एक रंगीन लिफाफा था — उस पर पुराने हस्ताक्षरों में नाम लिखा था:
“प्रिय बाबूजी — आपका बेटा, रवि।”
श्रीधर बाबू के हाथ काँपे। काँपती उँगलियों से चिट्ठी खोली। पढ़ना शुरू किया —
“बाबूजी, आपको बहुत याद करता हूँ। नौकरी और ज़िम्मेदारियों के बीच फँस गया हूँ, लेकिन जल्द ही आपसे मिलने आऊँगा। आप जैसे पोस्टमैन ने देश को जोड़े रखा — मैं गर्व से कहता हूँ कि आप मेरे पिता हैं।”
श्रीधर बाबू की आँखें भीग गईं। बोले — “रवि… बहुत बदला है… पहले इतना लिखता नहीं था…”
मीरा अपने एक झूठ की ख़ुशी और सुकून देखकर मुस्कुरा दी।
. वीना सिँह – लखनऊ